रसीद नं0 ग्यारह: कहानी (हनीफ मदार)

कथा-कहानी कहानी

हनीफ मदार 13 2018-11-17

समय के बदलाव के साथ कदमताल करते हुए चलने एवं बेहतर जीवन यापन के लिए बेहतर शिक्षा व्यवस्था की जरूरत को समझने समझाने के भ्रम जाल के बीच, समय के साथ मुस्लिम समाज में भी पुरानी बंदिशें टूटने लगीं हैं| जलसे आदि में भी शिक्षा व्यवस्था में बदलाब पर बहस की शुरुआत हो चुकी है| लेकिन हनीफ मदार जैसे कलमकार इन विषयों पर कहानी लिखकर महत्वपूर्ण एवं सार्थक रचनात्मक हस्तक्षेप कर रहे हैं | – अनीता चौधरी

रसीद नं0 ग्यारह

दोनों ने दुआ-सलाम किया और अन्दर आ गये। लियाकत अली ने मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा तब तक वे दोनों उनके पास आकर गर्मजोशी से हाथ बड़ा चुके थे। अब घर ही इतना छोटा है कि चौखट पार की और मास्टर साहब के पास। मास्टर साहब मानी लियाकत अली एक जूनियर स्कूल में प्रधानाध्यापक हैं। स्कूली अध्यापकों तथा शिक्षाधिकारियों के लिए एक सनकी आदमी। दरअसल उनकी सनक कोई पागलपन नहीं है बल्कि कहीं कुछ गलत होते देखकर उनकी भिड़ जाने की प्रवृत्त को लोगों ने सनक का नाम दे रखा है। रुस्तम नगर के इस स्कूल में अब अध्यापकों का समय से आकर पढ़ाना और बच्चों की संख्या चार सौ से ज्यादा हो जाना लियाकत अली के भिड़ जाने का ही नतीजा है । पहले तो यहां मास्टर आते ही नहीं थे बच्चे आकर करते भी क्या । इस के लिए शिक्षाधिकारियों से कई बार भिड़े। उन दिनों लियाकत अली पर कई तरह के दबाव बनाये गये एक बार तो टर्मिनेट हुए लेकिन हार नहीं मानी बोले गलत नहीं हूं सही के लिए लड़ता रहूंगा। फिर बहाल हुए और अब उन मास्टरों को भी समय पर आकर पढ़ाना होता है जिन्होंने कभी स्कूल आना ही नहीं सीखा था।
सरकारी मतगणना, चुनाव ड्यूटी, पोलियो दिवस या अन्य ऐसे कार्यं में मजाल है कि इस स्कूल के किसी मास्टर की ड्यूटी लग जाय। कौन आयेगा ड्यूटी लगाने उसे पहले लियाकत अली के सवालों का जवाब देना पड़ेगा ‘‘संविधान में एक अध्यापक की क्या जिम्मेदारियां हैं ….? पढ़ाना ज्यादा ज़रुरी है या इन कार्यं में अपने कर्तव्य का मज़ाक उड़ाना ….? हमसे यही कराना था तो हमको बी-एड या बीटीसी या अन्य टीचर ट्रेनिंग के बाद ही क्यों भर्ती किया गया ….?’’ मसलन उनके यूं भिड़ने की आदत के कारण उन्हें सनकी कह देते हैं लेकिन कोई अधिकारी भिड़ता नहीं ।
आज की ही बात ले लो अपने मित्र शर्मा जी के पास बैठे थे उनके बहनोई भी आये हुए थे चलती बातों में उनके मुंह से निकल गया कि मुसलमान बच्चे ज्यादा पैदा करते हैं। बस फिर क्या था भिड़ गये ‘‘मेरे पास केवल दो बच्चे हैं आपके पास तो फिर भी तीन हैं …. और आस-पास से लेकर बड़े राजनेताओं तक के ऐसे कितने ही नाम गिना डाले जिनके पास पांच-पांच या आठ बच्चे हैं। आखिर घंटों बहस के बाद शर्मा जी के बहनोई को लियाकत अली की इस बात से सहमत होना पड़ा कि बच्चों की पैदाइश को किसी वर्ग या जाति विशेष से नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि इसका कारण अशिक्षा ही है।
शर्मा जी के घर से वापस आते हुए मन ही मन उन्होंने अपनी कौम पर खूब खीझ उतारी ‘‘सदियों से दीन की हिदायतोें को कंधों पर लादकर खड़े हैं कितना कुछ बदल गया वह दिखाई नहीं देता ….. बस मुल्ला बने फिरते हैं । काश कि शिक्षा पर भी ध्यान देते तो इन लोगों को ऐसी झूठी-सच्ची अवधारणाऐं गढ़ने का मौका तो नहीं मिलता ‘हम बच्चे ज़्यादा पैदा करते हैं ….. आतंकी भी हम ही हैं …. काश कि पढ़-लिखकर अंबेडकर की तरह जवाब दे पाते ….।’’ लियाकत अली अपना यह गुबार भी शायद शर्मा जी के घर ही निकालते यदि उनके भाई छोटे का फोन न आ जाता । छोटे को पी0 सी0 एम0 से ग्रेजुएशन कर चुकी अपनी बेटी के लिए किसी इंजीनियरिंग कॉलेज के चयन और उसके खर्च की समस्या के समाधान के विषय में बात करनी थी ।
मास्टर जी यानी लियाकत अली अभी घर पहुंच कर रास्ते भर की झुंझलाहट को झटक कर कुछ संयत होकर छोटे से बात-चीत शुरू कर ही रहे थे कि इन दोनों ने दस्तक दे दी। लियाकत अली और छोटे ने बारी-बारी दोनों से हाथ मिलाया और उन्हें बैठने का इशारा कर फिर अपनी बातों में मशगूल हो गये।
असल में मास्टर जी और छोटे की बात-चीतों के बीच में उनके यूं अनायास आने ने ही उनकी बातों के सिलसिले की चूलें हिला दी थीं। एकाग्रता टूट गई थी। तारतम्य भंग हो गया था। फिर भी मास्टर जी छोटे के साथ बातों का क्रम जारी रखने का बहाना भर कर रहे थे । क्यों कि वे अब उन्हीं बातों को दुहरा रहे थे जिन्हें वे कुछ देर पहले भली भांति बोल चुके थे । जबकि उनका दिमाग उन दोनों को पहचानने की क्रिया में तेजी से पन्ने पलटने लगा था। इस बहाने मास्टर जी को थोड़ा-सा वक्त मिल पा रहा था। खुद को किसी नतीजे पर न पहुंचता देख उन्होंने आनन-फानन में छोटे की आंखों में देखना चाहा कि शायद वह उन दोनों को जानता हो।
यूं तो छोटे भी मास्टर जी की बातों में हां या ना जोड़कर उन्हें सहयोग देने का उपक्रम कर रहा था किन्तु उसकी नज़रें बारी-बारी उन दोनों पर आ जा रही थीं साथ ही उसकी आंखों में उन दोनों के प्रति एक हेयतापूर्ण घृणा की झलक स्पष्ट दिख रही थी । मास्टर जी अभी कुछ भी समझ नहीं सके थे कि उन दोनों में से ही एक आदमी बोला-
‘‘अल्लाह की रहमत है, हमारी खुश किस्मती देखो कि दोनों भाई आज एक साथ मिल गये।’’ सुनते ही मास्टर जी इतना तो समझ ही गये कि यह दोनों छोटे को और छोटे इन दोनों को पहचानता तो है और उन्होंने मास्टर जी को छोटे के भाई के रूप में इसलिए आसानी से पहचान लिया कि मास्टर जी और छोटे दोनों की शक्लें बहुत हद तक हू-व-हू मिलती हैं। अब मास्टर जी भी उनकी तरफ मुड़ गये।
दोनों आगन्तुकों के मुंह पान मसाले से इस कदर भरे थे कि चबाये हुए मसाले और उनके दांतों में फ़र्क कर पाना मुश्किल हो रहा था। चेहरे पर लगभग पूरी तरह सफ़ेद हो चुकी दाढ़ी पर मेंहदी जितनी चमक रही थी उसके ठीक विपरीत बदन में कुर्ता पायजामा उतने ही गंदले थे। पुरानी घिसी हुई चप्पलों से उनके धूल भरे पैर मायूसी से झांक रहे थे।
अभी मास्टर जी उनसे बात-चीतों के लिए सिरा खोज ही रहे थे कि वही पहला आदमी बोला ‘‘आपका अख़्ालाक बड़े क़माल का है ….. यहां चूड़ियों के तकाजे पर आये थे तो सोचा आपसे भी मुलाक़ात कर ली जाय ….. चन्दे के लिए।’’ इस अंतिम शब्द को वह एक पल ठहर कर बोला था। इससे पूर्व का पूरा वाक्य जैसे उसने इसी शब्द की भूमिका में बोला था।
‘‘चन्दा …..?’’ मास्टर जी ने इतना ही पूछा था।
‘‘मस्जिद के लिए ।’’ उसने तपाक से जवाब दिया और बहुत धीमे से मुस्कराया जैसे भीतर की खुशी का एक अंश बाहर होठों पर आकर फैल गया है। दूसरे ने अपने कुर्ते की जेब से एक रसीद बुक निकाली जो ऐसी भाषा में छपी थी जो मास्टर जी और छोटे दोनों के लिए काला अक्षर भैंस बराबर थी। इनमें से कुछ ग्यारह, इक्कीस, इक्यावन की कटी रसीदों पर नाम भी रसीद बुक छपाई बाली भाषा यानी उर्दू में लिखे थे। अब तक मास्टर जी उन दोनों को पूरी तरह समझ चुके थे वे उनकी हालत देखकर अजीब से क्षोभ से भर उठे। मास्टर जी ने प्रतिक्रिया जानने के उद्देश्य से छोटे की तरफ देखा। छोटे उन्हें अजीब सी वितृष्णा से भरा दिखा। जैसे उसके अन्दर कोई ज्वाला मुखी फट पड़ने को व्याकुल हो और उसे जबरन दबाने के प्रयास में उसका चेहरा पथरा रहा हो। मास्टर जी डर गये कि कहीं इसके फटने की आवाज़ या तपिश से मेरे या उन दोनों के भीतर कहीं कुछ टूट या पिघल न जाय।
इस बीच चारों के मध्य एक अजीब सा सन्नाटा खिंच गया। यह मौन छोटे के भीतर उठ रहे ज़लज़ले को फटने का आमंत्रण-सा देता लगने लगा। इसी आशंका से मास्टर जी ने ही मौन तोड़ा ।
‘‘मस्जिद कहां बनवा रहे हो ?’’
‘‘फिरोजाबाद में, तालीमी मदरसे के साथ जहां करीब दो सौ बच्चे तालीम हासिल करते हैं।’’ उसने जवाब दिया जैसे वह इन्तज़ार कर रहा था मास्टर जी के इस सवाल का जैसे उसे पहले ही पता था कि वे क्या पूछेंगे।
मदरसे की बात सुनकर मास्टर जी के लिए फिर रास्ता खुल गया ‘‘क्या-क्या पढ़ाते हो मदरसे में ?’’
इस सवाल को पूछे जाने की उम्मीद शायद उसे बिलकुल भी नहीं थी। इसलिए अब तक जहां वह किसी नाटक के रटे-रटाए संवादों की तरह जवाब दे रहा था वहीं इस बार अटक गया और दूसरे आदमी के चेहरे की तरफ देखने लगा। दूसरा आदमी उसके इस तरह देखने का मतलब समझ गया सो उसने बात सम्भाली।
‘‘उर्दू, हिन्दी और अरबी।’’ दूसरे के यह बोलते ही पहले ने मुस्कराते हुए सहमति में सिर हिलाया । अब तक छोटे के अंदर उठ रहा तूफान शायद थम गया था । इसलिए उसने चाय का आदेश दे दिया था। अब मास्टर जी और छोटे दोनों भी अपनी निजी समस्या को भूल कर इस बड़ी समस्या से जैसे भिड़ने की तैयारी में थे। उस आदमी ने भी अपने दोनों पैर ऊपर उठा कर कुर्सी में समेट लिए जैसे वह भी इस बहस के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका हो। किन्तु मास्टर जी का अनुमान ग़लत निकला क्योंकि वे दोनों बहस के किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे। इस लिए अगले ही पल उनमें से एक आदमी मोम की तरह पिघले शब्दों से बोलने लगा।
‘‘मालिक का करम है भाई पर, किसी भी चीज़ की कमी नहीं है। पिछली दफ़ा भी तो हम पांच सौ एक लेकर गये थे।’’ उसने यह पूरा संवाद दूसरे को संबोधित करते हुए छोटे की तरफ इशारा करते हुए कहा था।
दूसरे आदमी ने एक सरसरी नज़र मास्टर जी पर डाली वह उनके चेहरे के भावों को भांप कर उन्हें भीतर तक समझ लेने के प्रयास में था। किन्तु मास्टर जी इस रहस्योद्घाटन से खिन्न थे कि पिछले ही महीने यह लोग छोटे से इतने रुपये ले गये और फिर दोबारा …..!
मास्टर जी की मनःस्थिति का आभास मात्र होते ही दूसरा छोटे से पूछ बैठा ‘‘आपके भाई लगते हैं कहीं नौकरी करते हैं ? बहुत ही नेक और समझदार इंसान हैं, हमारी खुशकिस्मत है कि हमारी भी मुलाक़ात हो गई।’’
वह मास्टर जी की प्रशंसा कर रहा था या उन्हें उनकी सोच से दूर रखने की कोशिश ….. मास्टर जी यह समझते कि छोटे ने ही बताया ‘‘आप स्कूल में मास्टर हैं।’’
‘‘वा ख़ुदा बहुत खूब।’’ वे दोनों एक साथ बोले जैसे उन्हें छोटे की बातों में ही कोई अचूक बाण मिल गया था। जिसका काट किसी के पास न हो।
एक पल की शान्ति के बाद उनमें से एक बोला ‘‘क्या बात है ख़ुदा ने आपको भी हमारी तरह बड़े नेक काम के लिए बनाया है। अब आपसे तो कुछ ज्यादा कहने की ज़रुरत ही नहीं है क्यों कि आप तो तालीम का मतलब समझते हो।’’ कहते हुए उसने दूसरे के हाथ से रसीद बुक लेकर मास्टर जी की तरफ बढ़ाते हुए खींसें निपोरीं।
मास्टर जी इस हमले के लिए जैसे पहले से ही तैयार थे ‘‘इसे तो भर ही देंगे लेकिन आपको क्या लगता है कि केवल हिन्दी या उर्दू की अधकचरी तालीम के बल पर यह बच्चे अपना पेट भर पायेंगे।’’
मास्टर जी के इस सवाल पर वह ऐसे मुस्कराया जैसे उन्होंने कोई मूर्खतापूर्ण बात कह दी हो। वह कुछ देर और ऐसे ही मुस्कराता हुआ अपना पहलू एक बार और बदलता तो मास्टर जी झल्ला पड़ते लेकिन वह उनके अधीर होने को भांप चुका था और बोला-
‘‘ज़नाब आपकी चिन्ता जायज़ है …. आप मास्टर हैं बच्चों को पढ़ाते हैं ….. लेकिन हम भी इस नेक काम को बड़े सोच समझकर कर रहे हैं।’’ वह मास्टर जी को घुमा देना चाहता था इस लिए उसने गोलमोल बात ही की।
बेटी की पढ़ाई वाली समस्या से पूरी तरह मास्टर जी का ध्यान हटते देख छोटे के माथे की सलवटें गहराने लगीं। इसके लिए वह उन दोनों को ही जिम्मेदार मान रहा था। मास्टर जी को लगा वह उन्हें फटकार कर भगा देगा मास्टर जी अभी सोच ही रहे थे कि छोटे उठकर खड़ा हो गया। मास्टर जी सन्न वे छोटे को रोकने को कुछ बोलते कि छोटे ने हाथ के इशारे से मास्टर को शान्त रहने को कहा और-
‘‘भाई साहब कह रहे हैं कि जो तालीम आप उन बच्चों को दे रहे हो कल को इस मंहगाई में इस तालीम के बल पर, क्या वे अपने बीवी-बच्चों का पेट पाल सकेंगे ? कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी पा सकेंगे। या सरकार से अपने लिए मिलने वाली योजनाओं की जानकारी जुटा सकेंगे और उसके लिए किसी सरकारी बाबू को अर्जी देकर अपना काम करवा सकेंगे ?’’ तनिक उत्तेजना में अपनी बात कह कर छोटे अन्दर चला गया। दरअसल छोटे को जल्दी से चाय आने का इन्तज़ार था ताकि वह उन दोनों को चाय पिला कर शीघ्र ही चलता कर सके। छोटे की इस तुरत क्रिया से मास्टर जी ने जहां सुकून की सांस ली वहीं उनमें से वह आदमी भड़का जो ठीक मास्टर जी के सामने बैठा था उसने कुर्सी से पैर नीचे लटकाए जो अब तक कुर्सी में समेटे बैठा था। मास्टर जी को लगा अब यह खड़ा हो जाएगा और चिल्लाने लगेगा, तुम मुसलमान के नाम पर एक कलंक हो। तुम इन हिन्दुओं के बीच रहकर इस्लाम के सारे अमल और आमाल भूल गये हो। इसी लिए मस्जिद के नाम चंदा देने में इतनी बहस किये जा रहे हो। तुम लोग तो ज़ाहिलों से भी ज्यादा गये गुज़रे हो।
लेकिन उसने ऐसा नहीें किया। वह उठा तो ज़रुर और चुपचाप बाहर जाकर लगभग आधे गिलास के बराबर मुंह में भरी हुई पीक थूकी जिसे वह देर से बैठा-बैठा मुंह में घोल रहा था। अपने होठों पर बची पीक को अपने हाथों के सहारे अपनी दाढ़ी पर खिसकाते हुए अन्दर आ गया, यह पीक उसने इसलिए भी थूकी थी कि उसने अन्दर छोटे की आवाज़ सुन ली थी जल्दी चाय लाने की।
वह बिना देर किए बैठते ही बोला ‘‘बरखुरदार मैं वहीं आ रहा हूं जो आप जानना चाहते हैं।’’ कहते समय उसके चेहरे पर पूरे आत्मविश्वास की लकीरें खिंची हुर्इं थीं। वह तसल्ली से एक-एक शब्द को चुन-चुन कर बोलने लगा।
‘‘हम लोग भी समझते हैं इस बात को, इसीलिए हम बच्चों को दोपहर तक इल्मी तालीम देने के बाद हुनर की तालीम भी दिलवाते हैं।’’
‘‘हुनर की तालीम मतलब ….?’’ मास्टर जी बीच में ही बोल पड़े।
‘‘मैं बताता हूं !’’ अब पाला दूसरे ने सम्भाला अब मास्टर जी का चेहरा उसकी ओर घूम गया जो बिलकुल उनके बगल में बैठा था।
‘‘हम कुछ बच्चों को सिलाई की दुकान पर भेजते हैं, सिलाई सीखने को। कुछ को बैल्डिंग की दुकानों पर, कुछ हफ़ज़ा कर रहे हैं जो हाफि़ज़ या इमाम बन जाऐंगे, कुछ को चूडि़यों के कारखानों में लगाते हैं। इस तरीके से सारा इंतजाम कर रखा है। हमें भी तो सब दिखता है।’’
न जाने कैसे और न चाहते हुए भी इस बार मास्टर जी भड़क गये ‘‘तुम कुछ नहीं जानते हो बल्कि तुम महज़ अपने स्वार्थ और अपने घर चलाने के लिए इन बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हो। इन्हें पैदाइशी अनपढ़ मज़दूर बनाने पर तुले हो। आप इन नन्हे परिन्दों के पर कतर रहे हो, जिनसे उड़कर ये पूरे आसमान पर छा जाने की ताक़त रखते हैं, दुनिया को बदल देने की हिम्मत रखते हैं। लेकिन तुम इन्हें अपाहिज बनाकर उन बबूलों के इर्द-गिर्द घूमने को मज़बूर कर रहे हो जिनकी रखवाली करते-करते उन्हीं के कांटों से वे खुद ही लहूलुहान होते रहें।’’
क्रोध और खीझ के कारण शायद मास्टर जी की दोनों भंवें आपस में जुड़ गईं थीं । गले की नसें फूल कर फट पड़ना चाहती थीं वे गुस्से में कंपकंपाते न जाने क्या-क्या बोलते जाते यदि ठीक समय पर छोटे ने उन्हें रोका न होता।
‘‘यह तुम नहीं तुम्हारी वह पढ़ाई बोल रही है जो तुमने पढ़ रखी है इस लिए तुम बेतुकी बातें कर रहे हो तुम जैसे लोगों की वज़ह से ही आज दीन कमज़ोर हो रहा है। आज हमने देख लिया कि हमारे आलिम लोग ठीक ही कहते हैं कि दुनियावी कामयाबियों और आरामदेह जिन्दगी चाहने वाले लोग गुमराह हैं दीन से भटके हुए हैं ।’’
मास्टर जी के सामने बैठे उस आदमी के इस वाक्य ने आग में घी का काम किया था। मास्टर जी की नसों का खून अभी भी शान्त नहीं हो पाया था।
‘‘किस दीन की बात कर रहे हैं आप ! वही, जो हमें फिरक़ो में बांटकर हमारे यक़ीन और ईमान को कमज़ोर कर रहा है। इस्लाम ने तो हमें एक क़लमा पढ़कर मौमिन होना सिखाया है। मस्जिद के बहाने हमें एक जगह इकट्ठा होकर एक दूसरे का सुख-दुख बांटना सिखाया, नमाज़ में छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब को एक लाइन में खड़ा होकर या अपनी कमाई का एक अंश ज़क़ात में देकर इंसानी बराबरी का पाठ पढ़ाया और …. और तुम्हारे उन्हीं आलिमों के बच्चे जो अंग्रेजी पढ़कर विदेशों में नौकरियां कर रहे हैं, उनके साफ-सुथरे बड़े घरों में इन गंदले पांवों से घुसते हुए, उनके विदेशी कालीनों के गंदे होने के डर से तुम्हारे पैर कांपते हैं। क्यों वे तुम्हारे इन्हीं बच्चों का साया तक अपने बच्चों पर बर्दाश्त नहीं करते, तब उनके द्वारा दीन की पैरोक़ारी कहां चली जाती है। कहां चली जाती हैं इस्लाम की इंसानी बराबरी की बातें …. ?’’
‘‘तुम चार अक्षर अंग्रेजी पढ़ गये हो इसलिए कुफ्र बक रहे हो …..। यह गरीबी-अमीरी सब उसी की देन है और इंसान के अमल और आमालों का नतीज़ा है और फिर तुम कहां जानते हो कि अल्लाह किस तरह इंसानी सब्र का इम्तिहान ले ….?’’ कहते हुए उस आदमी का चेहरा तमतमा उठा था। वह क्रोध से भर कर फट पढ़ने को था।
‘‘यह भी आप नहीं बोल रहे बल्कि आपके उन आलिमों के शब्द बोल रहे हैं जिन्होंने आखिरत के बाद जन्नत का नक्शा तुम्हारी अधूरी इच्छाओं और मज़बूरियों की नींव पर खड़ा किया है। तुम्हें खुशबूदार रंगीन बगीचे में हूरों का लालच दिया और साथ ही भूख-प्यास के कष्टों से पूरा छुटकारा ….. लेकिन, क्या कभी झांक कर देखा उनके घरों में, कि क्या वे खुदा भी आखिरत की जिंदगी के इन्तज़ार में तुम्हारी तरह ही दीन की हिफाज़त में जुटे हैं या विदेशी नीतियों के फायदे नुकसान पर अपने बच्चों से अंग्रेजी में गुफ्तगू करते हुए अपनी जिन्दगी का फलसफा तय कर रहे हैं ? क्या कभी आपने उनसे यह पूछने की हिम्मत की, कि उनके बच्चे कोन से मदरसे में केवल हिन्दी, उर्दू और अरबी पढ़कर ही विदेश पहुंचे हैं ?’’ कहते हुए मास्टर जी के माथे पर पसीने की बूंदें छलछलाने लगी थीं। एक बारगी माहौल पूरी तरह गरमाने को था कि ठीक तभी छोटे की बेटी चाय लेकर बीच में आ गई।
‘‘अस्सलामु-अलैकुम …..।’’
‘‘वाअलैकुम-अस्सलामु …..।’’ दोनों आगन्तुकों ने एक साथ किया और ऊपर से नीचे तक इस तरह देखने लगे जैसे परवीन का पूरा नक्शा अपनी आंखों में उतार रहे हों। जीन्स और टी-शर्ट में, परवीन को उनका यूं देखना, मास्टर जी को अच्छा नहीं लग रहा था किन्तु परवीन पूरी तरह से सहज खड़ी छोटे से कुछ पूछने लगी । परवीन को तो आदत पड़ी है इस तरह घूरे जाने की । घर से बाहर निकलते ही आंखें उसे देखती कहां हैं घूरती ही हैं । पापा आप चल रहें हैं या मैं जाऊं, मैं लेट हो रही हूं। बेटी के इस सवाल से छोटे अजीब पशो-पेश में दिखने लगा । वह इस बहस को छोड़कर जाने न जाने का फैसला नहीं कर पा रहा था ।
मास्टर जी ने कहा भी ‘‘हां छोटे तू इसे छोड़कर ही आ जा …..।’’
लेकिन छोटे ख़ुद भी इस बहस को छोड़कर जाने वाला कहां था । ‘‘अभी टाइम है तू ऑटो से चली जा, मैं गुप्ता जी के यहां से लौटते समय तुझे उठा लाऊंगा ।’’ लापरवाही से कहते हुए उसने चाय का एक कप उठाया ।
‘‘लो चाय लो…।’’ कहकर छोटे ने उन दोनों को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया । चाय की चुस्की के साथ ही उनमें से एक आदमी बोला जो परवीन को देखने के बाद से ही अभी तक कुछ सोच रहा था । ‘‘वैसे तो तुम समझदार हो लेकिन …. लड़कियों को ऐसे कपड़े पहनना जायज़ नहीं है।’’
‘‘इसमें जायज़ और नाजायज़ की कोन सी बात है। मुझे पसंद हैं इसलिए पहनती हूं।’’ दरवाजे से निकलते हुए परवीन ने उनकी बात को सुन लिया था। सुनकर वह ऐसे मुड़ी जैसे जाते हुए किसी ने उसमें थप्पड़ मार दिया हो ।
अब वह फिर उनके पास आ खड़ी हुई और बड़ी मासूमियत से कहने लगी ‘‘अंकल आप लोगों को हम लड़कियों के केवल कपड़े ही क्यों दिखाई देते हैं । हमारा काम क्यों नहीं दिखता ? क्या आपको खुशी नहीं होती कि मैं हायर-एजुकेशन की ओर बढ़ रही हूं …. लेकिन इससे आपको क्या लेना-देना कि हम क्या कर रहे हैं और क्या कर सकते हैं, आपका काम तो बस हमारे लिए जायज़ या नाजायज़ को ही देखते रहना है ।’’ कहते-कहते परवीन का चेहरा एक अजीब बेचैनी से भर गया । वे दोनों हक्के-बक्के से उसका चेहरा ताकने लगे जबकि मास्टर जी यह समझ नहीं पा रहे थे कि परवीन की इस हरकत को वे समझदारी मान कर खुश हों या अशिष्टता मान कर दुखी । जवाब उन्हें उनके भीतर से ही मिला, अपनी बात कहना अभद्रता नहीं है बल्कि चुप रहकर सहना कायरता है। इसलिए, वे जान-बूझकर कुछ नहीं बोले और चाय पीते रहे । छोटे भी परवीन के बोलने से तनिक विचलित-सा था । उसने सवालिया नज़रों से मास्टर जी की आंखों में झांका । न जाने उसने उनकी आंखों में क्या देखा कि वह भी तसल्ली से बैठकर चाय पीने लगा ।
‘‘बेटी हमारा मतलब था कि तुम अपना काम सलवार सूट पहन कर भी कर सकती हो …..।’’
‘‘और ऊपर से नक़ाब भी, यही न ….।’’ बात को बीच में ही काटकर परवीन ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा और अगले ही पल उसका चेहरा कठोर हो गया जैसे चलते-चलते उस आदमी ने परवीन को फिर चेता दिया हो ।
‘‘अरे मुझे ही क्या आपके इसी जायज़-नाजायज़ ने तो मलाला को भी कहां छोड़ा था ….. लेकिन क्या हुआ उससे ….. सिवाय इसके कि कुछ दिन उसने शारीरिक कष्ट के साथ काटे …. फिर इससे आपको क्या फर्क पड़ना था ….।’’ वह कुछ और भी बोलती लेकिन छोटे से रहा नहीं गया ‘‘अब तू जा बेटा, लेट हो रही है।’’
‘‘हां जा रही हूं ….।’’ कहती हुई वह तेजी से बाहर को लपकी ।
परवीन के जाने के बाद दोनों ने जैसे सांस भरी थी। ‘‘बेटी बाप से चार क़दम आगे है ….।’’ उनमें से एक फुसफुसाया था ।
परवीन के साथ कुछ मिनटों की इस बातचीत ने उनके चेहरे की रेखाओं को एकदम शान्त कर दिया था। जैसे वे किसी अंधड़ से बाहर आए हों । ‘‘चलिए-चलिए पहले चाय पीजिए गर्मा-गर्मी में क्या रखा है।’’ कहते हुए छोटे ने जैसे युद्ध विराम की घोषणा की । अब तक मास्टर जी भी लगभग पूरी तरह सहज हो चले थे लेकिन उनके भीतर का लावा अभी पूरी तरह निकल नहीं पाया था । चाय की चुस्की के साथ ही मास्टर जी सधे शब्दों में फिर बोलने लगे
‘‘आप कहां सोये हैं अभी तक, आज बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी रेडीमेड कंपनियां बाज़ार में उतर आईं हैं। उन्होंने सिलाई मज़दूरों का काम तो बिलकुल खत्म कर ही दिया है और उन्हें सस्ती मज़दूरी पर बंधुआ मज़दूर बन जाने को विवश भी कर दिया है ।’’ मास्टर जी ने चाय की एक और चुस्की भरी तब तक उनकी बात को छोटे ने आगे बढ़ा दिया
‘‘सही बात है, इसी लिए तो सिलाई मज़दूर जितनी मज़दूरी लेता है, उतने से कम में वे सिले हुए कपड़े दे देते हैं तो कोई सिलवाने ही क्यों जायेगा ?’’ छोटे ने मास्टर जी की बात को संदर्भ में ढाल दिया था उन्हें सांस मिल गई और वे फिर बोलने लगे-
‘‘आज बैल्डिंग मशीन पर काम करने को बैल्डर का सर्टीफिकेट चाहिए, चूड़ी कारखानों की हालत आपसे छुपी नहीं होगी ? और रही बात इमाम या हाफ़िज़ बनने की, तो एक इमाम को किसी मस्जिद में कितने रुपये मिल जाते हैं, ज्यादा से ज़्यादा दो या तीन हज़ार और वह भी तब, जब सब आबादी जोड़-जमोड़ कर दे दे । आप क्यों नहीं सोचते कि वही इमाम या हाफि़ज़ गणित, विज्ञान या अंग्रेजी के मास्टर के बराबर तनख्वाह क्यों नहीं ले पाता ?’’ मास्टर जी एक सांस में सब-कुछ कह गये, वे लगभग हांफ से गये थे ।
‘‘तुम ही बताइए ?’’
‘‘आपको नहीं दिखता कि इन मज़हबी और सियासी नेताओं ने दीनी तालीम के साथ वह गठजोड़ नहीं होने दिया जिसमें इंसानी तरक्की, रोज़गार और खुशहाली छुपी है।
‘‘लगता है तुम होश में नहीं होे । आखिर उन्हें ऐसा न करने से क्या फायदा होना है ?’’
‘‘यही बात समझने की है, असल में उनकी नज़रों में तुम इंसान हो ही नहीं।’’
‘‘तो …..?’’
‘‘सिर्फ वोट, चुनाव से पहले तुम्हारी सुरक्षा का ऐजण्डा क्या वाकई तुम्हारी सुरक्षा का होता है ?….. नहीं, अपने वोटों की सुरक्षा का, और दुनियावी तालीम से दूर, अधकचरी दीनी तालीम लेती तुम्हारी औलादें इन सियासतदानों के बच्चों के लिए वोट में बदल जाएंगी, फिर डरे-सहमे भीड़ के रूप में इस्तेमाल होंगे, कौम के नाम पर, कभी पेट भर रोटी के लिए, मज़हबी नेताओं की एक आवाज़ पर अंधे सांपों की तरह खड़े हो जाऐंगे । मालूम नहीं है आपको, तब यह इस्लाम के सिपाही उन्हीं सियासतदानों के लिए न इंसान रहते हैं और न वोट, तब सिर्फ यह आतंकवादी होते हैं …. और फिर ये अपने पीछे भूख और मुफ़लिसी का बड़ा पहाड़ छोड़ जाते हैं ।’’ पूरी बात कह कर मास्टर जी ने एक लम्बी सांस भरी थी ।
‘‘बरखुरदार तुम कितना पढ़ गये हो जो यह भी भूल गये कि मालिक ने जिंदगी दी है, तो रिज़क का जि़म्मा भी लिया है। वही है सबकुछ देने वाला ….. क्या तुम और क्या हम ?’’ बोलते समय उस आदमी का चेहरा एक कसैली मुस्कान में तर था । अब वह किसी रौ में बोले जा रहा था ‘‘तुम्हारी उम्र के हमारे बच्चे हो रहे हैं ….. और तुम हमें सिखा रहे हो …. हमने क्या अपने बच्चों की परवरिश नहीं की …?’’ अब उसने सांस भरी मास्टर जी जैसे इसी इन्तज़ार में थे कि उसकी बातों को तनिक सा विराम मिले और वे लपक लें । मास्टर जी ने वही किया-
‘‘कितना पढ़ा लिया आपने अपने बच्चों को …..? क्या पहचान बना पाए वे इस समाज में, एक मज़दूर से ज्यादा …? कितने हक़ पा गये वे खुद को इन्सान होने के…?’’ मास्टर जी की बातों से उन दोनों का चेहरा तमतमाता जा रहा था । मास्टर जी इसकी परवाह किए बिना बोलते चले जाते अगर उनमें से एक आदमी ने उनकी बात को बीच में न काट दिया होता ।
‘‘आज तुम्हारे पास चार पैसे हैं इस लिए आसानी से यह बात कह पा रहे हो । हम और हमारे बच्चे जो काम कर सकते थे वह हम कर रहे हैं।’’
‘‘बस यहीं आप ग़लत हैं ।’’ मास्टर जी बड़े ठंडे लहज़े में कह रहे थे जैैसे अब उन्हें समझा रहे हों ‘‘आपके बच्चों ने एक मज़दूर के घर में जन्म ही तो लिया था किन्तु वे मज़दूर होने का ठप्पा लगवा कर तो नहीं आये थे । उनको यह ठप्पा आप लगा रहे हो निरा अनपढ़ रखकर ।’’
‘‘कौन कहता है हमारे बच्चे पढ़े नहीें हैं ….? आपको किस्मत से नौकरी मिल गई, नहीं तो मुसलमानों के लिए नौकरियां कहां हैं ….? इसका मतलब यह तो नहीं कि ….. हमारे बच्चे भी तालीम याफता हैं, अच्छे-अच्छे आलिमों से बहस में पीछे नहीं रहते।’’
‘‘इन बहसों से काम चलता है ? पेट भरता है ? कोई मुक़म्मल पहचान बनती है ? क्या पढ़ाई-लिखाई केवल नौकरी के लिए ही की जानी चाहिए …..?’’ बोलते-बोलते मास्टर जी पल भर रुके फिर बोले ‘‘असल में यह आप की ग़लती नहीं है। दरअसल यह सब बताने की जिम्मेदारी मेरी नहीं बल्कि उनकी है और थी जो हमारी क़ौम के आगे खड़े होते हैं । उन्होंने भी कहां अपनी तक़रीरों में यह बात शामिल की कि आज दीनी तालीम से कहीं ज्यादा ज़रुरी है दुनियावी तालीम या कहूं वह पढ़ाई-लिखाई जिसमें पूरी क़ौम की तरक्क़ी छुपी है ।’’ मास्टर जी ने थके बैल की तरह चेहरा थोड़ा सा उठा कर नज़र उन दोनों के चेहरे पर डाली दोनों अपनी आंखें फाड़े मास्टर जी की बातें सुनने में पूरी तरह तल्लीन थे । मास्टर जी के रुकने पर उन दोनों के चेहरे की रेखाएं बदलने लगीं जैसे कुछ अधूरा रह गया हो । उनकी यह मंशा भांप कर मास्टर जी फिर बोले ‘‘ठीक अंबेडकर की तरह, जिन्होंने केवल पढ़ाई-लिखाई के बल पर ही उस समय अपने और अपनी क़ौम के लिए वे तमाम हक़ पा लिए थे जिनका मिल पाना तब आसान नहीं था । तब तक तो हमारा संविधान भी नहीं था …. अब तो संविधान में सबको बराबरी का हक़ मिला है । बस पढ़-लिख कर आगे तो आओ ….।’’
मास्टर जी चुप हुए तो पाला छोटे ने संभाल लिया जो देर से चुप बैठा था जैसे अपनी बारी का इन्तज़ार कर रहा हो मौका मिलते ही रण में कूद पड़ा ‘‘हमारे पिता भी मज़दूर थे लेकिन उन्होंने अपना पेट काट-काट कर भी हमें बस पढ़ाया ही नहीं बल्कि आसमान में उड़ने का हौसला भी दिया । हम नौकरी कर रहे हैं …. हालांकि यह भी मज़दूरी ही है लेकिन एक मुकम्मल पहचान के साथ । बस वही आपको करना था जो आपने नहीं किया ।’’
इसके बाद वहां एक सन्नाटा खिंच गया । मास्टर जी और छोटे की बातों ने उनके भीतर कुछ तोड़ दिया था । अब वे दोनों एकदम शान्त होकर अपने भीतर की उस टूटन को कहीं टटोलने लगे थे । इन सारी बातों से कहीं इन्हें ठेस न पहुंचे इस ख्याल से मास्टर जी ने ठंडे शब्दों में ही बातों के टूटे तार को फिर से जोड़ने की कोशिश की –
‘‘मेरा इरादा आपको ठेस पहुंचाने का बिलकुल भी नहीं है और न ही मैं यह कह रहा हूं कि आप एक अच्छा काम नहीं कर रहे हैं लेकिन, क्या आपको नहीं लगता कि आज मस्जिद से कहीं ज्यादा स्कूलों की ज़रुरत है ।’’
दोनों की नज़रें एक साथ मास्टर जी की ओर उठीं जैसे वे उनकी बातों को पूरे ध्यान से सुनना चाहते हों । मास्टर जी ने भी तीर ठीक निशाने पर लगता देख बात आगे बढ़ा दी-
‘‘क्या आपको नहीं लगता कि हमारे बच्चों को आज एक सामाजिक पहचान की ज़रुरत है ….? और फिर दुनिया बदल रही है नये-नये आविष्कार हो रहे हैं, फिर हम क्यों चौदह सौ साल पुरानी हिदायतों के साथ वहीं खड़े रहें और समय को आंख बंद करके दौड़ते रहने दें यह कैसी अक्लमंदी है …. ?’’
मास्टर जी का गला लगभग सूख गया था सो पानी के लिए उठे और उन दोनों के लिए भी पानी लाये । उन दोनों को भी पानी की ज़रुरत थी लेकिन वे कह नहीं पा रहे थे । पानी पीने के बाद उन्होंने जैसे तरकश से अंतिम तीर निकाला था ‘‘तुम जिसे स्कूल कहते हो हम उसे मदरसा कह रहे हैं।’’
‘‘हमने कहां मना किया है …. सिवाय इसके कि उसमें केवल हिन्दी, उर्दू और अरबी ही क्यों गणित, विज्ञान और अंग्रेजी भी क्यों न पढ़ाई जाय ….? सर सैयद अहमद ने भी ऐसा ही सोचा होता तो क्या तक्षशिला, नालंदा जैसा एक और स्वरूप आज अमुवि के रूप में हमारे सामने खड़ा होता । वे दीन के जानकार नहीं थे या उन्हें क़ौम से नफरत थी । बताइए ….. जवाब दीजिए …..।’’
मास्टर जी की तरह छोटे को भी यह बहस आसानी से खत्म होती नहीं दिख रही थी । समय मुट्ठी में बंद रेत की तरह ऐसे खिसक गया कि कब परवीन की परीक्षा खत्म हो गई, छोटे और मास्टर जी को इसका भान भी न रहा । परवीन का फोन आने पर छोटे ने ही इस बहस को खत्म करने के मूड से कहा ‘‘देखिए साहब ! मुझे लगता है कि इस बहस का अंत अब तो हो ही जाना चाहिए क्यों कि मुझे भी अब निकलना है और वैसे भी, ये बातें या तो आपकी समझ में नहीं आ रहीं हैं या आप समझकर भी ना समझने का नाटक कर रहे हैं ।’’
मास्टर जी ने ताबूत में जैसे अंतिम कील ठोकी थी ‘‘आपको लगता है कि आपकी और आने वाली पीढ़ी की भलाई, खुशहाली और तरक्की इसी रसीद के भरे जाने में है तो भर दीजिए एक कागज मेरे नाम का ….। इतना कह कर मास्टर जी ने अपनी जेब में हाथ डाला । यह सब करते हुए मास्टर जी के चेहरे पर अनजाने दर्द के भाव अनायास ही उभरने लगे थे । मास्टर जी एकदम मौैन और अपने विचलन को दबाने के असफल प्रयास के साथ उन दोनों के द्वारा होने वाली प्रतिक्रिया के इन्तज़ार में थे, कि उनमें से वह आदमी उठा जो दूसरे से उम्र में ज्यादा था । मास्टर जी और छोटे दोनों भाइयों की निगाहें भी उसके साथ उठती हुईं उसके चेहरे पर टिक गईं। इतनी देर बहस के बाद वह पहली बार मास्टर जी और छोटे की आंखों में आंखें डाल कर बोला-
‘‘नहीं मेरे भाई अब हमें चंदे की ज़रुरत नहीं है …. बल्कि आपकी सलाह मशविरे की दरक़ार रहेगी।’’ अब तक वह दूसरा आदमी भी उठ खड़ा हुआ था । मास्टर जी व छोटे कुछ कह पाते कि दोनों ने खुदा हाफ़िज़ कहा और निकल गए । लियाकत अली मास्टर अपने भाई छोटे के साथ पत्थर की तरह बैठे रह गये, तभी परवीन का फोन फिर से आ गया ।

हनीफ मदार द्वारा लिखित

हनीफ मदार बायोग्राफी !

नाम : हनीफ मदार
निक नाम : हनीफ
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ऑथर के बारे में :

जन्म -  1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के 'एटा' जिले के एक छोटे गावं 'डोर्रा' में 

- 'सहारा समय' के लिए निरंतर तीन वर्ष विश्लेष्णात्मक आलेख | नाट्य समीक्षाएं, व्यंग्य, साक्षात्कार एवं अन्य आलेख मथुरा, आगरा से प्रकाशित अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, डी एल ए आदि में |

कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर  की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 

कहानी संग्रह -  "बंद कमरे की रोशनी", "रसीद नम्बर ग्यारह"

सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका 

संपादक - हमरंग 

फिल्म - जन सिनेमा की फिल्म 'कैद' के लिए पटकथा, संवाद लेखन 

अवार्ड - सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४ 

- पूर्व सचिव - संकेत रंग टोली 

सह सचिव - जनवादी लेखक संघ,  मथुरा 

कार्यकारिणी सदस्य - जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)

संपर्क- 56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१ 

phone- 08439244335

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 118 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 215 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 113 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

नोट-

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