अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

सिनेमा फिल्म-समीक्षा

मज्कूर आलम 94 2018-11-17

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवायद भर बन कर रह जाती है (फिल्मों में भी)। चाहे वह बात स्त्री की देह की आजादी की हो या फिर उसके न कहने के अधिकार की। साइमन बॉऊआर से लेकर फिल्म ‘पिंक’ के ‘न’ तक आकर भी बात नहीं रुकती। बहसें चलती रहती है और वास्तविक जीवन में विद्रोही लडक़ी के चरित्रहनन की कोशिशें भी जारी रहती हैं, उन्हीं लोगों द्वारा। यकीन न हो तो एक बार हिंदी साहित्य की कुछ बैठकों में नियमित आइए-जाइए। हकीकत का पता चल जाएगा।

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है

मज्कूर आलम

बहुत सक्षम लोग ‘अनारकली ऑफ आरा’ फिल्म पर लिख चुके हैं। इसलिए इस पर कुछ भी लिखना जोखिम का काम है। लेकिन यह जोखिम उठाने की हिम्मत भी मुझे अभिभूत करने वाले इसी फिल्म के एक ‘चमकदार’ डॉयलॉग से ही मिली है- आरा जिला घर बा, त कवन बात के डर बा।

मेरा जन्म भी इसी आरा जिले वाले क्षेत्र आरा (बक्सर, जो अपने आप में जिला है, लेकिन यह उसी पुराने शाहाबाद से टूट कर बना है, जिसके लिए यह डॉयलाग गढ़ा गया है। फिल्म के एक गाने में भी बक्सर का जिक्र है।) जिला में हुआ है और पूरी पढ़ाई-लिखाई और शिक्षा-‘दीक्षा’ भी वहीं से। मेरी एमए की डिग्री भी उसी वीर कुंअर सिंह विश्वविद्यालय की है, जिसका जिक्र फिल्म के एक डॉयलॉग में है (हालांकि पट पर लिखा वीर कुबेर सिंह है)। इसलिए वहां की आंचलिक भाषा भोजपुरी या फिर भोजपुरी मिश्रित बोली जाने वाली हिंदी से परिचित हूं। इसलिए यह कह सकता हूं कि इस मामले में यह फिल्म पूरी तरह से खरी उतरती है। इस फिल्म के कलाकारों ने भोजपुरी मिक्स हिंदी (आरावाली) को बड़ी शिद्दत से निबाहा है। यहां तक कि फिल्म की मुख्य किरदार स्वरा भास्कर ने भी। यह जिक्र इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अक्सर देखने में आता है कि मुख्य कलाकार (जो अक्सर स्टार होते हैं) यहीं पर चूक जाते हैं। यहां तक कि मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान जैसे कलाकार भी, जो फिल्म ‘पीके’ में जिस तरह की भोजपुरी बोलते हैं, वह नौटंकी लगती है तो ‘दंगल’ में भाषाई ऐतबार से वह कहीं से हरियाणवी लगे ही नहीं। कलाकारों का मेकअप और सेट की साज-सज्जा भी उसी अनुरूप है।

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवायद भर बन कर रह जाती है (फिल्मों में भी)। चाहे वह बात स्त्री की देह की आजादी की हो या फिर उसके न कहने के अधिकार की। साइमन बॉऊआर से लेकर फिल्म ‘पिंक’ के ‘न’ तक आकर भी बात नहीं रुकती। बहसें चलती रहती है और वास्तविक जीवन में विद्रोही लडक़ी के चरित्रहनन की कोशिशें  भी जारी रहती हैं, उन्हीं लोगों द्वारा। यकीन न हो तो एक बार हिंदी साहित्य की कुछ बैठकों में नियमित आइए-जाइए। हकीकत का पता चल जाएगा।

इसका ताजा उदाहरण हमने पिंक फिल्म में देखा। फिल्म के क्लाइमेक्स में अदालत में अमिताभ बच्चन ‘न’ पर अच्छा-खासा बौद्धिक व्याख्यान दे डालते हैं। सिनेमाहॉल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज जाता है, लेकिन ऐसे डॉयलॉग आम जनमानस को फंतासी में ले जाते हैं। ठीक है कि वह १९७०-८० के एंग्रीयंग मैन की छवि से यह अलग दिखाई पड़ता है, लेकिन सिर्फ दिखाई ही पड़ता है। यहीं पर आरावाली अनारकली की सार्थकता है, जिसे देखकर लगता है कि हां यह लडक़ी हमीं में से निकली एक किरदार है। अपने पूरे अक्खड़पने और भदेसपने के साथ। हालांकि इस अक्खड़पने और भदेसपने को निभाने में वह कई बार अतिरंजना की शिकार भी होती हैं। नाचनेवाली की किरदार में डूब जाने की अतिरिक्त कोशिश में वह अपनी भाव-भंगिमाओं के साथ थोड़ा ज्यादा जोर-आजमाईश करती नजर आती हैं, लेकिन जल्द ही वह संभल भी जााती हैं, जब वह पूरी तरह से विद्रोही तेवर अपनाती हैं। लेकिन एक ऐसी शख्सियत (जैसी फिल्म में अनारकली की दिखाई गई है) जब खुद को भाग्य के हवाले करती दिखाई पड़ती है तो बड़ा अटपटा-सा लगता है।

यहां तक भी बात समझ में आती है कि वह उन परिस्थितियों से भागकर एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश करती है। अपनी जान बचाने की कवायद में वह दिल्ली चली आती हैं और सबकुछ भूलकर वह नए सिरे से अपना जीवन संजोने की जुगत में लग जाती हैं, लेकिन यहां भी जब उसे राहत नहीं मिलती, अतीत के दानव पीछा करते-करते दिल्ली तक आ धमकते हैं, तब वह लडऩे का फैसला करती हैं, लेकिन इसके लिए भी वह एक संयोग पर मुनहसर हो जाती हैं। यानी

जब उसे यह पता चलता है कि उस घटना का वीडियो फुटेज मौजूद है, जो उनकी बेगुनाही का सबूत है। अनारकली अपनी तरफ से उस वीडियो को ढूंढऩे का जरा भी प्रयास नहीं करतीं। जबकि वह चाहतीं तो वह डिलिटेड वीडियो अनवर के मोबाइल से भी निकालने की कोशिश कर सकती थीं, जो अनारकली के हर कदम में हमेशा उसके साथ खड़ा रहता है। लेखक-निर्देशक को ऐसा करते इसलिए भी दिखाना चाहिए था, क्योंकि तकनीक के युग में यह संभव है तथा इससे अनारकली का विद्रोही स्वभाव और ज्यादा मजबूती से उभरकर सामने आता। फिल्म का क्लाइमेक्स पहले खुल न जाए इसके लिए इस सीन को क्लाइमेक्स सीन के साथ फ्लैशबैक में दिखाया जा सकता था। यहां फिल्मकार यह कहकर नहीं निकल सकता कि वह नाचने-गाने वाली लडक़ी भला क्या जानें कि ऐसी तकनीक भी इस जमाने में उपलब्ध है। उसके वीडियो फुटेज ढूंढऩे के क्रम में यह दिखाया जा सकता था कि उसे ढूंढऩे के क्रम में ही इस तकनीक का पता चला।

सिर्फ ये छोटी-छोटी सावधानियां बरत ली गई होतीं तो यह फिल्म कई संयोगों से बच जाती, जिसके सहारे इस फिल्म को चलायमान रखा गया है। जैसे वीडियो मिलना संयोग और फिल्म के हरदिल अजीज किरदार हीरामन तिवारी का मिलना संयोग। वह भी तब जबकि हीरामन तिवारी एलबम की सीडी और वीसीडी की मार्केटिंग के धंधे में है और फिल्म में यह पहले दिखाया जा चुका है कि उसके पास अनारकली के गाने के वीडियोज की डिमांड आती रहती थी। इस लिहाज से उसे अनारकली से पहले ही संपर्क करना चाहिए था, ताकि उनकी अनुमति लेकर उसके प्रोग्राम्स के कुछ वीडियो या मोबाइल क्लिप ही सही वह बना सके। यह अलग बात है कि वह उसकी इजाजत उसे देती या न देती।
इसके अलावा एक सबसे अहम बात। एक बार फिर फिल्म ‘पिंक’ पर आते हैं। पिंक अगर आपने देखी होगी आपको  निश्चित रूप से यह लगेगा कि इस फिल्म के ट्रीटमेंट पर उसका स्पष्ट प्रभाव है। यह सिर्फ न कि बात नहीं है। वैचारिक पक्ष की बात तो मैं हरगिज नहीं कर रहा। उसमें तो यह फिल्म उससे मीलों आगे है। मैं सिर्फ ट्रीटमेंट की बात कर रहा हूं। इससे यह अंदाजा मत लगा लीजिएगा कि यह फिल्म कमजोर है या नकल है। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि एक बेहद शानदार फिल्म है, जिसे इस फिल्म यूनिट से जुड़ा हर आदमी चाहे जितना ऊपर चला जाए, इसे ताजिंदगी याद रखेगा। अपनी पहली ही फिल्म में अविनाश ने एक ऐतिहासिक यादगार बहुत हद तक कालजयी फिल्म दी है। बॉलीवुड इतिहास में अमर रहेगी यह फिल्म। इतनी सारी बातें तो मैं सिर्फ इसीलिए कर  रहा हूं, क्योंकि जिन अविनाश की यह फिल्म है, उनसे लगाई गई उम्मीदें भी आसमान पर थीं। और अच्छी बात यह रही कि यह टूटी भी नहीं। शायद यह उनकी पहली निर्देशकीय फिल्म है, इसलिए ये छोटी-छोटी बातें उनसे रह गई हों। क्योंकि अखबारी दुनिया में उनके साथ काम किया हर व्यक्ति यह जानता है कि वह एक-एक खबर से लेकर पेज लेआउट तक पर कोई समझौता नहीं करते थे। अगर पेज डिजाइनर का बनाया कोई पेज उन्हें पसंद नहीं आता था तो वह खुद पेज डिजाइन तक करने बैठ जाते थे।

अब आते हैं फिल्म के वैचारिक पहलू और किरदार के कैरेक्टराइजेशन पर। सबसे ज्यादा बातें इसी पर की गई है। मुझे लगता नहीं कि इस पर कोई भी बात छूटी है। जैसे मर्दवादी समाज में वह अपनी लड़ाई खुद लड़ती है। किसी के कंधे पर रखकर बंदूक नहीं चलाती। उजले समाज के काजल की कोठरी पर। हीरामन की मासूमियत पर। अनवर की मोहब्बत। हाशिए के समाज की लड़ाई आदि-आदि। इसलिए इस पर कुछ नहीं। अरविंद शेष, संजीव चंदन, प्रियदर्शन आदि लगभग सबकी समीक्षा (जिनकी भी मेरे नजर के सामने आई) मैंने पढ़ रखी है और सहमत भी हूं कि उन सबने इस फिल्म के वैचारिक पक्ष पर काफी बेहतर लिखा है। इन समीक्षाओं से भी फिल्म के कई आयाम खुलकर सामने आते हैं। इसलिए मैं इस पर बस इतना ही कहूंगा कि मेरे लिए इस फिल्म का सबसे अहम पक्ष यही रहा कि वह समाज की परंपरा और बने-बनाए नियमों के प्रभाव में आकर अपना जीवन नहीं जीती। ऐसे समाज की वह रत्ती भर परवाह नहीं करती, जो दबे-कुचले-शोषित व स्त्री वर्ग के लोगों को हिकारत की नजर से देखता है और उन्हें अपने पैर की जूती के बराबर भी नहीं समझता। क्योंकि स्त्रियां अक्सर यहीं पर कमजोर पड़ती हैं कि लोग क्या कहेंगे और मर्द भी इस बात को जानता है। इसलिए वैचारिक और सेमिनारी बहस तक तो स्त्री मुक्ति की बातें ठीक है, लेकिन जैसे ही वह बगावत पर उतारू हो, उसे रंडी बनाने से तनिक भी गुरेज नहीं करता यह समाज। इसलिए भी करता है, ताकि मर्दों के सभ्य समाज की ‘अच्छी लड़कियां’ उसके कारनामे से ईबरत हासिल कर उसकी तरफ न हो जाएं। विद्रोही स्त्री के कारनामे को कारिस्तानियों में बदलकर वह भली लड़कियों को उस स्त्री खिलाफ कर पूरे समाज पर मर्दों द्वारा बनाई गई मान्यताओं पर अपना दबदबा कायम रखते हैं। जब स्त्रियां ही किसी लडक़ी के खिलाफ हो जाएं, तब ऐसी लडक़ी का शिकार करना मर्दों के लिए आसान हो जाता है। यहीं पर यह फिल्म बड़ी हो जाती है, जब वह सभ्य समाज को कहती है कि ‘यह एक रंडी की ना है’। कहीं से भी इस आडंबरी समाज की भाषा में वह अपना बचाव नहीं करती। उसके बाद यूनिवर्सिटी हॉल से बाहर निकल कर अपने आक्रोश को थूकती है और बड़े सहज भाव से अपने वास्तविक जीवन में प्रवेश कर जाती है। कोई रुदन नहीं। वही मस्ती भरी चाल, जो उसकी पहचान है।

इतनी शानदार और कालजयी फिल्म बनाने के लिए पूरी टीम को बधाई के साथ इसके कोरियोग्राफर और लेखक-निर्देशक से एक सवाल। आखिर क्यों अनारकली जैसी नाचने-गाने वाली विद्रोही महिला भी अपने आक्रोश व विद्रोह का प्रदर्शन तांडव जैसे परंपरागत नृत्य के जरिये ही करती है, क्या ये जरूरी था। फिल्म के  लेखक-निर्देशक तो लंबे समय तक झारखंड में रहे हैं, क्या किसी आदिवासी या किसी अन्य गैरपरंपरागत नृत्य के जरिये इस क्लाइमेक्स को शूट नहीं किया जा सकता था? क्या वह ज्यादा सार्थक नहीं होता?

मज्कूर आलम द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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