अवचेतन की चेतन से लड़ाई: ‘तमाशा’ (मजकूर आलम)

सिनेमा फिल्म-समीक्षा

मज्कूर आलम 83 2018-11-17

ऐसे ऊपर से शांत दिखने वाले अशांत समुन्दर में अगर कोई कंकड़ी भी मार दे तो जाहिर है कि उसमें हलचल मचेगी ही। और यही काम करती है तारा। और, अगर समुद्र में हलचल मचेगी तो ज्वारभाटा आएगा ही और ज्वारभाटा आएगा तो महासागर की लहरें आकाश को चुनौती भी देंगी। फिर जब कंकड़ी समुद्र की सतह पार कर नीचे जाकर स्थिर हो जाएगी तो समुद्र भी शांत होकर अपने ऊपर ढेर सारा अवसादयुक्त फेन छोड़ देगा। लेकिन, अगर कंकड़ी समुद्र की तल पर जाकर भी शांत नहीं हुई तो…

अवचेतन की चेतन से लड़ाई: ‘तमाशाmazkoor

 

फिल्म भी तमाशा की ही एक विधा है, हालांकि मूल तमाशा विधा तो खत्म होने के कगार पर है, लेकिन क्या जिंदगी एक तमाशा नहीं, या जिंदगी में तमाशा नहीं, या जिंदगी में तमाशा नहीं हो सकता। हो सकता है! कोई यह भी कह सकता है कि हो सकता नहीं, यकीनन होता ही है। एक ‘तमाशा’ इम्तियाज अली भी लेकर आए हैं। इस तमाशे में सिर्फ एक ही नायक है- रोबोट! बाकी के सितारे वेद (रणबीर कपूर) समेत सभी सहयोगी कलाकार की भूमिका में हैं।
जाहिर है बात यहां फिल्म ‘तमाशा’ की हो रही है, जो कोर्सिका में वेद और तारा (दीपिका पादुकोण) के मिलने से पैदा हुए एक संयोग से शुरू होती है। यहां वेद, तारा के लिए भी यह तय करता है कि इस शहर में उन्हें जानने वाला कोई नहीं, इसलिए वे जो करेंगे, किसी के दिशा-निर्देश पर रोबोट बन कर नहीं करेंगे। अपनी मर्जी से करेंगे। चूंकि हमारी शख्सियत पर रोबोट का पहरा है, इसलिए एक-दूसरे को अपनी पहचान नहीं बताएंगे। और, बिना पहचान के वे दोनों एक साथ रहते हैं व ‘रोबोट’ की कैद से आजाद होकर अपनी मर्जी का करते हैं।
कुछ दिनों के बाद वे दोनों अपने-अपने शहर लौट आते हैं, एक-दूसरे को बिना अपनी पहचान बताए। वेद दिल्ली आ जाता है और दीपिका कोलकाता, लेकिन उनके साथ-साथ उनकी पहचान भी भारत आ जाती है। वही पहचान, जो एक रोबोट की बंदी है।
तारा की शख्सियत पर रोबोट का कम शासन है, इसलिए वह अपने प्यार और एहसासात से ज्यादा परिचित है। इसलिए वह अपने प्यार वेद की खोज में निकलती है और उसे ढूंढ़ लेती है। लेकिन किसे, जिसे वह ढूंढ़ रही थी उसे या एक अनुशासित रोबोट को, जिसका नाम वेद को?
दरअसल यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो बचपन से बहुत अनुशासन में रहा है। उसके हर एक क्षण और हर एक पल को नियंत्रित किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे गणित में हम समीकरण हले करने के लिए कांस्टैंट रखते हैं। इस वजह से जो वह मूल रूप से है या यूं कहें कि उसका स्थायी भाव है, वह दबता जाता है और एक समय ऐसा आता है कि वह पूरी तरह दब जाता है, लेकिन राख के नीचे कहीं चिंगारी का एक कण बचा रह जाता है, जो उसके पूरे व्यक्तित्व को स्पिलिट (द्विव्यक्तित्व) में बदल कर रख देता है।
इम्तियाज अपनी इस बात को कहने के लिए पूरे एक कालखंड में एक व्यक्ति की भूमिका को विश्लेषित करते हैं। इस कालखंड में प्रेम है, रिश्ते हैं, संस्कृति है, समाज है, लोक-लाज है और उन सबका दबाव भी है। इन सबके साथ अपना स्टेटस बचाये-बनाये रखने का दबाव भी उस पर काम करने लगता है, क्योंकि उसकी स्पिलिट पर्सनालिटी का स्वीकृत रूप उसे ऐसा ही करने की इजाजत देता है, जो उसका मुखर रूप है अर्थात चेतन है। एक समय ऐसा आत है कि वेद अपने आप को सिर्फ इसी रूप में पहचानता-स्वीकारता है। इसीलिए फिल्म में वह तारा को कहता भी है, जिसे आप ढूढ़ रही हैं, वह मैं नहीं हूं। आपने अपनी कल्पना में किसी और व्यक्तित्व को जगह दी हुई है, लेकिन इससे निकलने की बेचैनी भी है, क्योंकि अवचेतन में उसका मूल रूप ही रचा-बसा है। हालांकि वेद के मुखर समाज में स्वीकृत रोबोटिक रूप ने उसके मूल व्यतित्व पर इतने जबरदस्त रूप से कब्जा जमा रखा है कि उसका मूल रूप वहीं पर सामने आता है, जहां उसे कोई पहचानता नहीं। वहां उसका अवचेतन मुखर हो जाता है।

साभार गूगल

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ऐसे ऊपर से शांत दिखने वाले अशांत समुन्दर में अगर कोई कंकड़ी भी मार दे तो जाहिर है कि उसमें हलचल मचेगी ही। और यही काम करती है तारा। और, अगर समुद्र में हलचल मचेगी तो ज्वारभाटा आएगा ही और ज्वारभाटा आएगा तो महासागर की लहरें आकाश को चुनौती भी देंगी। फिर जब कंकड़ी समुद्र की सतह पार कर नीचे जाकर स्थिर हो जाएगी तो समुद्र भी शांत होकर अपने ऊपर ढेर सारा अवसादयुक्त फेन छोड़ देगा। लेकिन, अगर कंकड़ी समुद्र की तल पर जाकर भी शांत नहीं हुई तो… तो वह ज्वालामुखी की बायस भी बन सकती है। ऐसे ही समुंदर का किरदार निभाया है रणबीर कपूर ने। आप समझ सकते हैं यह किरदार निभाना कितना मुश्किल रहा होगा। ऐसे जटिल व्यक्तित्व का किरदार निभाने में नाटकीयता का पुट आने की काफी संभावना है, क्योंकि उस व्यक्तित्व का जीवन भी दिखने-सुनने में नाटकीय लगेगा, इसके बावजूद रणबीर कपूर ने अपने कमाल के अभिनय से इस किरदार को ऐसे निभाया है कि वह जीवंत हो उठा है और उत्प्रेरक उर्फ कंकड़ी की भूमिका को दीपिका ने बड़ी शिद्दत से जिया है। हालांकि फिल्म में उनके लिए करने के लिए ज्यादा कुछ था नहीं, क्योंकि फिल्म का हर फ्रेम रोबोट रूपी स्पिलिट पर्सनालिटी वाले किरदार के मद्देनजर लिखा गया है, इसलिए यह भी कह सकते हैं कि यह पूरी फिल्म सिर्फ और सिर्फ रणबीर की है, हालांकि इसके बावजूद दीपिका भी इस फिल्म को अपने कंधे पर ढोती है तो इसका महज एक कारण है। वह है उनका सहज-स्वाभाविक अभिनय, जिसे वह हर अगली फिल्म में और ऊंचाई पर ले जाती हैं।

इम्तियाज की फिल्मों की सिनेमैटोग्राफी शानदार होती है। बतौर निर्देशक फिल्म पर उनकी पकड़ बनी रहती है। इसके बावजूद जमशेदपुर जैसे बी-टाऊन से निकल कर बॉलीवुड की रंगीन नगरी में अपनी पहचान बनाने वाले इस निर्देशक की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं- वह अमूमन एक ही ढर्रे की फिल्में बनाते हैं। उनकी कई फिल्मों को देखें तो ऐसा लगेगा कि फिल्म तो वही है, लेकिन कलाकार बदल गए हैं। वह करिश्माई रूप से अपनी हर फिल्म को सुखांत बना देते हैं। बॉक्स ऑफिस फॉर्मूले का पूरा ध्यान रखते हैं। उनकी हर फिल्म प्रेम कहानी के एक सेट फ्रेम में लेकर चलते हैं आदि-आदि-आदि… इस आधार पर आप कह सकते हैं कि वह भी उसी रोबोट की तरह हैं, जैसा किरदार उन्होंने इस फिल्म में रणबीर कपूर का गढ़ा है। उनकी अपनी फंतासियां है, जिस आधार पर वह काफी बोल्ड यौन फंतासियों का निर्माण लगभग अपनी हर फिल्म में करते हैं, लेकिन फिल्म खत्म होते-होते वह अचानक से परम्परागत हो जाते हैं। इस फिल्म की शुरुआत भी कुछ-कुछ वैसी ही होती है। इस फिल्म और रॉकस्टार के शुरुआती दृश्यों में तो इतनी समानता है कि लगता है कि फिर रॉकस्टार ही देख रहे हैं- अंतर बस इतना है कि नरगिस फाकरी की जगह दीपिका ने ले ली है। लेकिन जल्द ही ये फिल्म इस सेट पैटर्न से बाहर निकलती है, लेकिन पूरी तरह कहां निकल पाती है। फिल्म को सुखांत बनाने के चक्कर में वह युवाओं को एक नए खतरे की तरफ भी मोड़ देते हैं। बिना सामाजिक-पारिवारिक ढांचा बदले वह यह संदेश दे डालते हैं कि अपनी मर्जी का जिओ। यह खतरनाक है, बल्कि इसके बदले उन्हें सवाल सिस्टम पर खड़ा करना चाहिए था, लेकिन पॉपुलर सिनेमा की तरह इन दुश्वार सवालों से वह भी कन्नी काट जाते हैं।
इसके बावजूद रणबीर का शांत समुद्र से ज्वारभाटा और ज्वारभाटे से ज्वालामुखी बनना विचलित करता है और जिस बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रख कर फिल्म को सुखांत बनाने की चक्कर में इम्तियाज ने सामाजिक-पारिवारिक ढांचे पर सवाल नहीं खड़े किए, वे आपके जेहन में खुद-ब-खुद खड़े हो जाते हैं- जैसे क्या यह मुमकिन है कि बिना पारिवारिक-सामाजिक ढांचा बदले, जैसे वेद एक परंपरागत करियर को छोड़ कर दूसरे अपरंपरागत करियर में एक बार फिर उरोज पर पहुंच जाता है, वैसा ही कोई भी ऐसा कर सकता है या इस कोशिश में वो समाज को एक नये ‘एनिमल फॉर्म’ में बदल देगा।

साभार गूगल

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एक बात और, भले ही इम्तियाज पूरी तरह न बदले हों, बॉक्स ऑफिस की थोड़ी-बहुत मोह रह गई हो, लेकिन इसके बावजूद वह कई जगह दर्शकों को उनके कम्फर्ट जोन से बाहर ले जाते हैं। वह उन्हें परेशान करते हैं, कई सवाल का जवाब अनुत्तरित छोड़ देते हैं और रूपहले पर्दे के ‘तमाशा’ को जीवन के बड़े तमाशे में बदल देते हैं।

फिल्म की टैगलाइन है- व्हाई ऑलवेज सेम स्टोरी?- लेकिन यह भी सच है कि कहानी तो सिर्फ छह-सात तरीके की ही होती है। उसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता, इसलिए फिल्म शुरू होते ही वह बता भी देते हैं- कहानी चाहे राम-रावण की हो या सिकंदर-पोरस की अथवा लैला मजनूं की या शीरीन-फरहाद की, सबकी कहानी एक ही होती है- बस किरदार बदल जाते हैं। यानी जीवन के तमाशे में भी आपको वेद की कई कहानियां मिल जाएंगी, बस किरदार अलग होगा। हां, वहीं यह भी सच है कि भले ही वह भी नई कहानी लेकर नहीं आए हैं (यह अब शायद ही किसी के लिए मुमकिन हो), लेकिन प्रस्तुति का व्याकरण जरूर अलग गढ़ने की कोशिश की है। सीधे-सपाट, परंपरागत तरीके से कहानी न कह कर दास्ताने अलिफ लैला जैसी किस्सागोई, रंगमंच, बैले और कुछ हद तक गली-मोहल्लों में दिखाई जाने वाली तमाशा शैली का प्रयोग करते हैं। हालांकि यह प्रयोग भी कोई अभिनव प्रयोग नहीं है। फिल्मों में इसका यदा-कदा इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन इन सारी विधाओं का एक साथ और इतने व्यापक पैमाने पर शायद पहली बार किसी ने किया है। मैं अपनी बात के समर्थन में आपको केतन मेहता की अगस्त 1995 में आई शाहरुख खान और दीपिका मेहता अभिनीत फिल्म ‘ओह! डार्लिंग ये है इंडिया’ की याद दिला रहा हूं। बस स्मरण की खातिर। संभव है इम्तियाज ने इस शैली में फिल्म बनाने के लिए प्रेरणा वहीं से ली हो। लेकिन यह भी सच है कि प्रेरणा चाहे जहां से ली हो, प्रयोग बहुत शानदार किया है, जिसकी वजह से फिल्म शुरू से अंत तक आपको बांधे रखती है।

मज्कूर आलम द्वारा लिखित

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साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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