‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

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मज्कूर आलम 272 2018-11-17

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ 

मज्कूर आलम

मज्कूर आलम

तमाम हंगामों और तमाशों के बीच साल 2015 समाप्त हो गया। इस बीच साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सारोकार की पैरोकारी के लिए बना वेबपोर्टल ‘हमरंग डॉट कॉम’ ने भी पिछले ही महीने अपना एक साल पूरा कर लिया। यह हमारे लिए भी चुनौती थी और है कि इसकी दिशा और दशा सही रखने के साथ-साथ इसकी निरंतरता भी हम बनाए रखें। जिस मकसद से यह शुरू हुआ था, वह बना रहे। साहित्यिक-सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में दखल रखने वाले, युवा प्रतिभाओं को, अपनी बात रखने के लिए एक प्लेटफॉर्म मिले, इस साल भी हमारी प्राथमिकता में यही होगा। हम इसमें कितने सफल हुए या होंगे यह कहना तो अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि यह प्रयास जारी निरंतर रहेगा और साहित्यिक हस्तक्षेप की दिशा में हमरंग कभी चुप नहीं रहेगा।

चुप ! चुप्पी ! हां, यह एक चीज ऐसी जरूर रही, जिसे साल 2015 में पूरे साल होने वाले हंगामे और चलने वाले तमाशों के बीच हम सबने महसूस किया। हम सबने बेहद तकलीफदेह और चुभने वाली खतरनाक-सी चुप्पी इस साल महसूस की । यह चुप्पी अट्ठहास से भी ज्यादा खतरनाक इसलिए लगी, क्योंकि हमने देखा कि हर मुद्दे पर अपनी राय रखने वाले व्यक्ति ने भी कुछ खास किस्म के मुद्दों पर खामोशी ओढ़ और पहन ली।
अमूमन माना यह जाता है कि चुप्पी तटस्थ होती है। हम ऐसी स्थिति में ही खामोशी अख्तियार करते हैं, जब दोनों पक्षों की ओर से बोलना नहीं चाहते। ऐसे ही लोगों को लक्षित कर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी कविता की यह पंक्तियां लिखी थी-

‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध’

दिनकर जी ने ऐसा इसलिए लिखा था, क्योंकि वह जानते थे कि तटस्थता जैसी कोई चीज नहीं होती। वह हमेशा सशक्त के पक्ष में चली जाती है। इसी बात से वह हमें सचेत करना चाहते थे, लेकिन इस साल तो विश्व भर में इस चुप्पी का खुल्लम-खुल्ला इस्तेमाल रणनीतिक हथियार के रूप में किया गया। एक-एक चुप्पी के हजार-हजार मुंह बनते भी हमने देखे । सत्ता और शक्ति का संतुलन साधने में भी इसका इस्तेमाल होते देखा।

हालांकि यह भी सच है कि हंगामों के बीच के सूक्ष्मतम अंतरालों में खामोशियां छिपी ही होती हैं और यह भी तय है कि ये खामोशियां एक नये ‘तमाशे’ की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं । लेकिन, अगर यह खामोशी ‘फैब्रिकेटेड’ हो और यह चुभने की हद तक चली जाए तो यह बेहद खतरनाक हो जाती हैं। अगर इन खामोशियों का समाज द्वारा प्रतिकार न किया जाए तो निश्चित रूप से यह खामोशी भी उन फैब्रिकेटेड निर्दयी खामोशियों की पक्ष में ही खड़ी नजर आती हैं और यह तब होता है, जब हम कल्चर ऑफ साइलेंस (मौन संस्कृति) को स्वीकार लेते हैं, और हमारी सहभागिता, संघर्षों, आंदोलनों और प्रतिरोधों में कम या खत्म होने लगती है। हालांकि ऐसी स्थिति में हमें चारों तरफ से शोर ही शोर सुनाई देता है। हर मुद्दे पर राय रखी जाती है, ताकि ‘चुप्पी’ का उत्स जहां है, वहां तक लोगों को पहुंचने न दिया जाए या फिर चुप्पी के ईर्द-गिर्द बुने गए इन अट्ठाहासों में बाकी की आवाज़ चुप्पी की स्थिति में पहुंच जाए यानी किसी को सुनाई न पड़े। आपने भी जरूर देखे-सुने होंगे इस साल ऐसे अट्ठाहास और चुप्पियां । इसी खतरे से आगाह कराते हुए ‘ग्राम्शी’ ने अपने समय की स्थितियों पर एक बार यह टिप्पणी की थी, ‘समाज में सभी मनुष्य बुद्धिजीवी हैं, परंतु सभी बुद्धिजीवी की भूमिका का निर्वहन नहीं करते।’

हम वैश्विक स्तर पर इसे साफ देख सकते हैं कि ‘ग्राम्शी’ की यह उक्ति कितनी सही थी। कल्चर ऑफ साइलेंस के कितने भयावह परिणाम हो सकते हैं, यह आज हमारे सामने है। रूस ने जब इस साल आईएस के खिलाफ मोर्चा खोला तो अमेरिका समेत कई शक्तिशाली राष्ट्रों ने इस पर ऐसी चुप्पी साध ली, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अमेरिका और उसके गुट के राष्ट्रों का सीधा-सा अर्थ था, शक्ति संतुलन अपने पक्ष में रखना। इनके चुप होने की वजह से सशक्त अंतरराष्ट्रीय मीडिया जगत भी इस मुद्दे पर पूरे साल लगभग खामोश-सी ही रही । हाशिये की खबर की तरह आईएस पर रूस के हमले की खबरें हम तक जरूर आती रहीं।
अगर इस चुप्पी को बेहतर तरीके से समझना है तो इराक युद्ध के समय की स्थिति या अमेरिका के ट्विन टॉवर गिरने के बाद ओसामा बिन लादेन के खिलाफ चलाया गया अभियान अथवा अफगानिस्तान में जब अमेरिकी सेना के नेतृत्व में कई देशों की सेनाएं लगी थीं, उस समय को याद कीजिए- फर्क खुद-ब-खुद समझ में आ जाएगा। हालांकि फ्रांस में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका भी इस युद्ध में कूदा, लेकिन रूस के साथ नहीं, उसने अपना अलग मोर्चा खोल रखा है।
इस प्रकार जहाँ एक खास तरह की कट्टरता को लेकर पूरी दुनिया में माहौल बनाया गया तो वहीं दुनिया भर में एक दूसरी तरह की कट्टरता, जो इस ‘चुप्पी’ के साथ-साथ हमारे-आपके जीवन में प्रवेश करती जा रही है, उसके खिलाफ आपको शायद ही कुछ सुनने को मिले। इसे साजिशन न भी कहें तो यह तो कह ही सकते हैं कि इस मसले पर जान-बूझ कर (फैब्रिकेटेड) चुप्पी साधे रखी गई । यह मौन प्रश्रय इस कट्टरता को बहुत तेजी से पूरी दुनिया में फैला रहा है, जिसे लेकर दुनिया भर के समाज में बेचैनी महसूस की जा रही है । इस चुप्पी ने नफरत की जमीन तैयार की, जिसकी फसलें अब लहलहाने लगी हैं ।

इस खामोशी ने पूरे साल देश-दुनिया को परेशान रखा, लेकिन तटस्थता की पहचान के रूप में जानी जाने वाली इस चुप्पी को क्या सच में तटस्थता की श्रेणी में रखा जा सकता है। या फिर कवि अवतार सिंह ‘पाश’ की भाषा में कहूं तो यह चुप्पी, सहमी-सी चुप्पी है। नहीं यह वह भी नहीं। यह पूरी मुखरता के साथ ‘पक्षधर चुप्पी’ है।
जब मैंने इस चुप्पी पर संपादकीय लिखना चाहा तो पहली बार में अनायास कुछ ऐसे अस्फुट से ख्याल मेरे दिमाग में आए, जिसे लिखते वक्त मैंने बहुत बेचैनी भी महसूस की-

यह चुप्पी
अब तक हमने यही सुना है
चुप्पी हामी है
चुप्पी समर्थन है
चुप्पी सोना है

एक और चुप्पी है

आंखों की भाषा में है
दिलों की धड़कन में है
प्रेम के स्रोत में है

पर यह चुप्पी वह चुप्पी तो नहीं
न ही सहमी-सी चुप्पी में जकड़े जाना है

तो फिर कैसी है यह चुप्पी
जिसने सी दिए हैं औरों के लब

यह चुप्पी ‘पाश’ का वह चांद है
जो अपनी नर्म रोशनी में पिघला देता है हर सख्ती को
कि ‘सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता’
क्योंकि वह चुप रहता है
नजरें फेर लेता है
और उसकी चुप्पी पैदा करती हैं, हिंसक खामोशी की प्रतिध्वनियां
गली-गली, शहर-शहर
फिर वीरान पड़ जाती हैं बस्तियां
हमेशा के लिए सन्नाटे में तब्दील होकर
तमाम किंतु-परन्तु, अगर-मगर के बाद भी
यह चुप्पी इतिहास में दर्ज नहीं होती
नहीं, कभी नहीं
क्योंकि यह चुप्पी तटस्थता में नहीं आती

अर्थात यह चुप्पी इतनी निर्दयी चुप्पी है कि अपनी खामोशी के भीतर सबको समेट लेती है। इसके बाद आप सिसक तो सकते हैं, लेकिन वह सिसकी भी बेआवाज हो जाती है, क्योंकि इन सिसकियों के चारों ओर अट्ठाहास गूंज रहे होते हैं । इस हिंसक चुप्पी के सामने डर से आम आदमी की बोलती बंद है | अगर कोई हिम्मत करता भी है तो वह खामोश कर दिया जाता है । उदाहरण में लिखने के लिए सिर्फ यूनान, सुधींद्र कुलकर्णी, दाभोलकर, कलबुर्गी और पंसारे ही नहीं हैं, विश्व-पटल की तरफ नजर उठा कर देखिए तो ऐसे लोगों, समाजों, देशों को आर्थिक, मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना के द्वारा चुप कराए जाने के ढेरों उदाहरण आपको मिल जाएंगे। अगर एक साल और पीछे की बात करें तो 2014 में नोबेल पुरस्कार पाने वाली मलाला युसुफजई पर हुआ हमला और एक पाकिस्तानी स्कूल पर हमला कर सैकड़ों मासूमों को मारना भी तो चुप कराने का ही एक तरीका था।

अब चूंकि ‘उम्मीद’ अब भी एक जिंदा शब्द है, इसलिए इस नये साल में हमरंग आप सबको शुभकामना देते हुए यह उम्मीद करता है कि ‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ को बुद्धिजीवी या आम समाज में रत्तीभर भी जगह नहीं मिलेगी। हम मुखर होंगे… हर चुप्पी के खिलाफ!

साहित्यिक, सांस्कृतिक अपूर्णीय क्षिति या कहूं साहित्य और कला जगत के लिए किसी ह्रदय आघात से कम नहीं था, बीते वर्ष में एक के बाद एक हमसफरों का दिवंगत होना | हम उन्हें श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए यह यकीन रखते हैं कि वे सभी ज़िंदा रहेंगे हमारे शब्दों, एहसासों और ज़ज्बातों में |

पुनः आप सभी को नए साल की अनेक अनेक बधाइयां ……|

मज्कूर आलम द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
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