प्रेमचंद एक पुनर्पाठ, के संदर्भ में एक टिपण्णी: (डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा)

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डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' 79 2018-11-17

“हमरंग” के संपादकीय आलेख ‘प्रेमचंद एक पुनर्पाठ‘ के संदर्भ में साहित्यकार डॉ. मोहसिन ख़ान ‘तनहा की एक बड़ी टिपण्णी ……जिसे विमर्श के तौर पर जस के तस यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं –

प्रेमचंद एक पुनर्पाठके संदर्भ में एक टिपण्णी 

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

प्रेमचंद के पुनर्पाठ की आवश्यकता आज के संदर्भों में की जानी चाहिए ये बात सही है लेकिन आज की स्थितियाँ बादल चुकी हैं, आज पहले से भी अधिक कारगर शोषण के हथियार कई स्तरों पर ईजाद हो गए हैं। आज ज़रूरत है कि प्रेमचंद की परंपरा का निर्वाह करते हुए साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता और फासीवाद की ताकतों से संघर्ष करना होगा। यह लड़ाई सिर्फ साहित्य के माध्यम से की जा सकती है, क्योंकि मीडिया में इतनी सलाहियत नहीं कि सच को संसार के सामने ला सके, उसके पास शोधात्मक दृष्टि नहीं और न ही ज़िम्मेदारी का बोध है। हिन्दी के लेखक ही यह काम एक दायित्व के साथ कर सकता है। आज सवाल स्त्री- पुरुष के सम्बन्धों की पड़ताल का नहीं रहा गया है, न ही स्त्री कि छवि का, आज का सवाल सबसे बड़ा यह नज़र आता है कि जीविका को किस स्तर पर चलाया जाए ? सरकारी कार्यालय में नियुक्त हैं तो क्या बाकियों के साथ भ्रष्टाचार में योग देकर नोकरी बचाई जाए, या उदासीन होकर केवल यूं ही बुझेमन से जिया जाए! आज सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक ज़रूरत जनता को उसकी की शक्ति को पहचान कराकर सही जनमत को तैयार करना है। जिस दिन जनता का जनमत सही तैयार होगा राष्ट्र में सकारात्मक महाबदलाव कि स्थितियों का निर्माण हो जाएगा।

आज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा सांप्रदायिकता के बड़ते क़दमों में बेड़ियाँ डालने का है, जिस स्तर पर सांप्रदायिकता का प्रोपेगेंडा जिस दृष्टिकोण से जिस आयवरी टावर में बैठकर फैलाया जा रहा है उसका परिणाम बहुत खतरनाक होने के साथ मानव जीवन के लिए शर्मनाक होगा। आज की ज़रूरत सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ने की ज़रूरत है, लड़ने वाले कम हैं और लड़ाने वाले अधिक हैं, चारों ओर से आक्रामक स्थितियों का निर्माण हो रहा है, मन-मस्तिष्क में सांप्रदायिकता आलोड़न ले रही है, भरे हुए पेटों द्वारा सांप्रदायिकता की आग जलाई गयी है और उसकी आँच को और भी हवा देकर बढ़ाया जा रहा है। आज सबसे बड़ी चुनौती प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए राष्ट्रवाद की भावना को ऊपर लाना, साथ ही सांप्रदायिक-हिंसा और गलित प्रेरक शक्तियों की पहचान करते हुए उनके विरुद्ध खड़े होकर संघर्ष करने की है। मैं फिर स्पष्ट कर रहा हूँ कि राष्ट्र किसी भी आर्थिक संकट से नहीं गुज़र रहा है, न ही कोई बड़ा युद्ध राष्ट्र किसी राष्ट्र के साथ लड़ रहा है और न ही कोई प्राकृतिक आपदा राष्ट्र मे आई है। ऐसे शांति काल में क्यों न हम विकास की बात सोचें और सांप्रदायिक गलित शक्तियों का मुंह बंद करादें। ऐसे प्रगतिविरोधियों की सांप्रदायिकता की आग अपने आप ही बुझ जाएगी जिसमें बेगुनाहों को जलाया जाता है।

आज राष्ट्र में सांप्रदायिक सद्भाव का जनमत तैयार करने कि गहन आवश्यकता है, किसी भी प्रकार की अफवाह से ख़ुद को बचाते हुए सांप्रदायिक वैमनस्य की बातों से हरेक को हरेक से दूर रहना चाहिए और किसी भी प्रकार से मीडिया के बहकावे में न आते हुए, अपनी आत्मा, मन, मस्तिष्क की आवाज़ को सुनना होगा। आखिर धर्म, संप्रदाय से कहीं अधिक ऊँचा राष्ट्र होता है, राष्ट्रवासी होते हैं, उनका जीवन महत्त्वपूर्ण होता है। एक लेखक केवल अपने शब्दों से हिंसा करने वाली शक्तियों की पहचान ही करा सकता है, हिंसा को रोकने की हिदायत ही दे सकता है, ह्रासशील प्रवतियों के खतरों से सावधान रहने की बात कर सकता है। लेखक ख़तरों की संभावनाओं की तलाश कर सकता है, उनसे बचे रहने का मार्ग दिखा सकता है, गलित ताक़तों के विरुद्ध खड़े रहकर संघर्ष की भावना का निर्माण कर सकता है।

प्रेमचंद का साहित्य हमें ऐसी ही विचार-भावना का पाठ सिखाता है, उनके सारे पात्र संघर्ष की अवस्था के पात्र हैं, संघर्ष में भी विविधता है, कहीं आर्थिक है तो कहीं सामाजिक, कहीं सांप्रदायिक, कहीं राजनीतिक, लेकिन है संघर्ष की गाथा और आम आदमी के जीवन-संघर्ष की गाथा। किसी पूंजीपती, बुर्जूआ को कभी सड़क पर संघर्ष करते किसी ने देखा है? या किसी राजनेता को संकट के समय जनता के बीच सहायता करते देखा है? या किसी धर्म के ठेकेदार ने आमजन या जनता को सही मार्ग पर लेजाते हुए देखा है? सभी ने गुमराइयों को अपना हथियार बनया है, एक काल्पनिक लोक का झूठा निरमान किया है और समस्याओं को बढ़ाया है, यथार्थ तथा सच से दूर रखने की साजिश रची है, बिना चेतावनी के आम आदमी का क़त्ल किया है और करते जा रहे हैं। ऐसे समय में लेखक का दायित्व हो जाता है कि अपनी लेखन की धार को और पैना करे तथा गलित ताक़तों के विरुद्ध कई स्तरों पर संघर्ष करता हुआ प्रगति, विकास, राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हुए, फांसीवादी शक्तियों के विरुद्ध खड़े होकर आमजन को अपने साथ जोड़कर नए पथ का निर्माण करे जहां मानव जीवन को उन्नत, मूल्यवान, सुरक्षित और प्रगतिगामी बन जाए।

डॉ0 मोहसिन खान 'तनहा' द्वारा लिखित

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बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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