लोकतंत्र बचेगा तभी हम बचेंगे: (डॉ० नमिता सिंह)

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नमिता सिंह 25 2018-11-17

ये समझा जाता रहा है कि पत्रकार जनता की धड़कन पहचानते हैं और उसे शब्द देते हैं। वे एक प्रकार से जनता के प्रतिनिधि बन कर सत्ता और समाज के बीच सेतु होते हैं और इसीलिये लोकतंत्र के तीन अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका के साथ चैथे अंग के रूप में काम करते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश और समाज का परिदृश्य बदल गया है। ज्ञान और अध्ययन का क्षरण हुआ है, वैचारिक और राजनीतिक असहमति को सहन न करने आदि की बढती प्रवृति देश के लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा है।

लोकतंत्र बचेगा तभी हम बचेंगे

डॉ० नमिता सिंह

जनवादी लेखक संघ उ॰प्र॰ की अध्यक्ष नमिता सिंह ने हाल में बंगलूरू की वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के विरोध को देश में लोकतंत्र को बचाये रखने की मुहिम के रूप में देखने की बात कही है। गौरी लंकेश की दिन दहाड़े घर में घुसकर की जाने वाली हत्या को कुछ लोग समाज में होने वाली लूटपाट-हत्या जैसे अपराध की श्रेणी में रखने की कोशिश कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जो असहमति और प्रतिरोध की आवाज़ को बलपूर्वक दबा देने के हिमायती हैं। राजनैतिक रूप से अगर आप सत्ता-व्यवस्था की नीतियों के आलोचक हैं और विरोधी विचारधारा के हैं तो सत्ता-समर्थकों द्वारा आपकी हत्या होना आज मामूली बात हो गयी है। गौरी लंगेश लंबे समय से अपने पत्र में तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहीं। देश के पहले प्रधानमंत्री से लेकर इंदिरा गांधी तक और फिर अब वर्तमान मोदी सरकार की अनेक रीति-नीतियों की वे प्रखर आलोचक रहीं। कुछ दशक पहले तक आलोचना के बावजूद उसका दृष्टिकोण ध्यान से सुना जाता था। ये समझा जाता रहा है कि पत्रकार जनता की धड़कन पहचानते हैं और उसे शब्द देते हैं। वे एक प्रकार से जनता के प्रतिनिधि बन कर सत्ता और समाज के बीच सेतु होते हैं और इसीलिये लोकतंत्र के तीन अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका के साथ चैथे अंग के रूप में काम करते हैं।

    लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश और समाज का परिदृश्य बदल गया है। ज्ञान और अध्ययन का क्षरण हुआ है इसीलिये किसी से असहमत होने पर संभ्रांत दिखाई देने वाले लोग भी अब बहस नहीं करते बल्कि सीधे गाली-गलौज करते हैं जिसके नमूने हमें फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं। विचारधारा की असहमति सत्ता के समर्थकों को इतना डराती है कि लिखे गये लेखों या किताब के कारण फौरन ऐसे लेखक-पत्रकारों की हत्या हो जाती है। कानून-व्यवस्था इतनी लचर हो जाती है कि तमाम सूत्रों से जानकारी के बाद भी अपराधी नहीं पकड़े जाते हैं। पिछले चार सालों में डाॅ0 नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पानसारे और साहित्य अकादमी से सम्मानित कलबुर्गी ऐसे ही लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता थे।

वैचारिक और राजनीतिक असहमति को सहन न करने और विरोधी आवाज को हिंसा द्वारा दबा दिये जाने की यह दबंगई देश के लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा है। जहां असहमति हो या सच्चाई के लिये आवाज उठे उसे बलपूर्वक दबा दिया जाना तानाशाही को, हिंसा और अन्याय की राजनीति को जन्म देता है। हिंसा आधारित राजनीति में कोई भी सुरक्षित नहीं। जीने का अधिकार और सम्मान की सुरक्षा केवल लोकतंत्र में ही संभव है। इस लोकतंत्र के लिये, अन्याय के प्रतिरोध के लिये पत्रकार और लेखक दबंगई की बलि चढ़ते रहे हैं। बिहार के पत्रकार को शाहबुद्दीन जैसे नेता के लोगों ने मौत के घाट उतार दिया तो 2002 में गुरमीत रामरहीम के भक्तों ने यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की बात अपने पत्र में छापने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को गोली से उड़ा दिया। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं लेकिन जब वैचारिक असहमति के कारण हत्यायें हों तो यह लोकतंत्र को कमजोर करता है और क्षीण होता लोकतंत्र तानाशाही में बदलने लगता है जिसका सबक हमें हिटलर द्वारा शासित जर्मनी के इतिहास से लेना चाहिये।

 इस मौके पर जर्मनी के ही कवि पास्तर निमोलर की एक विश्व प्रसिद्ध कविता को हिन्दुस्तान के संदर्भों में बदल कर कहना समीचीन होगा-

पहले वे आये मुसलमानों के लिये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं मुसलमान नहीं था।
फिर वे आये ईसाईयों के लिये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं ईसाई नहीं था।
फिर वे आये कम्युनिस्टों के लिये
मैं चुप रहा
क्योंकि मैं कम्युन्स्टि नहीं था
फिर वे आये
मानव-अधिकार कार्यकर्ताओं के लिये
मैं चुप रहा
क्योकि मैं मानव अधिकार कार्यकर्ता नहीं था।
और फिर, वे आये मेरे लिये
वहां सन्नाटा था
मेरे लिये बोलने वाला
वहां कोई नहीं था।

(पास्तर निमोलर से क्षमा याचना सहित)

नमिता सिंह द्वारा लिखित

नमिता सिंह बायोग्राफी !

नाम : नमिता सिंह
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जन्म - 4 अक्टूवर 1944 लखनऊ


पूर्व संपादक - वर्तमान साहित्य


प्रदेश अध्यक्ष - 'जनवादी लेखक संघ' उत्तर प्रदेश


प्रकाशित कृतियाँ -
कहानी संग्रह - खुले आकाश के नीचे, राजा का चौक, नील गाय की आँखें, जंगल गाथा, निकम्मा लड़का, मिशन जंगल और गिनीपिग, उत्सव के रंग
उपन्यास - अपनी सलीबें, लेडीज क्लब, हाँ मैंने कहा था, स्त्री प्रश्न, आदि 

संपर्क-
अवंतिका, एम्0 आई0 जी0 -28
रामघाट रोड, अलीगढ

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 198 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 371 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

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