भाषाई विकास को लड़ना जरूरी…: “प्रेमपाल शर्मा” साक्षात्कार

नित्यानंद गायेन 12 2018-11-17

भाषाई विकास को लड़ना जरूरी…: “प्रेमपाल शर्मा” साक्षात्कार


किसी भी राष्ट्र की स्थाई विकास यात्रा में वहाँ के भाषाई योगदान को नकारा नहीं जा सकता बल्कि कहा जाय कि भाषा ही राष्ट्रीय विकास की पहली सीढी है | लेकिन इधर भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर हमारी सरकारें इतनी चिंतातुर नहीं लगतीं | हिंदी के लिए बड़े बड़े आयोजन तो होते हैं लेकिन भारतीय भू भाग में भी हिंदी जीविकोपार्जन की भाषा नहीं बन सकी | भारतीय विविधिता की पहचान, कई प्रादेशिक भाषाओं के लुप्त और अन्य क्षेत्रीय भाषाए हासिये पर हैं …. ऐसे में “भाषाई विकास की भारतीय अवधारणा” विषय पर साहित्यकार ‘प्रेमपाल शर्मा’ से बात की,  हमरंग के सहयोगी साथी ‘नित्यानंद गायेन’  ने | संसाधन के अभाव पर काम करने का जूनून भारी पडा और यह बात-चीत मोबाईल से रिकॉर्ड की गई …. कैमरे के त्तौर पर मोबाईल को ऑपरेट करने को एक व्यक्ति के आभाव में, इस विधा से बिलकुल अनजान एक वुजुर्ग व्यक्ति के सहयोग से यह साक्षात्कार रिकॉर्ड हुआ तब निश्चित ही कुछ तकनीकी खामिया भी रहीं हैं  बावजूद इसके इस महत्वपूर्ण चर्चा को आप तक पहुँचाने के उद्देश्य से प्रस्तुत है यह साक्षात्कार …..

नित्यानंद गायेन द्वारा लिखित

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अनीता 51 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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