भाषाई विकास को लड़ना जरूरी…: “प्रेमपाल शर्मा” साक्षात्कार

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नित्यानंद गायेन 87 2018-11-17

भाषाई विकास को लड़ना जरूरी…: “प्रेमपाल शर्मा” साक्षात्कार


किसी भी राष्ट्र की स्थाई विकास यात्रा में वहाँ के भाषाई योगदान को नकारा नहीं जा सकता बल्कि कहा जाय कि भाषा ही राष्ट्रीय विकास की पहली सीढी है | लेकिन इधर भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर हमारी सरकारें इतनी चिंतातुर नहीं लगतीं | हिंदी के लिए बड़े बड़े आयोजन तो होते हैं लेकिन भारतीय भू भाग में भी हिंदी जीविकोपार्जन की भाषा नहीं बन सकी | भारतीय विविधिता की पहचान, कई प्रादेशिक भाषाओं के लुप्त और अन्य क्षेत्रीय भाषाए हासिये पर हैं …. ऐसे में “भाषाई विकास की भारतीय अवधारणा” विषय पर साहित्यकार ‘प्रेमपाल शर्मा’ से बात की,  हमरंग के सहयोगी साथी ‘नित्यानंद गायेन’  ने | संसाधन के अभाव पर काम करने का जूनून भारी पडा और यह बात-चीत मोबाईल से रिकॉर्ड की गई …. कैमरे के त्तौर पर मोबाईल को ऑपरेट करने को एक व्यक्ति के आभाव में, इस विधा से बिलकुल अनजान एक वुजुर्ग व्यक्ति के सहयोग से यह साक्षात्कार रिकॉर्ड हुआ तब निश्चित ही कुछ तकनीकी खामिया भी रहीं हैं  बावजूद इसके इस महत्वपूर्ण चर्चा को आप तक पहुँचाने के उद्देश्य से प्रस्तुत है यह साक्षात्कार …..

नित्यानंद गायेन द्वारा लिखित

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उमाशंकर सिंह परमार 359 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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