एक अश्लील कहानी: लघुकथा (प्रमोद बेड़िया)

कथा-कहानी लघुकथा

प्रमोद बेड़िया 109 2018-11-17

इस अत्यंत ज्वलनशील विषय पर इतनी रोचक और साफसुथरी कलात्मक लेकिन गंभीर चिंतन को विवस करती कहानी …..

एक अश्लील कहानी

उसे याद है ,हुबहू ,वैसे का वैसा – सब के सब जमा थे ,एक जर्जर होते मकान का बचा हुआ कमरा ,चुना गया था ,इस काम के लिए । क़स्बे में ऐसे क्षण चरम उत्तेजना के होतें हैं ,सो सभी अंदर ही अंदर काँप रहे थे ,सिहर रहे थे कि सबकुछ खुलने वाला है ,हालाँकि ज़्यादातर लोगों के लिए यह कोई रहस्य तो नहीं था ,लेकिन जुगुप्सा असीम थी और उस आती अनजान आँधी का अंदेशा भी था ! वे सारे अधेड़ सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे ,फिर भी सकपकाती अनुभवहीनता ने उन्हें पकड़ रखा था और लगता था कि बहुत कुछ जानना बाक़ी है ।
इस आग में पलीता लगा दिया हरिप्रसाद की सूचना ने । पहले भी हरिप्रसाद अपनी दुकान के माल के साथ और कुछ खास माल भी ले आता था ,जो वह कुछ खास दोस्तों को बेचता था ,और उनसे भी खास दोस्तों को देखने देता था ,वे संभोग रत युगल ,तिगल , चगुल ,यहाँ तक कि कुत्तों ,घोड़ों ,इत्यादि के अति वैज्ञानिक तकनीक से खींचे गए चित्र थे ,जो यहाँ इस क़स्बे में ,कुछ खास लोगों को ही हासिल थे ,और अगर कुछ लोगों तक यह ख़बर जाती भी तो इससे उनका सामाजिक रुतबा अंदर ही अंदर बढ़ने लगता था ।
सो हरिप्रसाद यह काम गाहे ब गाहे अपने सामाजिक कर्तव्य की तरह ही करता था और जैसे कोई कविता लिख कर ऐसी जगहों में फुसफुसाती लोकप्रियता हासिल कर लेता है ,वैसे ही हरिप्रसाद भी लोकप्रिय हो चला था । सो उसे लगा होगा कि और लोकप्रिय हुआ जाए तो एक दिन उसने टोली में ऐलान किया कि सोलह एम एम का प्रोजेक्टर लाया है और फ़िलिम भी और यह ऐलान उसने किसी गुप्त हमले की तरह अपने खास दोस्त महावीर से किया !जगह का तोड़ा था ,गुप्त दुरभिसंधियां थी और सूचना के विस्फोट की आशंका थी ,सो स्वतंत्रता संग्राम में जैसे अस्त्र जमा किए जाते ,वैसे ही तीव्र ,लेकिन एक दूसरे को रोकते हुए ,वे सारे सरंजाम जमा किए गए और बाहर के हिस्सों में चल- फिर कर जाँच परख लिया गया ।
कुछ लोग तो समय से पहले ही पहुँचने लगे थे और कुछ चाह कर भी यह दिखाते हुए कि उन्हे कोई उत्सुकता नहीं थी ठीक याने ऐन समय पर पहुँचने लगे थे । जो बचा हुआ कमरा था ,उसे बंद करने के बाद प्रोजेक्टर की रोशनी मे हल्का- सा उजास हुआ और सबके पसीने से चमकते चेहरे नजर आने लगे । बहरहाल वहाँ प्रोजेक्टर को चलाने की सीमित योग्यता हरि में ही थी सो थोड़ी- सी खटखट के बाद वह चल गया और सादे काले में चरम व्युत्पियां होने लगी और ज़ुबान पर लगाम लगाए सब लपलपाते आनंद में विभोर होते जा रहे थे और कई तो लथपथ हो गए थे और कई ,जिनमें महावीर प्रमुख था ,ऐसे कृत्य को धिक्कारते भी जा रहे थे ।
बाद में महावीर कईबार वह प्रोजेक्टर हरि से अपनेघर भी ले गया ,अकेले देखने के लिए ।
॥॥॥॥॥॥
क़स्बे में एक नई संस्कृति का ऐलान होने लगा ,सभ्यता का विकास होते- होते अब ये सब आनंद सहज होते जा रहे थे और हरिप्रसाद पस्त हो गया और धार्मिक हो गया ,सो अब जो नए ज़माने के औज़ार थे सीडी इत्यादि वह कुछ अमीर और कुलीन लोगों के घरों में पाए जाने लगे । और बहुतायत में पाए जाने लगे ,लगता कि रात के ये कार्यक्रम ही रहते थे । ,दिन में वे समाज और राजनीति की बातें करते ,देश के बिगड़े हालात पर बातें करते और रातें रंगीन होती ।
महावीर साधारण- स्थिति का आदमी था ,जिसके साधन तो सीमित थे ,लेकिन अरमान पहाड़- से थे ,पिचकी हुई ही आर्थिक स्थिति थी ,उसे उस ज़माने से लत लग गई थी ,कोई नर्गिस का दीवाना था ,कोई रेखा का ,लेकिन महावीर बिना नाम की नायिकाओं का दीवाना था जो उसे असंभव अदाओं में करतब दिखाती और वह उसे सच मानने लगा था ।उसकी पत्नि तो बेचारी सरल भारतीय पत्नि थी जो पति परमेश्वर की धारणाओं में रची बसी रहती है और उसकी आज्ञा शिरोधार्य रहती है ,सो वह तो बेचारी जैसे महावीर कहता करती रहती थी ,उसे वैसे मज़ा कभी नहीं आया जैसा कि महावीर महसूस करता था ,और न ही वो अद्भुत ,भदेस और विकृत कलाबाज़ियाँ उसे अच्छी लगती थी ,वह तो उसे खुश करने साथ भर देती थी । सब हो चुकने के बाद वह उसे न तो कोई स्मृति रहती और न ही कोई रोमांच ! तीन बच्चे पैदा कर वह ऐसे भी निचुड़ चुकी थी ,उसे ऐसी अदाओं में कुछ नजर नहीं आता था ।
महावीर कौन- सा ज़हीन जवान गबरु था ,लेकिन सालों से इस षड़यंत्र में लिप्त होते- होते वह आदी हो गया था और निकल नहीं पा रहा था और रोज कुछ नया खोजता ,जो उसे ऐसे दृश्य दे पाते । उसे इधर में लगने लगा था कि उसकी पत्नि रेखा अब रेखा नहीं रही वह चरित्र अभिनेत्री हो गई है ,सो नायिका बदलनी चाहिए । पड़ोस की भाभीजी पर उसकी नजर थी ,लेकिन वह ऐसे संबंधों को अनुचित मानता था । क्या ग़ज़ब है कि दिन भर जो दिमाग़ के विस्तर पर औरतों के साथ लोटपोट खाते रहता ,उसे यह अनुचित लगता – यह उस चरम रूढ़िवादिता का दर्शन है जो नैतिकता की व्याख्या अपनी तरह करते जाता है !
अंतत: महावीर बग़ल वाली भाभीजी याने कमला को फँसाने में सफल हुआ ,क्योंकि भाभीजी को रेखा से कईबार वे सीडियां मिल चुकी थी और तार महावीर तक जाते ही थे । सो महफिल जमने लगी ,क्योंकि कमला के पति अक्सर बाहर जाते थे और रात अपनी थी ,महावीर को कौन बोले ,रेखा तो काम करती ,निचुड़ जाती और सो जाती ,घंटी बजती तो कपाट खोल देती ।
महावीर को उस अधेड़ होती हुई औरत में आनंद आने लगा । यह मर्द की कमाल की सीरत होती है कि उसे दूसरे की औरत जवान नजर आती है और मज़ेदार लगती है ,सो महावीर कमला पर फ़िदा रहता सामने फिलम चलती और वह उस अधेड़ होती औरत से अटखेलियाँ करता नहीं अघाता और वह औरत अपने पति को मन ही मन कोसते हुए जवान होते हुए भदभदाती रहती । एकाध महिने गुज़रे ।
यह समय गुज़रा ,तो महावीर वापस तंग नजर होने लगा । दरअस्ल उसे यह नहीं समझ में आ रहा था कि यह कोई लिप्त होने का सरूर नहीं है ,यह कोई ऐसा दरिया है ही नहीं जिसमें डूब कर रहा जा सकता है ,यह तो कीचड़ से लथपथ मेनहॉल है जिसमें गंदगी ही लिथड़ेगी ,वह इस लय को पकड़ नहीं पा रहा था और दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराए जा रहा था ।
एक रात जब वह कमला को नोचचींथ रहा था और वह आहे भर कर साथ दिए जा रही थी ,कि हठात् उसने उसे परे हटाया ,मन में कहा – साली छिनाल कहीं की – उसे बग़ल के घर में पड़ी अपनी पत्नि रेखा की याद आई ,वह सोचने लगा कि सालों से उसके साथ षड़यंत्र करता रहा वह ,एक बार फिर वह बड़बड़ाया – हरामज़ादी कहीं की ,जो कि कमला के लिए कहा ,लेकिन वह समझ नहीं पाई ,बोली – क्या हुआ?
कुछ नहीं – महावीर बोला और कपड़े पहनने लगा । यह संबंध कोई ऐसा तो था नहीं जिसमें कमला कहती कि न जाओ सैंयां ,छुड़ा के बहिंया ,सो बोली – अरे हुआ क्या ?
महावीर बोला – जो बहुत पहले होना चाहिए था । वह कपड़े पहन चुका था । बाहर जाते हुए बोला – कपाट बंद कर लेना ।

प्रमोद बेड़िया द्वारा लिखित

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

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