‘डॉ. राकेश जोशी’ की ग़ज़लें:

कविता ग़ज़ल

डॉ० राकेश जोशी 23 2018-11-18

डॉ. राकेश जोशी की ग़ज़लों को दुष्यंत कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली ग़ज़लें माना जाता है. उनकी ग़ज़लों में आम-जन की पीड़ा एवं संघर्ष को सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है, इसलिए ये आज के इस दौर में भीड़ से बिलकुल अलग खड़ी नज़र आती हैं.

‘डॉ. राकेश जोशी’ की ग़ज़लें 

डॉ० राकेश जोशी

१-

हर नदी के पास वाला घर तुम्हारा
आसमां में जो भी तारा, हर तुम्हारा

बाढ़ आई तो हमारे घर बहे
बन गई बिजली तो जगमग घर तुम्हारा

तुम अभी भी आँकड़ों को गढ़ रहे हो
देश भूखा सो गया है पर तुम्हारा

फिर तुम्हें कोई मदारी क्यों कहेगा
छोड़कर जाएगा जब बन्दर तुम्हारा

ये ज़मीं इक दिन उसी के नाम पर थी
वो जिसे कहते हो तुम नौकर तुम्हारा

दूर उस फुटपाथ पर जो सो रहा है
उसके कदमों में झुकेगा सर तुम्हारा

२-  

googleसे साभार

बादल गरजे, डर जाते हैं नए-पुराने सारे लोग
गाँव छोड़कर चले गए हैं कहाँ न जाने सारे लोग

खेत हमारे नहीं बिकेंगे औने-पौने दामों में
मिलकर आए हैं पेड़ों को यही बताने सारे लोग

मैंने जब-जब कहा वफ़ा और प्यार है धरती पर अब भी
नाम तुम्हारा लेकर आए मुझे चिढ़ाने सारे लोग

गाँव में इक दिन एक अँधेरा डरा रहा था जब सबको
खूब उजाला लेकर पहुँचे उसे भगाने सारे लोग

भूखे बच्चे, भीख माँगते कचरा बीन रहे लेकिन
नहीं निकलते इनका बचपन कभी बचाने सारे लोग

धरती पर खुद आग लगाकर भाग रहे जंगल-जंगल
ढूँढ रहे हैं मंगल पर अब नए ठिकाने सारे लोग

इनको भीड़ बने रहने की आदत है, ये याद रखो
अब आंदोलन में आए हैं समय बिताने सारे लोग

चिड़ियों के पंखों पर लिखकर आज कोई चिट्ठी भेजो
ऊब गए है वही पुराने सुनकर गाने सारे लोग

३-  

साभार google से

धरती के जिस भी कोने में तुम जाओ
वहाँ कबूतर से कह दो तुम भी आओ

अगर आग से दुनिया फिर से उगती है
जंगल-जंगल आग लगाकर आ जाओ

बादल से पूछो, तुम इतना क्यों बरसे
कह दो, लोगों की आँखों में मत आओ

गूंगे बनकर बैठे थे तुम बरसों से
अब सड़कों पर निकलो, दौड़ो, चिल्लाओ

महल में राजा के कल फिर से दावत है
भूखे-प्यासे लोगो, अब तुम सो जाओ

फसलो, तुमसे बस इतनी-सी विनती है
सेठों के गोदामों में तुम मत जाओ

४- 

हर तरफ भारी तबाही हो गई है
ये ज़मीं फिर आततायी हो गई है

कुछ नए क़ानून ऐसे बन गए हैं
आज भी उनकी कमाई हो गई है

जब से हम पर्वत से मिलकर आ गए हैं
ऊँट की तो जग-हँसाई हो गई है

फिर किसानों को कोई चिठ्ठी मिली है
फिर से ये धरती पराई हो गई है

मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
बीच में गहरी-सी खाई हो गई है

वो तो बच्चों को पढ़ाना चाहता है
पर बहुत महंगी पढ़ाई हो गई है

डॉ० राकेश जोशी द्वारा लिखित

डॉ० राकेश जोशी बायोग्राफी !

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