हमारे समय के धड़कते जीवन की कविताएं: समीक्षा (डॉ० राकेश कुमार)

कविता पुस्तक समीक्षा

डॉ० राकेश कुमार 53 2018-11-18

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के मध्यांतर में प्रदीप मिश्र की कविताएं तेजी से बदलते भारतीय समाज के विविध रंगों को हमारे सामने लाते हैं। वर्तमान समय में भारतीय समाज लोकतंत्र, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और निजीकरण की बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। समाज की सतह पर दिखाई देता है कि लोकतंत्र सही और स्वस्थ दिशा में जा रहा है। भूमंडलीकरण ने मध्यवर्ग को नए सपने और वैश्विक बाज़ार दिया है। बाज़ार ने आज इतने विकल्प उपलब्ध करा दिए हैं कि उपभोक्ता चकित है और निजीकरण ने सरकारी लेटलतीफी को तोड़ दिया है। परंतु यदि सतह के नीचे देखा जाए तो उदारीकरण के इन पच्चीस वर्षों में भारत में आज भी समाज का बहुत बड़ा वर्ग इस चमचमाते लोकतंत्र में अपनी जगह ढूंढ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के बड़े सपनों के बीच यह आम आदमी आज निराश हो रहा है। प्रदीप मिश्र इसी आम आदमी के सपनों, संघर्षों और उपलब्धियों को बड़े फलक पर उठाते हैं। ‘प्रदीप मिश्र’ के नए काव्य संग्रह ‘उम्मीद’ जो “मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरूस्कार” २०१६ के लिए चुना गया है, साठ कविताओं को समेटे इस काव्य संग्रह पर ‘डॉ० राकेश कुमार’ का समीक्षालेख……..

हमारे समय के धड़कते जीवन की कविताएं 

डॉ० राकेश कुमार

– संदर्भ – “उम्मीद” (काव्य संग्रह)

कहा जाता है कि आलोचना का काम रेडियो की सुई को सही मीटर पर लगाने जैसा होता है, ताकि रचना का अर्थ सही-सही सुनाई दे सके। इसी प्रकार कविता जोकि अनेक मायनों में अपने समय की आलोचना होती है, वह भी हमारे समय के रेडियो की सुई को सही मीटर पर लाने का काम करती है, ताकि हम अपने समय की उन आवाज़ों को साफ़ और सही सुन सकें, जिन्हें अक्सर या तो दबा दिया जाता है या फिर शोर के तले धुंधला कर दिया जाता है। कवि प्रदीप मिश्र की कविताएं सच्चे अर्थों में रेडियो की सुई को सही मीटर पर लगाती हैं। अपने पहले काव्य संग्रह ‘फिर कभी’ के बाद कवि प्रदीप मिश्र का नया काव्य संग्रह ‘उम्मीद’, साहित्य भंडार, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में प्रदीप मिश्र की साठ कविताओं को पढ़ा जा सकता है। प्रदीप मिश्र एक सजग, जागरुक और जनपक्षधर कवि हैं। उनकी कविताएं हमारे समय के जनवादी मूल्यों और सरोकारों की कविताएं हैं।

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के मध्यांतर में प्रदीप मिश्र की कविताएं तेजी से बदलते भारतीय समाज के विविध रंगों को हमारे सामने लाते हैं। वर्तमान समय में भारतीय समाज लोकतंत्र, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और निजीकरण की बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। समाज की सतह पर दिखाई देता है कि लोकतंत्र सही और स्वस्थ दिशा में जा रहा है। भूमंडलीकरण ने मध्यवर्ग को नए सपने और वैश्विक बाज़ार दिया है। बाज़ार ने आज इतने विकल्प उपलब्ध करा दिए हैं कि उपभोक्ता चकित है और निजीकरण ने सरकारी लेटलतीफी को तोड़ दिया है। परंतु यदि सतह के नीचे देखा जाए तो उदारीकरण के इन पच्चीस वर्षों में भारत में आज भी समाज का बहुत बड़ा वर्ग इस चमचमाते लोकतंत्र में अपनी जगह ढूंढ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के बड़े सपनों के बीच यह आम आदमी आज निराश हो रहा है। प्रदीप मिश्र इसी आम आदमी के सपनों, संघर्षों और उपलब्धियों को बड़े फलक पर उठाते हैं।

प्रदीप मिश्र कोरपोरेट मीडिया और राजनीति के द्वारा आम जनता की समृद्धि, स्वतंत्रता और संसाधनों की पूंजीवादी लूट पर सवाल उठाते हैं। उनकी कविताएं आम जन-जीवन के छोटे-छोटे बिम्बों के माध्यम से इन सभी बड़े सवालों को सहजता से उठाती हैं। इनमें ‘स्कूटर चलाती लड़कियाँ’ हैं तो अच्छे दिन की उम्मीद में जमीन में बीज और मतपेटी में वोट डालते आम जन हैं। अपनी एक कविता ‘उम्मीद’ में प्रदीप कहते हैं कि एक ऐसे समय में जहाँ

आदमियों से ज्यादा लाठियाँ हैं
मुद्दों से ज्यादा घोटाले 
जीवन से ज्यादा मृत्यु के उद्घोष
फिर भी वोट डाल रहा है वह
उसे उम्मीद है आएंगे 
अच्छे दिन भी (उम्मीद, पृ. 18)

देश में जब लोकतंत्र आया तो यह एक क्रांतिकारी कदम था परंतु लगभग सात दशक की यात्रा में अभी आजादी के वास्तविक मायने पाने बाकी हैं। प्रदीप अपनी एक कविता ‘सफेद कबूतर’ में इसी आज़ादी का इंतज़ार कर रहे आम जन की आकांक्षा को बयान करते हैं-

इंतज़ार कर रहा हूँ
कब सुबह हो और उतरूँ
अपने देश की आज़ाद धरती पर (सफेद कबूतर पृ. 65)

काव्य संग्रह- ‘उम्मीद’,
लेखक- प्रदीप मिश्र
प्रकाशक -नयासाहित्य भंडार, इलाहाबाद

पर ऐसा क्यों हुआ कि हम आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी आज़ादी को ढूंढ रहे हैं ? कौन छीन के ले गया हमारे आज़ाद पंख? सवाल बहुत सरल हैं पर उनके जवाब उतने ही जटिल। हमें पिछले 68 वर्षों के इतिहास को दो भागों में बांट कर देखना होगा । पहला सन् सैंतालिस में मिली आज़ादी से लेकर सन् नब्बे तक और सन् नब्बे से लेकर आज तक। इन दोनों काल खंडों में हमने अनेक चुनौतियाँ झेली और अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं। प्रदीप मिश्र हमारे बिलकुल समकालीन कवि हैं। इनकी कविताओं में बेवजह चीज़ों, मुद्दों, और समस्याओं को अधूरे बिम्बों से धुंधला नहीं किया गया है बल्कि इनकी कविताएं हमारे समाज, सत्ता प्रतिष्ठानों, संसद, व्यापार जगत से सीधे सवाल करती हैं। जाहिर है कि यथास्थितिवाद की पोषक शक्तियां इन सवालों से बेचैन होती हैं। सन् नब्बे के बाद के उदारीकरण और भूमंडलीकरण ने हमारे सामने अनेक नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं। प्रदीप मिश्र अपनी एक कविता ‘ग्लोब… ग्लोब… ग्लोबलाइजेशन’ में भूमंडलीकरण की चमक के ठीक नीचे आत्महत्या करते किसानों और फेरीवालों की त्रासदी को एक स्कूल के साधारण मास्टर के माध्यम से व्यक्त करते हैं। वे लिखते हैं….

मास्टर बेचैन है
जब से उसने पढ़ी
किसानों की आत्महत्या की खबर
फुटकर विक्रेताओं की सामूहिक मौत
फेरीवालों के कुएं में छलांग लगाने की कथा
तब से बेचैन है मास्टर ( ग्लोब… ग्लोब… ग्लोबलाइजेशन पृ. 71)

जहाँ एक ओर ये आत्महत्याएं हैं वहीं चमचमाते हुए बाज़ार और माॅल्स हंै। बाज़ार विज्ञापनों के जरिए पूरी की पूरी एक पीढ़ी को गुमराह किए हुए है। वास्तव में विज्ञापन पूंजीवादी बाज़ारवाद का सबसे अचूक हथियार है। कवि की गहरी चिंता यह है कि यह बाज़ार विज्ञापन के रथ पर बैठ कर सिर्फ दुकानों में ही नहीं घूम रहा बल्कि हमारे घरों और हमारी संवेदनाओं तक में घर कर रहा है। इसीलिए विज्ञापन शीर्षक से प्रदीप तीन कविताएं लिखते हैं- प्रदीप मिश्र कहते हैं

पैसा जब बोलता है तब
मनुष्य चुप हो जाता है
देश मुहल्ले-गली-घर 
सब बदल जाते हैं बाज़ार में (विज्ञापन-एक पृ. 73)

इस स्थिति में बाज़ार तय करता है आपकी इंसानियत, पक्षधरता और ईमानदारी और जब यह सबकुछ बिक जाता है तो मनुष्य किसी भी प्रकार सांस्कृतिक-नैतिक बोझ से आज़ाद हो कर एक पूर्ण उपभोक्ता बन जाता है। आज की बाज़ारवादी व्यवस्था को इसी प्रकार के उपभोक्ता की जरूरत है। प्रदीप विज्ञापन-दो और विज्ञापन-तीन में इसीको गहरी पीड़ा के साथ व्यक्त करते हुए लिखते हैं

भगत सिंह की जवानी को धिक्कारता हुआ
मैं पिज्जा और बर्गर खा रहा हूँ
मैं उड़ान पर हूँ
क्योंकि मेरे नीचे की ज़मीन खिसक गई है। (विज्ञापन-दो पृ. 74)

प्रदीप मिश्र के इस संग्रह की कई कविताएं सीरीज़ में लिखी गई हैं, जिनमें विषय तो एक ही रहता पर उसे देखने का नजरिया बदल जाता है। जिससे उस विचार-भाव के मायने एक नए रूप में सामने आते हैं। इस संग्रह की ‘बरसात में भीगती लड़कियाँ एक-दो, हमारे समय में विज्ञान एक-दो, मेघराज एक-दो, विज्ञापन एक-दो-तीन, कोचिंग सेंटर एक-दो-तीन, काठ की अलमारी में किताबें एक-दो, दीपक एक-दो-तीन इसी प्रकार की कविताएं हैं।
विकास और विनाश का मुद्दा बहुत पुराना है। पश्चिमी ढंग के औद्योगिकीकरण और विकास के मॉडल ने अनेक विसंगतियों और त्रासदियों को जन्म दिया है। भोपाल गैस कांड, टिहरी और नर्मदा पर बने बांधों से हुए विस्थापन, कोयला खदानों से नष्ट होते जंगल और आदिवासी इसके कुछ उदाहरण हैं। नर्मदा बांध से जलमग्न हुए हरसूद की त्रासदी पर प्रदीप पाँच कविताएं लिखते हैं। उनका मानना है कि जब कोई डूब की वजह से विस्थापित होता है तो सिर्फ जगह ही नहीं बदलती बल्कि सदियों से चली आ रही मूल्य व्यवस्थाएं, संस्कृति और जीवन शैली भी उसके साथ डूब जाती है। इन कविताओं में डूब में नष्ट हुए हरसूद की कई तस्वीरें हैं। कहीं उजाड़ पड़े हुए घर-द्वार हैं तो कहीं स्कूल। कहीं अनेक कहानियां कहते पेड़ हैं तो कहीं राह में छूट गया जूता है। प्रदीप कहते हैं-

इस बार न फैली महामारी
न भूकम्प से थरथराई धरती
न ज्वालामुखी से उमड़ा आग का दरिया
न ही हुआ प्रलय का महाविनाशक ताण्डव
फिर भी डूब गया एक गाँव हरसूद
हरसूद डूब गया 
हरसूद डूब गया 
अपनी सभ्यता-परम्परा और
जीवन की कलाओं के साथ। (चार-डूब गया एक गाँव हरसूद)

आज़ादी के बाद हुए विभाजन की त्रासदी कोई कम न थी वह एक ऐसा घाव था तो झटके में काट गया था भारत को। परंतु विस्थापन एक ऐसा घाव है जो निरंतर रिस रहा है। पिछले कुछ दशकों में गाँव से शहरों की ओर भयंकर पलायन हुआ। रोज़गार की तलाश में आने वाले एक बड़े सपने के साथ शहर के स्लम्स में मरने को अभिशप्त है गांव का आदमी। ‘नाले’ नामक कविता में प्रदीप मिश्र लिखते हैं,

इनके पेट से गुजरती है
शहर की सारी गंदगी
और मस्तिष्क में ट्यूमर की तरह होती है
शहर की सभ्यता (नाले- पृ. 62)

प्रदीप मिश्र की कविताओं में जहाँ एक ओर कठोर, निर्मम यथार्थ है तो उसके बरक्स उम्मीदें और सपने हैं। ये सपने किसी हवाई किले की तरह नहीं हैं बल्कि आम आदमी की संघर्षेच्छा और जिजीविषा की ठोस ज़मीन से उगे हैं। इसीलिए प्रदीप मिश्र की कविताओं में बच्चे हैं, पेड़ है, रंग हैं, मौसम और त्यौहार हैं, बारिश में भीगती लड़कियाँ हैं, प्रेम है, बिलकुल वैसे जैसे ‘बुरे दिनों के कैलेण्डरों में’ अच्छे दिन। प्रदीप लिखते हैं,-

रेगिस्तान में होती हैं नदियाँ
हिमालय में होता है सागर
उसी तरह से
अच्छे दिनों की तारीखें भी होती हैं
बुरे दिनों के कैलेण्डरों में। (बुरे दिनों के कैलेण्डरों में’ पृ. 15)

कवि कुंवर नारायण कहा था कि ‘कविता भाषायी पर्यावरण का सबसे नाजु़क हिस्सा है। उसका खास काम हमारा मनोरंजन मात्र नहीं है। हमारी सूक्ष्मतम मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों को जीवित रखना है। वे मुरझा न जाएं इसके लिए भाषा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति भी ज़रूरी है।’ प्रदीप मिश्र अपनी कविताओं के ज़रिए यही काम करते हैं। वे हमारे संवेदनात्मक स्पेस को और अधिक विविध और अधिक विस्तृत बनाते हैं। प्रदीप मिश्र का यह संग्रह वर्तमान समय की चुनौतियों के साथ-साथ मनुष्य की अच्छाई, ईमानदारी और सहज जीवन जीने की चाह की कविताएं लेकर आया है।

डॉ० राकेश कुमार द्वारा लिखित

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नोट-

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