झुण्ड में रहना होता है ज़रूरी…! ‘द जंगल बुक’ फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

सिनेमा फिल्म-समीक्षा

संध्या निवोदिता 61 2018-11-18

झुण्ड में रहना होता है ज़रूरी…! ‘द जंगल बुक’ फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

झुण्ड में रहना होता है ज़रूरी…! ‘द जंगल बुक’ फिल्म समीक्षा 

संध्या नवोदिता

संध्या नवोदिता

-: (संध्या नवोदिता)

जंगल का है यह क़ानून .. 

कि झुण्ड में रहना होता है ज़रूरी
झुण्ड है भेड़ियों की ताकत 
और हर भेडिया ताकत है झुण्ड की…..

ऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ…….

google से साभार

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भेड़िया माँ रक्षा भेड़िया बच्चों को सिखाती है अकेले मत रहो, अकेले रहोगे तो मारे जाओगे पक्का, यही है जंगल का क़ानून. और मोगली पूरे मन से मुंह ऊपर उठाकर जोर से ऊऊऊऊऊऊऊऊऊ  कर हुंकारी भरता है.

मजे की बात यह भी है कि घोर पूंजीवादी देश में ऐसी फिल्मे खूब बनती हैं जो अपनी कथावस्तु में एकाधिकार की वकालत नहीं करतीं, जोकि पूँजीवाद का लक्षण है, बल्कि वे दया, मानवीयता, संवेदनशीलता और बराबरी के मूल्यों की बातें करती हैं. हालीवुड की तमाम हिट फ़िल्में इसकी मिसाल हैं. इसके पहले आई फिल्म ‘अवतार’ भी पूँजी और लोभ के प्रति हिकारत का भाव जगाती है, और प्रकृति के साथ जीने वालों के पक्ष में खड़ी होती है. इन फिल्मो का नायक आज भी तमाम लोगों की जिंदगी बचाता है, खलनायक आज भी मुंह की खाता है. यह बड़ी बात है कि फिल्मे आज भी सच्चाई के मूल्यों की वकालत कर पा रही हैं.

फिल्म में जंगल के दृश्य बेहद सम्मोहित करते हैं . ऐसे जंगल, ऐसी मूसलाधार घनी बरसात, धड़धडाती वेग से दौडती नदियाँ, पोर- पोर बिखरी हरियाली, विशाल वृक्षों की अंतहीन श्रृंखला, खूबसूरत मोर, ताकतवर लेकिन समझदार बघीरा, चुनमुन से भेड़िया बच्चों का परिवार और इनके बीच लाल चड्ढी पहन के सच्चा भेड़िया बनने के जतन में जुटा मोगली !

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हाथियों के आगे सर झुकाओ, क्योकि वे ही हैं जो जंगल बनाते हैं. वे जहाँ दांत गड़ा दें वहीं नदियों के रास्ते बन जाते हैं….. बघीरा मोगली को सिखाता है.

किसी फिल्म का रात का शो भी अगर हाउसफुल जाए और उसमे बच्चे और बूढ़े और जवान सब खूब तादाद में मिलें तो आप समझ सकते हैं पिक्चर का असर क्या है.

जंगल बुक को फिल्म के रूप में बड़े परदे पर देखना और वह भी थ्री डी में , बचपन को एक बार फिर जीने जैसा है. शायद सन तिरानबे रहा होगा, जब जंगल बुक शुरू होता था और जंगल- जंगल पता चला है गीत की धुन बजती थी, तो हम लोग सारे काम छोड़ कर टीवी के सामने जम जाते थे.

यह फिल्म तो टीवी के उस जंगल बुक से भी गजब है. हम में से बहुतों ने इसे श्वेत श्याम टीवी पर देखा था, तब कलर टीवी की पहुँच घर- घर नहीं हो पाई थी. तब एनिमेशन भी इतना परिपक्व नहीं हुआ था. चित्र ही थे, लेकिन बच्चे उसमें अपनी कल्पना का रंग भरकर गजब आनन्दित होते थे. आज की यह फिल्म तो ज़बरदस्त वास्तविकता की हद तक सहज और आश्चर्यजनक तकनीक और एनीमेशन, रंगीन परदा, सारे चरित्र अद्भुत रूप से जीवंत ! भारत में आज भी ऐसी जीवंत और कमाल की एनिमेशन फ़िल्में जाने क्यों नहीं बनतीं !!

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फिल्म की कहानी तो सभी को पता ही है, कैसे इंसान के बच्चे को भेड़ियों का परिवार पालता है. मादा भेड़िया रक्षा मोगली से बहुत स्नेह करती है. जंगल के दमदार शेर खान को आदमी के बच्चे का यूँ जंगल में रहना पसंद नहीं, वह मानता है कि आदमी का बच्चा एक दिन अपना इंसानी रंग ज़रूर दिखाएगा और जंगल को धोखा देगा. शेर खान मोगली को अपना शिकार मानता है और उसकी जान के पीछे पड़ जाता है. ऐसे में उसका दोस्त और अभिभावक बघीरा और रक्षा उसे जंगल छोड़कर अपने इंसानी परिवार में वापस लौटने का निर्देश देते हैं, जिसके लिए मोगली बिलकुल तैयार नहीं है.

और हाँ, एक रक्तफूल भी है, दूर से देखो तो चमत्कार करता, रौशनी फैलाता , दहकता, चमकता लेकिन अगर उसे छू लो तो नष्ट कर देता है, ऐसा रक्तफूल जिसे छूने की कल्पना भी जानवर नहीं करते क्योंकि वह विनाशकारी है. यह रक्तफूल आदमी के पास रहता है, इसी रक्तफूल से मोगली के पिता ने अपने पर हमलावर हुए शेरखान का चेहरा जला दिया था.

इसी जंगल में मोगली चालाक और विशालकाय अजगर ‘का’ का शिकार बनने से बाल बाल बचता है, बल्लू भालू उसे बचाता है, इसी में उसकी बंदरों के राजा किंग लियो से मुठभेड़ होती है, और अंततः उसका सामना अपने सबसे ताकतवर दुश्मन शेर खान से होता है.

पूरी फिल्म ज़बरदस्त रोचक और गतिमान है. शेरखान की आवाज़ में नाना पाटेकर ने गजब की संवाद अदायगी की है. अपने लाउड संवाद के लिए मशहूर नाना इस रोल में बिलकुल उलट बहुत धीमे और सधे हुए स्वर में बोले हैं, और शेर खान केखतरनाक रुतबे को परदे पर जीवंत कर दिया है. अद्भुत!! बघीरा को ओमपुरी ने आवाज़ दी है और शुरू से अंत तक एक अभिभावक और दोस्त के अपनत्व वाला लहजा दर्शकों के दिल में घर बना लेता है. बल्लू की आवाज़ में इरफ़ान ने कमाल किया है. बल्लू को एक जिंदादिल पंजाबी भालू बना दिया है. रक्षा को शेफाली ने बहुत ममता भरी आवाज़ दी है. अकेला भी प्रभावशाली किरदार है. भेड़ियों की आपसी बातचीत बड़ी रसभरी और मजेदार है. और अजगर की आवाज़ में तो प्रियंका चोपड़ा ने सम्मोहन भर दिया है. स्सस्सस्सस……. की आवाज़ जैसे पूरे हाल पर छा गयी है.

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और मोगली तो पूरी फिल्म का केन्द्रीय पात्र है ही, बाल अभिनेता नील सेठी की मासूमियत और बहादुरी के कारनामे सबका दिल जीत लेते हैं. जंगल में दौड़ता कूदता मोगली कभी टार्जन की याद दिलाता है, कभी विशालकाय और डरावनी ऊँचाई पर लटके शहद के छत्ते तोड़ता वह नन्हा राजकुमार सा लगता है.

यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इन उम्दा कलाकारों की संवाद अदायगी का शाहकार भी है.

अच्छा यह भी लगा कि आज जब जंगल खत्म हो रहे हैं, जंगल छोड़िये, आसपास पेड़ तक नहीं बचे हैं, बच्चे जानवरों से अपनत्व नहीं मानते हैं क्योंकि जानवर इंसान के साथी होने के बजाय गंदी चीज हो गये हैं, ऐसे में फिल्म एक बार फिर से बच्चों के मन में जानवरों और जंगल के प्रति मानवीयता, दोस्ती और कोमल भाव जगाती है.

संध्या निवोदिता द्वारा लिखित

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- पंकज तिवारी का आलेख 

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