‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग तीन” (शक्ति प्रकाश)

कथा-कहानी लघुकथा

शक्ति प्रकाश 117 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

‘कान्दू – कटुए’ 

शक्ति प्रकाश

दृश्य -8

‘ क्यों बे मियां के तुझे कुछ शर्म है कि नहीं?’

‘ क्या हुआ संटी गुरु?’

‘ तुझे दोस्ती के लिए बराबरी के लड़के नहीं मिलते इम्तियाज? जो लड़के मुझे भाईसाब या चाचा कहते हैं वो तेरे गले में हाथ डालकर घूमते हैं’

‘ किसकी बात कर रए गुरु?’

‘ किस किसकी करूँ, तू कभी हमारे साथ रहता था, हम आगे बढ़ते गए तू वहीं टिका रहा पन्द्रह सोलह के लौंडों में ’

‘ पर आज किसकी बात कर रए?’

‘ जिसके साथ तू कल अंडे की ठेल पर था और जिसके घर में घुसने के लिए तू हाथ पैर फेंक रहा है’

‘ अरे त्तेरी, वो ? तुम्हें कैसे पता चल गयी?’ वह खिसियानी हंसी हंसता है

‘ मुझे तो ये भी पता है कि पहले तेरा प्रस्ताव उसके घर पर ऑमलेट बनाने का था, तेरे हिसाब से देशी अण्डों का ऑमलेट बाज़ार में नहीं मिलता, उसके मना करने पर तू उसे अंडे की ठेल पर ले गया, ठेल पर ले ही गया है तो अंडे तक ही रखना उसे, दारू पीना मत सिखा देना’

‘ ही ही ही’

‘ अब ये भी बताऊँ कि तेरा एजेंडा बजरिये आमलेट उसकी बड़ी बहन तक पहुँचने का है?’

‘ अरे गुरु अब तो पिक्चर किलियर हो गई, अब मैं बिस लौंडे से दूर, पर तम बड़े छुपे रुस्तम निकले गुरु, हम इस इलाके के सबसे बड़े लड़कीबाज और हमें पता नहीं कि गुरु का आइटम ऐ, तमारे चरन कां एं गुरु ’

‘ पिट जायेगा मियां के, तमीज से बात कर’ वह हंसकर कहता है

‘ जे लो गुरु, भाभी कै दे रए’

‘ कुछ नहीं है मेरा, पर वो अच्छी फैमिली है इसलिए दूर रह’

‘ अबी से दूर हो गए गुरु’

‘ इम्तियाज तुझे लड़कीबाज होने में फख्र होता है?’

‘ गम की बात है भी ना, अपने अपने शौक एँ गुरु , पर इम्तियाज के असूल एँ कुछ, मंदिर मस्जिद पर बदमाशी ना, हाथ पैरों की बदमाशी ना, लड़की मना कर दे तो भईं दी एंड, अब पीछा करना, स्कूल के बाहर खड़ा होना, चिट्ठी पत्री करना तो हक्क ऐ आशिकों का और इम्तियाज यारमारी भी ना करता, इसलिए तमारी ससराल का रस्ता बंद..ही..ही..ही.’

‘ भाड़ में जा, पर उधर देखियो भी मत’

वार्तालाप वहीं विराम लेता है, कुछ दिन बाद वह चौराहे से एक जुलूस जैसा निकलता देखता है, चार पांच मुस्लिम, दो तीन जाटव लड़के, कुछ पुलिस वाले, एक दरोगा हैं, इम्तियाज आगे आगे चल रहा है. उसे लगता है आज इम्तियाज किसी लड़कीबाजी के केस में उलझ गया, लेकिन इम्तियाज के कुछ उसूल हैं वह सामूहिक छेड़छाड़ में तो यकीन नहीं करता. वह देखता है कि एक मुस्लिम बुजुर्ग इम्तियाज के कान में कुछ फुसफुसाते हैं और वह चीख पड़ता है –

‘ बिरादर, बिरादर, अपनी माँ की बिसमें गई बिरादर, बिरादर एं तौ किसी की लौंडिया कूँ दबोचेंगे, जो करेगा सो भरेगा चच्चा’

वह माजरा समझने के लिए चौराहे पर जाता है, पान वाले से पूछता है –

‘ क्या लफडा है गुलमा?’

‘ मियों ने छोरी छेड़ दी जाटवों की’

‘ इम्तियाज भी उनमें है’

‘ नहीं वो तो पुलिस को लाया है’

‘ वो क्यों?’

‘ वो जाटवों की तरफ है’

‘ क्यों ?’

‘ जिस लडकी से बदमाशी हुई उसका भाई इम्तियाज का दोस्त है’

‘ कमाल है..’

‘ गुरु वो लौंडियाबाज तो है मगर यारी भी कोई चीज़ होती है’

पान वाला प्रशंसा से कहता है, ये यादगार 1993 की है शायद.

 दृश्य -9 

साभार google से

खराद का वर्कशॉप है, बाहर बोर्ड लगा है- ‘पंडित इंजीनियरिंग वर्क्स’, अनीस काउंटर पर बैठा है, उसका साला मिलने आया हुआ है, एक आदमी आता है –

‘ राम राम अनीस पंडित’

‘ राम राम जी ’ वह उत्तर देता है

‘ खराद हो जायेगी?’

‘ और किसके लिए बैठे हैं’

और वह पुर्जा उसके हाथ से लेकर काम कर उसे पकड़ा देता है, थोड़ी देर में पड़ोसी दूकानदार  आता है –

‘ अनीस पंडित आज एक्सप्रेस में क्या आ रहा है?’

‘ अबे बच्चों को पाल ले क्यों लोटरी में मर रहा है’

‘ बहुत ज्ञान बाँट रहे हो आजकल ’ वह हंसता है

‘ हाँ, छोड़ दी लोटरी, कोई ज्ञान नहीं इसमें’

‘ मने बिल्ली हज्ज को जा रही?’ वह हंसकर अपनी दूकान में घुस जाता है

इस तरह तीन चार लोग आते हैं, उसे अनीस पंडित कहकर सम्बोधित करते हैं तो साले को कसमसाहट होती है

‘ दूले भाई, जे तमें जाने ना?’

‘ जानते हैं सब’

‘ फिर मुसलमान कूँ पंडत कौं कै रए?’

‘ जिन्दगी गुजर गई पंडितों के संग, यार दोस्त सब पंडित, ये वर्कशॉप भी पंडितों की’

‘ पर जे तौ पाटनर शिप में हैगी?’

‘ हाँ, पर पैसा तो पंडित का ही लगा, कमाई में पार्टनर शिप है’

‘ फ़रम में भी होनी चैये’

‘ क्यों भाई? कोई कारीगरी के एवज पार्टनर बना रहा है इतना काफी नहीं है? जरुरी है उसके घर, मकान, दूकान अपने नाम करा लो’

‘ कल कूँ उसकी दूकान चल जाय, वो लात मार दे पीछे से तब?’

‘ यार है अपना, भरोसा है, वर्कशॉप तो अभी खोली उससे पहले क्या भूखा मर रहा था मैं? उसे लात मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिस दिन उसे लगेगा उसी दिन…यारी से बड़ी ना दूकान’

‘ तम तौ पंडत ई हो लिये बिनके संग रै कै’

‘ हाँ, बोली भाषा, रहन सहन, खान पीन, सब वैसा ही हो गया, अब तो कोई मेरे नाम में पंडित न लगाये तो अजीब सा लगता है’

‘ काफ़िर हो रए…’ वह शिकायती अंदाज़ में कहता है

‘ पता ना, पर मजे आ रए’ वह हँसता है

साला उसकी हंसी में कुफ्र खोजता है, ये 1994 का वार्तालाप है शायद.

दृश्य -10 

sabhaar google से

‘ तुम्हारा तबादला काजमी ने कराया था’ अ ने ब से कहा

‘ मुझे पता है’

‘ वो सांप्रदायिक किस्म का व्यक्ति है’

‘ ये भी पता है, लेकिन उसने मुझ पर हमला साम्प्रदायिक होने के कारण नहीं किया था, मैं बागी था और उसकी सत्ता को चुनौती देता था इसलिए किया. लेकिन वो मूर्ख है ये उसे भी नहीं पता’

‘ कैसे ?’

‘ मैं नया था, अधिकारी मुझे ठीक से जानते भी नहीं थे, लेकिन वो मेरी क्षमताएँ जानता था, ऐसे में उसे मुझे इग्नोर करना चाहिए था, या ऐसी जगह भिजवाना था जहाँ मैं डम्प हो जाता, मेरी क्षमताएँ जानने के बावजूद  उसने मुझे ऐसी जगह भिजवाया जहाँ दिन में बीस बार मुझे अधिकारियों का सामना करना था, ये सोचकर कि मैं रोज गालियाँ खाऊंगा, जबकि अधिकारी मुझसे प्रभावित ही हुए और नतीजा सामने है,

‘ अब तुम दफ्तर में अच्छी पोजीशन में हो, बदला लो’

‘ किस बात का ?’

‘ क्योंकि उसने तुम्हारा बुरा किया था’

‘ मगर मेरा तो भला हुआ तबादले के बाद मैं दो महीने में प्रभावशाली बनकर लौटा’

‘ हाँ मगर ये तुम्हारा कैलिबर था, क्या इन दो महीनों में तकलीफ नहीं हुई तुम्हें?’

‘ मामूली तकलीफ बल्कि यूं कहो अपने पूर्वाग्रह के कारण कि मुझे मेरी मर्जी के खिलाफ  पोस्ट किया गया, लेकिन  जो भी हो परिणाम मेरे पक्ष में रहा’

‘ मगर उसने तो बुरा सोचा ही था’

‘ उससे क्या होता है?’

‘ वो बाद में हमला करेगा’

‘ देखेंगे’

‘ देखो ऑफिस पॉलिटिक्स में चाहते न चाहते हुए इन्वोल्व होना पड़ता है, अब तुम्हें मौका मिला है तो खत्म कर ही दो, अलग अलग करो इन मियों को, भिजवाओ सब डिविजन में, एक साथ रहेंगे तो फिर किसी हिन्दू पर हमला करेंगे ये साम्प्रदायिक लोग ’

‘ कमाल है तुम कहते हो कि अकेला काजमी सांप्रदायिक है?”

‘ है, ना’

‘ और भी कई हैं बल्कि तुम भी हो ही, केवल साम्प्रदायिक होने के आधार पर मैं लडूं तो यहाँ तो नब्बे फीसद साम्प्रदायिक हैं, हिन्दू भी मुसलमान भी, मुझे नौकरी करने दो परिवार में भी शांति चाहिए’

‘ तुम्हें क्या लगता है ? वो फिर से ताकतवर हुआ तो तुम्हें बख्श देगा? बुरे लोग दोगुनी ताकत से हमला करते हैं’

‘ ठीक है, तब तुम मुझे बुरा बनाने पर क्यों तुले हो?’

‘ मतलब? तुम कुछ नहीं करोगे ?’

‘ हाँ, करूँगा ना, मैंने तय किया है कि मैं उसके नाम की चर्चा प्रभावशाली लोगों के बीच में नहीं करूँगा, बुरे और साम्प्रदायिक लोगों का यही इलाज है और हाँ मैं किसी भी साम्प्रदायिक व्यक्ति की चर्चा नहीं करने वाला पार्टनर’

अ मुंह बनाकर चल देता है ये जिक्र 1999 का है

दृश्य – 11 

google से

वह पॉश कॉलोनी में रहता है, उसका एक रिश्तेदार आया हुआ है, न चाहते हुए भी विमुद्रिकरण पर बहस छिड़ गई है

‘ अच्छा, आप का व्यापार ठीक चल रहा है?’ वह पूछता है

‘ अभी तो नहीं, पर रियल स्टेट तो पहले से ही खराब था’ रिश्तेदार कहता है

‘ चलिए बाकी व्यापार?’

‘ कुछ दिनों की बात है बस उसके बाद सब ठीक हो जाएगा’

‘ कैसे हो जाएगा?’

‘ सब प्लानिंग है उसके पास’

‘ कुछ खुलासा भी तो हो, आपको नही लगता कि हमें सब जानने का अधिकार है’

‘ बताकर करेगा तो गलत लोग रास्ता खोज लेंगे’

‘ उन्होंने तो अब भी फेल करा दी नौटंकी, उनके चक्कर में हम जान देते रहें?’

‘ देश की खातिर इतना भी नहीं कर सकते’

‘ देश मेरे रहने से है भाई, मेरे मरने से तो पूरी दुनिया खत्म, आप बार बार देश को लेकर कूदते हो, क्या आपने कभी टैक्स नहीं बचाया, रिश्वत नहीं दी?’

‘ दी, मगर सब कर रहे थे तो हम भी, सब बंद तो हम भी बंद’

‘ सब से क्या मतलब आप तो देशभक्त हैं ना? आपको करना चाहिए था, या इस दल के आते ही आपकी देशभक्ति जागी है?’

‘ पहले किसी ने पहल भी तो नही की’

‘ पहल नहीं ड्रामा, मेरी निजी जानकारी में जितने भ्रष्ट अफसर, कर्मचारी, व्यापारी हैं सभी इनके समर्थक हैं और किसी ने कुछ बंद नहीं किया है, देश इन लोगों की ढाल है बस’

‘ वो सत्तर साल से क्या कर रहे थे ?’

‘ मैंने उनका पक्ष कब लिया? वो चोर थे ये गिरहकट’

‘ कश्मीर की समस्या उनकी देन, रोज सैनिक शहीद हो रहे हैं’

‘ भाई जी ये सैनिक बीच में क्यों आते हैं बार बार ?’

‘ सरकार देश की सुरक्षा के लिए चुनी जाती है इसलिए’

‘ मने सुरक्षा के अलावा भूख, गरीबी, बेरोजगारी, चिकित्सा, शिक्षा मुद्दे हैं ही नहीं?’

‘ सुरक्षा पहले है’

‘ मने केवल सुरक्षा? मने किसकी? नेताओं और व्यापारियों की, गरीब को सुरक्षा की क्या दरकार? ये शहीद शहीद सैनिक सैनिक का ड्रामा सिर्फ सेना को खुश करने के लिए है कि कहीं सैनिक विद्रोह न कर दें क्योंकि हैं तो सब आम आदमी और किसान, मजदूरों के बेटे’

‘ तो आपके हिसाब से शहीद कौन है?’

‘वे सब जो अपनी ड्यूटी भुगताते हुए मरते हैं, रेलवे का गैंगमैन, ड्राईवर, गार्ड, पुलिस का सिपाही, रोडवेज का ड्राईवर, कंडक्टर, फैक्ट्री का मजदूर,  बैंक का बाबू भी जो काम के बोझ से पिछले दिनों मरा’

‘ ये तो तनख्वाह लेते हैं’

‘ तनख्वाह तो सब लेते हैं, सैनिक भी’

‘ फिर तो कोई नहीं हुआ आपके हिसाब से?’

‘ हो सकते हैं, आप भी यदि अपनी संपत्ति देश को दान कर दें, अपने पैसों से बंदूक खरीदें, कारतूस खरीदें और बिना वेतन के सीमा की पहरेदारी करें, देश के लिए लड़ें’

‘ ऐसा कौन कर सकता है ?’

‘ ऐसा किया है बहुतों ने लम्बी लिस्ट है भगत सिंह, आज़ाद, बिस्मिल, अशफाक…..

‘ ये सब घर से निकले हुए नाकारा और काहिल लड़के थे नाम पाने की भूख थी इनमे..’

‘ दैट्स इट…कुतर्क करते हुए आप सही जगह आ गये हैं, आप और आप के साहिब सिर्फ इस्तेमाल करते हैं इन्हें, सत्य यही है कि वे सब आपकी विचार धारा के खिलाफ थे आप उन्हें सख्त नापसंद करते हैं लेकिन उनकी लोकप्रियता आपकी मजबूरी है, दरअसल आप इस दल के साथ अपनी ऐसी तैसी कराकर भी सिर्फ हिन्दूवाद के कारण हैं, आपको मुसलमानों से नफरत है बस…’

‘ हाँ, है नफरत मुसलमानों से’ वे लगभग चीखते हैं

‘ मगर क्यों?’

‘ इन्होने अत्याचार किये हिन्दुओं पर’

‘ हो सकता है कुछ ने किये हों लेकिन वो वक्त ही ऐसा था राज्य लूटे और जीते जाते थे’

‘ इन्होने धर्म परिवर्तन कराये’

‘ सही बताऊँ तो मुसलमान चाहते तो सारे हिन्दुओं को या तो मार सकते थे या मुसलमान बना सकते थे ऐसी स्थिति में भी थे, पर उनमें भी कुछ तार्किक और उदार राजा हुए इसलिए आप आज भी ब्राह्मण हैं, इसलिए इतिहास को छोडिये, सैंतालिस के बाद की बात कीजिये, जब से संविधान बना है’

‘ ये आज भी उतने क्रूर, हमलावर, बेईमान और जाहिल हैं’

‘ आप कभी मुसलमानों के साथ रहे हैं? कभी दोस्ती या दुश्मनी हुई है?’

‘ नहीं रहे, रह भी नहीं सकते’

‘ तो फिर इकतरफा बात कह भी नहीं सकते, मैं आपको कुछ दृश्य दिखाता हूँ फिर तय करियेगा’

‘ नहीं देखने मुझे आपके दृश्य आप उन्हें महान ही साबित करेंगे’

‘ नहीं, मैं ये साबित करूँगा कि वे भी हम जैसे होते हैं, ऍन हम जैसे, मिरर इमेज’

‘ आपको मुसलमान इतने अच्छे लगते हैं तो बन क्यों नहीं जाते?’ वे खीजते हैं

‘ मुझे इंसान अच्छे लगते हैं, धर्म तो विवशता है, धर्म परिवर्तन मूर्खता और श्रेष्ठता का बोध सबसे बड़ी जहालत’

‘ आपका कुछ नहीं हो सकता’

‘ मगर आपका हो सकता है, कोशिश करें तो इंसान बन सकते हैं’

वे गुस्से में उठकर निकल लेते हैं, चाय ठंडी हो चुकी है, ये दृश्य निश्चित रूप से 2016 का है.

आप चाहें तो इन दृश्यों से मानव सभ्यता के  क्रमिक पराभव को समझ सकते हैं.

शक्ति प्रकाश द्वारा लिखित

शक्ति प्रकाश बायोग्राफी !

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आश्चर्य जनक किंतु सत्य टाइप फ़िलहाल के चंद अनपढ़ लेखकों में से एक। 

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हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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