जीवन में बसती हैं कविताएँ: समीक्षा (सुरेश उपाध्याय)

सुरेश उपाध्याय 3 2018-11-18

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्रतिबद्ध विचारधारा का दर्शन उसी पृष्ठभूमि के कारण है, जिसके कारण उनके अपने रचनाकार का भी विकास हुआ है।

जीवन में बसती हैं कविताएँ 

सुरेश उपाध्याय

सुरेश उपाध्याय

‘इस गणराज्य में’ अभी तक व्यंग्य लेखक के रूप में अपनी पहचान रखने वाले श्री ब्रजेश कानूनगो का पहला कविता संग्रह है, जो दखल प्रकाशन,दिल्ली से इस साल (2014) आया है। संग्रह की अधिकाँश कविताएँ पढते हुए समकालीन कविता के मूल प्रवाह में रहते हुए हमारे समय से मुठभेड होती है। संग्रह पढते हुए लगता है कि ब्रजेश का कवि उनके व्यंग्यकार से थोडा-सा आगे निकलता दिखाई देता है। वे कवि के रूप में कहीं उन्नीस नही लगते।

ब्रजेश कानूनगो की कविताओं पर बात करने के लिए कवि के अपने परिवेश और क्रमिक विकास को समझना एक बेहतर उपाय हो सकता है। कविताओं में उनकी सरल भाषा, सहज सम्प्रेषणीयता, अपने आस-पास के सन्दर्भों से उठाई विषय वस्तु और प्रतिबद्ध विचारधारा का दर्शन उसी पृष्ठभूमि के कारण है, जिसके कारण उनके अपने रचनाकार का भी विकास हुआ है। अखबारों में सम्पादक के नाम कई वर्षों तक पत्र और जनरुचि के कॉलमों में लगातार लिखते हुए ब्रजेश की भाषा ऐसी भाषा बन जाती है जो आम पाठक तक बहुत सहजता से पहुंचती है। बच्चों के लिए कहानियाँ और गीत लेखन के अभ्यास के कारण उनकी कविताओं को सहृदय पाठकों के मन तक पहुंच जाने में कोई खास दिक्कत नही होती। व्यंग्य लेखन का लम्बा अनुभव उनकी कविताओं में भी तंज और कटाक्ष करता नजर आता है। बैंक कर्मियों और तंग बस्ती के बच्चों तथा साहित्य और समाज के क्षेत्रों में एक प्रतिबद्ध एक्टिविस्ट की तरह काम करते रहने से उनकी कविताओं में मनुष्य के प्रति प्रगतिशील विचारधारा का अंतरधारा की तरह समावेश दिखाई देता है।

ब्रजेश की कविताओं का फलक काफी व्यापक है, अपने घर-आँगन से लेकर वैश्विक तत्व व दृश्य और तमाम चिंताओं तक वह फैला हुआ है। पत्थर की घट्टी, पुरानी लोहे की आलमारी, मेरा मुहल्ला, रेडियो की स्मृति आदि कविताओं के माध्यम से वे हमारी परम्परा और अतीत की मधुर स्मृतियों की सैर करवाते हैं वहीं मानवीय अंतर्सम्बन्धों की महत्ता को भी रेखांकित करते हैं।

गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह

कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें

न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश
आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही

स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में कैद है
देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह

स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
फसलों के बचाव के तरीके
माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता
अपने समय का महत्वपूर्ण कवि
सारंगी रोती रहती है अकेली
कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू

(रेडियो की स्मृति)

इस गणराज्य में आजादी,नक्शे में केलिफोर्निया खोजता पिता,मनीप्लांट की छाया,क्विज, छुप जाओ कजरी,प्लास्टिक के पेड, राष्ट्रीय शोक,ग्लोबल प्रोडक्ट जैसी कविताओं के माध्यम से आर्थिक भूमंडलीकरण और उससे उपजी बाजारवाद व उपभोक्तावादी नीतियों की जटिलताओं, समाज और पर्यावरण पर पडने वाले विपरीत प्रभाव पर व्यंग्यात्मक लेकिन सजग काव्य टिप्पणियाँ की गई हैं।
कितना सहज है कि
वे और मैं अब अलग नहीं लगते

पुस्तक- इस गणराज्य में, मूल्य- रु.100/, प्रकाशक- दखल प्रकाशन,104, नवनीति सोसायटी,प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन,पटपडगंज, दिल्ली-110092

पुस्तक- इस गणराज्य में, मूल्य- रु.100/, प्रकाशक- दखल प्रकाशन,104, नवनीति सोसायटी,प्लॉट न.51,आई.पी.एक्सटेंशन,पटपडगंज, दिल्ली-110092

वे सुझा रहे हैं कि क्या होना चाहिए मेरा भोजन
मैं वही देखता हूँ
जिसे कहा जा रहा है कि यही सुन्दर और वास्तविक है

मैं नाच रहा हूँ ,गा रहा हूँ उसी तरह
जैसे झूम रहे हैं साहूकार
बोल रहा हूँ सौदागरों की भाषा
बेचा जा सकता है हर कुछ जिसकी मदद से

मुझे पता नहीं है कि
कहाँ लगा है मेरा धन
और कितनी पूँजी लगी है परदेसियों की
मेरा घर सजाने में

मेरा शायद हो मेरा
जो समझता था उनका
लगता ही नही कि अपना नहीं था कभी

उनके निर्देशों के अनुरूप चलती हैं मेरी सरकारें
नियम और कानून ऐसे लगते हैं
जैसे हमने ही बनाए हैं अभी

पराधीनता का कोई भाव ही दिखाई नहीं देता गणराज्य में
तो कैसे जानूँ आजादी का अर्थ
( इस गणराज्य में आजादी)

कैसे कहूँ कि घर अपना है, बिल्लियों का रोना,जिप्सी आदि कविताओं में कीट पतंगों, छिपकलियों, तितली ,चिडिया, कुत्ते, बिल्ली आदि पशु-पक्षियों को महत्व देते हुए इको सिस्टम का महत्व भी कवि रेखांकित करता है।

जिस घर में रहता हूं
कैसे कहूं कि अपना है

चीटियां कीट पतंगे और
छिपकलियां भी रहती हैं
यहां बड़े मजों से

उधर कोने में कुछ चूहों ने
बनाया है अपना बसेरा
ट्यूब लाइट की ओट में
पल रहा है चिड़ियों का परिवार

आंगन में खिले फूलों पर
मंडराती तितलियां और भौंरे
गुनगुनाते हुए चले आते हैं
घर के अंदर तक
( कैसे कहूँ कि घर अपना है)

कुछ कविताओं में करुणा,दया, ममता जैसे मानवीय मूल्यों की खूबसूरत अभिव्यक्ति हुई है। अस्पताल की खिडकी से,भरी बरसात में बेवजह मुस्कुराती लडकी,बच्चे का चित्र, बंटी की मम्मी मायके जा रही है,व्रत करती स्त्री, मदर टेरेसा आदि कविताएँ इसी श्रेणी की हैं।
रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग के जरिये समाज की असमानता और वर्ग विभाजन को देखा जा सकता है। सम्प्रभु वर्ग किस तरह जीवन से और उसकी सच्चाइयों से बेखर बना रहना चाहता है बहुत प्रभावी रूप से इस कविता में अभिव्यक्त हुआ है।

दिखाई नही दे रही है उन्हें
नीले आकाश में उडते पक्षियों की कतार
कच्चे रास्ते पर दौडती बैलगाडी
खेतों की हरी चादर और नदी में नहाते बच्चे
पेड की छाया में सुस्ताते मजदूर
बारिश के बाद की धूप, दूर तक फैला इन्द्रधनुष
और गोधूलि में घुलता हुआ सूरज

गहरे परदों से छनकर पहुँच रही है उन तक
उजली सुबह,सुनहरी दोपहर और गुलाबी शाम

जीवन के आसपास दीवारें खडी करने के बाद
पुस्तकों में खोज रहे हैं वे
जीवन।
(रेल गाडी के वातानुकूलित डिब्बे में बैठे लोग)

बचपन में लौटने के लिए, मजे के साथ, आदि कविताएँ दृश्य की बेहतरी के लिए कवि की छोटी-छोटी सुन्दर आकांक्षाएँ हैं, जिसका वह मजा लेना चाहता है।

यह बहुत संतोष की बात है कि तमाम विकृतियों, विद्रूपताओं और विषमताओं के बीच ब्रजेश की काव्य दृष्टि में बेहतरी की उम्मीद और विश्वास की सकारात्मक चमक स्पष्ट नजर आती है। अंत में भूकम्प के बाद कविता की कुछ पंक्तियाँ देखिए-

कविता ही है जो मलबे पर खिलाती है फूल
बिछुड गए बच्चों के चेहरों पर लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नई बस्ती की हवाओं में
सिकते हुए अन्न की खुशबू

अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करती
पुस्तकों में नही
जीवन में बसती हैं कविताएँ।

सुरेश उपाध्याय द्वारा लिखित

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परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 51 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

नोट-

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