विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : ‘चाँद के पार एक चाभी’ “समीक्षा”

कथा-कहानी समीक्षा

सुशील कुमार भारद्वाज 41 2018-11-18

‘हमरंग‘ पर प्रकाशित हुई ‘अवधेश प्रीत की कहानी ‘चाँद के पार एक चाभी‘ को पढने के बाद कहानी के वर्तमान सामाजिक निहितार्थों पर एक विवेचनात्मक आलेख ‘सुशील कुमार भारद्वाज‘ की कलम से …..|

विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : ‘चाँद के पार एक चाभी’

सुशील कुमार भारद्वाज

अवधेश प्रीत अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को बहुत ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनकी कहानियों में सिर्फ विमर्श ही नहीं होता है बल्कि भूत, भविष्य के साथ-साथ वर्तमान का भी एक प्रतिरूप नज़र आता है. उन्होंने अपनी लंबी कहानी “चाँद के पार एक चाभी” में भी बदलते समय के साथ विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में एक विचारणीय सामाजिक कहानी को ही मूलभूत जातिगत समस्याओं के साथ प्रस्तुत किया है.

इसमें कोई दोमत नहीं है कि बदलते समय और शिक्षा की जागरूकता के बीच विकासोन्मुख ग्रामीण परिवेश में जाति-धर्म की दीवारें दरकने लगी है. चाहे इसे निजी स्वार्थ कहें या आवश्यकता, लेकिन परिस्थितियां बदल रही हैं. लेकिन सुदूर कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों, जहाँ जातिवाद गहरी जड़ तक धंसी हैं वहां छुआछूत, शोषण, और दबंगई जैसी समस्याएं अभी भी गंभीर हैं. मुशहरों से लोग एक दूरी बनाये रखने में ही अपने संस्कार की भलाई मानते हैं, विकल्पहीनता की ही स्थिति में वे दलितो के शरणागत होंगे, वह भी उनकी औकात बताते हुए. चाह कर भी कोई उनकी मदद नहीं कर सकता, समाज से कोई भी आदमी किसी और के लिए बेबजह पंगा नहीं लेना चाहता है. यदि कोई नौजवान आगे आएगा भी तो रूढ़िवादी और शक्तिसंपन्न राजनीतिक बुजुर्गों के हथकण्डो को ही भेंट चढ़ जाएगा.

कथा नायक पिंटू भी अपनी वस्तुस्थिति से परिचित है. बदले माहौल में इज्जत की रोटी खाने के लिए लुधियाना से मोबाइल बनाने की कला सीखकर आता है. बूढी माँ की सेवा की खातिर ढिबरी बाजार में ही एक दुकान से अपने जीवन की गुजर बसर करना चाहता है. आगे की पढाई न कर पाने के कसक के साथ किसी-न-किसी किताब और पत्रिका में उलझा रहता है. उसे ऊंच-नीच का भान है लेकिन दिल पर किसका जोर चलता है? तारा खुद मोबाइल बनवाने आयी और खुद ही वह उसे फोन करने लगी, और फिर दोनों के बीच थोड़ी आत्मीयता पनप गई तो इसमें उसका क्या कसूर है? सबों के साथ वह मेलजोल से रहना चाहता है. अपने घर, जमीन, और लोगों को छोड़ कर वह कहाँ और क्यों जाये? वह अपनी सीमा जानता है. छल-प्रपंच की हवा उसे भी है, तभी तो अपने टूटते सपने की तरह राजकुमारी पासिन के भी बिखरते सपने का भान मात्र होने से ही उसके अंदर एक व्यंग्यात्मक दर्द उभरता है– “अभागी को नही पता कि रमेश पांडे उसे छल रहा है. बाभन सब दुआरी मुंह मारेगा, अपने दुआरी झांकने भी न देगा.”

लेकिन रमेश पांडे राजकुमारी पासिन से दगा नहीं करता है. पटना भाग कर मंदिर में शादी रचा लेता है. परंतु मुखिया जी की राजनीति और भ्रष्ट थानेदार की मिली-भगत से उनकी प्रेम कहानी तब भी तबाह हो जाती है जबकि वे पंचायत में भी साथ-साथ जीने मरने की कसम खाते हैं , गुहार लगाते हैं. राजकुमारी के रोने-बिलखने का कोई असर समाज के निष्ठुर ठेकेदारों पर नही पड़ता है और माथा मुड़ाकर सारे गांव घूमने के बाद भुतहा बगीचा में बरगद के पेड़ पर लटकना ही उसकी नियति बन जाती है.
तारा का मोबाइल से बात करते पकड़ाने और किताब मिल जाने के बाद पिंटू की नियति सामान्य तौर पर लिखी जा चुकी थी. दोनों फिर से कुछ साहस बटोर कर कुछ गुल खिलाते उससे पहले ही तारा की शादी करनी थी और इस विषम परिस्थिति में रमेश से बेहतर कोई लड़का चाह कर भी शायद इतनी जल्दी और इस परिस्थिति में नही मिलता. पिंटू भी अपने प्रेम करने की सजा झेलकर तीन महीने बाद बाहर आ गया. इसमें तारा जीवन भर ताना सुनने और घूंट–घूंट कर मरने को ही अपनी नियति मान चुकी. यहाँ एक बिंदु रखना चाहूँगा कि बाभन समाज में अपनी बेटियों के प्रति एक अजीब सहानुभूति देखी जाती है और यहाँ तारा की शादी समाज के द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को दबाने के रूप में देखा जाना चाहिए. क्योंकि तारा के पिता गरीब हैं लेकिन अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझते हैं और उसकी शादी सरयूपार वाले से ही करने की बात सोचते थे.

अवधेश प्रीत

कथाकार संस्मरणात्मक शैली में कहानी की शुरुआत करते हुए कथानायक पिंटू कुमार के सामाजिक, आर्थिक, मानसिक एवं बौद्धिक परिस्थिति से हमारा परिचय कराते हैं. कहानी बढते हुए जब मूल रूप में आने लगती है तब तक समय काफी बदल चुका होता है, साथ ही साथ पिंटू कुमार की परिस्थिति भी बदल चुकी होती है. पहली बार जहाँ वह संकोचवश या फिर अस्पृश्यता के भोगे हुए दंश की वजह से थोडा असहज महसूस करता है, वहीं दूसरी बार वह आत्मविश्वास से लबालब ही नहीं बल्कि कथाकार से आत्मीय-अधिकार व अपेक्षा के भाव से भी मिलता है. उसका यह परिवर्तन लुधियाना में बिताये समय की वजह से हुआ जहाँ उसे किसी सामाजिक विद्रूपता का सामना नहीं करना पड़ा.

जबकि जाति विभेद से विकृत मानसिकता का ही एक रूप ढिबरी गांव में दिखता है जब रामधारी पासी कहता है “कोई मरे, चाहे जिये. हमरी बेटी ना मिली तो हम केस करेंगे,केस”. तब विशम्भर मिश्रा कहते हैं – “स्साला पासी, बेटी से ताड़ी बेचवाता था, तब ना कुछ सोचा. अब केस–मुकदमा बतियाता है. हम लोग क्या यहाँ चूड़ी पहिन के बैठे हैं, रे मादर….” वहीं मुखिया दिगम्बर मिश्रा ने भी फरमान दिया – “पंचायत के बाहर जो जाएगा, उसको गांव में वास न मिलेगा.” जबकि पिंटू और तारा के मामले में रातों-रात थाना में इस कदर सबकुछ निबटा लिया जाता है कि न किसी पंचायत की जरुरत होती है न किसी का गांव से निर्वासन. इससे एक बात तो स्पष्ट है कि जातिवाद और नियतिवाद दोनों ही सामर्थ्य जनों के सुविधानुसार ही व्यवहृत होते हैं.
कथाकार ने बहुत ही बेहतरीन तरीके से स्पष्ट किया है कि मनुष्य किस कदर और कब तक दोहरे चेहरे को जीता है? बात चाहे मिश्रा जी का हो, चाहे पांडे जी का हो, या फिर यादव जी का. जन्मजात गाली देने की आदत ना वे छोड़ते हैं ना ही अपना काम निकालने के लिए जी हुजूरी करने से पीछे हटते हैं. मजे की बात तो देखिये कि शुद्दर बाभन का काम नही कर सकता, वह शास्त्र नही जान सकता है. लेकिन रमेश पांडे पिंटू के साथ फोकट की दारू पी सकते हैं, मोबाइल लोग उसके यहाँ बनवा सकते हैं, उसके दिये किराये या रूपये को ही मिश्रा जी जेब में नही रख सकते हैं बल्कि गोतिया को झूठी शानोशौकत और रूतबा दिखाने के लिए सरकारी स्कूल के पास गैरमजरुआ जमीन और संरक्षण भी उसे दे सकते हैं.

हमारे समाज की यही नियति है जहाँ शक्तिसंपन्न लोग अपने इशारे पर कानून को धत्ता बताते हुए निर्बलों को हर तरीके से प्रताड़ित और शोषित करते रहते हैं. इस स्थिति के बदलने में शायद अभी काफी समय शेष है.

कहानी में एक चुनौती लेखक समुदाय के लिए भी है. आपके उन आदर्शवादी शब्दों के क्या मायने हैं जो चारदीवारियों के बीच कल्पना के उड़ानों पर सवार होकर रची जाती है जबकि यथार्थ की जमीन बेहद ही रुखड़ी और रोंगटे खड़े करने वाले हैं? जहाँ मोबाइल नंबर याद रखने के बजाय उसे सेव करते हैं, और मेमोरी फुल होने पर दूर के परिचितों को लिस्ट से बेदर्दी से बिना कोई अपराध किये उडा देते हैं? क्या सिर्फ पाठकों से सहानुभूति बटोर लेने और उन्हें कोरी कल्पनाओं के सहारे आने वाले समय में शिक्षा और जागरूकता के बदौलत सामाजिक परिवर्तन के सपने बेचते रहेंगें? यदि हाँ, तो फिर इंतज़ार करते रहिये पिंटू कुमार का, जो चाँद के पार फेंके गए उस चाभी को लेने आ रहा है, जिसे उसने अपने जिंदगी की सबसे हसीन हंसी को सात तालों में महफूज रखकर चाँद की ओर उछाल दिया था. वही पिंटू, जो कहानी पर प्रतिक्रिया के बहाने अपनी पीड़ा को शब्द दे रहा है, जो आपकी लफ्फाजियों में खुद के लिए जीवन जीने की एक कला की तलाश तब कर रहा है जब लोग मुशहर को इंसान नहीं समझते हैं, मुसीबत इतनी की कोई चाहकर भी इस नारकीय जीवन से उठ पाने में असहाय महसूस करता हो.

एक बड़ा ही लाजिमी सवाल है – प्यार करने का अधिकार. लेकिन प्रेम करने का अधिकार किसे है? इस सवाल का जबाब सिर्फ एक है – जिसके पास सत्ता है, शक्ति है और जो व्यवस्था में या तो शरीक है या फिर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उसे प्रभावित करने का माद्दा रखता है.

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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