एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, ‘कोठागोई’ (सुशील कुमार भारद्वाज)

कथा-कहानी समीक्षा

सुशील कुमार भारद्वाज 139 2018-11-18

इन दिनों चर्चा में ‘प्रभात रंजन’ की किताब “कोठागोई” पर एक समीक्षात्मक आलेख ……

एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, ‘कोठागोई’

सुशील कुमार भारद्वाज

सुशील कुमार भारद्वाज

प्रभात रंजन की नयी किताब “कोठागोई” के आने की खबर मात्र से मन में बेचैनी थी कि आखिर चतुर्भुज स्थान के बारें में क्या लिखा गया है? मन में एक ही बात समायी थी कि इन्होंने उन बदनाम गलियों में क्या देख लिया कि कलम उठाने को मजबूर हो गये? इसी बीच मालूम हुआ कि अक्सर तिरहुत क्षेत्र को कलमबद्ध करने वाले इस इंसान ने तवायफो की जिंदगी पर कुछ लिखा है| तब मन में बात आयी कि फिर तो ये अधूरी कहानी ही होगी, क्योंकि तवायफो की जिंदगी सिर्फ चतुर्भुज स्थान तक ही सीमित तो नहीं है| लेकिन जब “कोठागोई” मेरे हाथ लगी तो, दंग रह गया| इस कोठागो ने साहित्य में कोठागोई के बहाने एक नयी विधा से ही परिचय नहीं कराया है, बल्कि बहुत ही साफगोई और अपने कठिन परिश्रम से चतुर्भुज स्थान की एक लंबी परम्परा को हमारे सामने प्रस्तुत भी किया है|
पहली बार जाना कि लखनऊ, बनारस जैसे संगीतमय वातावरण को छोड़ लोग यहाँ आकर गाने में फक्र महसूस करते थे| पन्नाबाई, भ्रमर, गौहरजान, और चंदाबाई आदि जैसे नगीने किस प्रकार मुजफ्फरपुर के इस बाज़ार में आये, और किस तरह अपनी जिंदगी को आबाद करके, वे यहाँ से चले गये? तवायफ कितने प्रकार की होती हैं? और उनके जिंदगी की क्या ठसक और कसक थी? मुजफ्फरपुर ही नहीं, बल्कि समस्तीपुर, सीतामढ़ी और नेपाल तक में इनकी कितनी पैठ थी? कितने ऐसे हुए जो इन तवायफों से ठोकर खाकर अपमान और जलालत की जिंदगी ही नहीं झेली, बल्कि उसी चतुर्भुज मंदिर के पास फटेहाल में भीख मांगने को भी मजबूर हुए? समय के साथ चतुर्भुज स्थान बदलता गया| मुजरा के साथ-साथ ठुमरी और दादर जैसे संगीतों का दिन ढलने लगा| आधुनिकता के दौर में गीतों के साथ नाच का जो प्रचालन शुरू हुआ, वह चतुर्भुज स्थान जैसे संगीत और कला के समृद्ध केंद्र को पतन की ओर धकेलने लगा| बाद के दिनों में तो शामियाना में गोलियों की बौछार होने लगी| चंदाबाई का नाम सुनते ही टेंट वाले, टेंट का पूरा दाम पहले ही वसूल लेते थे| 1980 के बाद के दिनों में तो, देर रात छापेमारी और होटलों में तवायफों के मरने की भी बातें आम होने लगी| किस्सागो ने लघु प्रेम की बड़ी कहानियों के माध्यम से चतुर्भुज स्थान के उत्थान और पतन के एक लंबे इतिहास को कहानी के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया है वह बेमिशाल है|

पुस्तक -कोठागोई . लेखक -प्रभात रंजन . प्रकाशक - वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली , पृष्ठ -200, मूल्य - 395/-

पुस्तक -कोठागोई . लेखक -प्रभात रंजन . प्रकाशक – वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली , पृष्ठ -200, मूल्य – 395/-

मजे की तो बात ये है कि कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर ने ही इस धरती पर अपने पैर नहीं रखे, बल्कि शरतचंद्र चटोपाध्याय को पारो के रूप में सरस्वती से भी यहीं मुलाकात हुई थी| और यहाँ से लौटने के बाद ही उन्होंने देवदास की रचना की थी| साहित्यकार ने “दुनिया दुनिया जीवन जीवन” वाले अध्याय में यह राज भी खोला है कि इस किताब को कैसे, क्यों और किन लोगों की मदद से लिखा गया है| अंतिम शब्दों में यह भी बताया गया है कि पृथ्वीराज कपूर जानकी वल्लभ शास्त्री के पास अक्सर क्यों आते थे?
हिंदी, मैथिली और वज्जिका में लिपटी भाषा शैली जितनी मनमोहक है, शब्दों का चयन उतना ही सरल और सटीक है| पढ़ने बैठने पर 12 अध्यायों से होते हुए, 200 पन्नों का यह किताब कब खत्म हो गया पता ही नहीं चलता|
लेखक ने बहुत ही चालाकी से किताब के प्रारंभ में ही सारी कहानियों को चतुर्भुज स्थान की कसम खाते हुए झूठी करार दी है, जो कि सिर्फ आपको गुदगुदाएगा| आप आसानी से समझ सकते हैं कि इन शब्दों का प्रयोग किन चीजों से बचने के लिए किया गया है? फिर भी यदि कोई किताब पर अंगुली उठाना चाहे तो यही कह सकता है कि भाई तवायफों की कहानी में उसके लिखे जाने की प्रक्रिया तक की बात तो ठीक है लेकिन जानकी वल्लभ शास्त्री और रणबीर कपूर आदि की चर्चा करने की क्या जरुरत थी? क्या लेखक कुछ अधिक बताने के अपने लालच को नियंत्रित नही कर सका?
हर अध्याय के शुरू में गजलों की प्रस्तुति इसकी एक और विशेषता ही है| साथ ही साथ प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी की लिखी भूमिका और फ़िल्मकार इम्तियाज अली का सन्दर्भ लेखन भी काफी प्रभावकारी है| देखा जाय तो किताब प्रशंसनीय ही नही बल्कि संग्रहणीय भी है|

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

सुशील कुमार भारद्वाज बायोग्राफी !

नाम : सुशील कुमार भारद्वाज
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.