एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, ‘कोठागोई’ (सुशील कुमार भारद्वाज)

कथा-कहानी समीक्षा

सुशील कुमार भारद्वाज 30 2018-11-18

इन दिनों चर्चा में ‘प्रभात रंजन’ की किताब “कोठागोई” पर एक समीक्षात्मक आलेख ……

एक संस्कृति के उत्थान और पतन की कहानी, ‘कोठागोई’

सुशील कुमार भारद्वाज

सुशील कुमार भारद्वाज

प्रभात रंजन की नयी किताब “कोठागोई” के आने की खबर मात्र से मन में बेचैनी थी कि आखिर चतुर्भुज स्थान के बारें में क्या लिखा गया है? मन में एक ही बात समायी थी कि इन्होंने उन बदनाम गलियों में क्या देख लिया कि कलम उठाने को मजबूर हो गये? इसी बीच मालूम हुआ कि अक्सर तिरहुत क्षेत्र को कलमबद्ध करने वाले इस इंसान ने तवायफो की जिंदगी पर कुछ लिखा है| तब मन में बात आयी कि फिर तो ये अधूरी कहानी ही होगी, क्योंकि तवायफो की जिंदगी सिर्फ चतुर्भुज स्थान तक ही सीमित तो नहीं है| लेकिन जब “कोठागोई” मेरे हाथ लगी तो, दंग रह गया| इस कोठागो ने साहित्य में कोठागोई के बहाने एक नयी विधा से ही परिचय नहीं कराया है, बल्कि बहुत ही साफगोई और अपने कठिन परिश्रम से चतुर्भुज स्थान की एक लंबी परम्परा को हमारे सामने प्रस्तुत भी किया है|
पहली बार जाना कि लखनऊ, बनारस जैसे संगीतमय वातावरण को छोड़ लोग यहाँ आकर गाने में फक्र महसूस करते थे| पन्नाबाई, भ्रमर, गौहरजान, और चंदाबाई आदि जैसे नगीने किस प्रकार मुजफ्फरपुर के इस बाज़ार में आये, और किस तरह अपनी जिंदगी को आबाद करके, वे यहाँ से चले गये? तवायफ कितने प्रकार की होती हैं? और उनके जिंदगी की क्या ठसक और कसक थी? मुजफ्फरपुर ही नहीं, बल्कि समस्तीपुर, सीतामढ़ी और नेपाल तक में इनकी कितनी पैठ थी? कितने ऐसे हुए जो इन तवायफों से ठोकर खाकर अपमान और जलालत की जिंदगी ही नहीं झेली, बल्कि उसी चतुर्भुज मंदिर के पास फटेहाल में भीख मांगने को भी मजबूर हुए? समय के साथ चतुर्भुज स्थान बदलता गया| मुजरा के साथ-साथ ठुमरी और दादर जैसे संगीतों का दिन ढलने लगा| आधुनिकता के दौर में गीतों के साथ नाच का जो प्रचालन शुरू हुआ, वह चतुर्भुज स्थान जैसे संगीत और कला के समृद्ध केंद्र को पतन की ओर धकेलने लगा| बाद के दिनों में तो शामियाना में गोलियों की बौछार होने लगी| चंदाबाई का नाम सुनते ही टेंट वाले, टेंट का पूरा दाम पहले ही वसूल लेते थे| 1980 के बाद के दिनों में तो, देर रात छापेमारी और होटलों में तवायफों के मरने की भी बातें आम होने लगी| किस्सागो ने लघु प्रेम की बड़ी कहानियों के माध्यम से चतुर्भुज स्थान के उत्थान और पतन के एक लंबे इतिहास को कहानी के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया है वह बेमिशाल है|

पुस्तक -कोठागोई . लेखक -प्रभात रंजन . प्रकाशक - वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली , पृष्ठ -200, मूल्य - 395/-

पुस्तक -कोठागोई . लेखक -प्रभात रंजन . प्रकाशक – वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली , पृष्ठ -200, मूल्य – 395/-

मजे की तो बात ये है कि कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर ने ही इस धरती पर अपने पैर नहीं रखे, बल्कि शरतचंद्र चटोपाध्याय को पारो के रूप में सरस्वती से भी यहीं मुलाकात हुई थी| और यहाँ से लौटने के बाद ही उन्होंने देवदास की रचना की थी| साहित्यकार ने “दुनिया दुनिया जीवन जीवन” वाले अध्याय में यह राज भी खोला है कि इस किताब को कैसे, क्यों और किन लोगों की मदद से लिखा गया है| अंतिम शब्दों में यह भी बताया गया है कि पृथ्वीराज कपूर जानकी वल्लभ शास्त्री के पास अक्सर क्यों आते थे?
हिंदी, मैथिली और वज्जिका में लिपटी भाषा शैली जितनी मनमोहक है, शब्दों का चयन उतना ही सरल और सटीक है| पढ़ने बैठने पर 12 अध्यायों से होते हुए, 200 पन्नों का यह किताब कब खत्म हो गया पता ही नहीं चलता|
लेखक ने बहुत ही चालाकी से किताब के प्रारंभ में ही सारी कहानियों को चतुर्भुज स्थान की कसम खाते हुए झूठी करार दी है, जो कि सिर्फ आपको गुदगुदाएगा| आप आसानी से समझ सकते हैं कि इन शब्दों का प्रयोग किन चीजों से बचने के लिए किया गया है? फिर भी यदि कोई किताब पर अंगुली उठाना चाहे तो यही कह सकता है कि भाई तवायफों की कहानी में उसके लिखे जाने की प्रक्रिया तक की बात तो ठीक है लेकिन जानकी वल्लभ शास्त्री और रणबीर कपूर आदि की चर्चा करने की क्या जरुरत थी? क्या लेखक कुछ अधिक बताने के अपने लालच को नियंत्रित नही कर सका?
हर अध्याय के शुरू में गजलों की प्रस्तुति इसकी एक और विशेषता ही है| साथ ही साथ प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी की लिखी भूमिका और फ़िल्मकार इम्तियाज अली का सन्दर्भ लेखन भी काफी प्रभावकारी है| देखा जाय तो किताब प्रशंसनीय ही नही बल्कि संग्रहणीय भी है|

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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