कामवाली की जाति: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

सुशील कुमार भारद्वाज 6 2018-11-18

कामवाली की जाति: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

कामवाली की जाति

In partnership with Canada's Women in Cities International, India's Jagori is working towards building safer cities for women. (CNW Group/International Development Research Centre)

गूगल से साभार

सारिका बहुत परेशान थीं |घर के सारे काम खुद ही करने पड़ते थे | अंत में उसने पडोसी के घर काम करने वाली रागिनी से मदद मांगने की सोचीं |और अगली शाम ज्योंही उनकी नज़र रागिनी पर पड़ी उन्होंने लपक कर खुद को उसके आगे करते हुए कहा – “अरे रागिनी ! क्या मुझे भी अपने जैसी काम करने वाली को बुला दोगी ? …. अब क्या बताऊँ ? खुद से सारा काम हो नहीं पाता है | सुबह से शाम तक में क्या क्या करती रहूँ ? ”
मुस्कुराते हुए रागिनी ने जबाब दिया -” आदमी की भी कोई कमी होती है ? बस अच्छे लोग मिलने चाहिए | मैडम के यहाँ काम से फुर्सत ही नहीं मिलती वर्ना मैं ही कर देती |”
आशा की किरण मिलते ही सारिका बोली – ” सच पूछो तो मेरी भी यही इच्छा थी, पर सीधे कैसे कहती ? खैर किसी वैसी को देखना जो घर के साफ़ सफाई के साथ साथ रसोई में भी कभी कभी मदद कर दे |”
“मैडम ये भी कोई कहने की बात है |”
“रागिनी तब तो लगता है की मेरा काम जल्दी ही हो जायेगा | पैसे की कोई बात नहीं है जो उचित होगा दूंगी | बस एक बात का ध्यान रखना की वो किस जाति धर्म की है…..? तुम सब कुछ समझ रही हो न मैं क्या कहना चाह रही हूँ ?”
गौर से रागिनी सारिका के चेहरे पर देख रही थी और बात खत्म होते ही बोली -” मैडम एक बात पुछूं ?”
“हाँ हाँ पूछो , क्या पूछना चाहती हो ? ” – सारिका हुलस कर बोली |
रागिनी सारिका के चेहरे पर नज़र गडाये हुए ही बोली – “मैडम सिर्फ काम करने वाली की जाति – धर्म पर ही ध्यान देना चाहिए ? या जिसके यहाँ काम करना है उसके जाति – धर्म का भी ध्यान रखना चाहिए ?”
सारिका इस सवाल के जबाब में सिर्फ रागिनी को फटी आँखों से देखती रह गयी |

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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अनीता 51 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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