ओहदेवाले: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

सुशील कुमार भारद्वाज 7 2018-11-18

ओहदेवाले: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

ओहदेवाले

सुधा बहुत परेशान थी| घर में शादी की बात छिड़ने के बाद से बबाल मच गया था | अंत में उसे मौसी याद आयी| अक्सर सामाजिक मुद्दों पर लिखने वाली मौसी बड़े ओहदे पर थी| समाज में अपना रुतबा रखने वाली मौसी लोगों की समस्याओं को सुलझाया करती थी | अनेक जोडो को परिणय सूत्र में बंधवाए थे | इसलिए इस मुसीबत की घडी में कोई साथ दे सकता था तो एक मात्र मौसी ही बची थी |सो आते ही मौसी से बोली – “बताओ मौसी , आज – कल के युग में भी कोई जाति – धर्म की बात करता है ?”
अचानक हुए सवाल को बिना सोचे अपने लय में मौसी बोली -” नहीं! मनुष्य का सिर्फ एक ही जाति होता है मनुष्यता का| बांकी सब तो इस दुनियां में रहने वाले लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए जाति – धर्म का ताना – बाना बुन रखा है जिसका कोई मतलब नहीं है |”
अपने विचारों से मौसी के विचारों को मिलता देख सुधा फट पड़ी -” तो घर में मेरे विजातीय विवाह पर बाबेला क्यों मचा है? कोई इन दकियानुसी सोच वालों को समझाता क्यों नही है ? क्यों ये छोटी – छोटी बातों को बेबजह तुल देते हैं ?”
सारा माजरा समझते ही मौसी चुप हो गयी |थोड़ी देर की शांति के बाद मौसी समझाते हुए बोली – “ देखो, हर जाति–धर्म का अपना संस्कार होता है, जिसे बचाकर रखने की जिम्मेवारी भी इन्ही सामाजिक लोगों पर होती है |और विजातीय विवाह का सबसे अधिक असर संस्कार पर ही पड़ता है|”
– “लेकिन तुम तो कई की ऐसी शादी करवा चुकी हो | लोगों की सोच बदल रही है | विचारों में खुलापन आ रहा है |सरकार भी इसके लिए प्रोत्साहित कर रही है | मजे की तो बात ये है की सरकार सामाजिक और आर्थिक मदद भी दे रही है|फिर फालतू के बातों में क्या रखा है ?”
अब तक सारी बातों को गौर से सुनने वाली मौसी दुलारते हुए बोली – “अरी पगली ! तुम किन बातों के चक्कर में पड़ी हो | अपनों और दूसरों में फर्क होता है की नहीं | और हर जो बात कही जाय उस पर खुद भी अमल किया जाय यह कोई जरुरी थोड़े न है | फिर तुम क्यों राजनीति और सरकार को निजी जीवन में ला रही हो? राजनीति में जो बात कही जाये वही हो, कोई ज़रूरी तो नहीं |चुनाव के वक्त देखती नहीं हो वे किस तरह एक दूसरे को कोसते हैं और फिर बाद में एक हो जाते हैं | इसलिए इन चीजों के पीछे मत सोचो |”
अपनी बात जमती न देखकर सुधा बोली – “वैसे भी शादी के बाद लड़की तो लड़के के ही जाति–धर्म की हो जाती है और बच्चों को भी इसका लाभ मिल जाता है |”
मुँह बनाते हुए मौसी बोली -“इतने के लिए तुम खानदान की नाक कटवाओगी ?”
सुधा बेबस होकर कही -“लेकिन मौसी तुमने भी तो विजातीय शादी ही की हो| कम से कम तुम तो ….”
बात पूरी होती उससे पहले ही मौसी गुस्से से तमतमा गई – “चुप रहो| तुम अपने आपको समझती क्या हो ? शादी का मतलब भी समझ में आता है ? किससे शादी करनी चाहिए और किससे नहीं इसका फर्क तुम्हे मालूम है ? चली आयी मुँहउठा कर| ……. और तुम मुझसे बराबरी करने की सोच रही हो ? तुम जानती हो मैं कितने बड़े ओहदे पर हूँ ? पता है मैंने कितने बड़े ओहदे वाले से शादी की है ? कितने उसके पास धन संपत्ति है ?… तुम्हारे जैसे किसी राह चलते लफंदर को पसंद नहीं किया है | क्या है उसके पास जिसके लिए तू खानदान के नाम को मिटटी में मिलाना चाहती है? बता क्या है उसके पास ?
सुधा मौसी के रौद्र रूप को देखकर सहम गयी | उसे कुछ जबाब न सुझा | और फिर निराश मन से अपने घर चली आयी यह सोचते हुए की मनुष्यता, संस्कार, ओहदे, और खानदान के मायने क्या हैं?

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

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अनीता 52 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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