अनुचित: लहुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

कथा-कहानी लघुकथा

सुशील कुमार भारद्वाज 74 2018-11-18

मन को समझाने भर के लिए कह लेते है कि हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे है लेकिन आज भी इस पुरुष सतात्मक समाज में महिलाओं को वह हक़ या अधिकार नहीं मिलते जिनकी वे हकदार है | इसी दर्द को बयाँ करती है सुशील कुमार भारद्वाज की लघुकथा-अनीता चौधरी

अनुचित

रामवचन बहुत परेशान था | इंदु उससे तलाक लेने पर तुल गयी थी | लाख समझाने के बाबजूद वह उससे समझौता करने को तैयार न थी | उसने साफ -साफ कह दिया –  ” तुम्हें उस संगीत शिक्षिका के साथ समय बिताना अच्छा लगता है तो रहो न | मुझे भी स्वतंत्र कर दो ताकि मैं अपनी दुनिया बसा सकूँ | मैं तुम्हारे कारण अपनी जिंदगी क्यों बर्बाद करूँ ? ” यूँ तो रामवचन के लिए ये समस्या न थी क्योंकि इंदु से अब उसका मोह भांग हो गया था |परन्तु इंदु तलाक से पहले सम्पति उसके नाम करने को तैयार न थी | एक बार नहीं हज़ार बार वह कह चुकी थी -” क्या मैंने कहा था कि तुम अपनी  पहली पत्नी को छोड़ कर मुझसे शादी कर लो ? क्या मैंने तुमसे कहा था कि अपनी सम्पति अपनी दोनों बेटों से बचाने के लिए मेरे नाम कर दो ?” रामवचन का सीधा – सा जबाब हर बार होता था – ” नहीं | मैं उस समय तुमसे बहुत प्रेम करता था इसलिए उपहार के रूप में तुम्हारे नाम कर दिया था| और जबकि  तुम सच्चाई जानती हो फिर भी मेरी सम्पति पर जबरन हक जमाए बैठी हो ये अनुचित है |” आज भी इतना सुनते ही इंदु का गुस्सा उबाल खा गया और फटते हुए बोली -” बोलते हुए शर्म भी नहीं आती | तुम दो -दो बच्चों के पिता होने के बाबजूद  अपनी पहली पत्नी को छोड़ मुझसे प्रेम – विवाह करने आये वह उचित था | आज  मेरी उम्र ढलने लगी तो मुझे छोड़ तीसरी विवाह के लिए मुँह बाये हुए हो , ये भी उचित है | और जो सम्पति आज मेरे नाम पर है उसे तुम्हें न देना  अनुचित है ? ” रामवचन को इंदु का मुँह देखने और ठगा -सा महसूस करने के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा था|

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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