संपादक न तो सोया है और न ही सोने की कोशिश कर रहा है: (सुशील कुमार भारद्वाज)

बहुरंग टिप्पणियां

सुशील कुमार भारद्वाज 21 2018-11-18

हमरंग का एक वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्रयास को लेकर हो सकता है आपकी भी कोई दृष्टि बनी हो तो नि-संकोच आप लिख भेजिए हम उसे भी जस का तस हमरंग पर प्रकाशित करेंगे | इस क्रम में आज पटना से ‘सुशील कुमार भारद्वाज’ ….| – संपादक

संपादक न तो सोया है और न ही सोने की कोशिश कर रहा है 

सुशील कुमार भारद्वाज

सुशील कुमार भारद्वाज
जन्म – 1 मार्च १९८६ , गाँव देवधा , जिला – समस्तीपुर विभिन्न कहानियाँ तथा लेख पटना से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्प्रति – मुस्लिम हाईस्कूल , बिहटा , पटना में कार्यरत पटना
फोन – 08809719400

हमरंग जब सफलतापूर्वक एक वर्ष पूर्ण कर चुका है तो थोड़ा ठहर कर एक अवलोकन करना लाजिमी ही है कि इस दरम्यान क्या सही रहा और क्या गलत ? गलती की वजह क्या रही और उसे कैसे सुधार कर सतर्कता के साथ आगे बढ़ा जा सकता है ? वैसे हमरंग के अब तक के सम्पादकीय आलेखों पर एक नज़र डालें तो ज्ञात होता है कि इसमें सबसे अधिक ध्यान साहित्य, कला और उससे जुड़े जीवन विमर्शों पर ही दिया गया है जो कि बहुत ही स्वाभाविक है क्योंकि हमरंग की शुरुआत ही इस उद्देश्य के साथ की गया है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ बेहतर रचनाओं को एकत्र कर एक जगह उपलब्ध करा सकें. शोधकर्ताओं आदि को इसके लिए पुस्तकालय-दर-पुस्तकालय भटकना न पड़े. बहुत ही साफगोई से इसकी सीमा और लक्ष्य को स्पष्ट शब्दों में निर्धारित किया गया है- “हमने तय किया है कि हम साहित्य, कला-संस्कृति (समाज, लोक-कथा और कविता आदि भी इसमें शामिल है), नाटक और सिनेमा आदि जैसे श्रव्य-दृश्य माध्यमों से जन, समाज और समय का हाल बयान करने वाली रचनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे”.|

सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोण की अदूरदर्शिता की वजह से भटकते सांस्कृतिक आन्दोलन को यदि सवालों के घेरे में रखा गया है तो भगत सिंह के बहाने यह भी सवाल दागने की कोशिश की गई है कि उनके नाम को जपने वाले वाकई में उनके नीति और विचारधारा को समझते- बूझते भी हैं या महज उनके नाम पर अपनी मनोकामना पूर्ति की चाह में लगे रहते हैं? यथासंभव ऐसे सम्पादकीय आलेख भी दिए गए हैं जो न सिर्फ नारी और मजदूरों की समस्याओं पर प्रकाश डालते हैं बल्कि बेरोजगारी से जुड़े मसलों को भी बुलंद आवाज के साथ उठाते हैं. यदि ये किसानों की स्थिति और आत्महत्या को अपना विषय बनाते हैं, तो नारी के आत्मनिर्भर बनने की जरुरत पर भी जोर देते हैं. भू-मंडल पर पानी के लिए मचते त्राहिमाम की आहट है तो सबसे बड़ी संपत्ति स्वास्थ्य के प्रति बरती जा रही लापरवाही भी सवालिये घेरे में है. बीच में कहीं हिंदी भाषा और क्षेत्रीय भाषा की समस्याओं के बहाने इससे सम्बंधित विषमताओं को छूने की कोशिश की गई है. तो अम्बेडकर के बहाने दलित विमर्श के कुछ वाजिब प्रश्न भी उठाये गए हैं. स्पष्ट शब्दों में कहें तो ज्वलंत समस्याओं को भी मुखर रूप देने की कोशिश की गई है.

मथुरा की यादों के बहाने साम्प्रदायिक एकता को रेखांकित करने की कोशिश की गई है. ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टिकोण से ही नही बल्कि मथुरा धार्मिक दृष्टिकोण से भी भारत का एक महत्वपूर्ण शहर है जहाँ की आबोहवा में विविधता का जबर्दस्त सामंजस्य है जिससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने की जरुरत है. जहाँ एक आलेख में साम्प्रदायिकता की तेज लपटों एवं असामाजिकता को निशाने पर लेने की पुरजोर कोशिश की गई है. तो वहीं दूसरे में बीते बातों को भूल कर मेलजोल के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा लेने के लिए भी प्रेरित किया गया है.इतना ही नहीं, साहित्य को अन्य रचनाओं से अलग करती इन पंक्तियों को आप नज़रअंदाज नहीं कर सकते हैं बल्कि ये आपको कुछ सोचने को मजबूर करती हैं – “साहित्य का आदर्श अत्यंत उच्च होता है, कि वह ऊंचे आदर्श और नैतिक मूल्यों की खोज करता है, कि उसका काम बाहरी संसार का चित्रण करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक और आत्मिक संसार का प्रामाणिक चित्रण करना है. यह भी कहा जाता है कि रोजी-रोटी अथवा वर्ग संघर्ष की बात करना साहित्य नहीं है.”

साहित्यकारों के लिए मुक्तिबोध के विचार को भी उद्दृत किया गया है- “एक संवेदनशील लेखक, कलाकार खुद को मानवीय बाहरी स्वरूपों या प्रभावों को ग्रहण करने के लिए छुट्टा छोड़ देता है या उसे छोड़ देना चाहिए. कलाकार चाहे कितना ही महान क्यों न हो, जीवन-जगत की तुलना में उसका विश्लेषण छोटा ही है, इसीलिए वह जीवन-जगत के बिम्बों, प्रेरणापूर्ण दृश्यों, भाव और विचारधाराओं के सारे तत्वों को पीता रहता है या पीते रहना चाहिए.” साथ ही साथ रंगमंच की कुछ मूलभूत समस्याओं को भी सबके सामने रखा गया है. जबकि प्रेमचंद और राही मासूम राजा के सामाजिक और साहित्यिक योगदान को विभिन्न सन्दर्भों में प्रस्तुत किया गया है.और सबसे महत्वपूर्ण बात कि अभिव्यक्ति पर छाते कोहरे के बादलों के बीच डॉ के पी सिंह के साहित्यिक और सामाजिक योगदान को याद करना इस बात को पुष्ट करता है कि संपादक न तो सोया है और न ही वह सोने की कोशिश कर रहा है बल्कि अपनी प्रतिबद्धताके साथ उन अमानवीय एवं असांस्कृतिक घटनाओं का सदमा झेलते हुए आगे बढ़ने की कोशिश में लगा है जिनसे हमारी मानवीयता शर्मसार हो रही है.

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पंकज तिवारी 216 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

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आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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