जाति बघारने: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

कथा-कहानी लघुकथा

सुशील कुमार भारद्वाज 31 2018-11-18

जाति बघारने: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

जाति बघारने 

जाति बघारने: लघुकथा (सुशील कुमार भारद्वाज)

सुशील कुमार भारद्वाज
जन्म – 1 मार्च १९८६ , गाँव देवधा , जिला – समस्तीपुर विभिन्न कहानियाँ तथा लेख पटना से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्प्रति – मुस्लिम हाईस्कूल , बिहटा , पटना में कार्यरत पटना
संपर्क :- सुशील कुमार भारद्वाज A-18, अलकापुरी, पो० – अनिसाबाद , था० – गर्दनीबाग, जिला – पटना -800002, Mo- 8581961719

“मंत्रीजी! हम आप ही के क्षेत्र से आए हैं. बहुत आस लगाकर आए हैं.” – वह गिडगिडाता हुआ मंत्री जी के चरणों में गिर पड़ा– “कुछ रहम कीजिए, घर की सारी जमीन बेचकर आए हैं. इससे अधिक रूपया हमसे संभव नहीं है.”
“देखो भाई, अगर हम अधिक जनकल्याण की बात सोचने लगेंगें तो एक दिन हमें ही भीख मांगनी पड़ जाएगी. सिद्धांत से कोई समझौता नहीं. जो रकम कहा गया उससे एक भी पैसा कम रहा तो, समझो तुम्हारा काम नहीं हो पाएगा.” – मंत्रीजी टका-सा जबाब देकर कुर्सी से उठने लगे.
श्याम बुरी तरह से ऐंठ कर रह गया. समझ नही पा रहा था कि क्या करे? आखिरकार उसने अपने तरकश का अंतिम बाण छोड़ते हुए कहा– “हुजूर, कुछ नहीं तो जाति के ही नाम पर रहम कीजिए. हम आपही की जाति के हैं.”
मंत्री जी आँख फाड़ते हुए बोले – “क्या कहे? आप हमारे ही जाति के हैं?”
श्याम आशा की किरण मिलते ही बोला- “जी जी, हमलोग जातिभाई हैं. बातचीत में कभी बताने का मौका ही नहीं मिला.” – आत्मविश्वास के साथ वह तेज आवाज में बोलता चला गया – “मजाल था जो कोई एक भी वोट इधर से उधर हो जाता? पूरी मुस्तैदी थी हमारी. चुनाव में हमलोग अपनी जाति का मान–सम्मान और गौरव को बचाए रखने के लिए जी जान लगाए हुए थे.”
मंत्रीजी के चेहरे पर सहज ही मुस्कुराहट की रेखाएं खिंचती चली गई. कुर्सी पर बैठते हुए वे श्याम को देखते रह गए और धीरे से बोले– “भाई चुनाव में जो आपने जाति के लिए किया उसका ऋण तो शायद कोई भी नहीं चुका पाएगा. और हर इंसान का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी जाति की भलाई के लिए जान कुर्बान कर दे. लेकिन आप ही कहिए चुनाव से आज तक का जो सारा खर्च चल रहा है वह कोई जाति वाला दे जाता है क्या?”
श्याम सिर्फ उनकी बातों को आँखें फैलाए सुनता रहा और मंत्रीजी बोलते रहे– “आप हमारी जाति के हैं तो, हम क्या करें? हमको आपके साथ कोई शादी–विवाह का सम्बन्ध करना है जो ई सब बात हमको बता रहे हैं?”- मंत्रीजी कुर्सी से उठ, कमरे में जाते हुए बोले- “अगली बार पैसा हो जाए तो आइएगा जाति बघारने नहीं.”

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

सुशील कुमार भारद्वाज बायोग्राफी !

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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