मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी: आलेख (सुशील कुमार भारद्वाज)

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सुशील कुमार भारद्वाज 59 2018-11-18

एक इंसान की खुशी दूसरे की भी खुशी हो, कोई जरूरी तो नहीं. जैसे इस दुनियां में सुंदरता और संतुष्टि का कोई निश्चित पैमाना नहीं है ठीक उसी प्रकार खुशी का कोई निश्चित स्वरूप या पारामीटर नहीं है. खुशी हमें हर उस क्षण से मिल सकती है जिस पल हम स्वयं को आनंदित करते है. परिवार, दोस्त, सहकर्मी या फिर जीवन में मिलने वाले हर प्राणी से निष्पक्ष एवं निष्कलुष भाव से मिलते हैं. जहां हम कुछ वापस पाने की आस लगाने की बजाय परोपकार या सहयोग की भावना से कार्य करते हैं. जब हम अपनी स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रकृति के हर जीव –जंतु के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते हैं. स्वर्ग की परिकल्पना खुशी की ही भूमि पर तैयार की जाती है जहां मनुष्य सारी चिंताओं और विध्न-बाधाओं से दूर हो सिर्फ भोग-विलास में खोया रहना चाहता है. जबकि सभी जानते हैं कि किसी चीज में हमारी आसक्ति ही हमारे खुशी के विनाश का कारण बनती है. कुछ लोग कहते हैं कि मनुष्य के पास होने से खुशी मिलती है तो कोई कहता है दूर रहने से. जबकि खुशी का सम्बन्ध नजदीकी और दूरी से नहीं है….

मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी

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सुशील कुमार भारद्वाज
जन्म – 1 मार्च १९८६ , गाँव देवधा , जिला – समस्तीपुर विभिन्न कहानियाँ तथा लेख पटना से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्प्रति – मुस्लिम हाईस्कूल , बिहटा , पटना में कार्यरत पटना
फोन – 08809719400

“खुशी कहां से मिलती है?” यह एक अहम सवाल बना हुआ है. जिसका जबाब भी मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना की तर्ज पर अलग –अलग स्वरूपों में मौजूद है. क्योंकि खुशी का मतलब हर इंसान के लिए अलग –अलग है. कोई इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखता है तो कोई भौतिक नज़रिए से. कोई पूजा –पाठ और कीर्तन में खुशी को महसूसता है तो कोई अपने बीबी –बच्चों को अच्छी सुख –सुविधा मुहैया कराकर. किसी के लिए खुशी का मतलब वृद्ध माता-पिता की सेवा है तो
किसी के लिए समाजसेवा और देशसेवा. कोई परोपकार के काम में खुशी का अनुभव करता है तो कोई किसी को धोखा देने में. कोई जीव-जन्तुओं से प्रेम में आनंदित होता है तो कोई कला के क्षेत्र में अपनी ऊर्जा का उपयोग करके. कोई
धनलिप्सा और वासना में खुश है तो कोई त्याग और संतुष्टि में. कोई जीवन की सार्थकता समझने में खुश है तो कोई धर्म के नाम पर पाखंड करके. लेकिन इतना सच है कि हर कोई खुशी की ही तलाश में मारा- मारा फिर रहा है. हर कोई खुशी
पाने की चाह में ही बेतरतीब भागा जा रहा है या फिर भागने को आतुर है. परंतु दुर्भाग्यवश सभी लोग अपनी –अपनी खुशी तक चाहकर भी पहुंच नहीं पाते हैं. या यूं कह लें कि वे खुशी को पहचान ही नहीं पाते हैं और समय निकल जाने पर महसूस करते हैं कि उनके लिए खुशी के मायने इस विस्तृत जगत में क्या था?
एक इंसान की खुशी दूसरे की भी खुशी हो, कोई जरूरी तो नहीं. जैसे इस दुनियां में सुंदरता और संतुष्टि का कोई निश्चित पैमाना नहीं है ठीक उसी प्रकार खुशी का कोई निश्चित स्वरूप या पारामीटर नहीं है. खुशी हमें हर उस क्षण से मिल सकती है जिस पल हम स्वयं को आनंदित करते है. परिवार, दोस्त, सहकर्मी या फिर जीवन में मिलने वाले हर प्राणी से निष्पक्ष एवं निष्कलुष भाव से मिलते हैं. जहां हम कुछ वापस पाने की आस लगाने की बजाय परोपकार या सहयोग की भावना से कार्य करते हैं. जब हम अपनी स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रकृति के हर जीव –जंतु के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते हैं. स्वर्ग की परिकल्पना खुशी की ही भूमि पर तैयार की जाती है जहां मनुष्य सारी चिंताओं और विध्न-बाधाओं से दूर हो सिर्फ भोग-विलास में खोया रहना चाहता है. जबकि सभी जानते हैं कि किसी चीज में हमारी आसक्ति ही हमारे खुशी के विनाश का कारण बनती है. कुछ लोग कहते हैं कि मनुष्य के पास होने से खुशी मिलती है तो कोई कहता है दूर रहने से. जबकि खुशी का सम्बन्ध नजदीकी और दूरी से नहीं है.
इंसान स्वयं के अंदर कैसा महसूस करता है? उसके अंदर आत्म-संतुष्टि की भावना कितनी और कैसी है? इस पर काफी कुछ निर्भर करता है. सबसे बड़ी बात कि यदि हम अपनी खुशी इस नश्वर एवं मायामोह से ग्रस्त संसार में दूसरे जीवों अथवा वस्तुओं में आरोपित कर दें तो शायद यह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी होगी. क्योंकि आकर्षण और जरूरत एक समय विशेष के बाद महत्वहीन हो जाते हैं. धन-दौलत, परिवार, दोस्त- दुश्मन, सुविधा–असुविधा या फिर कोई भौतिक आकर्षण आखिर क्या है? ये चीजें नश्वर दुनियां में कब तक स्थायी रह सकती हैं? एक उदाहरण दूँ तो, एक मनुष्य अपने दुश्मन के मरने या उसे किसी प्रकार का नुकसान होने पर जी भर ठठा कर हंसता है. जश्न मनाता है. लेकिन क्या इसे सच्ची खुशी कही जा सकती है? क्या होगा उनकी सच्ची खुशी का यदि जो जश्नी माहौल के बीच कोई अप्रिय घटना की खबर मिल जाए? सारा का सारा रंग वहीं बदरंग नज़र आने लगेगा.
एक इंसान की सच्ची खुशी किसी के विनाश में या प्रतिशोध में नहीं बल्कि निर्माण में है. प्रतिशोध या बदले की भावना से मिलने वाली खुशी आपके विकृत चरित्र का ही परिचायक हो सकता है, जिसे शायद सामने वाला या आपके साथी भी पसंद न करें. खुशी तो क्षमा से मिलती है. क्या आप अपनी खुशी की तुलना उस खुशी से कर सकते हैं?- जब आपने किसी जरूरतमंद इंसान को महज एक रुपए से मदद किया? जब किसी घायल चिडियां या जीव को जीवन देने की कोशिश की? जब आपने अपने दुश्मन को संकट के समय में मदद की? यदि आप सिर्फ दूसरों की नज़रों में प्रतिष्ठा या प्रशंसा पाने के लिए कुछ करते हैं तो शायद वो खुशी बनावटी लगे, उसमें उचित –अनुचित का भाव आए. भौतिक पैमाने पर लाभ –हानि के पचड़े में पड़ जाएँ लेकिन जिस काम को आपने दिल से किया, जिसके लिए आपके मन में कोई मलाल नहीं है. पश्चाताप नहीं है. शायद वह आपकी सच्ची खुशी है. फिल्म थ्री इडियट के बोल “आल इज वेल” और मुन्नाभाई एमबीबीएस के “प्यार की झप्पी” को आप किस रूप में देखते हैं? भागम – भाग की इस जिंदगी में, जहां लोग मौके की ताक में रहते हैं. आपको हर पल कमतर दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. आपकी नाकामियों पर दांत निपोरने के लिए आतुर रहते हैं. हर सावधानी के बाबजूद कोई दुर्घटना या विश्वासघात हो जाने से इनकार नहीं किया जा सकता है, वैसी स्थिति में नॉस्टैल्जिक हो जाना गुनाह नहीं है. पुराने दिनों को याद कर खुशी को
पाने की कोशिश गलत नहीं है. लेकिन हम कब तक पीछे की ओर मुड़ते रहेंगें? क्या बार –बार पीछे मुड़ने की कोशिश में हम वर्तमान को खोते नहीं चले जा रहे हैं? हम जिन पुरानी बातों से खुद को खुश करने की कोशिश करते हैं, वह भी परिवर्तन का एक दौर था और आज भी समय का पहिया अपने साथ काफी कुछ नया लेकर उपस्थित हो रहा है और पुरानी चीजों को नीचे की ओर धकेलते जा रहा है. ऐसी विषम परिस्थिति में भी स्वयं को बदलते हुए बदले माहौल में चारों ओर
बिखरी खुशी को समेटने की जरूरत है. खुशी को किसी खास दायरे में समेटने की बजाय इसके व्यापक स्वरूप को समझने की जरूरत है. खुशी की तलाश में भटकते इंसान को इंसान समझ, मदद का एक हाथ बढ़ा, मुस्कुराहट को बिखेरने की जरूरत है, जहां से मिलती है वास्तविक खुशी. खुशी को तलाशने के लिए पेड़ – पौधे, चांद –तारे, नदी –नाले, या प्रेमी –प्रेमिका के पास जाने से पहले खुद से पूछने की जरूरत है कि हमारे लिए खुशी के मायने क्या हैं? हमारी कौन-सी
सफलता हमारी खुशी को दुगुनी करती है?

सुशील कुमार भारद्वाज द्वारा लिखित

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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- पंकज तिवारी का आलेख 

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