अच्छा आदमी!!! एवं अन्य कविताएँ: (सुशील उपाध्याय)

सुशील उपाध्याय 15 2018-11-18

वर्तमान समय में समाज से लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं के पहलूओं को विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करती सुशील उपाध्याय की कविताएँ – सम्पादक

अच्छा आदमी!!! 

सुशील उपाध्याय

सुशील उपाध्याय

हर किसी की निगाह में
ऊंचा होता है अच्छा आदमी!
बौने लोगों के बीच
पूरी लंबाई का वाला अच्छा आदमी!
उसके कदमों की आहट पर
झुक जाते सिर,
हर कोई आग्रही-
हमारे घर आइये किसी दिन।
और चौड़ा हो जाता अच्छे आदमी का सीना!
छोटे लगने लगते-
पड़ोसी, साथी, सहकर्मी,
परिजन, प्रियजन!
अच्छा आदमी कभी-कभी बोलता,
अक्सर चुप रहता,
उसकी चुप्पी को भी सब सुनते चुपचाप!
लोग मांगते सलाहें,
लेते आशीर्वाद, पूछते रास्ता।
चमकने लगती सिर के पीछे दिव्य-दीप्ति।
सहम जाती धरती!
शांत, स्थिर, गुणी-ज्ञानी, तटस्थ, समदर्शी, प्रज्ञापुरुष….
और भी न जाने कितने-कितने
गुणों को धारण करता अच्छा आदमी।
न दुष्ट को दुष्ट कहता, न गलत को गलत
और न बुरे को बुरा कहता ‘अच्छा आदमी’।
हमेशा रखता शीर्ष से सहमति,
वक्त के साथ बदलता अपना दायरा,
परिधि और आयाम।
जीवन-मरण के प्रश्नों पर देता दार्शनिक जवाब!
तब, लोग खुद से पूछते-
हमेशा अच्छा ही होता है ‘अच्छा आदमी’ ?

बच्चा और कुंवारी इच्छाएं

बच्चा,
भुनी मूंगफलियों को हाथ में दबाए,
मिट्टी खोदता है।
बीज बोता है,
खुश होता है!
एक दिन,
जिंदगी उगेगी भुरभुरी मिट्टी से!

पानी देता है,
फिर, बीज उखाड़कर देखता है,
बीज, जो भुनी मूंगफलियां हैं!
निराश होता है
बीजों के साथ खेलता है!
कुंवारी इच्छाओं के लिए,
भगवान को पुकारता है!

सवाल पूछता है,
सयाने और गुनी लोगों से-
कैसे निकलेंगी धरती से कौंपले ?
लोग मुस्कुराते हैं,
आगे बढ़ जाते हैं,
बच्चा, नई जगह पर मिट्टी खोदता है,
उसे जिद है
जिंदगी उगाने की!
कल का इंतजार करो,
शायद! कौंपले फूट जाएं!!!

रोटियां नहीं, सपने बेलती है 

सड़क पर ठेला लगाकर
रोटी बनाती, बेचती है वो लड़की!
गोल रोटियां, धरती के आकार जैसी।
अक्सर लगता है-
रोटियां नहीं, सपने बेलती है।
गर्म तवे पर आकार लेती रोटियां,
फूलती, फुस्स हो जाती।
ठीक वैसे ही,
जैसे कि अच्छे दिनों की उम्मीदें।
चूल्हे की आग तवे को नहीं,
देह को गरम करती है।
लपटे भले ही बाहर दिखती हों,
पर, ये भीतर से उठती हैं!
लड़की रोज सामना करती है
पेट की भूख का
देह की भूख का
नर-शिकारियों का,
जिनकी भूख है पेट से नीचे
लटकती, लहलहाती!
लड़की आंखें झुकाएं रोटियां बनाती है।
परोसती है।
दिनों को ठेलती है,
सड़क पर ठेले के पीछे खड़ी होकर!

सुशील उपाध्याय द्वारा लिखित

सुशील उपाध्याय बायोग्राफी !

नाम : सुशील उपाध्याय
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 38 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

विजय शर्मा 29 2018-12-04

‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.