समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई.. : फिल्म समीक्षा (सैयद एस तौहीद)

सिनेमा फिल्म-समीक्षा

एस. तौहीद शहबाज़ 23 2018-11-18

समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई.. : फिल्म समीक्षा (सैयद एस तौहीद)

समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई.. 

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एस तौहीद शहबाज़

प्रेम रतन की परिभाषा एवम दायरा इतना अधिक सीमित नही होना चाहिए जितना कि हालिया रीलिज ‘प्रेम रतन धन पायो’ या उसके समान फिल्मों में पेश किया जाता है. प्रेम एहसान तथा इंसानियत के महान मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का यह प्रयास मुश्किल समय में हमारे समक्ष है. बड़जात्या की प्रेम रतन का समय इसके प्रयास को मामूली करार दे रहा. आज समूचा विश्व कट्टरता -बर्बरता घृणा एवं असहिष्णुता की ज़द में खुद को पा रहा. प्रेम दिलवाले ने केवल बिखरे हुए मात्र एक परिवार को प्रेम रतन धन का एहसास कराया, जबकि पूरे समाज की तृष्णा अनदेखी रह गई..हाशिए पर जाने दी गई. देश और दुनिया प्रेम रतन धन से अछूते रह गए. पटकथा में जगह मिलना तो बहुत दूर समाज एवम विश्व की ज़रूरत का सांकेतिक उल्लेख भी नही किया गया.

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि राजश्री वालों ने एक सुनहरे अवसर को यूं ही गंवा दिया.प्रेम रतन रूपी खजाने का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता था. कथा को परिवार से आगे गांव एवं समाज तक ले जाने की सामयिक ज़रूरत थी.घटनाओ एवम परिस्थितियो को राजघराने से उठा कर प्रीतमपुर के आमजन के बीच नहीं ले जा सके बड़जात्या.. प्रेम रतन का विस्तार क्या नहीं किया जाना चाहिए था ?

प्रेम दिलवाले एवम कन्हैया के राजघराने के अहंकार तथा स्वार्थ की संकीर्ण दुनिया में वहां एक नए संसार की रचना होती है. साधारण ख़ास को प्रभावित कर उसमें नाटकीय परिवर्तन लाता है. बड़जात्या को ऐसा अनुकूल माहौल बनाने में सफलता मिली जिसमे अमीर- गरीब,खास -आम घुल मिल गए. प्रेम रतन से राजसी खानदान की जटिलताएं सुलझने की दिशा में आ गई.प्रेम की जादूगरी से अहंकार स्वार्थ तथा नफरतो की दीवार धाराशायी हो जाती है. प्रेम रतन नाम धन पारिवारिक कलह की समस्या को प्रेम एवम हुस्न ए सलूक के माध्यम से हल करने का विकल्प देता है.हर परिवार अपनी मुश्किलों का इसी तरह सामना किया करता है.

google से साभार

प्यार, मुहब्बत एवं एहसान की वकालत करने वाली इस फिल्म में प्रेम रूपी धन का लाभ बहुत लोगों को नहीं दिया जा सका. प्रेम को ‘ प्रेम रतन धन पायो ‘ में दिखाई गयी परिधि से आगे निकाला जा सकता तो शायद कमाल हो सकता था. बड़जात्या की फिल्म का समय वैश्विक अस्थिरता का समय है. अहंकार, गुटबंधन, अवसरवादिता, युध तथा आतंक की शक्तियां मानव जगत के लिए खतरा हैं. इन नाजुक हालात में प्रेम रतन रूपी धन निजी एवम पारिवारिक सीमाओं तक महदूद क्यों ? जबकि समाज, देश एवम दुनिया को भी आज प्रेम धन की सख्त ज़रूरत नज़र आती है. प्रेम को विस्तार चाहिए ..

एस. तौहीद शहबाज़ द्वारा लिखित

एस. तौहीद शहबाज़ बायोग्राफी !

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सैयद एस. तौहीद जामिया मिल्लिया के मीडिया स्नातक हैं। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम  से लेखन की शुरुआत। सिनेमा व संस्कृति विशेषकर फिल्मों पर  लेखन।फ़िल्म समीक्षाओं में रुचि। सिनेमा पर दो ईबुक्स के लेखक। प्रतिश्रुति प्रकाशन द्वारा सिनेमा पर पुस्तक प्रकाशित passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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हनीफ मदार 119 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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