क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?: फिल्म समीक्षा (सैयद एस.तौहीद)

सिनेमा सिने-चर्चा

एस. तौहीद शहबाज़ 48 2018-11-18

कॉम्पलेक्स किरदारों की कॉम्पलेक्स कहानी में भावनाओं की यात्रा दिखाने की कोशिश हुई है। संगीत व गानों को फिल्म की कथा का हिस्सा देखना सुखद था। लेकिन प्यार व दोस्ती जैसे सरल सुंदर भाव को उलझन बना देना। कभी न ख़त्म होने वाली जिरह बना देना क्या ज़रूरी था ? भावनात्मक रिश्तों को लेकर हमारे भीतर उलझन क्यों पनप जाती है ? जवाब केवल संकेतों में मिला। अयान के किरदार में रणबीर कपूर रॉकस्टार का संशोधित एक्टेंसन मालूम पड़ रहें जोकि उनके लिए बेहतर ही रहा। इस किस्म के किरदारों को जीने की उनमें खासियत विकसित हो रही । लेकिन जल्द ही विकल्प भी तलाशने होंगे।

फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ पर ‘सैयद एस.तौहीद’ का समीक्षालेख 

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते? 

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एस तौहीद शहबाज़

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते? अरसे से जारी जिज्ञासा एक बार फ़िर एक फिल्म का आधार बनी है। करण जौहर की ‘ऐ दिल है मुश्किल’ इस सवाल को केन्द में रख एक रोचक संघर्ष रचने का प्रयास करती है।

अलीजेह (अनुष्का शर्मा), आयान (रणबीर कपूर) सबा (ऐश्वर्या), अली (फवाद खान), ताहिर (शाहरुख खान) के माध्यम से कहानी हम तक पहुंचती है। जिन्हें करन की कभी अलविदा ना कहना पसंद आई थी, वे ऐ दिल है मुश्किल को मिस नहीं करना चाहेंगे क्योंकि यहां भी दोस्ती- प्यार का संघर्ष रचा गया है।

अयान- अलीजेह एक पार्टी में मिलने के बाद गहरे दोस्त बन जाते हैं। लंदन में पला-बढा अयान बेशक अच्छा नहीं गाता लेकिन उसका सपना मोहम्मद रफी जैसा बनना है। हालांकि परिवार के दबाव में मैनेजमेंट की पढाई कर रहा। अलीजेह को अयान की आवाज़ में दर्द नहीं फील होता। रॉकस्टार की तरह दिल टूटने तक का सफर यहां प्रोजेक्ट हुआ। बहरहाल अयान -अलीजेह के सफर में ब्रेकअप की समानता उन्हें दोस्त बना देती है।

अयान की तरफ़ से दोस्ती धीरे धीरे रोमांस व आकर्षण में तब्दील होने लगी। जबकि अलीज़ेह के दिल में दोस्ती का अधिक महत्व है। प्यार -दोस्ती समानांतर चलते हुए भी एक दूसरे का एक्सटेंसन नहीं बल्कि विरोधी दिखाए गए। भावनाओं को नाम दिया जाना ज़रूरी नहीं। वे हालात व मनोस्थिति की उपज होती हैं। भावनाओं को स्वीकार करने समय तय कर पाना मुश्किल होगा कि वो भावना दरअसल क्या हैं। इनका एहसास हमें बाद में होता है। कहानी के किरदारों में मुझे एक समानता नज़र आई.. प्यार की तलाश.तक़दीर के फैसले से नाखुश यह लोग अपने अपने हिसाब से रिश्तों को परिभाषित कर रहें..अए दिल है मुश्किल। अलीजेह -अली की कहानी की तरह ताहिर -सबा का रिश्ता दूसरा उदाहरण सा है।ताहिर सबा क्यों अलग हुए ? कारण ताहिर के शायराना एकतरफा प्यार की फिलॉसोफ़ी में तलाश कर रहा था। लेकिन बाकी रही।

ताहिर-सबा को फिल्म में थोड़ा अधिक टाईमफ्रेम दिया जाना चाहिए था ।अयान को जब अलीजेह से प्यार के बदले नहीं मिला तो उसे चोट लगी,काश इसके बाद वो प्यार में चोट खा चुकी सबा के प्यार को पहचान पाता ! हुआ नहीं। ताहिर -सबा के किरदार कथा में केवल एक पाठ तरह आएं और फ़िर चले गए। अलीजेह -अयान की कहानी को संघर्ष देने के लिए। यह आखिर उन दोनों की ही कहानी का विस्तार थी।

google film 1 कॉम्पलेक्स किरदारों की कॉम्पलेक्स कहानी में भावनाओं की यात्रा दिखाने की कोशिश हुई है। संगीत व गानों को फिल्म की कथा का हिस्सा देखना सुखद था। लेकिन प्यार व दोस्ती जैसे सरल सुंदर भाव को उलझन बना देना। कभी न ख़त्म होने वाली जिरह बना देना क्या ज़रूरी था ? भावनात्मक रिश्तों को लेकर हमारे भीतर उलझन क्यों पनप जाती है ? जवाब केवल संकेतों में मिला। अयान के किरदार में रणबीर कपूर रॉकस्टार का संशोधित एक्टेंसन मालूम पड़ रहें जोकि उनके लिए बेहतर ही रहा। इस किस्म के किरदारों को जीने की उनमें खासियत विकसित हो रही । लेकिन जल्द ही विकल्प भी तलाशने होंगे।

अयान के दिल में मोहम्मद रफ़ी बनने का ख्वाब था। रफ़ी उनके आदर्श हैं। जिस कथा में नायक को रफ़ी का दीवाना बताया गया,उसी कथा में रफ़ी साहेब की गायकी का अपमान कर क्या साबित करना चाहते थे करण ? बढ़िया गायक बनने के लिए ‘दिल टूटने व उसमें दुख होने ‘ की फिलॉसोफ़ी एक कॉमन मिसअंडरस्टेंडिंग का विस्तार है। दिल टूटने पर आदमी अच्छा गाए यह कोई ज़रूरी नहीं.यह भावना से अधिक प्रतिभा का सवाल है।शायरा सबा के किरदार में ऐश्वर्या प्रभावित करती हैं।

इस किस्म के किरदार उन्हें अधिक ऑफर होने चाहिए। डायलॉग डिलीवरी करने व भावनाओं को व्यक्त में वो अनुष्का से सधी नज़र आती हैं। केमिओ में ताहिर तलियार खान के किरदार में शाहरुख खान की किस्मत में एकतरफा प्यार के संदर्भ में प्रभावी सम्वाद आएं हैं..ताहिर के आंखों में सबा के लिए प्यार था,थोडे आंसू का होना कमाल कर सकता था!अलीजेह के किरदार से बहुत अधिक जुड़ नहीं पाया, दूसरे हाफ में वो ज्यादा प्रभावित करती हैं। अली के किरदार में फवाद में अपार सम्भावनाएं नज़र आई..सबा व अली के कहानी दिल में और की कसक छोड़ गई। जैसे ताहिर की छोड़ जाती है..दिल मुश्किल में है कि फिल्म ने दोस्ती निभाई या प्यार ।

एस. तौहीद शहबाज़ द्वारा लिखित

एस. तौहीद शहबाज़ बायोग्राफी !

नाम : एस. तौहीद शहबाज़
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सैयद एस. तौहीद जामिया मिल्लिया के मीडिया स्नातक हैं। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम  से लेखन की शुरुआत। सिनेमा व संस्कृति विशेषकर फिल्मों पर  लेखन।फ़िल्म समीक्षाओं में रुचि। सिनेमा पर दो ईबुक्स के लेखक। प्रतिश्रुति प्रकाशन द्वारा सिनेमा पर पुस्तक प्रकाशित passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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