‘गांधी ने कहा था’: नाट्य समीक्षा (एस तौहीद शहबाज़)

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एस. तौहीद शहबाज़ 23 2018-11-18

साम्प्रदायिकता का ख़बर बन जाना ख़तरनाक नहीं है, ख़तरनाक है ख़बरों का साम्प्रदायिक बन जाना। देश में विभिन्न समुदायों में तमाम तनावों और असहज हालातों के बीच राजेश कुमार का नाटक ‘गांधी ने कहा था’ हमेशा प्रासंगिक रहेगा । जनवादी नाटककार राजेश कुमार नुक्कड़ नाटक आंदोलन के शुरुआती दौर से सक्रिय है। कथा सांप्रदायिकता की आईने में ‘संतान’ खो चुके तार्केश्वर एवं माता-पिता खो चुके आफ़ताब को एक सुत्र में पिरोने का सुंदरतम उदाहरण है । राजेश कुमार का नाटक ‘ गांधी ने कहा था’ हमसे गांधीवादी विचारों पर गंभीरता से मंथन करने की अपील करता है । सांप्रदायिकता की रोकथाम एवम परस्पर सदभाव स्थापित करने में बापू के विचार बहुत कारगर हैं।

‘गांधी ने कहा था’ 

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एस तौहीद शहबाज़

साम्प्रदायिकता का ख़बर बन जाना ख़तरनाक नहीं है, ख़तरनाक है ख़बरों का साम्प्रदायिक बन जाना। देश में विभिन्न समुदायों में तमाम तनावों और असहज हालातों के बीच राजेश कुमार का नाटक ‘गांधी ने कहा था’ हमेशा प्रासंगिक रहेगा । जनवादी नाटककार राजेश कुमार नुक्कड़ नाटक आंदोलन के शुरुआती दौर से सक्रिय है। अब तक दर्जनों नाटक एवं नुक्कड़ नाट्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अस्मिता एवम देश की अनेक नाट्य मंडलियों द्वारा ‘गांधी ने कहा था’ कई सफल मंचन हुए हैं।

कहानी आज़ादी के पहले समयकाल की है . देश में हो रहे सांप्रदायिक दंगों से गांधी जी दुखी हैं, इसे रोकने के लिए वह नागरिकों को समझा रहे हैं। वह फ़िलहाल नोआखली की एक मुस्लिम बस्ती में ठहरे हुए हैं । गांधी जी के बारे में सुनकर कई लोग उनसे मिलने आ रहे हैं। इन घटना क्रम के बीच पुराने गांधी समर्थक ‘तार्केश्वर पांडे’ भी उनसे मिलने आते हैं, जिनका लड़का ‘सूरज’ भी दंगो में मारा गया है। गांधीवादी सिधांतों की सामूहिक अवहेलना से तार्केश्वर पीडित है, वह नहीं चाहते कि यह सांप्रदायिक महौल किसी और मासूम की जान ले । तार्केश्वर की व्यथा सुनकर बापू उसे एक मुस्लिम बालक को गोद लेने की सलाह देते हैं । उस समय वह एक मुस्लिम बालक को अपनाने का संकल्प लेता है । समुदायों के आपसी मतभेद को सदा के लिए दूर करने की सिर्फ़ यही दवा थी ।

natak 1 बापू की सलाह पर तार्केश्वर एक मुस्लिम बच्चे आफ़ताब को गोद ले लेते हैं। तार्केश्वर की पत्नी ‘सुमीत्रा’ रुढिवादी विचारों के प्रति विश्वास रखती है,अफ़ताब को लेकर वह पति से नाखुश है । किंतु अभी-अभी संतान खो चुकी ‘मां’ समय के साथ अफ़ताब को स्वीकार कर लेती है । तार्केश्वर ‘आफ़ताब’ का पालन-पोषण मुस्लिम रितियों के अनुसार करने का निर्णय लेते हैं। आफ़ताब सर्वधर्म समभाव अर्थात सभी धर्मों का सम्मान करने वाला युवक बनकर उभरता है। हालांकि रह-रह मुस्लिम समुदाय के प्रति उसकी गहरी संवेदना प्रकट होती है। वो मुस्लिम समाज के प्रति सामान्य पुर्वाग्रहों से वह बहुत दुखित है, व समुदाय की पीडा को समाप्त करने का संकल्प लेते हुए वह अतिवादी रास्तों को अपनाता है। आफ़ताब समझता है कि ‘अतिवादी’ मार्ग से ही मुसलमानों का दुख खत्म होगा, किंतु आतंक का मार्ग सदैव अंधकार की ओर ले जाता है । वह भवावेश में अतिवादी संगठन में शामिल होकर हिंसा का रास्ता अपनाता है, जोकि पिता तार्केश्वर से मिले सत्य -अहिंसा समान महान गांधीवादी मुल्यों की अवहेलना थी। आफ़ताब अनजाने में सांप्रदायिक दंगों का कारण बन जाता है। किन्तु यदि सुबह का भूला शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। आफ़ताब को बापू से मिली शिक्षा का अहसास होता है और वह अपनी तरह दंगों में किसी भी बच्चे को अनाथ न होने देने का संकल्प लेता है। साम्प्रदायिक
सदभाव को जीवन का लक्ष्य बनाता है।

natak 2 कथा के विचार और संवाद दोनों बहुत प्रभावी हैं और साम्प्रदायिक तनाव के बीच बार-बार बापू के विचारों की हत्या न करने की अपील करती है। साम्प्रदायिकता का ख़बर बन जाना ख़तरनाक नहीं है, ख़तरनाक है ख़बरों का साम्प्रदायिक बन जाना. साम्प्रदायिकता के संकट पर लिखा गया यह नाटक ‘महात्मा गांधी’ के व्यक्तित्व एवम उनकी शिक्षा का महत्व रेखांकित करता है । कथा सांप्रदायिकता की आईने में ‘संतान’ खो चुके तार्केश्वर एवं माता-पिता खो चुके आफ़ताब को एक सुत्र में पिरोने का सुंदरतम उदाहरण है । राजेश कुमार का नाटक ‘ गांधी ने कहा था’ हमसे गांधीवादी विचारों पर गंभीरता से मंथन करने की अपील करता है । सांप्रदायिकता की रोकथाम एवम परस्पर सदभाव स्थापित करने में बापू के विचार बहुत कारगर हैं।हमेशा रहेंगे। शांति एवं परस्पर सहयोग के बिना विकसित समाज की स्थापना नहीं की जा सकती।

एस. तौहीद शहबाज़ द्वारा लिखित

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नाम : एस. तौहीद शहबाज़
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सैयद एस. तौहीद जामिया मिल्लिया के मीडिया स्नातक हैं। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम  से लेखन की शुरुआत। सिनेमा व संस्कृति विशेषकर फिल्मों पर  लेखन।फ़िल्म समीक्षाओं में रुचि। सिनेमा पर दो ईबुक्स के लेखक। प्रतिश्रुति प्रकाशन द्वारा सिनेमा पर पुस्तक प्रकाशित passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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