बादल, एवं हवा…: ग़ज़ल (उपेन्द्र परवाज़)

उपेन्द्र परवाज़ 2 2018-11-18

कालिदास ने सिर्फ बादलों को दूत के रूप में लिखा | यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य के विभिन्न रूपों को मानव दूत के लिए प्रतीकात्मक प्रयोग कालिदास की रचना मेघदूतम से प्रेरित प्रतीत होता है, ‘उपेन्द्र परवाज़’ कालिदास की इसी कलात्मकता से प्रेरित होकर “क़ासिद” नामक एक पुस्तक लिखने का प्रयास कर रहे है | उसकी प्रथम दो रचनाएँ प्रस्तुत है |…. संपादक

बादल 

उपेन्द्र परवाज़

उपेन्द्र परवाज़

काली घटाओं के बादल, सन्देश पिया का लेता जा

ओ उड़ने वाले काले जल, सन्देश पिया का लेता जा |

जबसे मुझको वह छोड़ गया, जीवन धारा को मोड़ गया

सारे रिश्ते वह तोड़ गया, अब गणित वही है न जोड़ नया

कटता ही नहीं है अब इक पल, सन्देश पिया का लेता जा |

ओ उड़ने वाले काले जल, सन्देश पिया का लेता जा |

देना उसको पैगाम यही, अब उसके सिवा कोई नाम नहीं

कटती है सुबह पर शाम नहीं,  जैसे सूरज हो घाम नहीं

ये अश्क़ बह रहे है पल पल, सन्देश पिया का लेता जा |

ओ उड़ने वाले काले जल, सन्देश पिया का लेता जा |

ये अश्क़ बने सावन बादल, सब भीग रहे तन के आँचल

मन के ये हो गये ऐसे पल, स्वाती के बिना चातक व्याकुल

रोते – रोते न हो जाऊं पागल, सन्देश पिया का लेता जा |

ओ उड़ने वाले काले जल, सन्देश पिया का लेता जा |

हवा   

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ओ  जाके पवन उसको यह, कर दे तू इशारा

अब लौट के आ जा, उसे मेरे दिल ने पुकारा |

देना वो पोछ उसकी, आँखों के जो हो अश्क़

रातों को काटती होगी, वो गिन के सितारा |

मै अजनबी सहर, वह है चाँदनी सी रात

सहरा हूँ मै तपता, वह बारिश का नजारा |

मुझको समझ गैर, वो छूने न दिया हाथ

छूकर उसे कहना की, अब भी मुझे प्यारा |

मिलने लगे ये जो दिलों के सितम “परवाज़”

तू हो गया उसी का जो हो सका न तुम्हारा |

उपेन्द्र परवाज़ द्वारा लिखित

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परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

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अनीता 51 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

नोट-

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