गोजर: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

विजय शर्मा 6 2018-11-18

यूं तो कहानी बहुत पहले लिखी गई …. लेकिन आज पढ़ते हुए लगता है जैसे हम सब पूरा समाज असहाय गोजर (कांतर) बनता जा रहा है और ऊपर रखी अनचाही ईंट का वज़न लगातार बढ़ रहा है ……. ‘ विजय शर्मा’ की कहानी

गोजर 

विजय शर्मा

जून का महीना था। बाहर सूरज का गोला आकाश पर चढ़ा अगन बरसा रहा था। धरती तप रही थी। बारिश का दूर-दूर तक ठिकाना न था। कमरे के भीतर भी उमस भरी गर्मी और घुटन थी। कहीं चैन नहीं पड़ रहा था। कहीं आराम न था। बिस्तर जल रहा था। नीचे नंगे फ़र्श पर लेट कर भी छटपटाहट बरकरार थी। तभी छत की गर्मी से बिलबिलाता हुआ एक गोजर धरन के बीच से फ़र्श पर ठीक मेरी बगल में चू पड़ा। मैं सिहर कर सिमट गया। थप्प की आवाज सुनते ही उनकी नजर जमीन पर गिरे गोजर पर पड़ी। वे बड़ी फ़ुर्ती से उठे। लपक कर रसोईघर में गए। वहाँ से चिमटा उठा लाए। गोजर को चिमटे से पकड़ कर दरवाजा खोल कर छत पर गए। गोजर को धूप से जलती छत पर रख कर ईट से दबा दिया। वापस आ कर चुपचाप लेट गए। मानो कुछ हुआ ही न हो। मैं इस दृश्य को देख रहा था। ईट से दबा, गर्मी से छटपटाता गोजर सैंकड़ों  पैरों के होते हुए भी मजबूर था। चल नहीं सकता था, बच नहीं सकता था। अपनी जान नहीं बचा सकता था। भाग नहीं सकता था। वह छत की जमीन पर असह्य तपन से छटपटा रहा था। मैं देख रहा था। मैं देख रहा था ईट से दबा हुआ वह गोजर तड़फ़-तड़फ़ कर मौत के करीब सरकता जा रहा था।

आज यह कोई नहीं बात न थी। अक्सर गर्मियों में घर की छत तपने से धरन के बीच से गोजर टपकता था। और वे उसे चिमटे से पकड़ कर छत पर ले जा कर ईट से दबा देते, जहाँ पड़ा-पड़ा वह दम तोड़ देता। दिन हुआ तो ईट के बोझ और छत की आग से जल्द शांत हो जाता। रात हुई तो रात भर ईट से दबा रहता और सुबह होने पर सूरज के चढ़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे ठंडा होता। कभी-कभी सई साँझ को टपकता, तब तो शाम, रात, सुबह ईट से दबा रहता, छटपटाता रहता, सुन्न पड़ता जाता और अगली दोपहर को ही पूरा मर पाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि गोजर काफ़ी तगड़ा होता और उन्हें पूरी सही-सलामत ईट न मिल पाती। अद्धे-पौने ईट से ही वे उसे दबा देते। सतह समतल न होने के कारण वह गोजर पर सटीक न बैठती और नजर चूकते ही थोड़ी देर में गोजर गायब हो जाता। मगर ऐसा कभी-कभार ही हो पाता। ज्यादातर उनका ही पलड़ा भारी रहता।

इस सारी प्रक्रिया के दौरान मैं मूक भयभीत दर्शक बना रहता। न ही प्रतिरोध करता, न ही सहायक बनता। मैं चीखना चाहता था, रोकना चाहता था उन्हें, बचाना चाहता था गोजर को। उनके हाथ से चिमटा खींच कर फ़ेंक देना चाहता था। चिल्ला-चिल्ला कर कहना चाहता था उसे मत मारो। मत मारो। गोजर पर से ईट उठा कर उसे भगा देना चाहता था, उसे बचाना चाहता था। पर कुछ करता नहीं था, मुँह से बोल नहीं फ़ूटते थे। भय से भीतर-भीतर काँपता रहता था।

साभार google से

मेरे सारे शरीर में सिहरन हो रही थी। वह छूटने के लिए छटपटा रहा था, पर छूट नहीं पा रहा था। वह तड़फ़-तड़फ़ कर मर रहा था। पर यह क्या? यह क्या होने लगा? वह गोजर कब ईट के नीचे से निकल कर मेरे शरीर पर आ गया। और मेरे शरीर में समाने लगा। अरे यह क्या? मैं ही गोजर में बदलने लग रहा हूँ। मुझे ही छत की गर्मी जला रही है। मैं कब और कैसे छत पर पहुँच गया? मेरे ऊपर इतनी बड़ी ईट कब और कैसे आ गई। किसने रख दी मेरे ऊपर यह इतनी भारी-भरकम ईट? मैं गर्म तवे पर पड़ा हूँ। हिलना चाहता हूँ मगर हिल नहीं पाता हूँ, हिल नहीं सकता हूँ। निकल भागने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। सब उपाय बेकार हैं। हाथ-पैर सब जकड़े हुए हैं। मैं पूरी तरह ईट के नीचे दबा हुआ हूँ। ईट भारी और भारी होती जा रही है। बड़ी और बड़ी होती जा रही है। उसके नीचे दबे हुए मेरा दम घुटता जा रहा है। साँस रुकी जा रही है। छटपटाना चाहता हूँ, पर छटपटा भी नहीं सकता हूँ। हिल भी नहीं पा रहा हूँ। बोझ बढ़ता जा रहा है। चिल्लाना चाहता हूँ मगर गले से आवाज नहीं निकल रही है। हलक गर्मी और प्यास के मारे सूखा जा रहा है। मगर पानी कहाँ है? चारो ओर तेज झुलसाती हुई, आँखों को चुँधियाती हुई तेज धूप है। असह्य गर्मी है। ऊपर से बरसती आग और नीचे से जलती छत के बीच ईट से दबा मैं मर रहा हूँ। जबान ऐंठ रही है। आँखें बाहर निकली पड़ रही हैं। हलक सूख रहा है। गला घुट रहा है। दम निकल रहा है।

अरे! यह क्या सारे शरीर पर फ़फ़ोले उभरने लगे हैं। मानो चेचक निकल रही हो। सारा शरीर फ़फ़ोलों से भर गया है। फ़फ़ोले मवाद से भर गए हैं। पीब हिलने से हर फ़फ़ोले में सैंकड़ों सूइयाँ चुभ रही है, टीस हो रही है। उफ़! कितनी तकलीफ़, कितनी जलन हो रही है। शरीर से आग निकल रही है। आग के साथ-साथ शरीर से ये क्या निकल रहा है? अरे! मैं तो सच में गोजर बनता जा रहा हूँ। मेरे शरीर के दाएँ-बाएँ दोनों ओर सैंकड़ों पैर उगते आ रहे हैं। पैर लंबे और लंबे होते जा रहे हैं। पैर हिल रहे हैं मगर लय में नहीं, रिदम में नहीं। वे छटपटा रहे हैं, बेतरतीब छटपटा रहे हैं। पैरों की जकड़न मेरे शरीर पर बढ़ती जा रही है। मेरा शरीर अमीबा की तरह बँटता जा रहा है, हर हिस्सा एक और गोजर बन रहा है। चारो ओर बस गोजर-ही-गोजर हैं। अब तो हिलना-डुलना भी संभव नहीं है। पैर हिलाना चाहता हूँ पर एक भी पैर नहीं हिलता है। अब सिर्फ़ जकड़न है। छटपटाहट बेबसी में बदलती जा रही है। घुटन बढ़ रही है। लग रहा है कोई दोनों हाथों से मेरा गला दबा रहा है। मैं चीखना चाहता हूँ पर मुझ पर बोझ इतना है कि चीख नहीं निकलती है। मेरे गले से आवाज नहीं निकल रही है। चीख घों-घों बन कर रह गई है। हाथ-पाँव सब बेजान हो गए हैं। बस गले से घुटी-घुटी-सी आवाज निकल रही है।

पत्नी ने झकझोर कर उठा दिया। पहले कुछ समझ में नहीं आया कि कहाँ हूँ, क्या हो रहा है। गला अभी भी दबा हुआ है। हलक सूखा है, साँस धौकनी-सी चल रही है। पूरा शरीर काँप रहा है। पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ है। “कितनी बार कहा है, सीने पर हाथ रख अक्र मत सोया करो।” पत्नी ने कहा और अँधेरे में टटोल कर ढक्कन हटा कर पानी का गिलास मेरे हाथ में थमा दिया। “लो पानी पीयो, लगता है कोई बुरा सपना देख रहे थे। गले से घों-घों की आवाज आ रही थी।” मैं अभी भी स्थिर नहीं हो पाया था। पानी पी कर मैंने गिलास बगल की मेज पर रख दिया। पत्नी अब तक लेट चुकी थी। मैं भी लेट गया। अभी भी मेरा दिमाग पूरी तरह काम नहीं कर रहा था।

मेरे बालों में अँगुली फ़ेरती हुई पत्नी बोली, “करवट ले कर सो जाओ। दिन भर न जाने क्या-क्या उलटा-पुलटा सोचते रहते हो तभी बुरे सपने आते हैं।” पत्नी मेरी बेबसी, मेरी लाचारी, मेरा भय, मेरी सिहरन कभी पूरी तरह नहीं समझ पाएगी। मैं उसे समझा भी नहीं सकता हूँ। क्या हम किसी को अपनी पूरी बात कभी समझा पाते हैं? समझा सकते हैं? थोड़ी देर में पत्नी सो गई। खर्राटे भरने लगी। मगर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी। मेरी आँखों में गोजर भरे हुए थे। मैं लेटे-लेटे सोचने लगा, शरीर पर ये फ़फ़ोले उगना, गोजर की तरह शरीर से सैंकड़ों पैर निकलना, ईट से दबे हुए जलती छत पर पड़े रहना, घुटना, तपन से छटपटाते हुए मौत की ओर धीरे-धीरे सरकना, क्या यह सब दिन भर की उलटी-सीधी बातें सोचने का नतीजा है? दिन में तो शायद इस भय, इस सिहरन, इस जकड़न से मैंने पीछा छुड़ा लिया है। मगर अभी भी बचपन में रोज-रोज की देखी वह क्रूरता, वह बेरहमी, वह छ्टपटाहट रात में मेरा पीछा करती है। उस क्रूरता के निशान मेरी आत्मा पर फ़फ़ोले बन कर पड़ गए हैं, जो रात को निकल आते हैं। रात को ईट से दबा, जलती-तपती छत पर मौत की ओर धीरे-धीरे सरकता गोजर मेरे सीने पर पुन: जिंदा हो जाता है। क्या इस जनम में अपने शरीर पर रेंगते इस गोजर से मुझे छुटकारा मिलेगा? अब तो मेरा सारा शरीर ही गोजर बनने लगा है। धीरे-धीरे में भी आँख लग गई।

चिमटे से पूँछ दबा गोजर छत की मुरेड़ से उलटा लटका था। मैं फ़िर बेबस था, सिहर रहा था।

विजय शर्मा द्वारा लिखित

विजय शर्मा बायोग्राफी !

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परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

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अनीता 52 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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