वारिस: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

कथा-कहानी कहानी

विजय शर्मा 129 2018-11-18

“एक बार के हुए दंगों ने जब उन्हें जड़ से उखाड़ दिया तो वे आकर इस मोहल्ले में बस गए। दंगों में उन्हीं जैसे गरीब लोगों का नुकसान हुआ था। उन्हीं जैसे गरीब लोगों के घर में आग लगी थी। उन्हीं जैसे गरीब लोग मारे गए थे। उनके जैसे लोग अपनी जमीन से उखड़े थे। उनकी बीवी उन्हीं दंगों में यतीम हुई थी। उसके अब्बा को किसी ने छुरा मार दिया था। किसी गैर धर्म वाले ने उन्हें नहीं मारा था। जब हिन्दू-मुसलमान के बीच दंगा हो रहा था तब किसी ने उन्हें छुरा मार दिया। रहमत ने देख लिया था, वे उसे जानते थे और उन्होंने उस बदमाश को दौड़ाया भी था। पर उसके हाथ में छुरा था। डर कर ज्यादा पीछा नहीं किया। वह अँधेरे में भाग निकला। वह कोई और नहीं सकीना का अपना रिश्तेदार था। दंगे की ओट में उसने अपनी पुरानी दुश्मनी निकाली थी।” ‘प्रो० विजय शर्मा’ की बेहद असरदार कहानी …….

वारिस 

विजय शर्मा

विजय शर्मा

मूनलाइट टेलर मास्टर रहमत मियाँ की दिली ख्वाहिश थी कि अल्लाह ताला उन्हें एक बेटा बख्शता। जिसे पढ़ा-लिखा कर वे आदमी बनाते। खुद तो पढ़-लिख न सके। अक्सर वे सोचते रहते, काश! उनका भी एक वारिस होता ताकि उनका खानदान आगे चलता रहता। खानदान का नाम चलता रहता। दिली तमन्ना थी कि बेटा होता और वह खानदान का नाम भी रौशन करता। सारी जिंदगी यूँ ही कट गई। खुदा से दुआ करते रहे पर उसने इनकी एक न सुनी। उनकी यह चाहत धीरे=धीरे बुझती गई और अंत में मरने के कगार पर आ गई। अब उन्होंने हालात से समझौता कर लिया था। उन्होंने इस बात को मान लिया था कि उनकी कब्र पर दीया जलाने वाला कोई न होगा। चलो ऐसा ही। खुदा ने नहीं दिया बेटा तो खुदा से लड़ा तो नहीं जा सकता है। उसकी मर्जी जैसे चाहे रखे। जिसे चाहे बेटा दे, जिसे न चाहे न दे। एक दिन ऐसा भी आया जब उनकी बीवी तपेदिक की बीमारी से घुल-घुल कर मर गई। उन्हें अफ़सोस रहा कि बेचारी ने जिंदगी में कोई सुख न देखा। इलाज भी न करा सके। पैसे न जुटने थे, न जुटे।

ऐसा भी न था कि रहमत मियाँ बेऔलाद थे। अल्लाह ताला ने रहमत मियाँ पर रहमत की थी। उन्हें एक औलाद दी थी। पर इस औलाद का वे क्या करें। इससे उनका खानदान न चलेगा। खानदान का नाम न चलेगा। खानदान की तो दूर इससे उनकी दुकान भी न चलेगी। उनकी एक बेटी थी। देखने-सुनने में ठीक-ठाक। उन्होंने उसे पढ़ाया भी पर कभी अच्छे नम्बर न ला सकी। अच्छे नम्बर आते हैं पढ़ने से। दिन-रात किताब में सिर घुसाए रहती है। पर अच्छे नम्बर लाती कैसे, स्कूल की पढ़ाई करे तब न। दिन-रात अफ़सानों की किताब पढ़ती रहती है। सफ़े-के-सफ़े अपनी कॉपी में नकल करती रहती है। शायरी की किताब से अपनी कॉपी में शेर उतारती रहती है। किताब में सर घुसाए रहती है मगर सलीके की किताबें कभी नहीं पढ़ती है। उसे बस किस्से-कहानियाँ अच्छी लगती हैं। नतीजा वही हुआ जो होना चाहिए। दसवीं फ़ेल कर गई। बेकार की किताबें पढ़ती रहती है। कितनी बार कहा, मत पढ़ा करो, ये बेकार की किताबें। आँखें खराब हो जाएँगी, पर सुनती नहीं है। दसवीं फ़ेल हो गई और जब कहा गया कि दोबारा इम्तहान में बैठे तो साफ़ मना कर दिया। कहती है और स्कूल नहीं जाएगी। जाने कहाँ से किस-किस से माँग-मूँग कर किस्सों की किताबें ले आती है और नहीं तो पुरानी किताबें ही फ़िर-फ़िर पढ़ती रहती है।

पहले वे कभी-कदा उसे डाँटते-फ़टकारते भी थे मगर आजकल उसकी पढ़ने की ललक देख कर वे सोचने लगे हैं कि चलो पढ़ने का ही तो शौक है। दूसरी लड़कियों की तरह तो नहीं है। उसकी उमर की मोहल्ले की कई लड़कियाँ तो बस बनने-सँवरने-सजने में सारा-सारा दिन लगी रहती हैं। ज़ेबा को तो पहनने-ओढ़ने, सजने-सँवरने का कोई शौक ही नहीं है। बड़ी लापरवाह है इन मामलों में उनकी बेटी। वैसे वे यह भी जानते हैं कि नंगी क्या धोएगी और क्या निचोड़ेगी। कितनी जोड़ी मिलती है उसे साल भर में। आजकल रहमत मियाँ को कुछ ज्यादा ही लाड़-प्यार आता है अपनी बेटी पर। भले ही उसका दिखावा न करते हों, दिखाते न हों। उनकी तरह के लोग प्यार करते हैं, दिखावा नहीं करते हैं। कर ही नहीं सकते हैं। आजकल उन्हें ज़ेबा की शादी की फ़िकिर लगी रहती है। बड़ी हो गई है उनकी बेटी ज़ेबा।

वे जब बच्चों को खासकर लड़कों को स्कूल जाता देखते, उनका मन मसोस उठता। उनके मोहल्ले में वैसे बहुत कम बच्चे स्कूल जाते थे। मस्जिद में क्लास लगती थी। उसमें लड़के पढ़ने जाते थे। लड़कियों के स्कूल जाने का रिवाज न था। हाँ, जुबेदा बीबी के यहाँ कुरान शरीफ़ पढ़ने कुछ लड़कियाँ जरूर जाती थी। मगर रहमत मियाँ ने गजब का काम किया था, उन्होंने अपनी बेटी को स्कूल भेजा था। वह स्कूल की पढ़ाई में आगे न आ सकी यह दीगर बात है।

रहमत मियाँ खुद पढ़ना-लिखना नहीं सीख सके। बस कामचलाऊ उर्दू आती थी। उसी से ग्राहकों के नाप नोट करते, नाप पढ़ कर उसी नाप के कपड़े काटते और सिलते। हाथ में हुनर था। लोगों को उनके सिले कपड़े फ़िट बैठते, पसंद आते। तुरपन इतनी सटीक-सुंदर करते मानो मशीन ने एक नाप की दूरी पर टाँके लगाए हों। लोग उनसे कपड़े सिलवाना पसंद करते। मगर कितने लोग उनसे कपड़े सिलवाते? वही गिने-चुने, बँधे-बँधाए ग्राहक थे उनके। उन्हीं के तबके के। साल में एक या दो जोड़ी कपड़े सिलवाने वाले।

एक बार के हुए दंगों ने जब उन्हें जड़ से उखाड़ दिया तो वे आकर इस मोहल्ले में बस गए। दंगों में उन्हीं जैसे गरीब लोगों का नुकसान हुआ था। उन्हीं जैसे गरीब लोगों के घर में आग लगी थी। उन्हीं जैसे गरीब लोग मारे गए थे। उनके जैसे लोग अपनी जमीन से उखड़े थे। उनकी बीवी उन्हीं दंगों में यतीम हुई थी। उसके अब्बा को किसी ने छुरा मार दिया था। किसी गैर धर्म वाले ने उन्हें नहीं मारा था। जब हिन्दू-मुसलमान के बीच दंगा हो रहा था तब किसी ने उन्हें छुरा मार दिया। रहमत ने देख लिया था, वे उसे जानते थे और उन्होंने उस बदमाश को दौड़ाया भी था। पर उसके हाथ में छुरा था। डर कर ज्यादा पीछा नहीं किया। वह अँधेरे में भाग निकला। वह कोई और नहीं सकीना का अपना रिश्तेदार था। दंगे की ओट में उसने अपनी पुरानी दुश्मनी निकाली थी। किसी ने रहमत की बात का यकीन न किया। सबका कहना था कि वह जरूर कोई काफ़िर रहा होगा, जो भेष बदल कर आया होगा। और वे लोग दूसरे मोहल्ले पर हमले की योजना बनाने लगे। केवल सकीना की अम्मी को रहमत की बात का यकीन था। उस समय सकीना काफ़ी छोटी थी। बस तेरह साल की। रहमत उससे काफ़ी बड़े थे। सकीना काफ़ी छोटी उमर की थी पर दोनों में खूब पटती थी। सकीना के बाप की हत्या के बाद रहमत उन माँ-बेटी के साथ यहाँ आ बसे। सकीना की अम्मा ने सकीना से उनका निकाह करवा दिया। रहमत मियाँ सकीना और उसकी अम्मी की देखभाल करते, वे दोनों उनकी देखभाल करतीं। उन्होंने सिलाई मशीन खरीद ली और लोगों के कपड़े सिलने लगे।

सकीना की अम्मी तीन साल बाद चल बसी। इस बीच जेबा का जनम हो चुका था। रहमत मियाँ की बेटे की ख्वाहिश पूरी न कर पाने के गम में सकीना घुलने लगी और एक दिन पता चला कि उसे तपेदिक हो गई है। काफ़ी दिन छिपाती रही पर तपेदिक भी भला कहीं छिपाए छिपता है। बुखार छिपा ले जाती, बदन टूटता रहता उसकी खबर किसी को न होने देती, पर खाँसी, खाँसी कैसे छिपाती? उन दिनों आज की तरह इसका इलाज न था, यह लाइलाज बीमारी थी। यह गरीब-अमीर सबको को दबोचे हुए थी। नेहरू जी की पत्नी इससे न बच सकी। वो अमीर थे पत्नी को दूर पहाड़ों में रख दिया। फ़िर भी कहाँ बची। फ़िर भला रहमत मियाँ जैसों का टी.बी. पर क्या वश चलता? सकीना खून थूकते-थूकते मर गई और रहमत मियाँ चाह कर भी कुछ न कर सके।

घर के कामकाज, अपनी बीमारी के चलते सकीना बेटी पर ध्यान न दे पाती थी। बेटी को खुद से दूर भी रखती थी। उसे डर था कही उसे यह बीमारी न लग जाए। बड़ी जानलेवा बीमारी है यह। खुदा दुश्मन को भी न दे यह रोग। बेटी को क्या पता अम्मी उसे खुद से दूर क्यों रखती है। गोद में ले कर प्यार नहीं करती। उसे अम्मी का यह व्यवहार अच्छा न लगता। सो थोड़ी बड़ी हुई तो किताबों की ओर मुड़ गई।

ऐसा नहीं रहमत मियाँ बेटी को प्यार न करते हों। बीवी मरने के बाद और ज्यादा प्यार उनके दिल में बेटी के लिए उमड़ता पर दिखाएँ कैसे? वे बेटी को बहुत प्यार करते थे पर बेटा न होने की कसक बनी रही। उनके दिल में बार-बार हूक उठती, काश! उनके भी एक बेटा होता। बेटी को पढ़ते देखते तो बेटा न होने की कसक और सालती। बेटी बड़ी हो रही थी। उन्हें फ़िकिर थी कि इसके लिए ढंग का लड़का कहाँ से लाएँ।

मूनलाइट टेलरिंग शॉप घर के साथ लगी थी। घर में दुकान थी या ऐसे भी कह सकते हैं कि दुकान में घर था। एक कमरे के घर को घर और दुकान दोनों माना जाए या नहीं। मालूम नहीं। उसी कमरे में रहमत मियाँ का सब कुछ था। कमरे के आगे के हिस्से में एक सिलाई मशीन, एक स्टूल और एक बेंच उनकी दुकान थी। कमरे के पीछे के हिस्से में गिने-चुने बरतन, एक झूलती खाट, रस्सी पर टँगे कुछ कपड़े, पानी का मटका। यह उस घर का सामान था। टाट का एक परदा घर और दुकान को अलग करता था।

इधर बीवी के गुजरने के बाद से रहमत मियाँ को एक हेल्पर की जरूरत महसूस होने लगी थी। जब तक सकीना बीबी थी, तुरपन, काज-बटन करती रहती थी और रहमत मियाँ का काम चल जाता था। पर अब उसके न रहने से इन कामों में दिक्कत आने लगी थी। सो अब वे एक हेल्पर की तलाश में थे। बेटी ने कभी यह काम न किया था और न वे उससे कहना-करवाना चाहते थे। यही गनीमत थी कि खाना बना देती थी और बस अपने किस्सों-कहानियों में डूबी रहती थी। किस्मत से जल्दी ही उनकी हेल्पर की मुराद पूरी हो गई। अंधा क्या चाहे? दे आँखें। और उन्हें दो आँखें, दो हाथ और दो सही-सलामत पैर वाला एक हेल्पर मिल गया। हाँ, इस हेल्पर का दिमाग थोड़ा चढ़ा हुआ था। उसे बात बहुत जल्दी लग जाती थी और वह किसी की बात सहन करने को राजी न था। बड़ा मनमौजी और स्वभाव का थोड़ा अक्खड़ था। वैसे बातचीत और व्यवहार में अक्खड़पन कहीं, कभी दीखता न था। यह अक्खड़पन उसके भीतर था। शायद गरीब का आत्मसम्मान ऐसा ही होता है।

इस बीच दंगे फ़िर भड़के पर रहमत मियाँ का शहर इस बार बचा रहा। जाने कैसे दंगों की चपेट में न आया। पूरा समय दहशत का था। आग कभी भी लग सकती थी। आशंका बनी हुई थी। इसी के कुछ दिन बाद एक दिन एक आदमी काम माँगता उनके पास आया। पहले रहमत मियाँ तैयार न थे क्योंकि उस आदमी ने पहले कभी दर्जीगिरी न की थी। उसे यह काम न आता था। उसने रहमत मियाँ से मिन्नत की और कहा कि वह जल्दी काम सीख लेगा। रहमत मियाँ को रहम आ गया पर वे ठहरे दुनियादार आदमी। उन्होंने उसे साफ़-साफ़ समझा दिया, “जब तक काम सीखोगे, हम तुम्हें पैसे न देंगे। हाँ, तुम निवाला हमारे संग तोड़ सकते हो।” रहमत मियाँ उसे टालने की गरज से यह कह रहे थे। उन्हें मालूम था कौन सिरफ़िरा इस शर्त पर काम करेगा? पर वह राजी हो गया। रहमत मियाँ को आश्चर्य हुआ, साथ ही राहत मिली।

इस तरह करीम मूनलाइट टेलरिंग शॉप में काम करने लगा। आदमी जहीन था। पंद्रह दिन में उसने काज, बटन और तुरपन का सारा काम सीख लिया। और महीने भर में मशीन पर फ़र्राटे से कपड़े सीने लगा। मगर कपड़ा काटने का काम रहमत मियाँ उसके सामने न करते। वे उसे यह गुर न सिखाना चाहते थे। उन्हें डर था कहीं यह अपनी दुकान न खोल कर बैठ जाए और उन्हें हाथ-पर-हाथ धर कर बैठना पड़े। उन्होंने अक्सर यही देखा था शागिर्द उस्ताद बन बैठता है और उस्ताद की छुट्टी कर देता है। सो, वे कपड़ा काटने का गुर गुप्त रखना चाहते थे। रात को उसके जाने के बाद कपड़ा काटते।

करीम के हाथ में सफ़ाई और फ़ुर्ती थी। सबसे बड़ी बात वह बकवास नहीं करता था। चुपचाप अपने काम-से-काम रखता था। रहमत मियाँ कुछ पूछते तो कम-से-कम शब्दों में जवाब देता। सुबह दस बजे काम पर आ जाता और गई शाम तक काम में लगा रहता। उसे बीड़ी-सिगरेट की लत न थी। चाय पीने भी न जाता। उसी मोहल्ले में उसने एक खोली ले ली थी और रहमत मियाँ का काम मन लगा कर करता। शुरु में कुछ दिन उन्हीं के साथ रोटी खाई पर जल्द ही अपना कुछ और इंतजाम कर लिया। उसने अपने खाने का इंतजाम एक ढ़ाबे पर कर लिया था।

रहमत मियाँ दुनियादार आदमी थे। गरीबी ने उन्हें बहुत कुछ सिखा दिया था। पर वे संगदिल या बेहरम न थे। किसी का हिस्सा मारने की बात उनके मन में कभी न आई। दो महीना बीतते-न-बीतते उन्हें लगने लगा कि इतनी मेहनत करता है करीम, उसे उसकी वाजिब मजदूरी मिलनी चाहिए। मुफ़्त का काम कराने के हक में वे न थे। वे उसे कुछ मजदूरी देने लगे। भला कितना दे सकते थे, दिल में धुकपुकी लगी रहती। इतने कम पैसों में कोई कब तक काम करेगा। उन्हें हरदम लगता रहता कि करीम कभी भी उनका काम छोड़ कर कहीं और कोई और काम पकड़ लेगा। या फ़िर अपनी दुकान डाल लेगा। लेकिन करीम ने ऐसा कुछ नहीं किया। कुछ दिन बाद वे उसे ले कर निश्चिंत रहने लगे, उस पर निर्भर रहने लगे। वे खुदा के शुक्रगुजार थे। उसने उन्हें करीम की सूरत में एक बड़ी नियामत दी थी।

जेबा खाना बनाती और अपनी दुनिया में डूबी रहती। बासी अखबार को भी कई-कई बार उलटती-पुलटती रहती। मुहल्ले में कहने को एक लाइब्रेरी थी मगर किताब के नाम पर उसमें कुछ खास न था। करीम वहाँ से किताब लाने लगा। करीम एक दिन किताब लिए हुए दुकान में आ गया। किताब देख कर ज़ेबा खुद को जब्त न कर सकी। उसने करीम से पूछा,

“हम ये किताब देख लें?”

“हाँ, पढ़ लो। हम पढ़ चुके हैं। आज लौटानी थी इसीलिए ले आए थे।”

थोड़ी देर में यह सोच कर कि करीम को आज किताब लौटानी है, ज़ेबा ने किताब उसे वापिस कर दी। ज़ेबा ने जब किताब वापस दी तो करीम ने पूछा,

“अरे! इतनी जल्दी पढ़ ली?” उसकी आवाज में थोड़ा तंज था।

“इतनी जल्दी कोई कैसे पढ़ सकता है?” उसने आगे जोड़ा, “मगर तुमको आज वापिस करनी है न?”

“नहीं तुम पढ़ लो, अभी इसे लौटाने की तारीख नहीं आई है” उसने आगे कहा, “मैंने पढ़ ली थी। इसी से इसे लौटा कर दूसरी किताब लाने की सोच रहा था।“”

“तो तुम दूसरी कैसे लोआगे?”

“बाद में ले आऊँगा। मेरे पास और बहुत हैं।”

“तुम्हारे पास किताबें हैं?” ज़ेबा की आवाज में खुशी-खनक और आश्चर्य का मिला-जुला भाव था।

तभी रहमत मियाँ आ गए और बात बंद हो गई। ज़ेबा किताब ले कर भीतर चली गई।

जब करीम ने देखा कि ज़ेबा किताब पढ़ती है तो वह जब-तब किताबें ला कर उसे देने लगा। ज़ेबा को किताबों की आमद का एक अच्छा जरिया मिल गया। दोनों में एक मूक समझौता हो गया। करीम किताब ला देता, ज़ेबा पढ़ कर सप्ताह-दस दिन में वापिस कर देती। लेकिन यह किताब व्यवहार रहमत मियाँ की आँख की ओट में हो रहा था।

रहमत मियाँ को टुकड़ों-टुकड़ों में पता चला कि दंगों में करीम की बीवी, जो पेट से थी, मारी गई थी। इसीलिए उसने अपना शहर छोड़ दिया था। जिस शहर ने उसकी बीवी और होने वाला बच्चा मार डाला, वह उसमें कैसे रहता? वह वहाँ न रह सका। अब वह नए सिरे से जिंदगी समेटने की कोशिश कर रहा था। खाना बनाते हुए ये सब बातें ज़ेबा के कान में भी पड़ती रहतीं।

एक दिन मौलवी साहेब मूनलाइट टेलरिंग शॉप में तशरीफ़ आए। आते ही दुआ-सलाम के तुरंत बाद शुरु हो गए, “रहमत तुम्हरी बीवी बड़ी नेक दिल थी। अल्लाह उसे जन्नत बख्शे। अब वह नहीं है, रहमत मियाँ तुम्हें बेटी की डोली उठाने की फ़िक्र करनी चाहिए। कब तलक बैठाए रखोगे जवान बेटी को घर पर।” आगे यह भी जोड़ दिया, “जमाना बड़ा खराब है, कोई ऊँच-नीच हो गई तो ऊपर जा कर बीवी को क्या मुँह दिखाओगे? अल्लाह ताला को क्या जवाब दोगे?”

असल बात यह थी कि मौलवी साहेब ज़ेबा के लिए एक रिश्ता ले कर आए थे। लड़का इकलौता था और घर खाता-पीता। जब मौलवी साहेब रहमत मियाँ से बातें कर रहे थे करीम पास बैठा तुरपन कर रहा था। उसकी आँखों के सामने धुंध छा गई। उसे सूझना बंद हो गया। बेध्यानी में सूई उसकी अँगुली में खुब गई। भल्ल से खून निकल पड़ा। उसने अँगुली मुँह में दबाई और दुकान से उठ गया। उसे लगा उसका कलेजा किसी ने जकड़ लिया है। उसका दम घुटने लगा। वह दुकान से उठ कर पास के तालाब पर जा बैठा। काफ़ी देर बैठा रहा फ़िर अपनी खोली में चला आया। पूरे दिन छटपटाता रहा। उससे उस दिन कुछ खाया-पीया न गया। कई बार दिल में आया कि रहमत मियाँ के पास जाए और उनसे साफ़-साफ़ बात कर ले। उन्हें सब बता दे। मगर कहेगा क्या उनसे? कैसे उनकी बेटी का रिश्ता माँगेगा? वे भला क्यों राजी होंगे? और क्या ज़ेबा राजी हो जाएगी? उसने तो कभी ढ़ंग से दो बात भी नहीं की है करीम से। कहीं वह ना कर दे तो करीम के लिए यह डूब मरने वाली बात होगी। और रहमत मियाँ भला क्यों एक रँडुए को अपनी बेटी देने लगे? वह भी इकलौती बेटी। इसी उधेड़-बुन में वह पड़ा रहा।

जब रहमत मियाँ ने खुद इस बाबत नहीं सोचा तो वह कैसे कहे? उन्हें इसका ख्याल न आया तो वह कैसे क्या कहे? क्या वे उसके कहने से मान जाएँगे? एक बार मन में आया ज़ेबा से ही बात करे। पर उसे वह कहेगा क्या? उसने उससे कभी इस तरह की कोई बात नहीं की है। कैसे कहेगा उससे वह यह बात? कैसे कहेगा कि वह उससे शादी करना चाहता है। क्या वह उसके दिल की बात जान कर मान जाएगी? क्या वह उसके दिल की बात जानती है? एक बात उसे और रोक रही थी। वह ज़ेबा से उम्र में बड़ा था। दोनों की उम्र में आठ-नौ साल का फ़ासला था। वैसे यह कोई बहुत बड़ा फ़ासला न था। मौहल्ले में ऐसी बातें आग की तरह फ़ैलती हैं। सुबह चाय की दुकान पर उसे भी पता चल गया कि मौलवी साहेब ज़ेबा के लिए जो रिश्ता ला रहे हैं, वहाँ उम्र का यह फ़ासला ईकाई में नहीं दहाई में है। वह भी कहाइयों में। जबकि वह तो ज़ेबा से खाली कुछ साल बड़ा था।

क्या रहमत मियाँ को उम्र वाली यह बात मालूम नहीं है? क्या वे ज़ेबा को एक बूढ़े के पल्ले बाँध देंगे? शायद बाँध दें। पैसे में बड़ी ताकत होती है। और यह आदमी पैसे वाला है इसमें कोई शक नहीं। पैसा शादी-ब्याह के मामले में कई ऐसे ऐब ढ़ंक लेता है। घी का लड्डू टेढ़ा भी हो तो कोई शिकायत नहीं करता है। वैसे भी दूल्हे से ज्यादा उसकी जायदाद देखी जाती है। तमाम बातें करीम के दिमाग में घूँम रही थीं। और वह अगले दिन भी काम पर न जा पाया। हाँ, मोहल्ला छोड़ कर, शहर छोड़ कर, कहीं दूर चले जाने की बात उसके मन में बार-बार चक्कर काटने लगी।

करीम को यह भी लगता कि वह अपनी बीवी सलमा के प्रति बेवफ़ाई कर रहा है। उसे मरे अभी दो साल भी नहीं हुए हैं। जब दंगाइयों ने उसे मारा था, उनका पहला बच्चा उसके पेट में था। कितनी खुश थी वह अपने होने वाले बच्चे को ले कर। कितना खुश था वह अपने होने वाले पहले बच्चे को ले कर। कितना खुश थे वे दोनों अपने होने वाले पहले बच्चे को ले कर। मगर क्या हुआ? सब एक लम्हें में खतम हो गया। बीवी खतम हो गई और उसके साथ उसके पेट में पल रहा उनका पहला बच्चा भी। वह रोया नहीं था। काठ हो गया था। उसे जिंदगी बोझ लगने लगी थी। वह मर जाना चाहता था। मगर चाहने से कोई नहीं मरता है। वह चाह कर भी मरा नहीं। खुदकुशी की बात सोचते वह काँप जाता। उसे मालूम था खुदखुशी गुनाह है। फ़िर भी खुदखुशी का ख्याल उसे बराबर आता रहता। समय के साथ घाव भरने लगे। सलमा की याद धुंधली पड़ने लगी। निशान था, घाव भर रहा था।

आजकल उसे खुदखुशी का ख्याल नहीं आता है। उसे खुद मालूम नहीं कब सलमा की जगह ज़ेबा आ बैठी। अगर मौलवी साहेब न आते, वे ज़ेबा की शादी की बात न चलाते तो शायद उसे अपने दिल की बात पता न चलती। पता चलती तो न जाने कब। अब वह मरना नहीं जीना चाहता था। लेकिन आज फ़िर उसे लगा कि मर जाए। ऐसे जीने से मर जाना बेहतर है।

रहमत मियाँ ने सोचा करीम एक-दो दिन में आ जाएगा। जब अगले दिन भी वह न आया तो उन्हें लगा कि वह बीमार है। वे उसे देखने उसकी खोली पर गए। यह पहली मर्तबा हुआ था जब वे करीम की खोली में गए थे। करीम दीवाल का सहारा लिए, हाथ में एक किताब लिए बैठा था। हाथ में किताब थी पर वह पढ़ नहीं रहा था। किताब खुली थी पर वह किताब देख नहीं रहा था। उसकी आँखें दूर कहीं खोई हुई थीं। उसका मुँह सूखा हुआ था। खोली का दरवाजा खुला हुआ था। रहमत मियाँ की आमद का पता करीम को न चला। जब उन्होंने पूछा, “सब खैरियत से तो है।” करीम चौंक गया। पर वह उठा नहीं, वैसे ही बैठा रहा। रहमत मियाँ ने देखा खोली में ईटों के ऊपर लकड़ी का एक पटरा रख कर उस पर बहुत सारी किताबें रखी हुई थीं। रहमत मियाँ को आश्चर्य हुआ। उन्हें नहीं मालूम था कि करीम को पढ़ने में इतनी दिलचस्पी है। उसे देख कर उनके मन में एक हूक-सी उठी। उन्हें अपने पैदा न हुए बेटे की कसक साल गई। न जाने क्यों उनकी आँखों में अपनी बेटी ज़ेबा की सूरत कौंध गई। वे करीम से इधर-उधर की बातें कार के उठ गए। यह भी न पूछ सके कि वह काम पर क्यों नहीं आ रहा है, या वह कब काम पर आएगा?

इधर ज़ेबा मन-ही-मन परेशान थी कि करीम आ क्यों नहीं रहा है। मगर पूछे तो किससे पूछे? आखीर में उसने अपने अब्बा से पूछ ही लिया, “अब्बा, करीम इधर कई दिनों से काम पर नहीं आ रहे हैं। क्या बात है?” रहमत मियाँ को खुद पता नहीं था, वे बेटी को क्या जवाब देते। भीरत कहीं उन्हें अपनी बिटिया की करीम के लिए की जा रही फ़िकिर भली लगी। पर मुँह से कुछ न बोले।

एक दिन मौलवी साहेब फ़िर धमक गए। इसी बीच रहमत मियाँ को खबर लग चुकी थी कि मौलवी साहेब जो रिश्ता ला रहे है, उसमें उनका अपना फ़ायदा है। जिस लड़के की बात वे कर रहे हैं, असल में वह लड़का है ही नहीं। वो तो मौलवी साहेब की उम्र का ही बूढ़ा है। वह उनका दूर का रिश्तेदार है। उस आदमी के जवान लड़के-लड़कियाँ है। थोड़ी बातचीत के बाद रहमत मियाँ ने मौलवी साहेब को कुरेदने के लिए पूछा, “आप ज़ेबा के लिए जिस लड़के की बात कर रहे हैं वह कितना पढ़ा-लिखा है?”

मौलवी साहेब लगे रहमत मियाँ को दुनिया की ऊँच-नीच समझाने, दीन-दुनिया की बात से वाकिफ़ कराने लगे। “भई लड़के की उम्र और पढ़ाई-लिखाई से क्या लेना-देना। वह ज़ेबा बिटिया को खूब सुखी रखेगा। अच्छा पहनाए-ओढ़एगा। खाने-पीने की कोई कमी न होगी।”

सारी बातचीत के वक्त रहमत मियाँ की आँखों के आगे किताब लिए बैठा करीम और उसकी सजी हुई किताबों की कतार घूँम रही थी। रहमत मियाँ बेवकूफ़ न थे। उन्होंने बाल धूप में सुफ़ेद नहीं किए थे। दुनिया देखी थी। मौलवी साहेब की मक्कारी उनसे छिपी न रह सकी। मगर साफ़ इंकार करते भी न बने। रहमत मियाँ ने मौलवी साहेब से कहा, “सोच कर एक-दो दिन में बताता हूँ।”

“इसमें सोचना कैसा? इससे अच्छी किस्मत ज़ेबा की कहाँ होगी।” लेकिन चेतावनी देते हुए आगे जोड़ा, “फ़िर भी अगर तुम सोचना चाहते हो तो सोच-विचार कर लो। मगर देर हो गई, लड़का हाथ से निकल गया तो मुझे मत कहना।”

“जेबा से भी पूछ लेता हूँ।”

यह सुन कर मौलवी साहेब हत्थे से उखड़ गए, “शादी-ब्याह मे मामले में लड़की से क्या पूछना? वह क्या कहेगी? जहाँ तुम रिश्ता कर दोगे वहीं चली जाएगी। हम-तुम उसके दुश्मन थोड़े न हैं।” मौलवी साहेब अपनी कडुआहट न रोक सके, “कहीं ऐसा तो नहीं उसने खुद कहीं रिश्ता कर लिया है?”

“बच्ची के बारे में ऐसी कैसी बातें कर रहे हैं, खाँ साहेब?” रहमत मियाँ परेशान हो गए। “बिन माँ कीहेबच्ची है मेरी ज़ेबा पर मेरी निगरानी में है और बहुत मासूम है।”

“तभी तो कहता हूँ जल्दी से हाथ पीले कर दो।” मौलवी साहेब मौके पर चोट करना जानते थे। “इतना अच्छा रिश्ता हाथ से निकल गया तो फ़िर हमें न कहना।” कहते हुए मौलवी साहेब चले गए। उन्हें पक्का यकीन था। उन्होंने दाना डाल दिया है अब चिढ़िया को फ़ँसना ही है, उड़ कर कहाँ जाएगी। इस शादी से उन्हें काफ़ी रकम हासिल होने वाली थी। उस रकम को खरचने के मंसूबे बाँधते मौलवी साहेब चले जा रहे थे। दूसरी ओर से छुट्टी के बाद लड़के स्कूल से लड़के निकल रहे थे।

अचानक रहमत मियाँ की आँखों में करीम की किताबों की कतार और हाथ में किताब लिए करीम घूम गया, साथ ही उन्हें किताब पढ़ती ज़ेबा दीखी।

रहमत मियाँ एक पक्का इरादा करके करीम की खोली की ओर चले जा रहे थे।

विजय शर्मा द्वारा लिखित

विजय शर्मा बायोग्राफी !

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मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 136 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 95 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 153 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 172 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 273 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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