तीसमार खाँ: कहानी (डा० विजय शर्मा)

कथा-कहानी कहानी

विजय शर्मा 67 2018-11-18

“अरे भई औरतों को काबू में रखना जरूरी है। बड़े घर की बेटियाँ बड़ी मगरूर होती हैं, उन्हें ठीक करना जरूरी है।” उन्होंने स्त्री संबंधी अपने विचारों का खुलासा किया। मैं कुछ कहूँ उसके पहले उन्होंने कहा, “आप हमे बताएँ कि हिन्दी में इस समय कौन अच्छी कहानियाँ लिख रहा है?” (प्रस्तुत कहानी से )

तीसमार खाँ

“हेलो, आप कैसे हैं?”
“मैं ठीक हूँ। आप कौन साहब बोल रहे हैं ? पहचान नहीं पा रहा हूँ।”
“अरे! पहचाना नहीं आपने ? भई आप बड़े लोग हो क्यों पहचानोगे। हमने आपको एसएमएस किया था। ईमेल भी भेजी थी। कूरियर भी जरूर मिला होगा। फ़िर भी आप कार्यक्रम में नहीं आए।” उन्होंने एक सांस में सब गिना डाला।
“अच्छा, अच्छा। आप खीरवालजी बोल रहे हैं। बधाई हो।” मुझे तीन दिन पहले मिले निमंत्रण की याद आई। किताब लोकार्पण का कार्यक्रम था। निमंत्रणपत्र में लिखा था देश के जाने-माने लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार…।
“जी कुछ जरूरी काम पड़ गया इसलिए नहीं आ सका। कैसा रहा कार्यक्रम।”
“अरे क्या बताएँ। बड़ा जबरदस्त था, आपने मिस किया। अपने मंत्री जी ने क्या तारीफ़ की किताब की। आप आते तो कार्यक्रम में चार चाँद लग जाते।”
जिस मंत्री को बुलाया था उसका साहित्य क्या, किसी भी तरह के लिखने-पढ़ने से कुछ लेना-देना नहीं था। कार्यक्रम के अगले दिन अखबार में लोकार्पण की तस्वीर और रपट छपी थी।
“हमने किताब आपको कूरियर कर दिया है, शायद आज मिल जाएगा।”
“जी धन्यवाद।”
“खाली धन्यवाद से काम नहीं चलेगा। आपको किताब पर लिखना है। आप सबकी किताब पर लिखतें हैं। हमारी पर क्यों नहीं लिखते। पहले भी दो किताबें आपको भेजी हैं। इस बार जरूर लिखिएगा।”
“देखिए कोई आया है। मैं आपसे बाद में बात करता हूँ। नमस्ते।” और मैंने फ़ोन काट दिया।
मुझे याद आया करीब छ: महीने पहले इन्होंने अपनी दो किताबों का एक साथ लोकार्पण करवाया था। तब भी कोई मंत्री आए थे। क्योंकि कविता पर मेरा काम नहीं है अत: ध्यान नहीं दिया था। मगर कुछ दिन पहले एक पिकनिक में देखा था। पिकनिक में कविता पाठ का प्रोग्राम था। संचालक ने लंबी चौड़ी भूमिका बाँधने के बाद इन सज्जन को कविता पाठ के लिए बुलाया था। कविता सुन कर माथा पीटने का मन कर रहा था। मैंने अपने बगल में बैठे एक संपादक से कहा, “इसे कविता कहते हैं?”
संपादक महोदय ने कहा, “ये वाली उतनी अच्छी नहीं थी, पर ये बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं। आपने पढ़ी हैं कि नहीं इनकी कविताएँ। जरूर पढ़िएगा।”
मुझे किसी से बाद में पता चला कि संपादक महोदय की पत्रिका के लिए कवि महोदय अच्छी-खासी राशि देते हैं। फ़िर भला कविताएँ अच्छी क्यों न होंगी। पिकनिक की समाप्ति के पहले संपादक महोदय ने कवि महोदय से उनकी कविताएँ इसरार करके पत्रिका में छापने के लिए माँग लीं थीं। पिकनिक में कवि ने एक बड़ी रकम चंदे में दी थी।
जल्द ही एक पत्रिका में खीरवालजी की किताब की समीक्षा देखी। समीक्षा में कविताओं को समाज और समय समीक्षा करने वाली कहा गया था और कवि को देश का महान कवि।
खीरवालजी हमारे शहर के एक बिजनेसमैन हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि बिजनेसमैन साहित्यकार नहीं हो सकता है। मगर साहित्यकार खुद अपनी किताब छपवाए और खुद उसके लोकार्पण का खर्च उठाए और फ़िर खुद ही उसे बाँटे, मुझे यह बात कुछ जमती नहीं है।
अगले दिन कूरियर किताब दे गया। कूरियर के जाते मोबाइल बजा। देखा, खीरवालजी का नम्बर चमक रहा था। क्या करता फ़ोन उठाया।
“हेलो, किताब मिल गई?”
“जी, मिल गई अभी-अभी कूरियर वाला दे कर गया है। धन्यवाद।”
“आप किताब पढ़िए, आपको बहुत अच्छी लगेगी।”
“जी ऐसा है कि अभी कुछ दूसरा काम कर रहा हूँ।”
“कोई बात नहीं, आराम से पढ़िए। दो दिन बाद फ़ोन करता हूँ।” फ़ोन कट गया।
बड़ी कोफ़्त हुई। अपने आप पर गुस्सा आया। साफ़ क्यों नहीं कह देता कि मुझे नहीं पढ़नी आपकी किताब। हरेक की अपनी रूचि होती है। आदमी किताब अपनी रूचि की पढ़ता है। किसी की जबरदस्ती से नहीं। अपनी “ना” न कह पाने की आदत पर खीज हुई। क्या किया जाए आदत बदलना इतना आसान नहीं है।
दो दिन बाद फ़िर फ़ोन आया, “पढ़ ली किताब?”
“नहीं अभी बहुत व्यस्त हूँ।” फ़ोन कट गया। मैंने राहत की सांस ली। अब नहीं करेगा फ़ोन। कितनी बार ना सुनेगा कोई। मेरी टालमटोल से बंदे को आभास हो गया होगा। जरूर गालियाँ देता होगा। कोई बात नहीं देता रहे गालियाँ।
“नमस्ते!” करीब पंद्रह दिन बाद फ़िर फ़ोन आया।
आज मैंने साफ़ बात करने का मन बना लिया था। “ऐसा है आप बहुत व्यस्त रहते हो। बहुत विद्वान आदमी हो।” पट्ठा मस्का लगा रहा है। मैं नहीं फ़ँसने वाला इसके जाल में।
“जी धन्यवाद।”
“किताब तो जब टाइम मिले तब पढ़ लेना जी। आज दूसरी बात के लिए याद किया है।”
“जी कहिए।”
“ऐसा है, सोच रहा हूँ कहानियाँ लिखूँ। एक प्रकाशक से बात कर ली है। वह मेरा कहानी संग्रह प्रकाशित करने को राजी है।”
“यह तो बड़ी अच्छी बात है। बधाई हो।”
“इसीलिए आपको फ़ोन किया है।” मेरे कान खड़े हो गए, मुझसे क्या काम हो सकता है?
“आप तो बहुत पढ़ते हो। आजकाल हिन्दी में कौन अच्छी कहानियाँ लिख रहा है?” लगता है पट्ठा कहानी लिखना आउटसोर्स करना चाहता है। मैंने प्रतिप्रश्न दागा, “आपने किनकी कहानियाँ पढ़ी हैं?”
“ऐसा है जी कि प्रेमचंद के बाद हमें कोई अच्छा नहीं लगा।”
“प्रेमचंद की कौन-कौन सी कहानियाँ पढ़ी हैं?” मैंने टटोलना चाहा।
“बड़े घर की बेटी, पंच परमेश्वर। बड़े घर की बेटी में प्रेमचंद ने भारतीय परिवार की मर्यादा की रक्षा की है।” उन्होंने व्याख्या की।
“देवर का भाभी को खड़ाऊँ फ़ेंक कर मारने के विषय में आप क्या कहेंगे?” प्रेमचंद महान कहानीकार हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। मगर यह कहानी मुझे अच्छी नहीं लगती है।
“अरे भई औरतों को काबू में रखना जरूरी है। बड़े घर की बेटियाँ बड़ी मगरूर होती हैं, उन्हें ठीक करना जरूरी है।” उन्होंने स्त्री संबंधी अपने विचारों का खुलासा किया। मैं कुछ कहूँ उसके पहले उन्होंने कहा, “आप हमे बताएँ कि हिन्दी में इस समय कौन अच्छी कहानियाँ लिख रहा है?”
हाल में मैंने एक बहुत अच्छी कहानी पढ़ी थी और मन में इच्छा थी कि इसे ज्यादा-से-ज्यादा लोग पढ़ें। मैंने कहा, “इधर अनंग की “जल” शीर्षक से एक बहुत अच्छी कहानी आई है, पढ़ी है क्या आपने?”
“अरे वो क्या कहानियाँ लिखेगा। बड़ी बकवास कहानी लिखता है। शुरु करेगा कहीं से और ले जाएगा कहीं और। प्रेमचंद के बाद तो हिन्दी में कोई कहानीकार हुआ ही नहीं है भाईसाहब।” उन्होंने अपना ज्ञान बघारा।
“आपने यह कहानी पढ़ी है?” मैं भी कौन-सा छोड़ने वाला था।
“मैं ऐसे फ़ालतू लोगों की कहानियाँ नहीं पढ़ता। आप हमें प्रेमचंद के टक्कर का कोई हो तो बताओ।”
“आप ऐसे फ़ालतू कहानीकारों की पोलपट्टी क्यों नहीं खोलते हैं? तर्क दे कर अपनी बात रखते हुए एक लेख प्रकाशित करवाइए।” मैंने बिन माँगी सलाह दी।
“वो तो जब लिखेंगे, तब लिखेंगे अभी तो आप हमें किसी तगड़े कहानीकार का नाम बताओ।”
“ऐसा है कि अभी तो कोई नाम याद नहीं आ रहा है। याद आता है तो आपको फ़ोन करता हूँ। अच्छा नमस्ते।” और मैंने फ़ोन काट दिया।
कुछ दिन बाद उनका फ़ोन फ़िर आया। वो सीधे मतलब की बात पर आ गए। “आप बड़े लेखक हो हम जैसे छोटे-मोटे साहित्यकार पर भी लिखा करो। हम एक शहर के रहने वाले हैं। शहर वालों पर तो लिखना आपका फ़र्ज बनता है।” मन में आया फ़र्ज सिखाने वाले का मुँह तोड़ दूँ। मगर अपने फ़ोन पर गुस्सा उतारने का क्या फ़ायदा, अत: चुप रहा।
“अच्छा छोड़िए ये बात। जब आपका मन करे तब लिखिएगा। आज तो आपको कुछ और बताने के लिए फ़ोन किया है।”
“कहिए।”
“मेरा कहानी संग्रह अगले महीने आ रहा है। उसके लोकार्पण के समय एक घोषणा करने जा रहा हूँ। वैसे तो अभी यह रहस्य है पर सोचा आपको बता दूँ। उस दिन मैं शहर के लेखकों के लिए एक पुरस्कार की घोषणा करने जा रहा हूँ। पहले शहर के लोगों को देंगे फ़िर दूसरे शहर और अच्छा चला तो देश के लेखकों को हर वर्ष दिया करेंगे।”
अगले महीने एसएमएस, ईमेल और कूरियर से निमंत्रण मिला, जिसका लुब्बो-लुबाब था – एक भव्य समारोह में देश के महान कथाकार खीरवालजी की कहानी संग्रह का लोकार्पण है, आप अवश्य पधारें। संग्रह की कहानियों पर हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचकों द्वारा चर्चा। कहानीकार द्वारा कहानी पाठ। चर्चा और कहानी पाठ के बाद प्रीतिभोज।
आ रहे हैं न आप सब?
०००

विजय शर्मा द्वारा लिखित

विजय शर्मा बायोग्राफी !

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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