‘विमल कुमार’ की तीन कविताएँ

विमल कुमार 15 2018-11-18

(दंगे इंसानियत के माथे पर कलंक की तरह होते हैं और जिनोसाइड जैसी अमानवीय कृत्य से इंसानियत शर्मसार होती है. दंगो में मारे गए लोग चाहे किसी धर्म/जाति/नस्ल/लिंग के हों बेबात मारे जाते हैं और न्याय–तंत्र सबूतों के अभाव में कुछ नही कर पाता. वरिष्ठ कवि विमल कुमार की कविताएँ इन्ही सवालों से जूझ रही हैं…संपादक)

एक  vimal-kumar

एक दिन मैं भी मार दिया जाऊंगा किसी दंगे में

फिर बीस साल बाद ये कहा जायेगा
कि मैं मारा नहीं गया हूँ दंगे में
जैसे भूख से मरने पर
कभी नहीं कहता है जिलाधीश
कि एक आदमी की मृत्यु हुई है
क्योंकि वह भूखा था कई दिनों से

इसलिए जब आयेंगे दंगाई मुझे मारने मेरे घर
तो मैं सबसे पहले उनसे यही करूँगा विनती
कि मेरी जान ले लो
पर इसका सबूत जरूर देकर जाना तुम
कि मैं दंगे में तुम्हारे हाथो ही मारा गया हूँ
क्योंकि अदालत को दरकार होती है इन चीज़ों की
मेरे मरने की तुम सबूत के एवज़ में
मेरे बच्चे की भी तुम जान ले सकते हो

अब मैं मारे जाने के बाद
इकठा कर रहा हूँ खुद ही सबूत
सबूतों को इकठ्ठा करने में भी
मैं मर गया था

जज साहब
अगर मैं दे सका कोई सबूत
आप यकीन तो करोगे मुझ पर
कि मैं मारा गया हूँ दंगे में ही

अगर आपको फिर भी लगता है
कि मैं मारा नहीं गया हूँ
तो मेरा चेहरा देखिये
क्या किसी जिन्दा आदमी का चेहरा ऐसा ही दीखता है आपको

दो  

साभार google से

साभार google से

कातिलों के कई घर हैं यहाँ
पर यहाँ कोई कातिल नहीं है .

कातिलों की बस्ती मेंभी अब कितनी रौशनी है
रौनक भी है उनकी महफ़िल मेंआजकल

पर तुम देख नहीं सकते किसी कातिल को
कातिलों को कभी पकड़ भी नहीं सकते हो

कातिल अब कातिल नहीं रहे
उन्हें तुम कातिल भी नहीं कह सकते हो ,

 तीन 

मेरे पास अब किसी चीज़ का कोई सबूत नहीं ब चा है
बाढ़ में डूबा था मैं एक बार
तो उसका भी कोई सबूत नहीं है मेरे पास
आग जब लगाई गयी थीमे रे घर में
तो उसका सबूत भी कहाँ जुटा पाया था मैं
बिना सबूत के मैं नहीं कह सकता
कि मेरी बहन के साथ बलात्कार हुआ ही था
तुम्हारे सामने ही हुए थे ये सारे हादसे मेरी ज़िन्दगी के
फिर भी तुम मांगते हो मुझसे सबूत
मैं भले ही हार जाऊं हर बार अपना मुकदमा
पर कम से कम इस बात का सबूत है
कि तुम्हारी तरह मैं कभी बिका नहीं था
पर तुम्हारे पास ढेर सारे सबूत होने के बाद भी
इस बात का सबूत नहीं है
कि तुम्हारे भीतर बचा है अभी भी एक आदमी

विमल कुमार द्वारा लिखित

विमल कुमार बायोग्राफी !

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अनीता 51 2018-12-10

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कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

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