तुम बिलकुल हम जैसे निकले : कविता (फ़हमीदा रियाज़)

कविता कविता

फ़हमीदा रियाज़ 221 2018-11-23

फ़हमीदा रियाज़ का 21 नवम्बर 2018 को मशहूर शायर फहमीदा रियाज का लाहौर में लंबी बीमारी के बाद इंतकाल हो गया। फहमीदा पिछले कई महीनों से बीमारी से जूझ रही थीं। फहमीदा का जन्म भारत में यूपी राज्य के मेरठ जिले में हुआ था। लेकिन बाद में उनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया। हालांकि, यहां भी जनरल जिया उल हक के शासनकाल में उन्हें निर्वासन का सामना करना पड़ा और करीब 7 साल तक भारत में रहीं। बतौर श्रिधांजलि उनकी एक कविता ॰॰॰॰॰॰

तुम बिलकुल हम जैसे निकले


तुम बिलकुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई ?

वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गँवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई !

भूत धरम  का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्टे  काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ (नष्ट) करोगे ?

तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी

यहाँ भी मुश्किल होगा जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नजर न आयी?

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना
आगे है गड्ढा यह मत देखो
लाओ वापस, गया ज़माना

कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुतल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई.

मश्क (अभ्यास) करो तुम, आ जाएगा
उल्टे  पाँव ही चलते जाना
दूजा ध्यान  न मन में  आए
बस पीछे ही नजर जमाना

एक जाप सा करते जाओ
बारंबार यही दोहराओ
'कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत' !

फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे

हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ,  वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना.


फ़हमीदा रियाज़ द्वारा लिखित

फ़हमीदा रियाज़ बायोग्राफी !

नाम : फ़हमीदा रियाज़
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ऑथर के बारे में :

फ़हमीदा रियाज़ उर्दू की प्रमुख शायरा एवं लेखिका हैं। इनका जन्म 28 जुलाई 1946 को मेरठ में हुआ। बाद में इनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया।गोदावरी, ख़त-ए-मरमुज़ इनके प्रमुख संग्रह हैं। 21 नवम्बर 2018 को  मशहूर शायर फहमीदा रियाज का लाहौर में लंबी बीमारी के बाद इंतकाल हो गया। फहमीदा पिछले कई महीनों से बीमारी से जूझ रही थीं। फहमीदा का जन्म भारत में यूपी राज्य के मेरठ जिले में हुआ था। लेकिन बाद में उनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया। हालांकि, यहां भी जनरल जिया उल हक के   शासनकाल में उन्हें निर्वासन का सामना करना पड़ा और करीब 7 साल तक भारत में रहीं।

मृत्यु

21 नवंबर 2018 को 72 वर्ष की आयु में उनका लाहौर में निधन हो गया।


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पोस्ट की गई टिप्पणी -

ग़ुलाम कुन्दनम्

24/Nov/2018
सटीक रचना... नफ़रत की जमीं पर पाकिस्तान बना था... भारत को भी कुछ लोग अब उसी राह लें जाना चाहते हैं.... पर भारतीयता से वे हार जाएंगे।

हाल ही में प्रकाशित

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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हनीफ मदार 197 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पंकज तिवारी 371 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

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