शह की जीत ( उपन्यास ) शक्ति प्रकाश

शक्ति प्रकाश 49 2018-11-30

एकाध प्रश्न उठा है कि 'शह की जीत' का विषय क्या है? एक शब्द में कहूं तो 'हिंदुस्तान' वैसे इसका फ्लैप विख्यात आलोचक डा. प्रियम अंकित ने लिखा है। उससे काफी कुछ साफ़ होता है, पढ़ें -

शक्तिप्रकाश का उपन्यास ‘शह की जीत’ समकालीन भारतीय संदर्भों में भारतीय जनता और सत्ता के बीच चलने वाली आँख-मिचौली को व्यंग्यात्मक आवेगों मे अभिव्यक्त करता है । व्यंग्य शक्तिप्रकाश की ताक़त है। इसे वह अपने पिछले उपन्यास और कहानियों द्वारा साबित कर चुके हैं । उनका यह नया उपन्यास भी इसी परंपरा की कड़ी मे है । हमारे देश में सत्ता द्वारा बरती गई क्रूरता, विद्रूपता, रूढ़िवादिता, सांप्रदायिकता की जिन घटनाओं ने पिछले 20-25 वर्षों में जनमानस की संवेदनाओं को झकझोर कर रखा है, उपन्यास अपना कच्चा माल वहीं से प्राप्त करता है । इस तरह यह उपन्यास एक ऐसे लेखक की रचना है, जो वर्तमान समाज को न सिर्फ गहराई से समझता है, बल्कि उस समाज के भीतर गहरी पैठ भी रखता है ।
उपन्यास मे अनेक पात्र ऐसे हैं जो मन को छू लेते हैं, हालांकि लेखक ने इन पात्रों को बड़ी निर्ममता से रचा है । वास्तव में व्यंग्य एक ऐसी विधा है, जो निर्ममता की मांग करती है । लेकिन उत्कृष्ट व्यंग्यकार वही है, जो निर्ममता और सहानुभूति के बीच के संतुलन को कुशलता से साधे । शक्तिप्रकाश ऐसे ही कथाकार है, व्यंग्य में मारक लेकिन पाठकों के मन में दलितों और वंचितों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने में माहिर । व्यंग्य केवल हास्‌ नहीं है, वह परिहास भी है, घाघ सत्ता के शातिरपन का, उसकी चालाकियों का, उसकी विद्रूपताओं का । शक्तिप्रकाश का व्यंग्य सत्ता-रूपी भव्य इमारत के नफीस पलस्तरों पर हथौड़े की तरह चोट करके, उसके खूबसूरत बाह्य आवरण को धवस्त करके, बदसूरत संरचनाओं को बेबाकी से उजागर करता है । सद्भाव, सदाचार और सहिष्णुता के जो प्रचलित मानदंड हमारे मतलबपरस्त सत्ताधीशों ने गढ़े हैं, जिन विसंगतियों को आज़ादी के इतने वर्षों के दौरान हम लगातार झेलते आ रहे हैं, लेखक ने उन पर भरपूर चोट की है ।
शक्तिप्रकाश की एक विशेषता और है । वह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं के यथार्थवादी कथानक का ताना-बाना बुनते हुए भी अपनी रोमानी प्रकृति की छाप अवश्य छोड़ते रहते हैं । इससे कथारस की मर्यादा तो निभती ही है, व्यंग्य का अतिरेक भी पनपने नहीं पाता । उनके लेखन की प्रभावी विशेषता है कथोपकथन का ढंग, सुघढ़ वर्णन शैली, मंझी भाषा तथा रचना की सौष्ठवता । 
इस उपन्यास में लेखक ने सांप्रदायिक राजनीति को और उसकी समस्याओं को वस्तुस्थिति के अनुरूप प्रस्तुत करते हुए इन समस्याओं का कोई भी पुष्ट समाधान देने की कोशिश नहीं की है क्योंकि वह जानता है की समाधान देना उसका काम नहीं है । वह कोई प्रचारक या समाज-सुधारक नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के प्रति जागरूक रहने वाला एक लेखक है और एक लेखक के रूप में इन संवेदनाओं को मरने से बचा लेना उसका सबसे ज़रूरी फर्ज़ है । अपने इस फर्ज़ का निर्वाह लेखक ने इस उपन्यास में बखूबी किया है |
लेखक ने इस उपन्यास में मुसलमानों के जीवन यथार्थ का बेपर्द चित्रण करने की कोशिश की है । इसके लिए उसने मुकम्मल शोध किया है । सांप्रदायिक राजनीति के दौर में मुसलमानों की विविध मनःस्थितियों, उनके डर, उनकी आशंकाओं, हिदुओं से उनके संबंध और दुःखद एवं द्वन्द्वमूलक अनुभवों और इन सबके साथ खिलवाड़ करती सत्ता की अठखेलियाँ और विद्रूपताओं का विश्वसनीय शब्दांकन इस उपन्यास में संभव हुआ है । साथ ही असहिष्णुता के दौर में कसमसाती सहिष्णुता की त्रासदी का भी यहाँ अनुभव किया जा सकता है ।
हम यह कह सकते हैं की भारतीय परंपरा की गंगा-जमनी तहज़ीब को जीने वाले लेखक ने यह उपन्यास रचकर अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करने की एक मुकम्मल कोशिश की है ।


-----प्रियम अंकित

शक्ति प्रकाश द्वारा लिखित

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