शह की जीत ( उपन्यास ) शक्ति प्रकाश

कथा-कहानी समीक्षा

शक्ति प्रकाश 130 2018-11-30

एकाध प्रश्न उठा है कि 'शह की जीत' का विषय क्या है? एक शब्द में कहूं तो 'हिंदुस्तान' वैसे इसका फ्लैप विख्यात आलोचक डा. प्रियम अंकित ने लिखा है। उससे काफी कुछ साफ़ होता है, पढ़ें -

शक्तिप्रकाश का उपन्यास ‘शह की जीत’ समकालीन भारतीय संदर्भों में भारतीय जनता और सत्ता के बीच चलने वाली आँख-मिचौली को व्यंग्यात्मक आवेगों मे अभिव्यक्त करता है । व्यंग्य शक्तिप्रकाश की ताक़त है। इसे वह अपने पिछले उपन्यास और कहानियों द्वारा साबित कर चुके हैं । उनका यह नया उपन्यास भी इसी परंपरा की कड़ी मे है । हमारे देश में सत्ता द्वारा बरती गई क्रूरता, विद्रूपता, रूढ़िवादिता, सांप्रदायिकता की जिन घटनाओं ने पिछले 20-25 वर्षों में जनमानस की संवेदनाओं को झकझोर कर रखा है, उपन्यास अपना कच्चा माल वहीं से प्राप्त करता है । इस तरह यह उपन्यास एक ऐसे लेखक की रचना है, जो वर्तमान समाज को न सिर्फ गहराई से समझता है, बल्कि उस समाज के भीतर गहरी पैठ भी रखता है ।
उपन्यास मे अनेक पात्र ऐसे हैं जो मन को छू लेते हैं, हालांकि लेखक ने इन पात्रों को बड़ी निर्ममता से रचा है । वास्तव में व्यंग्य एक ऐसी विधा है, जो निर्ममता की मांग करती है । लेकिन उत्कृष्ट व्यंग्यकार वही है, जो निर्ममता और सहानुभूति के बीच के संतुलन को कुशलता से साधे । शक्तिप्रकाश ऐसे ही कथाकार है, व्यंग्य में मारक लेकिन पाठकों के मन में दलितों और वंचितों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने में माहिर । व्यंग्य केवल हास्‌ नहीं है, वह परिहास भी है, घाघ सत्ता के शातिरपन का, उसकी चालाकियों का, उसकी विद्रूपताओं का । शक्तिप्रकाश का व्यंग्य सत्ता-रूपी भव्य इमारत के नफीस पलस्तरों पर हथौड़े की तरह चोट करके, उसके खूबसूरत बाह्य आवरण को धवस्त करके, बदसूरत संरचनाओं को बेबाकी से उजागर करता है । सद्भाव, सदाचार और सहिष्णुता के जो प्रचलित मानदंड हमारे मतलबपरस्त सत्ताधीशों ने गढ़े हैं, जिन विसंगतियों को आज़ादी के इतने वर्षों के दौरान हम लगातार झेलते आ रहे हैं, लेखक ने उन पर भरपूर चोट की है ।
शक्तिप्रकाश की एक विशेषता और है । वह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं के यथार्थवादी कथानक का ताना-बाना बुनते हुए भी अपनी रोमानी प्रकृति की छाप अवश्य छोड़ते रहते हैं । इससे कथारस की मर्यादा तो निभती ही है, व्यंग्य का अतिरेक भी पनपने नहीं पाता । उनके लेखन की प्रभावी विशेषता है कथोपकथन का ढंग, सुघढ़ वर्णन शैली, मंझी भाषा तथा रचना की सौष्ठवता । 
इस उपन्यास में लेखक ने सांप्रदायिक राजनीति को और उसकी समस्याओं को वस्तुस्थिति के अनुरूप प्रस्तुत करते हुए इन समस्याओं का कोई भी पुष्ट समाधान देने की कोशिश नहीं की है क्योंकि वह जानता है की समाधान देना उसका काम नहीं है । वह कोई प्रचारक या समाज-सुधारक नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के प्रति जागरूक रहने वाला एक लेखक है और एक लेखक के रूप में इन संवेदनाओं को मरने से बचा लेना उसका सबसे ज़रूरी फर्ज़ है । अपने इस फर्ज़ का निर्वाह लेखक ने इस उपन्यास में बखूबी किया है |
लेखक ने इस उपन्यास में मुसलमानों के जीवन यथार्थ का बेपर्द चित्रण करने की कोशिश की है । इसके लिए उसने मुकम्मल शोध किया है । सांप्रदायिक राजनीति के दौर में मुसलमानों की विविध मनःस्थितियों, उनके डर, उनकी आशंकाओं, हिदुओं से उनके संबंध और दुःखद एवं द्वन्द्वमूलक अनुभवों और इन सबके साथ खिलवाड़ करती सत्ता की अठखेलियाँ और विद्रूपताओं का विश्वसनीय शब्दांकन इस उपन्यास में संभव हुआ है । साथ ही असहिष्णुता के दौर में कसमसाती सहिष्णुता की त्रासदी का भी यहाँ अनुभव किया जा सकता है ।
हम यह कह सकते हैं की भारतीय परंपरा की गंगा-जमनी तहज़ीब को जीने वाले लेखक ने यह उपन्यास रचकर अपने समय में सार्थक हस्तक्षेप करने की एक मुकम्मल कोशिश की है ।


-----प्रियम अंकित

शक्ति प्रकाश द्वारा लिखित

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

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हनीफ मदार 118 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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पंकज तिवारी 215 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

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