प_फ़_ब_भ_म : कहानी (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 70 2018-12-07

'औरत होने की सज़ा' जैसी बहुचर्चित किताब के लेखक, स्त्रिवादी प्रवक्ता, साहित्य समीक्षक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता "अरविंद जैन" के जन्म दिन पर 'हमरंग' परिवार की ढेरों बधाइयों के साथ आज पढ़ते हैं उन्हीं की यह कहानी॰॰॰॰॰

प_फ़_ब_भ_म

सुबह से लाल कपड़ों की गठरियों में बंधी पुरानी केस फ़ाइलों में से एक फ़ाइल ढूँढ रहा हूँ। ढूँढते-ढूँढते कागजों के ढेर में से लगभग पन्द्रह साल पहले लिखी एक 'अधूरी कहानी' मिल गई। शायद अधूरी होने की वज़ह से ही कहीं छपने को नहीं भेजी होगी। खैर.. फ़ाइल ढूँढने का काम मुंशी जी पर छोड़, कहानी पढ़ने बैठ गया। कहानी अभी भी अधूरी ही है। अब इसमें एक शब्द भी जोड़ने-घटाने का समय नहीं है। पाठकों से प्रार्थना है कि इसे एक बार पढ़ लें और कमियों को अपने हिसाब से पूरा कर लें। तो यह रहा अधूरी कहानी का रफ़ ड्राफ्ट-
"प फ़ ब भ म
पचासवें साल की पहली पूर्णिमा को, 'काफ्का'ज लास्ट लव' पढ़ते-पढ़ते दोपहर हो गई। घण्टी बजने पर दरवाजा खोल देखा तो एक स्त्री लाल पल्लू की सफेद साड़ी में सामने खड़ी है, जिसके कंधे पर पर्स, आँखों पर चश्मा, हाथों में एक किताब और रजनीगंधा के फूल महक रहे हैं। उसकी कलाई पर काँच की चूड़ियाँ नहीं, सुनहरी घड़ी बंधी है।

सुबह ही सुधीर का फोन था "पहुँच गए..होटल दून...53...ठीक है। थोड़ी देर आराम करो। इंटरव्यू के लिए, सह-सम्पादिका दोपहर तक आएंगी। मैं शाम को हाज़िर होता हूँ।" 

कमरे में कुर्सी पर बैठने से पहले गुलदस्ता और किताब 'एन इंटरव्यू विद हिस्ट्री' देते हुए, पहला वाक्य "आपके लिए हैं, मैं...।" अचानक गहरे तक ऐसा महसूस होने लगा कि  आवाज़ में जादुई सा संगीत गूँज रहा हैं, हवा में कस्तूरी सी गंध घुली है और विलुप्त संवेदना सी 'सरस्वती' आस-पास बह रही है। बाहर-भीतर के बीच, काँच की खिड़कियां हैं और रंग-बिरंगे पर्दों पर समय की झुर्रियाँ। मैंने "धन्यवाद" कहते हुए, गुलदस्ता सफेद-साँवले गुलाब के फूलों के बराबर सजा दिया।

सिगरेट सुलगा पैकेट सामने बढ़ाया,तो उसने कहा "धन्यवाद! मेरे पास है" और पर्स से पैकेट-लाइटर निकाल सिगरेट सुलगाने लगी। थोड़ी देर दोनों, कमरे में उड़ता धुँआ देखते रहे। आमने-सामने धुँधले से आइने में मौन फ़िल्म के दृश्य हैं। पिंजरे सी बंद हवेली या किले में कैद, कुछ उदास स्त्रियों के प्रतिबिम्ब। ख़ामोशी जितना दिखाई दे रही हैं, उससे अधिक अनदेखी हैं।सपनों में देखी हैं कितनी बार, व्यक्ति से बड़ी प्रतिमा, प्रतिमा से लंबी परछाईयाँ। आत्मकथाएं भी जितना  बताती है, उससे कहीं ज्यादा छुपाती हैं। काश! वही होती, तो देखते ही बोलती 'प फ़ ब भ म' और नाचने-गाने लगती-"मेरी झांझर चम-चम चमके, लश्कारा जावे गली-गली।"

इसी बीच कॉफ़ी-बिस्किट्स आ गए। उसने कॉफ़ी की पहली सिप लेने के बाद दरोगा की तरह पूछा "सुधीर जी को कब से जानते हैं?" मैंने कॉफ़ी का कप रखते हुए कहा "तब से जब देश की राजधानी में दंगा...नरसंहार हुआ, हाशिमपुरा की नहर में लाशें बहाई गई और ...और जब से वो प्रेम कविताएँ लिख रहे हैं।" रूमाल से चश्मा पोंछते हुए उसकी आँखों  में रेत उड़ रही थी, मानो बहुत लंबी यात्रा करके आई हों।

"ओह! शब्दों की बैसाखियाँ!" कहते हुए पूछने लगी "आपने 'आषाढ़ का एक दिन' तो जरूर देखा या पढ़ा होगा।" मैंने जवाब दिया "हाँ! 'आषाढ़ का एक दिन' पढ़ने के बाद, 'आधे-अधूरे' भी पढ़ा-देखा था राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में।" याद आया जब कॉलेज में एक लड़की लिफाफे में लपेट कर चुपचाप, मेरी सीट पर 'आषाढ़ का एक दिन' रख गई थी। वही जो किताबों के कवर संभाल कर रखती थी और किताब की जिल्द फाड़, पक्षियों के लिए घौंसले बना देती थी। वही जो स्कूल-कॉलेज में 'प फ़ ब भ म' कहते हुए, बराबर से निकल जाती और बाद में सालों जन्मदिन पर 'प फ़ ब भ म' कह कर फोन काट देती थी। उसके 'डॉल म्यूजियम' में देसी-विदेशी, गोरी-काली, छोटी-बड़ी बहुत सी गुड़िया थीं। तरह-तरह और किस्म-किस्म की गुड़ियाएं! घाघरे और बुर्के वाली से लेकर, मिनी स्कर्ट और बिकनी वाली गुड़िया।

दोनों हाथों से आधे काले-आधे चाँदी से सफेद बालों के बादल पीछे करते हुए, वह पूरे नाटकीय अंदाज़ में संवाद पढ़ने लगी "ये पृष्ठ अब कोरे कहाँ हैं, मल्लिका?" गहरे अँधे कुँए में पैठी स्मृति कहती रही "सुनो! कालिदास सुनो! तुम मुझे कविता लिखना सिखाओ, मैं तुम्हें रोटी बेलना सिखाती हूँ" और दिमाग में आटा गूँथना, गूँथने के बाद भीगने-पसीजने देना, फिर से आटा संवारना, दोनों हाथों से गोल-गोल लोई बनाना, पलोथन लगाना, लकड़ी या पत्थर के बेलन से बेलना, गर्म तवे पर सेकना, धीरे-धीरे रोटी फुलाना और घी चुपड़ना सिखाती रही। विश्वास नहीं हो रहा कि वो सामने बैठी है। अखबार उलटते-पलटते हुए   नए राज्यों के बारे में पढ़ता रहा "नाम बदलने से रास्ते नहीं बदलते"। 

तभी उसने उस लड़की की तरह ही, दूसरा संवाद पढ़ना शुरू कर दिया "प्रतिभा से एक चौथाई व्यक्तित्व का निर्माण होता है, शेष की पूर्ति प्रतिष्ठा द्वारा होती है"। ऐशट्रे में सिगरेट बुझाता मैं, प्रतिभा.. प्रतिष्ठा.. और कमरे में भरे धुँए के बारे में सोचते हुए, कागज पर रंग-बिरंगी मछलियाँ और उल-जलूल कार्टून बनाता रहा। धुँएं या धुंध में सपने देखना और उनके संकेत समझना, इतना मुश्किल भी नहीं है संकल्प! 

थोड़ी देर बाद  कुर्सी घूमाते हुए बोली "कॉफ़ी बहुत बढ़िया थी।" मैं भी सोच ही रहा था कि एक-एक कप कॉफ़ी और पी जाए। जब तक कॉफी आये, ये चॉकलेट खाओ।"  चॉकलेट का कवर फाड़ते हुए बड़बड़ाती रही "काश! हम सब चॉकलेट से होते"।फोन पर दो कप कॉफ़ी का आर्डर दे वापिस आया, तो चेहरे पर चॉकलेटी मुस्कान बोली "अपनी कोई कविता सुनाएं ना!" मैंने टालते हुए कहा "अजन्मी कविताएँ! छोड़ो.. अभी नहीं..।" पुखराज की अँगूठी में फंसे आटे के बचे-खुचे निशान, नाखून से खुरचते हुए बोली "अजन्मी कविताएँ!..ठीक है, बाद में सुनाना। तब तक कुछ सवालों का  जवाब, रिकॉर्ड कर लेती हूँ।"

उसने जन्म स्थान, घर-परिवार, शिक्षा-दीक्षा और पढ़ने-लिखने से लेकर, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आरक्षण, धर्म, अर्थ, कानून, समय, समाज, साहित्य, शिक्षा और भविष्य में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों तक के बारे में ना जाने क्या-क्या पूछ डाला। मैंने कहा सबसे महत्वपूर्ण बात है "स्त्री अपने बारे में हर फैसला (सही-गलत) खुद ले सके और बाकी सब लोग उसके फैसले का सम्मान करें। औरत को चाँद नहीं एक शरारती सा बच्चा चाहिए, जिसके साथ मन भर जी सके...खेल सके....खिला सके।स्त्री-पुरुष तो माँस-मिट्टी के दिया-बाती हैं, जो उनके रक्त से प्रज्जवलित हो सृष्टि को रोशन करते हैं।"

सामने बैठी स्त्री ने खिलखिला कर हँसते हुए रोका "अरे! आपने तो दूध में सारा शहद घोल दिया" और साड़ी के पल्लू से मुँह छुपा वॉशरूम में घुस गई। थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला, तो सिर से पाँव तक ठिठुरती हुई कहने लगी "कोई कुर्ता-पायजामा हो तो ..!" मैंने अलमारी खोली, नया कुर्ता-पायजामा निकाला और दरवाज़े की तरफ बढ़ा दिया। 

मुझे ऐसा लगा जैसे नाटक खत्म होने के बाद, कलाकार 'ग्रीन रूम' में कपड़े बदलने और चेहरे पर पुता रंग-रोगन उतारने में लगे है। निर्देशक-सूत्रधार बाहर खड़े, सिगरेट फूँक रहे हैं और दर्शक संवाद दोहराते घर लौट रहे हैं। पता ही नहीं चला नायिका कब आकर, पीठ पीछे खड़ी हो गई। गर्दन पर ओस में भीगी नरम दूब से स्पर्श ने सचेत किया। देखते ही कहने लगी "शुक्रिया..कैसी लग रही हूँ?" कमरे का तापमान नियंत्रित करते हुए बोला "सच में 'अच्छी लड़की' लग रही हो।" उधर से संवाद "ये कुर्ता अब कोरा कहाँ है...?" मैं 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' गुनगुनाते हुए, पहाड़ी नदी और बर्फीले तूफ़ान में घिरे, जीवन के बारे में विचार करने लगा। अनुभूति बड़बड़ाती रही "तपती देह ही जीवन है,वरना ठंडी लाश। माथे पर लगा चंदन ना सूखे, तो समझना गिद्ध आसपास ही मंडरा रहे हैं।"

यह सुनते ही 'अच्छी लड़की' की दोनों चौटियों में सरसों के फूलों जैसे रिबन लहराने लगे और वह बाग में कच्ची अमिया-ईमली तोड़ती, तितलियाँ पकड़ती या गुड़ की गज़क खाती, अल्हड़ किशोरी सी उछल-कूद मचाते हुए गाने लगी "रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख"।  

रक़्स शुरू करने से पहले ही, भावना करवटें बदलने लगी। दरअसल शाम ढलते-ढलते मन में सन्नाटा पसरने लगा। देह का पारा लुढ़कता जा रहा है और दिमाग में रह-रह कर कड़कती बिजली, किसी अज्ञात थार में जा गिरती है। 

पारदर्शी पर्दों पर दशकों की धूल जमी है।खिड़की- दरवाजा खोला ताकि धुँआ निकल जाए, मेज़ पर रखा मोबाइल उठाया और बालकॉनी में जा खड़ा हुआ। पहाड़ियों पर रुई के मुलायम रेशों सी बर्फ की सफेद चादर बिछने लगी है। सामने दूर पहाड़ों पर जमीं बर्फ पर, डूबते सूरज की  लाल-पीली-सुनहरी किरणें बरस रही हैं। आकाश की गोल मंडी में, नरमा कपास के ढेर लगे हैं। नैपथ्य में किसी लोकगीत की धुन बज रही है। आगे-पीछे, इधर-उधर देखता हूँ, तो होली के रंगों में भीगी ओढ़नी ओढ़े, सरयू नज़र आ रही है। शब्द तलाशते-तराशते और 'हाँ.. ना' तौलते हुए, स्वयं को 'संदेह का लाभ' दे मुक्त करता हूँ। 

तभी मोबाइल बजने लगता है। हेल्लो! हेल्लो! 'प..फ़..ब.  .भ..म..' के बाद फोन 'डेड' हो गया। यह फोन नंबर तो संवेदना का है! ऐसा लगा कि  'मुझे पुकारती हुई, पुकार खो गई कहीं'। इधर-उधर देखता हूँ तो पीछे दरवाज़े के बीचों-बीच, मोम सी श्वेत संवेदना 'स्टेचू' की मुद्रा में मौन खड़ी है, उसकी एक मुट्ठी से हिम-मणियाँ और दूसरी से भीगी रेत झर रही है। 9 जनवरी।"

अरविंद जैन द्वारा लिखित

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