मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर: स्मरण शेष, 'कादर खान'

बहुरंग स्मरण-शेष

मनीष पाण्डेय " आशिक़ " 866 2019-01-02

'हमारी तारीफ़ ज़रा लम्बी है । बचपन से सर पर अल्लाह का हाथ और अल्लाहरक्ख़ा है अपने साथ । बाज़ू पर ७८६ का है बिल्ला, बीस नम्बर की बीड़ी पीता हूँ, काम करता हूँ क़ुली का और नाम है इक़बाल' - फ़िल्म क़ुली का एक संवाद ।

हिन्दुस्तानी फ़िल्म जगत के मशहूर चरित्र अभिनेता और लेखक कादर खान का आज कनाडा के अस्पताल में निधन हो गया. वह 81 साल के थे. कादर खान को हिन्दी फ़िल्मों के महान संवाद लेखक और हास्य अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है. नब्बे के दशक में, कादर खान और अभिनेता गोविंदा की जोड़ी ने अपनी शानदार कॉमेडी के ज़रिये भारतीय दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ दी थी. आज जब कादर खान साहब हमारे बीच नहीं हैं तो इस लेख के ज़रिये, हम उनकी ज़िंदगी के तमाम संघर्षों और उपलब्धियों को आपसे साथ साझा करेंगे. यही हम सबकी तरफ़ से कादर खान साहब को सच्ची श्रद्धांजली होगी.॰॰॰॰ मनीष पाण्डेय " आशिक़ " का आलेख 

मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर 

हिन्दुस्तानी फ़िल्म जगत के मशहूर चरित्र अभिनेता और लेखक कादर खान का आज कनाडा के अस्पताल में निधन हो गया. वह 81 साल के थे. कादर खान को हिन्दी फ़िल्मों के महान संवाद लेखक और हास्य अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है. नब्बे के दशक में, कादर खान और अभिनेता गोविंदा की जोड़ी ने अपनी शानदार कॉमेडी के ज़रिये भारतीय दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ दी थी. आज जब कादर खान साहब हमारे बीच नहीं हैं तो इस लेख के ज़रिये, हम उनकी ज़िंदगी के तमाम संघर्षों और उपलब्धियों को आपसे साथ साझा करेंगे. यही हम सबकी तरफ़ से कादर खान साहब को सच्ची श्रद्धांजली होगी.
कादर खान का जन्म 22 अक्टूबर सन 1937 को काबुल, अफ़ग़ानिस्तान के एक कबीले में हुआ था. उनके पिता का नाम अब्दुल रहमान खान और माता का नाम इक़बाल बेगम था. जब कादर खान पैदा हुए तो उनकी माँ इक़बाल बेगम ने अपने पति से यह ज़िद की कि हम अपने बच्चे के साथ यहाँ नहीं रहेंगे. इसकी वजह यह थी कि इससे पहले अब्दुल रहमान और इक़बाल बेगम के तीन बेटे शम्स- उर - रहमान, हबीब - उर रहमान और फ़ज़ल रहमान अपने जन्म के आठ साल बाद ही मृत्यु को प्राप्त हुए थे. इस कारण इक़बाल बेगम को ऐसा लगता था कि काबुल की हवा, उनके बच्चों की सेहत लिए मुफ़ीद नहीं है. आखिर में अब्दुल रहमान और इक़बाल बेगम अपने नवजात शिशु यानी कादर खान को लेकर काबुल से मुंबई पहुंचे.
मुंबई में कादर खान साहब के परिवार का ठिकाना बना कमाठीपुरा, पहली गली, जो भारत का सबसे गंदा स्लम इलाक़ा माना जाता है. यहाँ दिन रात देह व्यापार, गैंबलिंग, शराब, चरस- अफ़ीम का कारोबार होता. इस माहौल को कादर खान के वालिद नहीं सह पाए और मानसिक रूप से अशांत हो गये. इसका नतीजा यह हुआ कि कादर खान के माता - पिता रोज़ किसी न किसी बात पर बहस करते और आखिर में दोनों ने तलाक़ ले लिया. तलाक़ के बाद कादर खान के पिता, मुंबई में ही एक मस्जिद में नमाज़ पढ़वाने का काम करने लगे. जब यह बात कादर खान के नाना और मामा को मालूम हुई तो दोनों पाकिस्तान ( ब्रिटिश इंडिया) से मुंबई पहुंचे. उन्होंने कादर खान की माँ को समझाया कि इस तरह एक जवान औरत का अंजान शहर में अकेले रहना, खतरे से खाली नहीं है और इसलिए उन्हें दूसरा निकाह कर लेना चाहिए. कादर खान की माँ मजबूर थी, सो उन्होंने दूसरा निकाह किया. कादर खान के सौतेले पिता एक कारपेंटर थे, मगर काम करने में उनकी रूचि नहीं थी. इसका असर ये हुआ कि कादर खान, उनकी माँ की ज़िंदगी भूख और ग़रीबी के साये में गुज़रने लगी. कादर खान के सौतेले पिता, कादर खान को पैसे लेने के लिए अब्दुल रहमान के पास भेजते. कादर खान पैदल मस्जिद में जाकर अपने पिता से पैसे की मांग करते. अब अब्दुल रहमान साहब खुद मस्जिद में किसी तरह रहकर जीवन गुज़ार रहे थे. उनके पास पैसा नहीं था. फिर भी अपने बेटे की हालत देखकर वह किसी तरह उधार मांगकर, कादर खान को दो - तीन रूपये दे देते. इन्हीं रुपयों से कादर खान, उनकी माँ और उनके सौतेले पिता का भोजन बनता. 
जब कादर खान कुछ बड़े हुए तो उनकी माँ ने उन्हें पढ़ने के लिए नज़दीक के म्युनिसिपल स्कूल में भेजा. मगर जीवन की इन विकराल परिस्थितियों में पढ़ना आसान नहीं था. इसी संघर्ष में एक दिन कादर खान ने किताबों से भरा बस्ता दूर फेंककर, मजदूरी करने का मन बनाया. उन्हें लगा इस तरह से ही उनके घर के हालात सुधर सकेंगे. कादर खान अभी घर से निकल ही रहे थे कि उनकी मां ने उनके रोका और बोली " बेटा, मैं जानती हूँ कि तू आज कहाँ जा रहा है, मैं तुझे रोकूंगी नहीं, मगर बेटा अगर तू सच में इस घर की ग़रीबी दूर करना चाहता है तो तू पढ़...तू पढ़ बेटा, तू पढ़..वरना इस मज़दूरी से तू जीवन भर तीन रूपये का आदमी बना रहेगा और हमारी स्थिति कभी नहीं सुधरेगी. कादर खान पर अपनी माँ की बात का ऐसा असर हुआ कि उस दिन से वह पूरी तरह से पढने में डूब गये. उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक( इस्माइल युसुफ़ कॉलेज) और फिर परास्नातक ( इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स ) की पढ़ाई पूरी की.
कॉलेज की पढ़ाई की दौरान कादर खान साहब की रूचि अभिनय और लेखन में भी पैदा हो गयी थी. उनके लिखे नाटक बहुत लोकप्रिय हो गये थे. एक बार कॉलेज के वार्षिक समारोह में उनका एक नाटक " ताश के पत्ते" खेला जाना था. इस समारोह के मुख्य अतिथि थे महान अभिनेता दिलीप कुमार. जब नाटक हुआ तो कादर खान साहब की शानदार परफॉरमेंस से दर्शक बहुत प्रभावित हुए. दिलीप कुमार साहब को कादर खान साहब की काबिलियत नज़र आ गई और उन्होंने कादर खान से उसी वक़्त यह वादा किया कि वह जल्द ही कादर खान को अपनी फ़िल्म में मौक़ा देंगे.
बहरहाल वक़्त गुज़रता रहा. इसी बीच एक नाटक की प्रतियोगिता हुई, जहाँ कादर खान भी अपना नाटक " लोकल ट्रेन" लेकर पहुंचे. कादर खान इस प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना चाहते थे मगर जब उन्हें पता चला कि पुरुस्कार राशि 1500 रूपये है तो उन्हें इसमें भाग लेना पड़ा. कादर खान साहब को पैसों की सख्त ज़रूरत थी. खैर नाटक " लोकल ट्रेन" खेला गया और इसने बेस्ट एक्टर, बेस्ट स्क्रिप्ट, बेस्ट डायरेक्टर समेत सारे ख़िताब अपने नाम किए. कादर खान साहब को पूरे 1500 रूपये मिले. इस प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में निर्देशक नरेंद्र बेदी, राजेन्द्र सिंह बेदी, अभिनेत्री कामिनी कौशल जैसे हिंदी फ़िल्म जगत के बड़े लोग शामिल थे. नरेंद्र बेदी, कादर खान साहब के काम से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उसी समय कादर खान साहब को अपनी फ़िल्म " जवानी दीवानी" लिखने का ऑफ़र दिया.कादर खान ने झिझकते हुए कहा कि उन्हें स्क्रिप्ट, डायलॉग्स लिखने नहीं आते. इस बात पे नरेंद्र बेदी बोले कि तुम जो नाटक में बोलचाल की भाषा लिखते हो, वही संवाद लिखने की भाषा है. तुम्हें इस काम के 1500 रूपये मिलेंगे. कादर खान उस वक़्त एक टेक्निकल स्कूल "एम.एच साबू सिद्दीक पोलीटेक्निक" में पढ़ाते थे और 300 रूपये महीना उनकी तनख्वाह थी. ऐसे में 1500 रूपये एक बड़ी रकम थी.कादर खान ने नरेंद्र बेदी की बात मानी और फ़िल्म लिखने चले गये. तक़रीबन चार - पांच घंटे बाद जब कादर खान, नरेद्र बेदी के ऑफिस पहुंचे तो उन्हीने देखा कि नरेंद्र बेदी और बाक़ी लोग, वहां बियर पीकर बेसुध पड़े थे. नरेंद्र बेदी ने जब कादर खान को देखा तो उसी मदहोशी की हालत में बोले " इस गधे के बच्चे को लगता है कुछ समझ नहीं आया". इस बात को सुनकर कादर खान बोले" सर, गाली मत दीजिए, मैं गधे का बच्चा नहीं मेहनती आदमी हूँ, आपने लिखने को कहा तो मैं लिखकर लाया हूँ". यह सुनकर नरेंद्र बेदी चौंक गये. उन्हें यक़ीन ही नहीं हुआ कि कादर खान इतनी जल्दी फ़िल्म लिख के ले आए थे. नरेंद्र बेदी ने जब स्क्रिप्ट पढ़ी तो ख़ुशी से फूले न समाए. उन्होंने कादर खान को गले लगाया और उन्हें 1500 रूपये दिए. इसके बाद कादर खान का नाम पूरी मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री में हो गया.
इसी दौरान एक रोज़,कादर खान साहब के छात्र स्टूडियो के बाहर पहुँच गये. जब कादर खान स्टूडियो की शूटिंग के बाद बाहर आए तो छात्रों ने उन्हें घेर लिया और बोले " सर, आप तो यहाँ आ गये, वहां आपके जाने के बाद से हमको कोई नहीं पढ़ाने आता. सर प्लीज आप हमें पढ़ा दीजिए, वरना हम सब पास नहीं हो पाएँगे.
कादर खान बहुत दुविधा में पड़ गये. वह रात 11 बजे तक शूटिंग में व्यस्त रहते थे. अब किस तरह बच्चों को पढ़ाया जाए. ये बड़ी समस्या थी. अंत में तय किया गया कि कादर खान स्टूडियो से सीधा स्कूल पहुंचेंगे और फिर छात्रों को पढाएंगे. इसके बाद कादर खान साहब ने कई महीनों तक लगातार रात 12 बजे से सवेरे 6 बजे तक बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाया और सभी छात्र फर्स्ट क्लास पास हुए.
फ़िल्म " जवानी दीवानी" की कामयाबी के बाद कादर खान साहब की मुलाक़ात निर्माता रवि मल्होत्रा से हुई. उन्होंने कादर खान साहब को अपनी फ़िल्म लिखने का ऑफ़र दिया और इसके लिए 20 हज़ार रूपये देने की बात कही. फ़िल्म का नाम था " खेल खेल में". कादर खान साहब ने फ़िल्म लिखी और वह फ़िल्म भी बेहद कामयाब हुई. इसके बाद कादर खान साहब ने इब्राहीम नाडियाडवाला की फ़िल्म " रफूचक्कर" लिखी.
इन तीन फ़िल्मों ने कादर खान साहब को बहुत लोकप्रियता दिलाई. इसी शोहरत के कारण, कादर खान साहब को, उस वक़्त के मशहूर फ़िल्मकार मनमोहन देसाई साहब ने बुलाया.मनमोहन देसाई जब कादर खान से मिले तो उन्होंने कहा " देखो भाई, तुम मियाँ लोग ये शायरी, मुहावरे लिख के लाते हो, अगर तुम भी ऐसा ही लिख के लाए तो मैं स्क्रिप्ट को फाड़कर गटर में फेंक दूंगा". इस बात से कादर खान थोड़ा ताव में आकर बोले " और अगर बढ़िया लिखा तो ?". इस प्रश्न के जवाब में मनमोहन देसाई बोले " तो फिर मैं तुम्हें सर पर बैठाकर इस तरह से नाचूँगा, जैसे लोग गणपति महोत्सव के समय गणपति के मूर्ति को सर पर रखकर नाचते हैं.
इसके बाद कादर खान साहब ने मनमोहन देसाई की फ़िल्म " रोटी" का क्लाइमेक्स लिखा.मनमोहन देसाई ने जब स्क्रिप्ट पढ़ी तो बहुत खुश हुए. उन्होंने फ़ौरन सोने की घड़ी कादर खान दी. इसके साथ ही मनमोहन देसाई ने फ़िल्म लिखने के बदले कादर खान को एक लाख इक्कीस हज़ार रूपये दिए. यहाँ से शुरू हुई मनमोहन देसाई और कादर खान की जोड़ी ने अमर अकबर एंथोनी, कुली,सुहाग,देश प्रेमी, परवरिश,गंगा जमुना सरस्वती जैसी सुपरहिट फ़िल्में दी. इसके साथ ही कादर खान साहब ने मशहूर निर्देशक प्रकाश मेहरा के साथ मुक़द्दर का सिकंदर, शराबी, लावारिश जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में दी.अमिताभ बच्चन इन फ़िल्मों में बोले गए संवादों से सदी के महानायक के रूप में स्थापित हुए.
कादर खान साहब को अभिनय करने का पहला मौक़ा यश चोपड़ा साहब की फ़िल्म " दाग़" (1973) में मिला. उन्होंने फ़िल्म के वकील का किरदार निभाया.इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका में अभिनेता राजेश खन्ना, एक्ट्रेस राखी,शर्मिला टैगोर थे. फ़िल्म बेहद कामयाब साबित हुई इसके बाद सन 1976 में अमिताभ बच्चन के कहने पर कादर खान को फ़िल्म " अदालत" में इंस्पेक्टर खान का रोल मिला. यह फ़िल्म भी कामयाब रही.
इसके बाद कादर खान साहब ने बतौर खलनायक परवरिश,धन दौलत, लूटमार, बुलंदी,क़ुर्बानी, नसीब , कुली जैसी कामयाब फ़िल्में की. इस वक़्त तक कादर खान साहब टॉप के विलेन बन गये थे.मगर तभी कुछ ऐसा हुआ , जिससे उनकी ज़िंदगी में बदलाव आ गया.
कादर खान साहब के बच्चे एक दिन स्कूल से लौटे तो उनके कपडे जगह जगह से फटे हुए थे.बच्चों के शरीर पर खरोंच के निशाँ भी दिखाई दिए. जब कादर खान साहब ने अपने बच्चों से इस सबकी वजह पूछी तो बच्चे बोले " आप फ़िल्मों में हीरो को मारते हो, परेशां करते हो, आप विलेन के रूप में फिर आखिर में हीरो से पिटते हो, इसी बात को लेकर हमारे स्कूल के बच्चे हमारी मज़ाक़ बनाते हैं और इसलिए आज हमारी लड़ाई हो गयी. इस चीज़ से कादर खान साहब बहुत दुखी हुए. उन्होंने तय किया कि अगर उनके बच्चे नहीं चाहते तो वह विलेन का रोल अब से नहीं करेंगे. यह साल 1983 का था. उसी साल फ़िल्म " हिम्मतवाला" रिलीज़ हुई, जिसमें अभिनेता जीतेंद्र और अभिनेत्री श्री देवी मुख्य भूमिका में थीं. फ़िल्म सुपरहिट रही. फ़िल्म " हिम्मतवाला" में कादर खान साहब द्वारा निभाया गया मुनीम नारायणदास गोपालदास का किरदार बहुत लोकप्रिय हुआ. यह एक कॉमिक रोल था, जिससे कादर खान को बहुत सराहना मिली. बस इसके बाद फिर कादर खान साहब ने कुली नंबर वन, मिस्टर एंड मिसेज खिलाड़ी, राजा बाबू, हीरो नंबर वन जैसी बहुत कामयाब फ़िल्में की.
कादर खान साहब ने अपने फ़िल्मी सफ़र में तकरीबन 450 फ़िल्मों में अभिनय किया और लगभग 250 फ़िल्मों के संवाद लिखे. उन्हें तीन बार फ़िल्मफेयर पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया गया.कादर खान साहब ने हंसना मत, मिस्टर धनसुख नामक टीवी सीरियल में भी अभिनय किया.
कादर खान साहब को एक प्ले के दौरान हुई घटना के कारण, घुटने में गम्भीर चोट लग गई थी. बाद में घुटने की सर्जरी भी हुई मगर तकलीफ बरक़रार रही. अभी कुछ साल पहले कादर खान साहब अपने इलाज के सिलसिले में, अपने बेटे के पास कनाडा चले गये थे. वहीं उनका इलाज चल रहा था, मगर आज वो हमेशा हमेशा के लिए हम सभी को छोड़कर चले गये.
कादर खान साहब का जीवन संघर्षों और चुनौतियों से भरा हुआ था. उनके जीवन से हम सब यह सीख सकते हैं कि अगर इन्सान मेहनत करे तो वह सब कुछ हासिल कर सकता है.
कादर खान का जीवन, उनकी फ़िल्में, उनके लिखे संवाद आने वाले समय में कई पीढ़ियों को मेहनत, संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते रहेंगे.
 

मनीष पाण्डेय " आशिक़ " द्वारा लिखित

मनीष पाण्डेय " आशिक़ " बायोग्राफी !

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मनीष पाण्डेय " आशिक़ " उत्तराखंड राज्य के शहर हल्द्वानी के रहने वाले हैं.इन्होंने सन 2016 में कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग रूड़की से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्यूनिकेशन डिपार्टमेंट में बीटेक की पढाई पूरी की.कविताओं,कहानियों में रूचि रखते हैं.फ़िलहाल फ़िल्म पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर लेखन कर रहे हैं.

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पोस्ट की गई टिप्पणी -

हरे राम चौरसिया "मिन्टू"

03/Jan/2019
आशिक़ भाई आपने बहुत बढ़िया लिखा है, आज आपने एक ऐसे शख्सियत से मुख्तिब करवाया जिसको बहुत देखता था और गोविंदा सर के फ़िल्म में बहुत बार देखा और पसंद भी किया। आपका बहुत बहुत शुक्रिया स्व. कादर खान साहब से रूबरू करवाने के लिए। वैसे आप लिखते तो बहुत अच्छा हो और आज एक बार फिर से आपकी लेखन रंगत लायी है।। शुक्रिया मिन्टू

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हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

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