मानवीय सरोकारों की टकराहट से उत्पन्न कविताएं: शोध आलेख (दिनेश कुमार)

शोध- आलेख

दिनेश कुमार 547 2019-02-28

मानवीय सरोकारों की टकराहट से उत्पन्न कविताएं

       समकालीन हिंदी कविता संसार में रीतादास राम की काव्य-यात्रा का सफ़र गंभीर रूप से नब्बे के दशक से प्रारंभ होता है| अब तक इनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| पहला ‘तृष्णा’ 2012 में प्रकाशित हुआ तथा हिंदी कविता जगत में काफी चर्चित भी रहा है| ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ 2016 मेंहिन्द युग्म से प्रकाशित दूसरा कविता-संग्रह है| इसमें 2012 से 2016 के दौरान लिखी गई कविताओं को संग्रहीत किया गया है| ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ को वर्ष 2016 में ‘हेमंत स्मृति कविता सम्मान’ (हेमंत स्मृति फाउंडेशन, भोपाल, म.प्र.) से सम्मानित किया गया है| रीतादास राम के इस कविता-संग्रह की कविताओं से गुजरना अपने वर्तमान समय से बावस्ता होना है| इनकी कविताएँ वर्तमान मनुष्य के दैनिक जीवन की तमाम उलझनों, संघर्षों एवं विभिन्न समसामयिक मुद्दों की टकराहट से उत्पन्न हुई हैं जिसके दृश्य इन कविताओं में बखूबी दृष्टिगोचर हुए हैं|

            समकालीन काव्य परिदृश्य में दृष्टिपात किया जाये तो ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’एक अलहदे किस्म की कविताओं से लैश महत्वपूर्ण कविता-संग्रह हैं| इसकी पहली और महत्वपूर्ण कविता ‘किताबें’ शीर्षक से है जिसमें रीतादास ने वर्तमान समय में फैलाते हुए अंतर्जालीय वर्चस्व से पाठकों में किताबों से निरंतर बढ़ रही दूरी की चिंता को बेहद संजीदगी के साथ व्यक्त किया है- “पुस्तकालयों में/ अपनी उपयोगिता, आकलन/ और सही पहचान के लिए/ एक अदद पाठक को/ तरसतीं हैं|”1 रीतादास अपनी कविताओं में एक ओर जहाँ अपने ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण स्त्री जाति के अस्तित्व की तलाश की पैरवी तथा सवाल खड़े करतीं हैं तो वहीं दूसरी ओर उन तमाम सवालों को अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त करती हैं तथा उनकी पड़ताल कर स्त्री के अस्तित्व को स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास भी करती हैं| इनकी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्ष से जुड़े ऐसे तमाम पहलू देखे जा सकते हैं| जिन्हें हमारे समाज के लोग विस्मृत करते जा रहे हैं कि हम जिस औरत को वेश्या, चुड़ैल, डायन, देवी इत्यादि नामों से संबोधित करते हैं, उससे पहले वह एक स्त्री है, माँ है, बहिन है| सदियों से स्त्रियों को अपनी सुविधानुसार पुरुषों द्वारा तमाम व्याख्याएँ दी जाती रही हैं जिसे रीतादास ने ‘कौन हूँ मैं’ कविता में कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं कि “आप मुझे/  नारी कह सकते हैं/ वेश्या कह सकते हैं/ देवी कह सकते हैं/ डायन कह सकते हैं/ औरत हूँ न/ ये सारी व्याख्याएँ मेरी ही हैं|”2 पुरुषवादी समाज के तमाम अत्याचारों के सहने के बाद भी औरत किसी भी प्रकार से टूटी-बिखरी नहीं | उसने संघर्षपूर्ण जीवन से कभी हार नहीं मानी और पुरुष शक्ति या पौरुष अहंकार के बरक्स हमेशा विद्रोह का स्वर जारी रखा है| औरत की पराधीनता का काफी पुराना इतिहास रहा है जो आज भी अपनी जड़ें जमाये हुए है |

समकालीन हिंदी काव्य परिदृश्य में रीतादास राम की कविताएँ महत्वपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि वर्तमान समय में जहाँ चारों तरफ से मनुष्यता पर खतरा मंडरा रहा हो, समाज में स्त्री और प्रेम के लिए कोई जगह न रह गई हो वहाँ पर ये कविताएँ पूरी मुस्तौदी के साथ अपनी दस्तक देती हैं और अपनी उपस्तिथि दर्ज कराती हैं, जो एक रचनाकार होने के नाते साहित्य, समाज और मनुष्यता के लिए बेहद जरुरी कार्य है| इसलिए रीतादास राम की कविताओं का बोध एकायामी न होकर बहुयामी है| क्योंकि ये कविताएँ एक विस्तृत कैनवास को लेकर रची गईं हैं, जिनमें मनुष्य तथा समाज की वर्तमान स्थिति की गहन संवेदनात्मक यथार्थपरक अभिव्यक्ति हुई है| साथ ही भविष्य में आने वाली तमाम परिस्थितियों की ओर ध्यान आकृष्ट कर नुकसानदेह परिस्थितियों से आगाह भी कराती हैं|

‘डर’कविता में पुरुषवादी सत्ता के द्वारा स्त्रियों के शारीरिक, मानसिक शोषण और दमन की प्रक्रिया, अमानवीयता एवं वर्चस्व की जड़ों को उखाड़कर अपने अस्तित्व को कायम करने का पुरजोर प्रयास किया है| वे लिखती हैं कि­ “परास्त होते हुए/ चिथड़े लिए अंजुली में/ अपनी औकात के/ देखती है औरत/ तमाम हार के बाद/ जीतती हुई|"3 रीतादास अपनी कविताओं के मार्फ़त एक ओर जहाँ पुरातन भारतीय संस्कृति का समर्थन करती हैं वहीं दूसरी ओर समाज में व्याप्त तमाम दुर्व्यवस्थाओं पर कुठाराघात भी करती हैं| ‘अस्मत’ कविता में उन्होंने हजारों वर्षों से स्थापित स्त्री स्वतंत्रता और उसके सामाजिक, आर्थिक विकास के विरुद्ध तमाम पुरुषवादी वर्चस्व की मान्यताओं पर गंभीर कटाक्ष किया है| वे समाज में व्याप्त सती प्रथा, बलात्कार जैसी पुरुष प्रधान समाज की दकियानूसी मानसिकता पर अपना प्रतिरोध जाहिर करती हैं| रीतादास अपनी कविताओं के मार्फ़त नारी शोषण के विरुद्ध पैरवी करती हुई शिद्दत के साथ खड़ी हुई हैं तथा अपमानित होती स्त्रियों के दर्द को भी साहित्यिक पटल पर रखती हैं| वे अपनी कविताओं के माध्यम से समाज की प्रत्येक औरत के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध कवयित्री के रूप में देखी जा सकती हैं| वे कहती हैं कि आखिर कब तक स्त्रियों को ज़िल्लत भरी ज़िन्दगी गुजारनी होगी|‘अस्मत’ कविता में लिखती हैं कि “उठाकर बिठाना है/ हर ओर नारी को/ न खेत में अपमानित हो/ न कार्यालय में/ न देश में हो, न विदेश में/ अपमान झेलना ज़िल्लत पाटना/ आखिर कब तक ?”4 वहीं दूसरी ओर स्त्रियों को ही प्रेरणा व संबल प्रदान करती है कि“औरत को ही लड़नी होगी/ अपनी लड़ाई अपने तरीके से|”5 आगे ‘नारी’ कविता में सीधी और सटीकता के साथ कहती हैं कि “न भरमाइए कहकर कि/ कमज़ोर नहीं शक्ति है वह/ निचोड़ रखा है सारा/ उसे समाज ही ने”6 यहाँ गौरतलब यह है कि रीतादास स्त्री जीवन के तीन पक्षों को सामने रखती हैं जिसमें अपमानित स्र्तियों के सम्मान देने की बात करती हैं| दूसरी यह कि जो सहानुभूति जाहिर करते हुए कुत्सित मानसिकता से ग्रसित समाज के लोग हैं उन्हीं समाज के ठेकेदारों ने स्त्री की हालत बद-से-बदतर की है| इसलिए फिर वह कहती हैं कि औरत को ही लड़नी होगी, अपनी लड़ाई अपने तरीके से| अब वह समय बीत गया जिसमें कि महज़ पुरुषों की ही मनमानी और उनका ही अंतिम निर्णय होता था| क्योंकि आज की स्त्रियाँ अपने जीवन का निर्णय खुद करती हैं| आज की स्त्रियों ने पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होना एवं अधिकारों के प्रति सजगता भी आई है|

 ‘आखिर किस सुख को तरसे मन’ एक विस्तृत कैनवास में रची गई कविता है, जिसमें वर्तमान समय एवं समाज में व्याप्त मनुष्यता एवं अस्मिता के विभिन्न खतरों की गंभीरता पूर्वक मार्मिक एवं संवेदनात्मक अभिव्यक्ति बेहद संजीदगी के साथ परिलक्षित हुई है| इसमें संस्कृति के बचाव और सामाजिक विकास के नाम पर पूँजीपतियों और राजनेताओं के गठजोड़ से उत्पन्न षड्यंत्रकारी योजनाओं का पर्दाफाश किया गया है जिसमें गरीब मजदूरों से उनकी जमीन एवं जीवन के मूलभूत अधिकारों से बेदखल लोगों के दुःख दर्द को व्यक्त किया गया है| समाज के पूँजीपति विभिन्न प्रलोभनों द्वारा ऊँचे दामों में गरीबों की ज़मीनें हड़पकर उनके अधिकारों से दरकिनार कर दिया जा रहा है| गरीब मजदूरों की ज़मीन हड़पकर विशालकाय आसमान छूते हुए मल्टीप्लेक्स एवं फ़्लाइओवर आदि का निर्माण किया जा रहा है जिससे कि मजदूरों के समक्ष मुफलिसी की जद्दोजहद के साथ-साथ विस्थापन जैसी भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है| वे लिखती हैं कि-“विकास की राजनीति पर/ गरीबों का विस्थापन/ अच्छों के प्रस्थापन का प्रलोभन/ दरकिनार कर स्थानीय संस्कृति/ मॉल मल्टीप्लेक्स का बोलबाला/ मेट्रो और मोनोंरेल का मकडजाल/ फ़्लाइओवर, हाइवे से अटा पड़ा संसार/ परिवर्तन के इस जंगल में/ गढ़ने को अपनी बेहतर पहचान|”7इन कविताओं पूँजी के वर्चस्व के सम्मुख मनुष्य के लगातार बौने और पराजित होते जाने की प्रमुख चिंता शिद्दत के साथ दृष्टव्य हुई है|

दरअसल, रीतादास की कविताओं में वैचारिक चिंतन एवं समय के साथ मुठभेड़ इतनी व्यापक और मानवीय इसलिए प्रतीत होती है क्योंकि उनकी कविताओं में एक छोटे जीव से लेकर मनुष्य और मनुष्यता पर हावी संकटों पर गंभीर चिंतन किया गया है तथा सरल सहज और सम्प्रेषणीय भाषिक अभिव्यक्ति हुई है|  समकालीन भारतीय समाज में मनुष्य विरोधी परिस्थितियों एवं तमाम शक्तियों का एक ऐसा जाल बिछा हुआ है जिसमें मनुष्यता को दरकिनार कर एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा रहा है जिसमें मनुष्य तो रहेंगे लेकिन महज तमाशाई बनकर| रीतादास वर्तमान समय और मनुष्य की तकलीफ़, उसके साथ हो रहे तमाम षड्यंत्रकारी अभियोजनों का पर्दाफाश करती हैं तथा मनुष्य के सुन्दर एवं सुखद जीवन की कामना करती हैं| रीतादास वर्तमान समाज की परिवर्तनकामी शिक्षा व्यवस्था और बढती हुई बेरोजगारी पर चिंता जाहिर करते हुए, हमारे समाज में संलिप्त भ्रष्ट और गैरकानूनी धंधों को बढ़ावा देने वाली स्थिति से बाकिफ कराती हैं तथा समाज में चल रही तमाम अमानवीय और भ्रष्टताओं की हरकतों को अपनी कविता की जद में लेते हुए कहती हैं कि “बदलती शिक्षा नीति पालकों पर बढ़ता दबाव/ सर्वोच्च सफलता का ध्येय कर रहा बेहाल/ दृष्टिगत होता उम्मीद का बोझ मासूमों पर/ साक्षरता का बढ़ता ग्राफ़ बढती, बेरोज़गारी/ डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेशनल होने की चाहत सर्वोपरि/ परिणामतः शिक्षा ख़रीदता समाज का भ्रष्ट वर्ग/ बिकती डिग्री, शिक्षक, पेपर,एडमिशन/ आखिर किस सुख को तरसे मन|”8

आज हम आधुनिकता के उत्कर्ष पर आकर अपने अतीत से मुँह मोड़ रहे हैं उसे निरंतर अस्वीकारते जा रहे हैं| अपने अतीत को भुलाकर एक ऐसा संसार रचने में व्यस्त हैं जिसका कोई अस्तित्व रहेगा या नहीं भी यह कह सकना संदेहपूर्ण है| कविता हमारे समूचे संश्लिष्ट व्यक्तित्व की परिचायक होती है| वह मनुष्य की ज़िन्दगी के मर्म की पारदर्शी भी होती है इसलिए कवि अपनी कविताओं के द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनता है| कविता मनुष्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं की ओर भी इशारा करती है| एक सच्चा कवि वही होता है जो अतीत से सीखता हुआ वर्तमान को दर्ज करता है तथा भविष्य में आने वाले तमाम खतरों से बाकिफ भी कराता है| इस मानी देखा जाये तो रीतादास की कविताएँ गौरतलब हैं| वे अपनी कविताओं में अपने समाज की विभिन्न परिस्थितियों से हमें रू-ब-रू कराती हैं| इसी के आलोक में ‘आखिर किस सुख को तरसे मन’ कविता का महत्वपूर्ण अंश दृष्टव्य है “कहाँ जा रहा देश ? कैसी हमारी सरकार ?/ कैसी हो रही संस्कृति ? कहाँ है इंसानियत ?/ कैसी सामाजिक व्यवस्था ? कैसा हो चला समाज ?/ धोखाधड़ी, जालसाजी, बेईमानी, रिश्वतखोर/ इस दलदल में तैरते-तैरते खोती सामाजिक सभ्यता/ गरीब-अमीर,साक्षर-निरक्षर, सभी-असभ्य/ क्या नर, क्या नारी,क्या बच्चे,क्या बूढ़े/ साक्षात् सदृश्य देख सबको मन में कौंधता एक विचार/ क्या है उन्नति ? एक ध्येय का पीछा ! एक पागलपन !/ या सिर्फ हवस|”9 इसी के आलोक में रंजना शरण अपने वक्तव्य में कहती हैं कि “इस संग्रह की कविताएँ एक व्यापक परिदृश्य को लेकर चली हैं| स्त्री-जीवन से अलग भी देश और समाज से जुड़े समसामयिक बिन्दुओं को उठाया गया है| जैसे किसानों की आत्महत्या, भूकंप, गाँवों का विकास, टूटती हुई संस्कृति, देश, सरकार, शहर और महानगरों के खट्टे-मीठे एहसास बगैरह|”10

‘तबस्सुम’ यह एक संवादात्मक शैली में लिखी बेहद मार्मिक कविता है जिसमें महज़ मुंबई की लड़की ‘तबस्सुम’ के जीवन संघर्ष की कहानी वयान नहीं हुई है बल्कि ‘तबस्सुम’ के मार्फ़त भारत के समस्त निम्न मध्यवर्गीय समाज की लड़कियों और स्त्री की दारुण दशा का मार्मिक ढंग से चित्रण किया है| शहर में रहने वाले बेरोजगार परिवारों की आर्थिक हालत अच्छी न होने से छोटी-छोटी बच्चियों को पास की कालोनियों में झाड़ू, पौंछा, बर्तन और खाना बनाने के काम पर लगा दी जाती हैं| जब किसी के खाने-खेलने और पढने के दिन हों और काम दिया जाए तो वह कैसे कुछ लिख-पढ़ सकता है ? “उसने तान दी थी आवाज/ हर दिन का येईच रोना/ अभी नवीं में गई है मैं/ घर में पढने के लिए/ टाइम ईच नहीं मिलता/ कितना काम होता है/ खाना, बर्तन, कपड़ा, झाड़ू सब/ चुपचाप करती मैं|”11 एक स्त्री का यही ‘चुपचाप रहना’ ही स्त्रियों की तमाम इच्छाओं के दमन का कारण होता है लेकिन वे भी क्या करें बेचारीं| घर की माली हालत देखते हुए कुछ कह नहीं पाती, अन्दर ही अन्दर अपने दर्द को सहन करते हुए जीती रहती हैं| “पानी” कविता में कवयित्री ने समाज के सच को एक दृश्य के रूप में खींचने का सार्थक प्रयास किया है जिसमें किसानों की तमाम आकांक्षाएँ, गंगा की पवित्रता, समुद्र के पानी का खारापन, बाढ़ की वीभत्सता, अचानक उठी हुई सुनामी का अचरज, मंदिर में पड़ी लाशों का शोर, झील की खामोशियाँ, मोतियों की चमक, समुद्र में दौड़ती लहरों की गति, रास्ते के कीचड की नमी, गीली रेत का अद्भुत सौन्दर्य आदि सभी कुछ समाहित है|

            ‘मज़दूरी’ कविता में रीतादास ने समाज में सदियों से जड़ जमाये बैठे हुए शोषण एवं दमनकारियों की प्रवृत्ति को उजागर किया है| दिन-दिन भर कम करने के बावजूद भूखे पेट के लिए मज़दूर दो जून की रोटी को मोहताज़ हैं| ठेकेदार पगार देते हुए ऐहसान जताते हैं जैसे मुफ़्त के पैसे दे रहे हों और गरीब बेचारे चुपचाप अपनी क्षुदा शांत करने के उपाय खोजने निकल जाते हैं| वे लिखती हैं कि “एक फटकार के साथ/ लेता है मज़दूरी/ जैसे खैरात/ भूलता प्यास/ चला जाता है/ भूख कम करने की/ तरकीब सोचता हुआ|”12 यहाँ गौरतलब है कि हमारे देश में विदेशियों के चंगुल से मुक्त, बंधुआ मज़दूरी के ख़त्म होने और आजादी के पश्चात् भी मज़दूरों के हालात ज्यों के त्यों हैं जिसे रीतादास ने अपनी कविताओं में उनके अधिकारों की माँग का समर्थन किया है| ‘किसान’ कविता में रीतादास ने वर्तमान समय में किसानों की दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों की चिंता का दुःख भी प्रकट हुआ है| वे लिखती हैं कि “किसान/ किसान मर रहे हैं/ सुन रहे हैं हम/ उनका मरना/ क्या होता है मरना....जाने बिना|”13

इस कविता-संग्रह में ‘औरत’ शीर्षक से क्रमशः पाँच कविताएँ हैं जिसमें ‘औरत-5’ कविता में रीतादास ने घरेलु कामकाजी महिलाओं के दुःख दर्द को गहन संवेदनात्मकता प्रकट की है जिसमें एक औरत दूसरों की ख़ुशी के लिए अपने कामों में भी सुख की तलाश करती हुई नज़र आई हैं| “औरत ढूँढ लेगी/ अपना सुख/ एक जलती हुई/ कढ़ाई में/ जली हुई सब्जी में/ कोयले की राख-सा/ करके अपने ज़ज्बात|”14 एक साहित्यिक रचनाकार होने के नाते रीतादास कविताएँ लिखना एक बड़ी ज़िम्मेदारी के तौर पर मानती हैं| वह अपनी कविताओं में एक ऐसे समाज की कल्पना करती हैं जिसमें कि सभी के लिए जीवन की तमाम मूलभूत ज़रूरतें उपलब्ध हों| रीतादास ने अपनी कविताओं में शिद्दत के साथ हमेशा एक नई ज़मीन को तलाशने की सार्थक कोशिश की है| इनकी कविताओं में अतीत के जख्म और भविष्य की चिंताएँ स्पष्टतः दृष्टिगोचर हुई हैं| रीतादास की इन कविताओं के सन्दर्भ में माधुरी छेड़ा कहती हैं कि “अपनी अभिव्यक्ति के लिए रीता ने प्रकृति से लेकर आधुनिक जीवन, टेकनोलॉजी और साथ ही स्त्री-भाषा का इस्तेमाल कर रचनाओं को नई अर्थवत्ता दी है| अभिनव प्रस्तुतीकरण रीता की रचनाओं को नई ताज़गी देता है और एक रचनाकार के रूप में उसे एक मौलिक पहचान भी|”15

जयशंकर प्रसाद सभागार मुंबई में रीतादास के ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ कविता संग्रह के विमोचन कार्यक्रम में बतौर अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ कवि आलोचक मंगलेश डबराल कहते हैं कि “काल को लेकर प्रतिक्रिया देने की क्षमता लेखिका में है, इसी वजह से उनकी कविताएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं| वहीं साहित्यकार नलिन रंजन कहते हैं कि ‘हाशिए के वर्ग जैसे- स्त्री, मजदूर व बाल श्रमिक पर लेखिका की लिखी गई कविताएँ महत्वपूर्ण हैं|’ इसी कार्यक्रम में डॉ. मुक्ता टंडन कहती हैं कि ‘यह काव्य-संग्रह जीवन के अनुभव और सत्य का मिश्रण हैं| इसकी हर कविता अपने अन्दर क्रांति और जागरूकता को समेटे हुए है|’

कविता का प्रभाव उसकी रचनात्मक भाषा की कसौटी पर ही संभव हो पाता है क्योंकि वह भाषा ही है जो कविता को उसके उत्कर्ष तक पहुँचाने में अपनी अहम् भूमिका अदा करती है | कविता की भाषा के लिए बेहद जरुरी है शब्दों का चयन, सम्पूर्ण कविता महज शब्दों का ही खेल है जिसके मार्फ़त कवि अपने भावों और जीवनानुभवों को शब्दरूप में अभिव्यक्त कर पाते हैं | कवयित्री रीतादास राम अपनी कविताओं में प्रयुक्त भाषा बहुत ही सजग और आधुनिक शब्दावलियों का प्रयोग किया है | इनकी काव्य-भाषा में अपने अतीत की गंध आती है और आधुनिकता से लैश नवीन शब्दों का प्रयोग भी शामिल है जिसका एक पृथक शिल्पगत वैशिष्ट्य है| वैसे देखा जाये तो आज हमारे समाज का व्यापक विस्तार हुआ है | विभिन्न औद्योगीकरण और सूचना तकनीकी के विकास ने हमारी दूरियों को ख़त्म कर दिया है, जिसका प्रभाव साहित्य में दिखना स्वाभाविक ही है| रीतादास राम स्वयं अपनी कविताओं की रचनात्मक प्रक्रिया के सन्दर्भ में कहती हैं कि ‘मेरी कविता समाज को अपनी निगाह से देखने का बयान है| प्रकृति, समाज, सामाजिक रिश्ते, मेरा माहौल, गरीबी, मर्द-औरत के सम्बन्ध, औरत की दयनीय स्थिति और आन्तरिक वेदना मुझे प्रभावित करती रही है| एक आतंरिक चोट को सहेजती है मेरी अनुभूति| मनन की प्रक्रिया सतत क्रियाशील रहती है जब तक दंश की अनुभूति शब्दों द्वारा कविता की प्रक्रिया पूर्ण न कर लें|’

मनुष्य को जीने के लिए महज़ चीजों और तौर-तरीकों से युक्त वातावरण भर नहीं चाहिए हमें कुछ और भी चाहिए | थोडा सा दुःख, बहुत सारी यादें, बहुत सारे विचार, भावनायें, प्रेम और जीवनासक्ति | रीतादास की कविताएँ वर्तमान मनुष्य जीवन के विभिन्न अंतर्विरोधों की पड़ताल करती हैं तथा अपनी कविताओं में अपने भाषाई बौद्धिक संयम से उन तमाम अंतर्विरोधों का अन्वेषण भी करती हैं| एक जिम्मेदार रचनाकार होने के नाते रीतादास ने समकालीन सामाजिक सरोकारों से जुड़े अहम् मुद्दों को अपनी कविताओं में प्रमुखता के साथ दर्ज किया है| वर्तमान समय में एक औरत महज औरत नहीं रही है, वह पुरुषवादी समाज द्वारा पूर्व निर्धारित तमाम मानदंडों का अतिक्रमण करते हुए पुरुष के बराबर दृणसंकल्पित खड़ी होकर एक इन्सान के रूप में अपने अस्तित्व को स्थापित करने के लिए अग्रसर है जिसे रीतादास की कविताओं में बखूबी देखा जा सकता है| इन कविताओं में  निर्मम उपभोक्तावादी समय की अमानवीयताक्रूरता और क्षुद्र स्वार्थों के बरक्स संवेदनशीलता और तमाम त्रासदियों के बावजूद मानवीय मूल्यों की पड़ताल कर उन्हें साहित्य एवं समाज में स्थापित करने का प्रयास परिलक्षित हुआ है| इन कविताओं में कथ्य के स्तर पर अदृश्य सी लगने वाली जीवन की वास्तविक कटु सच्चाईयों को उजागर करने का सार्थक प्रयास दृष्टिगोचर हुआ है| साथ ही गहन मानवीय संवेदनाओं की अर्थवान छवियों के संकेत भी मिलते हैं|

वर्तमान समय में यदि हम समकालीन हिंदी कविता संसार पर दृष्टिपात करते हैं तो रीतादास राम ने अपने कविता-संग्रह ‘गीली मिट्टी के रूपाकार’ में समय बोध एवं समसामयिक मुद्दों से अनुप्रेरित मानवीय संवेदनाएँ, कल्पनाशीलता एवं समकालीन सरोकारों का शिद्दत के साथ तादाम्य स्थापित कर एक भावपूर्ण रचना संसार निर्मित करने की सार्थक कोशिश की है|

सन्दर्भ सूची -

1   राम, रीतादास, गीली मिट्टी के रूपाकार, हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ - 11

2   वही,  पृष्ठ - 12    

3   वही,  पृष्ठ - 14

4   वही, पृष्ठ - 24 

5   वही, पृष्ठ - 24

6   वही, पृष्ठ - 42

7   वही, पृष्ठ - 28

8   वही, पृष्ठ - 29 

9   वही, पृष्ठ - 30

10  शरण, रंजना, ‘चौराहा’ पत्रिका, अंक -जनवरी-जून, 2017, पृष्ठ - 52

11  राम, रीतादास, गीली मिट्टी के रूपाकार, हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ - 35

12  वही, पृष्ठ - 47

13   वही, पृष्ठ - 77  

14   वही, पृष्ठ - 72

15   छेडा, माधुरी,  ‘शिवना साहित्यिकी’ (पत्रिका) सीहोर (म.प्र.), अंक-अप्रैल-जून 2017, पृष्ठ - 40

दिनेश कुमार द्वारा लिखित

दिनेश कुमार बायोग्राफी !

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