तीन प्रश्न : कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

कथा-कहानी कहानी

लियो टॉलस्टॉय 105 2020-03-26

लियो टॉलस्टॉय उन्नीसवीं सदी के सर्वाधिक सम्मानित लेखकों में से एक हैं । उनका जन्म रूस के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था । उन्होंने रूसी सेना में भर्ती होकर क्रीमियाई युद्ध में भाग लिया, लेकिन अगले ही वर्ष सेना छोड़ दी । लेखन के प्रति उनकी रुचि सेना में भर्ती होने सी पहले ही थी । आपने युद्ध और शांति तथा अन्नाकेरेनिन्ना जैसी विश्व प्रसिद्ध किताबें लिखीं और अनेक कहानियाँ । तात्कालिक समय में लिखीं आपकी कहानियों से गुजरते हुए वे कहानियाँ वर्तमान समय के ताज़ा हालातों पर लिखी गई जान पड़ती हैं । यही कारण है कि आपकी कहानियाँ आज भी उतनी ही रोचक और वक़्त की नब्ज में धड़कती महसूस होती हैं । आज पढ़ते हैं आपकी ऐसी ही एक कहानी ......। - संपादक

तीन प्रश्न 



यह कहानी उस राजा की है जो अपने तीन प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था।

तो, एक बार एक राजा के मन में आया कि यदि वह इन तीन प्रश्नों के उत्तर खोज लेगा तो उसे कुछ और जानने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी।

पहला प्रश्न: किसी भी कार्य को करने का सबसे उपयुक्त कौन सा है?

दूसरा प्रश्न: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है?

तीसरा प्रश्न: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?

राजा ने यह घोषणा करवाई कि जो भी व्यक्ति उपरोक्त प्रश्नों के सही उत्तर देगा उसे बड़ा पुरस्कार दिया जाएगा। यह सुनकर बहुत से लोग राजमहल गए और सभी ने अलग-अलग उत्तर दिए। पहले प्रश्न के उत्तर में एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को एक समय तालिका बनाना चाहिए और उसमें हर कार्य के लिए एक निश्चित समय नियत कर देना चाहिए तभी हर काम अपने सही समय पर हो पायेगा। दूसरे व्यक्ति ने राजा से कहा कि सभी कार्यों को करने का अग्रिम निर्णय कर लेना उचित नहीं होगा और राजा को चाहिए कि वह मनविलास के सभी कार्यों को तिलांजलि देकर हर कार्य को व्यवस्थित रूप से करने की ओर अपना पूरा ध्यान लगाये।

किसी और ने कहा कि राजा के लिए यह असंभव है कि वह हर कार्य को दूरदर्शिता पूर्वक कर सके। इसलिए राजा को विज्ञजनों की एक समिति का निर्माण करना चाहिए जो हर विषय को परखने के बाद राजा को यह बताये कि उसे कब क्या करना है। फिर किसी और ने यह कहा कि कुछ मामलों में त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं और परामर्श के लिए समय नहीं होता लेकिन ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की सहायता से राजा यदि चाहे तो किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा सकता है।

दूसरे प्रश्न के उत्तर के लिए भी कोई सहमति नहीं बनी। एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को प्रशासकों में अपना पूरा विश्वास रखना चाहिए। दूसरे ने राजा से पुरोहितों और संन्यासियों में आस्था रखने के लिए कहा। किसी और ने कहा कि चिकित्सकों पर सदैव ही भरोसा रखना चाहिए तो किसी ने योद्धाओं पर विश्वास करने के लिए कहा।

तीसरे प्रश्न के जवाब में भी विविध उत्तर मिले। किसी ने कहा कि विज्ञान का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है तो किसी ने धर्मग्रंथों के पारायण को सर्वश्रेष्ठ कहा। किसी और ने कहा कि सैनिक कौशल में निपुणता होना ही सबसे ज़रूरी है।

राजा को इन उत्तरों में से कोई भी ठीक नहीं लगा इसलिए किसी को भी पुरस्कार नहीं दिया गया। कुछ दिन तक चिंतन-मनन करने के बाद राजा ने एक महात्मा के दर्शन का निश्चय किया। वह महात्मा एक पर्वत के ऊपर बनी कुटिया में रहते थे और सभी उन्हें परमज्ञानी मानते थे।

राजा को यह पता चला कि महात्मा पर्वत से नीचे कभी नहीं आते और राजसी व्यक्तियों से नहीं मिलते थे। इसलिए राजा ने साधारण किसान का वेश धारण किया और अपने सेवक से कहा कि वह पर्वत की तलहटी पर लौटने का इंतज़ार करे। फिर राजा महात्मा की कुटिया की ओर चल दिया।

महात्मा की कुटिया तक पहुँचने पर राजा ने देखा कि वे अपनी कुटिया के सामने बने छोटे से बगीचे में फावड़े से खुदाई कर रहे थे। महात्मा ने राजा को देखकर सर हिलाया और खुदाई करते रहे। बगीचे में काम करना उनके लिए वाकई कुछ कठिन था, वे वृद्ध हो चले थे। हांफते हुए वे जमीन पर फावड़ा चला रहे थे।

राजा महात्मा तक पहुंचा और बोला, “मैं आपसे तीन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता हूँ। पहला: किसी भी कार्य को करने का सबसे अच्छा समय क्या है? दूसरा: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है? तीसरा: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?

महात्मा ने राजा की बात ध्यान से सुनी और उसके कंधे को थपथपाया और खुदाई करते रहे। राजा ने कहा, “आप थक गए होंगे। लाइए, मैं आपका हाथ बंटा देता हूँ।” महात्मा ने धन्यवाद देकर राजा को फावड़ा दे दिया और एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए बैठ गए।

दो क्यारियाँ खोदने के बाद राजा महात्मा की ओर मुड़ा और उसने फिर से वे तीनों प्रश्न दोहराए। महात्मा ने राजा के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया और उठते हुए कहा, “अब तुम थोड़ी देर आराम करो और मैं बगीचे में काम करूंगा।” लेकिन राजा ने खुदाई करना जारी रखा। एक घंटा बीत गया, फिर दो घंटे। शाम हो गयी। राजा ने फावड़ा रख दिया और महात्मा से कहा, “मैं यहाँ आपसे तीन प्रश्नों के उत्तर पूछने आया था पर आपने मुझे कुछ नहीं बताया। कृपया मेरी सहायता करें ताकि मैं समय से अपने घर जा सकूं।”

महात्मा ने राजा से कहा, “क्या तुम्हें किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई दे रही है?”। राजा ने आवाज़ की दिशा में सर घुमाया। दोनों ने पेड़ों के झुरमुट से एक आदमी को उनकी ओर भागते आते देखा। वह अपने पेट में लगे घाव को अपने हाथ से दबाये हुए था। घाव से बहुत खून बह रहा था। वह दोनों के पास आकर धरती पर गिर गया और अचेत हो गया। राजा और महात्मा ने देखा कि उसके पेट में किसी शस्त्र से गहरा वार किया गया था।राजा ने फ़ौरन उसके घाव को साफ़ किया और अपने वस्त्र को फाड़कर उसके घाव पर बाँधा ताकि खून बहना बंद हो जाए। कपड़े का वह टुकड़ा जल्द ही खून से पूरी तरह तर हो गया तो राजा ने उसके ऊपर दूसरा कपडा बाँधा और ऐसा तब तक किया जब तक खून बहना रुक नहीं गया।

कुछ समय बाद घायल व्यक्ति को होश आया और उसने पानी माँगा। राजा कुटिया तक दौड़कर गया और उसके लिए पानी लाया। सूरज अस्त हो चुका था और वातावरण में ठंडक आने लगी। राजा और महात्मा ने घायल व्यक्ति को उठाया और कुटिया के अन्दर बिस्तर पर लिटा दिया। वह आँखें बंद करके चुपचाप लेटा रहा। राजा भी पहाड़ चढ़ने और बगीचे में काम करने के बाद थक चला था। वह कुटिया के द्वार पर बैठ गया और उसे नींद आ गयी। सुबह जब उसकी आँख खुली तब सूर्योदय हो चला था और पर्वत पर दिव्य आलोक फैला हुआ था।

एक पल को वह भूल ही गया कि वह कहाँ है और वहां क्यों आया था। उसने कुटिया के भीतर बिस्तर पर दृष्टि डाली। घायल व्यक्ति अपने चारों ओर विस्मय से देख रहा था। जब उसने राजा को देखा तो बहुत महीन स्वर में बुदबुदाते हुए कहा, “मुझे क्षमा कर दीजिये”।

“लेकिन तुमने क्या किया है और मुझसे क्षमा क्यों मांग रहे हो”, राजा ने उससे पूछा।

“आप मुझे नहीं जानते पर मैं आपको जानता हूँ। मैंने आपका वध करने की प्रतिज्ञा ली थी क्योंकि पिछले युद्ध में आपने मेरे राज्य पर हमला करके मेरे बंधु-बांधवों को मार डाला और मेरी संपत्ति हथिया ली। जब मुझे पता चला कि आप इस पर्वत पर महात्मा से मिलने के लिए अकेले आ रहे हैं तो मैंने आपकी हत्या करने की योजना बनाई। मैं छुपकर आपके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था पर आपके सेवक ने मुझे देख लिया। वह मुझे पहचान गया और उसने मुझपर प्रहार किया। मैं अपने बचाव के लिए भागता हुआ यहाँ आ गया और आपके सामने गिर पड़ा। मैं आपकी हत्या को उद्यत था पर आपने मेरे जीवन की रक्षा की। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपके उपकार का मोल कैसे चुकाऊँगा। मैं जीवनपर्यंत आपकी सेवा करूंगा और मेरी संतानें भी सदैव आपके कुल की सेवा करेंगीं। कृपया मुझे क्षमा कर दें”।

राजा यह जानकर बहुत हर्षित हुआ कि प्रकार उसके शत्रु का रूपांतरण हो गया। उसने न केवल उसे क्षमा कर दिया बल्कि उसकी संपत्ति लौटाने का वचन भी दिया और उसकी चिकित्सा के लिए अपने सेवक के मार्फ़त अपने निजी चिकित्सक को बुलावा भेजा। सेवक को निर्देश देने के बाद राजा महात्मा के पास अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पुनः आया। उसने देखा, महात्मा पिछले दिन खोदी गयी क्यारियों में बीज बो रहे थे।

महात्मा ने उठकर राजा से कहा, “आपके प्रश्नों के उत्तर तो पहले ही दिए जा चुके हैं।”

“वह कैसे?”, राजा ने चकित होकर कहा।

“कल यदि आप मेरी वृद्धावस्था का ध्यान करके बगीचे में कार्य करने में मेरी सहायता नहीं करते तो आप वापसी में घात लगाकर बैठे हुए शत्रु का शिकार बन जाते। तब आपको यह खेद होता कि आपको मेरे समीप अधिक समय व्यतीत करना चाहिए था। अतः आपका कल बगीचे में कार्य करने का समय ही सबसे उपयुक्त था। आप जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिले वह मैं ही था। और आपका सबसे आवश्यक कार्य था मेरी सहायता करना। बाद में जब घायल व्यक्ति यहाँ चला आया तब सबसे महत्वपूर्ण समय वह था जब आपने उसके घाव को भलीप्रकार बांधा। यदि आप ऐसा नहीं करते तो रक्तस्त्राव के कारण उसकी मृत्यु हो जाती। तब आपके और उसके मध्य मेल-मिलाप नहीं हो पाता। अतः उस क्षण वह व्यक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण था और उसकी सेवा-सुश्रुषा करना सबसे आवश्यक कार्य था।”

“स्मरण रहे, केवल एक ही समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और वह समय यही है, इस क्षण में है। इसी क्षण की सत्ता है, इसी का प्रभुत्व है। सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही है जो आपके समीप है, आपके समक्ष है, क्योंकि हम नहीं जानते कि अगले क्षण हम किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने के लिए जीवित रहेंगे भी या नहीं। और सबसे आवश्यक कार्य यह है कि आपके समीप आपके समक्ष उपस्थित व्यक्ति के जीवन को सुख-शांतिपूर्ण करने के प्रयास किये जाएँ क्योंकि यही मानवजीवन का उद्देश्य है।”

प्रतीकात्मक चित्र google से साभार 

लियो टॉलस्टॉय द्वारा लिखित

लियो टॉलस्टॉय बायोग्राफी !

नाम : लियो टॉलस्टॉय
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

लियो टॉलस्टॉय का जन्म ९ सितम्बर १८२८ रूस में हुआ 

आपकी मृत्यु २० नवंबर १९१० में हुई 

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

लियो टॉलस्टॉय 23 2020-03-28

‘वह निराश होकर घर को लौट पड़ा। राह में सोचने लगा—कितने अचरज की बात है कि मैं सारे दिन काम करता हूं, उस पर भी पेट नहीं भरता। चलते समय स्त्री ने कहा था कि वस्त्र अवश्य लाना। अब क्या करुं, कोई उधार भी तो नहीं देता। किसानों ने कह दिया, अभी हाथ खाली है, फिर ले लेना। तुम्हारा तो हाथ खाली है, पर मेरा काम कैसे चले? तुम्हारे पास घर, पशु, सबकुछ है, मेरे पास तो यह शरीर ही शरीर है। तुम्हारे पास अनाज के कोठे भरे पड़े हैं, मुझे एकएक दाना मोल लेना पड़ता है। ‪सात दिन में‬ तीन रुपये तो केवल रोटी में खर्च हो जाते हैं। क्या करुं, कहां जाऊं?’

माँ : कहानी

माँ : कहानी "मैक्सिम गोर्की"

मैक्सिम गोर्की 103 2020-03-27

प्रमुख रूसी लेखक, सोवियत साहित्य के प्रवर्तक गोर्की के लेखन से सारी दुनिया के पाठक भली भाँति परिचित हैं। सोवियत देश के पहले शिक्षा मंत्री अनातोली लूनाचसर्कि ने गोर्की के बारे लिखा था "मैक्सिम गोर्की की कृतित्व की विलक्षण रेखा आरम्भ होकर उन शिखरों को जा छूती है जिन्हें विश्व इतिहास में बहुत काम लोग ही चू पाए हैं। १९०६ से १९१३ के बीच इटली में लिखी गई उनकी कहानियों में से यह कहानी भी इटली के जनसाधारण के जीवन को समर्पित है। लोगों को कठिन दौर में शीघ्र उबा देना वाले जीवन में कुछ प्रफुल्लता लाना ही इन कहानियों का उद्देश्य रहा। प्रस्तुत है आज गोर्की की उन्हीं में से एक कहानी ॰॰॰॰॰

तीन प्रश्न : कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

तीन प्रश्न : कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

लियो टॉलस्टॉय 106 2020-03-26

लियो टॉलस्टॉय उन्नीसवीं सदी के सर्वाधिक सम्मानित लेखकों में से एक हैं । उनका जन्म रूस के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था । उन्होंने रूसी सेना में भर्ती होकर क्रीमियाई युद्ध में भाग लिया, लेकिन अगले ही वर्ष सेना छोड़ दी । लेखन के प्रति उनकी रुचि सेना में भर्ती होने सी पहले ही थी । आपने युद्ध और शांति तथा अन्नाकेरेनिन्ना जैसी विश्व प्रसिद्ध किताबें लिखीं और अनेक कहानियाँ । तात्कालिक समय में लिखीं आपकी कहानियों से गुजरते हुए वे कहानियाँ वर्तमान समय के ताज़ा हालातों पर लिखी गई जान पड़ती हैं । यही कारण है कि आपकी कहानियाँ आज भी उतनी ही रोचक और वक़्त की नब्ज में धड़कती महसूस होती हैं । आज पढ़ते हैं आपकी ऐसी ही एक कहानी ......। - संपादक

ख़लील जिब्रान की दो कहानियाँ

ख़लील जिब्रान की दो कहानियाँ

ख़लील जिब्रान 139 2020-03-25

ख़लील जिब्रान का नाम विश्व के उत्कृष्ट साहित्यकारों में ख़ास सम्मान के साथ गिना जाता है। इतना ही नहीं आपको एक लेखक के अलावा कवि और चित्रकार के रूप में भी विश्व भर में जाना जाता है। ख़लील जिब्रान के लेखन में पाखंड के प्रति विद्रोह, व्यंग्य एवं प्रेरणास्पद विचारों का भाव ही परिलक्षित नहीं होता बल्कि इसमें गहरी जीवन अनुभूति, संवेदना व भावात्मकता भी स्पष्ट दिखाई देती है। आपका साहित्य जीवन दर्शन से ओत-प्रोत है और इसीलिए प्रेम, न्याय, कला, आध्यात्म के अलावा धार्मिक पाखंड, वर्ग संघर्ष, समाज और व्यक्ति प्रमुख तौर पर आपके विषय रहे हैं। कहा जा सकता है कि प्रेरणा देने वाले विचारों का रचनात्मक प्रस्तुतिकरण आपके साहित्य की वेशेषता है। आपकी कहानियाँ पाठकों को आनंदित तो करती ही हैं साथ ही हमें जीवन जीने की कला से भी परचित कराती हैं। आज पढ़ते हैं ऐसी ही कुछ दो कहानियाँ "ख़लील जिब्रान" की

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.