इरफ़ान आप तो ऐसे न थे...: “अनीता चौधरी”

बहुरंग स्मरण-शेष

अनीता 315 2020-05-01

इरफ़ान आप तो ऐसे न थे.... 


कई बार जीवन में बहुत लोग ऐसे होते हैं जिनसे हम व्यतक्तिगत रूप से कभी नही मिले होते हैं फिर भी हमेशा उनको देखकर लगता है जैसे वे हमारे करीब रहे हैं। और बहुत बार उनसे मिले हैं।  

कल जब दोपहर में फेसबुक खोला तो सबसे पहले इरफान के फोटो के ऊपर किसी ने लिखा था, "आप हमेशा दिलों में जिंदा रहोगे"। पढ़ते ही दिल को एक धक्का सा लगा और आंखे नम हो गयी। थोड़ी देर तक हजारों चित्र आंखों के सामने नाचने लगे  ऐसा क्यों हुआ पता नहीं । ऐसा मुझे ही नहीं बहुत लोगों को लगा।जैसे अपना बहुत ही करीबी प्यारा इंसान चला गया हो। बेहद ही दुख हुआ।

बहुत से जाने माने कलाकारों के असमय चले जाने की खबरें मिलती हैं । दुख होता है।एक मानवीय संवेदना व विनम्र श्रद्धान्जलि के साथ ही बात आई गयी हो जाती है। लेकिन तुम्हारे साथ ऐसा क्या जुड़ा था। जो अलग नही होने दे रहा है । आपका सरल सहज व्यक्तित्व, एक साधारण इंसान, पर्दे के आगे भी और परदे के पीछे भी उतना ही सौम्य....इतना ही क्यों सकारात्मक विचारों से लबरेज जिंदगी को जीने का बेहतरीन उदाहरण थे आप ।

इरफान खान से मेरी मुलाकात टी वी सीरियल चन्द्रकान्ता (1994) में बद्रीनाथ के किरदार को करते समय हुई थी। हांलाकि इससे पहले भी कई फिल्मों में छोटे-छोटे रोल कर चुके थे। लेकिन ये फिल्में मैंने नही देखी थीं । चन्द्रकान्ता सीरियल से मैं उन्हें बद्रीनाथ ही कहती थी। तब तक मुझे उनका असली नाम पता नहीं था। या कि मैंने जानना नही चाहा था।

उसके बाद मैंने उनकी  फिल्म 'मकबूल' (2003) में देखी। उस फिल्म पर चर्चा करते हुए मेरे मुहं से उनका बद्रीनाथ नाम निकला तो वह बहुत जोर से हंसी, "अरे पागल इनका असली नाम इरफान खान है।तू क्या बद्रीनाथ बद्रीनाथ करती रहती है।"  मैंने नाम तो सही कर लिया था लेकिन बड़ी बड़ी मोटी थोड़ी सूजी आंखों वाला, अंदर बस सा गया था। उसके बाद तो उनकी हर फिल्म देखने लगी थी। नए नए चरित्रों के साथ परदे पर देखते हुए ऐसा लगता जैसे अभी हमारे बीच से निकल कर सामने पर्दे पर आ गए हैं।

फिर चाहे फ़िल्म 'सलाम बॉम्बे' (1988)का लेटर राइटर हो चाहे फ़िल्म 'एक डॉक्टर की मौत' (1990) में अमूल्य का चरित्र।

फ़िल्म 'मकबूल (2003) में बेहतरीन अदाकारी के साथ मकबूल बने रहना चाहे फिर फ़िल्म 'हासिल' (2004)में रण विजय सिंह का लुक ही क्यों न हो। 

फ़िल्म 'बिल्लू' (2009)में विलास परदेशी, फ़िल्म 'सात खून माफ' (2011) में वसी उल्ला खान, फ़िल्म 'पान सिंह तोमर' (2011) में पान सिंह , फ़िल्म 'लाइफ ऑफ पाई' (2012) में मॉलीटर पटेल, फ़िल्म 'लांच बॉक्स'(2013)में साजन फर्नाडीज, फ़िल्म 'डी de' (2013)में वली खान,या फिर फ़िल्म 'किस्सा' (2014) में अंबर सिंह, फ़िल्म 'पीकू' (2015) में राणा चौधरी, फ़िल्म 'तलवार (2015) में अश्विन कुमार और फ़िल्म 'हिंदी मीडियम' (2017) में राज बत्रा का किरदार हो क्यों न हो। यूं तो और तमाम फिल्में है जैसे स्लम डॉग मिलेनियर, करीब करीब सिंगल, इन मेट्रो, ऑन, ब्लैकमेल आदि आदि। 

पचास से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले इरफान को देखकर कर कभी लगा ही नही कि अभिनय कर रहे हैं। हर एक किरदार को करते करते आप मन में उतरते चले गए।

एक साधारण से परिवार में जन्म लेने कारण ही वे अपने ही श्रम से बने अभिनेता थे। जमीनी जुड़ाव के कारण ही कभी वे स्टार नही बन पाए। उनमें अत्याधिक सीखने की ललक ने ही उन्हें बहुत कम समय में लोगों के बीच अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा लिया था। और मेरे जैसे असंख्य आपकी अदाकारी के मुरीद बन गए। 

अपने निजी जीवन में भी आप इतने बेहतरीन इंसान थे तभी तो  सुतापा जैसी ज़हीन व्यक्तित्व की धनी व शानदार स्क्रीन प्ले राइटर आपकी जीवन संगिनी बनी। 

बार बार दिल यह मानने को तैयार ही नही हो रहा है कि मैं तुमसे अब कभी नही मिल पाऊंगी। अबकी बार मुम्बई से लौटी तो सोचा था अगली बार जब भी मुम्बई आउंगी आपसे जरूर मिलूंगी। अफसोस ये मौका भी आपने नही दिया। 

सिने जगत को ऐसे मौलिक अभिनय की क्षमता के मूल्यवान ओर विरले कलाकार से भविष्य में बहुत उम्मीदें थी। इस तरह आपका जाना सार्थक सिनेमा और चाहने वालों के लिए अपूर्ण क्षति है।


भूरे चेहरे पर बड़ी बड़ी बोलती हुई आंखे एक सहज और संजीदा चेहरे के साथ हिट फिल्में के सारे मिथकों को तोड़ने वाले इरफान खान को अलविदा......लेकिन यह सवाल आपसे हमेशा रहेगा कि आप तो ऐसे नहीं थे कि सबके मन की अपेक्षाओं को धता बताकर यूँ चुप-चाप चले जाओ ......


-सभी चित्र google से साभार

अनीता द्वारा लिखित

अनीता बायोग्राफी !

नाम : अनीता
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ऑथर के बारे में :

अनीता चौधरी 
जन्म - 10 दिसंबर 1981, मथुरा (उत्तर प्रदेश) 
प्रकाशन - कविता, कहानी, नाटक आलेख व समीक्षा विभिन्न पत्र-पत्रकाओं में प्रकाशित| 
सक्रियता - मंचीय नाटकों सहित एक शार्ट व एक फीचर फ़िल्म में अभिनय । 
विभिन्न नाटकों में सह निर्देशन व संयोजन व पार्श्व पक्ष में सक्रियता | 
लगभग दस वर्षों से संकेत रंग टोली में निरंतर सक्रिय | 
हमरंग.कॉम में सह सम्पादन। 
संप्रति - शिक्षिका व स्वतंत्र लेखन | 
सम्पर्क - हाइब्रिड पब्लिक  स्कूल, दहरुआ रेलवे क्रासिंग,  राया रोड ,यमुना पार मथुरा 
(उत्तर प्रदेश) 281001 
फोन - 08791761875 

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