प्रक्रिया : कहानी (कैलाश बनवासी )

कथा-कहानी कहानी

कैलाश बनवासी 224 2020-06-29

वह हमें दुनिया की सबसे सुंदर और शानदार लड़की मालूम होती. पंजाबी लड़कियों की ख़ास गुलाबी आंच लिए हुए गोरा रंग, कि दूध में बस जरा सा महावर घोल दिए जाने पर आने वाला रंग! उसकी ठोड़ी पर तिल-किसी शायर की उपमा लेकर कहें तो दौलत-ए-हुस्न पर तैनात दरबान |

प्रक्रिया   

यह ख़बर हम लोगों तक बहुत जल्द पहुँच गयी थी,उसके घर-परिवार के द्वारा लीक होने से रोकने की तमाम कोशिशों के और अनिच्छा के बावजूद. यह खबर जैसे बारीक सुराख से किसी गैस की तरह रिसकर हम तक पहुँची थी.वरना अरविन्द के पिता जिस तरह के व्यक्ति थे,उसके चलते यह काफी मुश्किल था. यह तो खैर कोई भी माता-पिता नहीं चाहेंगे कि उनकी औलाद के मेंटली डिस्टर्ब हो जाने का शहर में ढिंढोरा पीटा जाए. और वकील साहब—अरविन्द के पिता—भी नहीं चाहते रहे होंगे कि उनकी तीन संतानों में एकमात्र बेटे के पागल हो जाने की ख़बर इस बढ़ते हुए शहर में मज़ाक का एक विषय बन जाए.
   किन्तु यह हो रहा था.खबर हम लड़कों—जो उसके सहपाठी थे—के बीच इधर से उधर फड़फड़ाती उड़ रही थी,असहाय.जैसे हम बचपन में फुरफुन्दी को धागे से बांधकर उड़ाते थे और उसकी करुण असहायता का मज़ा लूटते थे,कुछ वैसे ही.
   यहाँ केवल चश्मुद्दीन सुरेश ही नहीं था जिसे दूसरों की गलतियों और कमजोरियों पर हंसने में एक विशेष आनंद मिलता है,तमाम दूसरे लड़के भी इस हँसी में शामिल थे.
  “मेरे को तो पहलेई मालूम था,इसीलिए तो हमेशा बोलता था कि देखना,ये लौंडा एक न एक दिन जरूर पागल होगा करके.”
  “ और देख लो आज हो गया!” किसी ने जोड़ा.
  सबके सब फिर खिलखिलाकर हँस पड़े.उनका इस बात से अच्छा मनोरंजन हो रहा था.
   “वो साला दुनियादारी बिलकुल नहीं जानता था. जानता है,एक दिन मेरे से क्या पूछ रहा था? पूछा कि यार,ये औरतों का एम.सी. क्या होता है? तो मैं बोला—अबे घोंचू ! यहाँ तक तो ठीक है,अब ये मत पूछ लेना कि बच्चा पैदा कैसे होता है?”
  फिर हँसी.पहले से ज़ोरदार. लेकिन मैं नहीं हंस सकता था और विजय भी. शायद वह भी मेरी तरह गंभीर था इस समय. इनकी हँसी जैसे कोई अश्लील फिकरा मालूम हो रही थी मुझे. बहुत अनैतिक और बहुत निर्मम ! तो ये है इनकी अपने पागल हो गए साथी के प्रति सहानुभूति ! मुझे इन लडकों पर ताज्जुब हो रहा था.यही लड़के हैं जो कल तक उसके नोट्स की खातिर उसके आगे-पीछे घिघियाते घूमते थे.आज उस पर हंस रहे हैं! नैतिकता,भावनाएँ या दोस्ती—सब इनके लिए बदलते रहने वाली फालतू बातें हैं.मुझे उस समय लगा था,यह ऐसा ही समय है...जहां सब कुछ आसानी से भुलाया जा सकता है...एक झटके में गाजर-मूली की तरह काटा जा सकता है.
  ऐसी और भी जाने कितनी बातें सोचकर उस शाम बहुत निराश और दुखी हो गया था मैं.
  दूसरे दिन शाम को मैं और विजय अरविन्द के घर जा रहे थे.उसके पिता ने हमें बुलाया है.
  यह जुलाई के आखिरी दिनों की एक बदली भारी सांझ थी.चारों तरफ एक मनहूस किस्म की सफेदी वाला वातावरण. हवा नहीं थी,सो सब ठहरा हुआ-सा लग रहा था.जाते हुए हमें कुछ ऐसी घुटन महसूस हो रही थी गोया मारे सर्दी के नाक बंद हो... 
   हमें मालूम था,अरविन्द के मित्रों कि संख्या इतनी कम है कि एक हाथ की उंगलियाँ भी कुछ ज्यादा ही बैठती हैं.और करीबी दोस्त? वह तो शायद बिलकुल नहीं.शायद हम दोनों ही. या शायद हम दोनों भी नहीं. अलबत्ता, हमें इसकी खुशी अवश्य थी कि दूसरों की तुलना में उसका उठना-बैठना हमारे साथ अधिक है. ऐसा शायद इसलिए भी था कि हमारे घर आस-पास थे,और हम पिछले तीन साल से स्कूल साथ-साथ आ-जा रहे थे. स्कूल—शासकीय बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक शाला. और शायद इसलिए भी कि हम तीनों एक ही ग्रुप—गणित, और एक ही कक्षा ग्यारहवीं ए के विद्यार्थी थे.
  हमारा आना-जाना साथ होता था.पैदल. स्कूल हमरे घरों से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था. अगर हममें से किसी को तैयार होने में कुछ देर हो जाती तो उसके तैयार होने तक रुका जाता था.और देर हो जाने पर पाठक सर के रूल की मार हम तीनों की हथेलियाँ खातीं. स्कूल जाते हुए हम प्रायः जल्दी में होते कि देर न हो और सज़ा से बच जाएँ. लेकिन लौटते हुए वक़्त हमारा होता था. बड़ी फुर्सत से तफरीह करते,बाजार,तमाशा,सिनेमा के पोस्टर्स आदि देखते हुए लौटते थे.जाने कहाँ-कहाँ की बातें करते हमारा रास्ता कट जाता था और हमें पता नहीं चलता था.
  उम्र के साथ हम बड़े हो रहे थे और विषयों के प्रति गंभीर.
  यह सिलसिला उस साल की गर्मियों में टूट गया था जब हमारी स्कूली पढ़ाई समाप्त हो गयी थी. हम तीनों ने मैट्रिक पास कर लिया था. कक्षा में हर साल की तरह अरविन्द को सबसे ज्यादा नंबर मिले थे.वह हमारी कक्षा का सबसे तेज़ विद्यार्थी था.
  हमारी कक्षा के बहुतेरे लडकों ने इस साल मई में ‘प्री इंजीनियरिंग टेस्ट’ परीक्षा दी थी. ज़ाहिर है हम तीनों ने भी. और चूंकि अपने राम को इसमें चुने जाने की बहुत उम्मीद नहीं थी; मन में ये था कि अँधेरे में तीर लग जाए तो लग जाए,पूर्ण विश्वास नहीं था. इसीलिए साइंस कॉलेज में दाखिला ले लिया.विजय ने भी यही किया. क्योंकि डर यह बना हुआ था कि हमारी स्थिति धोबी के कुत्ते की तरह न हो जाए—न घर का न घाट का.हम माया और राम में से एक को पाना ही चाहते थे,इसलिए अपने घाट हमने चुन लिए. 
   अरविन्द की बात अलग थी.उसे अपनी योग्यता पर,क्षमता पर पूरा भरोसा था.वह इसमें चुन लिया जाएगा इस बात का पूरा यकीन हम सबको था. उसे तो खैर था ही. इसलिए वह सिर्फ इसके नतीजे की प्रतीक्षा कर रहा था.
    और सप्ताह भर पहले ही इसके परिणाम घोषित हुए थे.जैसे कि हमें आशंका थी कि हमारा सिलेक्शन नहीं हुआ. इसका हमें बेहद दुःख हुआ था,और यह चुभने वाला अहसास भी कि हम पिछड़ों की जमात में हैं, क्रीमी लेयर में नहीं.हमारे सुखमय भविष्य के रंगीन,चमकदार सपने टूटकर बिखर गए थे...चूर-चूर. 
  लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का था कि अरविन्द का भी सिलेक्शन नहीं हुआ.वह पोलिटेक्निक के लिए क्वालिफाई हुआ था,इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए नहीं. भले ही यह हमारे लिए अविश्वसनीय था,लेकिन सच था.
 शायद इसे ही अरविन्द बरदाश्त नहीं कर सका था. और...
   हम उसके घर जा रहे थे.उससे मिलने.
    मुझे अजीब-सी बेचैनी हो रही थी,और काफी घबराहट भी.जो आज तक उससे मिलते हुए नहीं हुई थी. अब हमारे लिए वह बदल चुका था. उसके बारे में तरह-तरह की कल्पनाएँ बन-बिगड़ रही थीं.एक अहम सवाल तो यह था कि हम उससे मिलने पर कहेंगे क्या? और वह इन्हें समझेगा या नहीं? हम करेंगे क्या? क्या मातम-सा मनाते हुए रोनी सूरत लेकर उसके सामने बैठे रहेंगे ? और हम अपनी सहानुभूति रबर की मानिंद खींचते रहेंगे? वह इस समय पागल है. पागलों को लेकर आज भी मन में एक भय रेंग जाता है.उसे हमारी कौन-सी बात अच्छी  लगेगी,या किस बात पर नाराज़ हो जाएगा,समझ से परे था. हो सकता है वह गुस्से में सामने पड़ी किसी भी चीज़ को हमारे सर पर दे मारे—क्योंकि ऐसी शिकायत हम उसकी सुन चुके थे.आखिर है तो वह पागल...
    उसके घर का पहला कमरा बैठक होने के साथ-साथ उसके पिता का ऑफिस भी था. उसके पिता शहर के जाने-माने वकील हैं.कमरे में तीन तरफ लकड़ी की शीशेदार अलमारियां थीं जिनमें कानून की किताबें थीं.काले कपड़े की जिल्द वाली ढेर सारी मोटी-मोटी किताबें !
  बाप रे! इतनी सारी किताबें! मुझे हमेशा हैरानी होती थी कि कैसे कोई एक जीवन में इतनी किताबों को पढ़ पता होगा? तभी मैं फैसला कर लेता कि चाहे जो हो,मुझे वकील तो हरगिज़ नहीं बनना. कौन पढ़ेगा इतनी किताबें !हाँ,इन्हें पढने वाले आदमी के प्रति मैं सम्मान से ज़रूर भर जाता.
  “अरे आओ-आओ बेटा !”उसके पिता हमें देखते ही चहके. उनका ऐसा चहकना हमारे लिए नया था,बदला हुआ रूप था. वर्ना आज तक हमारे सामने रिजर्व बने रहते,उनके बेटे के मित्र होने का भी सम्मान या प्रेम उनकी आँखों में झांकता नहीं था. हम उनके सामने अपने घरू पिछड़ेपन से भर जाते थे...कि हम पहचान रहित परिवारों से थे.लेकिन आज ! खैर ! हमें निश्चित रूप से यह अच्छा लगा था. और हम अच्छे बच्चों की तरह पिछला सब भूलकर खुश हो गए थे.
   इस बीच उनसे बातचीत होती रही. उनके सहज होने के प्रयास को हम भांप गए थे. घर पर कुछ असहज घटा हो तो उसकी छाया पूरे घर पर डोलती रहती है.
   उन्होंने बताया था,इस समय वह ठीक है.सुबह और शाम को ज़रा ठीक रहता है. बाकी दोपहर को परेशान करता है. शायद दिन की गरमी का दिमाग पर असर होता है. फिर उन्होंने बहुत प्यार से--जैसे किसी छोटे बच्चे को पुकारा जाता है--भीतर पुकारा था, “ अरविन्द,देखो बेटा...तुम्हारे दोस्त तुमसे मिलने आए हैं...”
  हम बुरी तरह रोमांचित हो गए. यह उसके आगमन की सूचना थी कि बस अभी वह प्रकट होता है. बा-मुलाहिजा,होशियार... हमारी धड़कन नामालूम ढंग से तेज़ हो चली थी. हम जैसे सांस रोके उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे... पागल व्यक्ति का सामना करने का भय हमें पागल बनाये था.
 
   और वह सचमुच किसी भूत के समान अचानक दरवाज़े का परदा हटाकर हमारे सामने आ गया था.मुझे लगता है मेरी चीख निकलते-निकलते रह गयी थी. 
   “हलो !” वह हमारे साथ हाथ मिला रहा है,गजब के उत्साह से.
  पहली ही नज़र में वह बहुत बदला-बदला लगा था. उसका चेहरा उसका नहीं वरन,उससे मिलते-जुलते लड़के का लग रहा था. सिर के बाल मिलेट्री के जवानों की भांति छोटे-छोटे कटे थे जिस पर ढेर सारा तेल चुपड़ा हुआ था. तेल कोई ख़ास था—किसी वैद्य-ओझा का दिया हुआ,जिसकी तीखी कड़वी गंध हमारे नथुनों में भर गयी थी. ट्यूबलाइट के तेज़ उजाले में उसका हँसता हुआ विक्षिप्त चेहरा चमक रहा था,जिसे देखकर हमें सस्पेंस फिल्म के किसी डरावने  रहस्यमय पात्र की याद आ रही थी. 
  यद्यपि वह सामान्य ही था,मगर हम असामान्य हो चले थे. कुछ देर बाद हम इससे मुक्त होकर सामन्य हुए तो राहत मिली. अब अरविन्द को सामने देखकर आश्वस्त हुए थे कि बात अभी ज्यादा बिगड़ी नहीं है. कि सुधार के बहुत अवसर हैं.इस पल हमें यह भी लगा था कि लड़के साले बेकार में हल्ला मचाये हुए हैं,और दो का चार बता रहे हैं...
   हमारी बातचीत होने लगी.बातचीत बिलकुल सामान्य.पढाई-लिखाई,मौसम,परीक्षा आदि. कि कुछ देर में हम भूल चले कि हमारे सामने कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जो मानसिक रूप से असंतुलित है.
  इसी बीच मौका देखकर हम दोनों ने अपनी-अपनी ‘भूमिका’ निभाना चालू कर दिया,जिसके लिए हम बुलाये गए थे.हम उसे समझा रहे थे...
  ‘देखो अरविन्द,पी.ई.टी. में तुम्हारा सिलेक्शन नहीं हुआ,इस बात को भूल जाओ.हजारों लड़के हैं जिनका सिलेक्शन नहीं हुआ है. ठीक है,बुरा लगता है लेकिन सब कुछ यहीं ख़त्म नहीं हो गया.इसे इतना माइंड मत करो.’
   ‘ हमारा भी चयन नहीं हुआ. तो क्या हुआ? अगले साल ज्यादा तैयारी करके बैठेंगे.कैसे नहीं होगा? और फिर ये तो हमारा पहला चांस था. तुमको इतना निराश होने की जरुरत नहीं.तुम समझ रहे हो न...?’
  हम उसे बिलकुल किसी टाइप्ड और प्रोफेशनल टीचर की तरह समझा रहे थे,शिक्षा दे रहे थे...शायद वही बातें जो उसके घरवालों ने उसे बीसियों बार कही होंगी. इस दौरान हमारी नज़र उसके पिता से मिली थी,चश्मे के भीतर से अपनी पलकें झपकाकर उन्होंने इशारा किया,’हाँ-हाँ,ठीक है...चलते रहो इसी तरह...’
    कुछ देर हम इसमें लगे रहे थे. हम जाने क्या-क्या उसे समझाते रहे. हमें मालूम नहीं था कि वह सुन भी रहा है अथवा नहीं.लेकिन इतना ज़रूर है कि हम इसे अद्भुत उत्साह से कह रहे थे,बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समझकर कह रहे थे. गोया ऐसा करते हुए हम एकाएक बहुत काम के और महत्वपूर्ण आदमी बन गए हों. साथ ही साथ,हमारे अवचेतन में कहीं न कहीं यह बात भी काम कर रही थी कि खुदा-न-ख्वास्ता,हमारी इस कोशिश से इसकी हालत में जरा भी सुधार आता है तो इसका श्रेय हमें मिलेगा. और हमारी दोस्ती पर पक्की मुहर लग जाएगी—आड़े वक्त में काम आए वही सच्चा मित्र है—की सूक्ति हमें बखूबी मालूम थी. शायद यही वजह थी कि हम सहसा जिम्मेदार दोस्त हो गए थे, पूरी तरह गंभीर और ईमानदार.
  ‘कुछ नहीं हुआ है यार तुम्हें.’
  ‘तुम देखना,अगले साल तुम्हारा सिलेक्शन जरूर हो जाएगा.’
  ‘ये तो लाइफ है यार,इसमें तो सब लगा रहता है...हार-जीत...ऊँच-नीच...सफलता-असफलता—इसी का नाम तो जीवन है.अपना काम है कोशिश करना.ट्राई अगेन...ट्राई अगेन...’
   ये ही कुछ दार्शनिक,आध्यात्मिक तथा घोर आशावादी टाइप वाक्य थे जो घूम-फिर कर हमारी जबान में स्कूली बच्चे के किसी रटे हुए पाठ के समान बार-बार आ-जा रहे थे.
  लेकिन हम शायद भैंस के आगे बीन बजा रहे थे. दीवाल पर मुक्के बरसा रहे थे. व्यर्थ.
   अरविन्द का चेहरा सपाट बना रहा—प्रतिक्रियाविहीन. वह शायद अपनी किसी दुनिया में निमग्न था,जहां से वापस लाना एक मुश्किल काम था.बीच-बीच में सिर्फ हाँ-हूँ... हमारे लिए यह अनुमान लगा पाना नामुमकिन था कि इस समय वह क्या सोच रहा है.हम कोई मनोविश्लेषक तो थे नहीं. लेकिन वह सोच रहा था,कुछ न कुछ. मैंने सुन रखा था कि पागल व्यक्ति का दिमाग हमेशा सक्रिय रहता है,हर वक्त कुछ न कुछ सोचता रहता है.जाने कहाँ से सुनी हुई यह बात मेरे मस्तिष्क में बजने लगी कि पागल व्यक्ति को नींद नहीं आती.वह सतत जगता रहता है.इस सोच से मैं डर गया था. अरविन्द पिछली कितनी रातों से जाग रहा है ?
  “तुम लोग मेरे घरवालों को समझाते क्यों नहीं ?” वह एकाएक उत्तेजित होकर हमसे कहने लगा, “वो मेरे को पागल समझते हैं. जबरदस्ती मुझको डॉक्टर के पास पकड़ के ले जाते हैं. अब तुम्ही लोग बताओ,क्या मैं पागल हूँ? अगर मैं पागल होता तो मेरा एट्टी एट परसेंट आता? अपने स्कूल में पिछले तीन साल से टॉप कर रहा हूँ और ये कहते हैं मैं पागल हूँ ! अरे,पागल तो वो होता है जो सड़क पे नंगा घूमता है,जोर-जोर से चिल्लाता है,अपनेआप हँसता है—हो-हो-हो-हो !’ और वह एकदम हंसने लगा—हो-हो-हो ! देखो,क्या मैं नंगा नाच रहा हूँ,बोलो?’
   “नहीं-नहीं,बिलकुल नहीं,” उसे यों बदलता देख हमने तुरंत प्रतिवाद किया, “कौन कहता है तुम पागल हो ? तुम ठीक हो—बिलकुल राइट ! पागल वो हैं जो तुमको पागल कहते हैं—वो ही असली पागल हैं. समझे ?”
  “असली पागल !” वह फिर हंसने लगा, “असली पागल ! हा-हा-हा-हा! दैट मीन्स ओरिजनल पागल! हा-हा-हा-हा !”
  वह बेतहाशा हंसने लगा.
  हमने उसे पकड़ लिया और स्थिति को सँभालने की कोशिश करने लगे.उसकी हँसी ! वह एक पागल की हँसी थी जो भय पैदा करती है.हमने आज तक उसे इस प्रकार हँसते नहीं देखा था. वह हँसता ही कब था ! लेकिन आज उसकी हँसी थमने का नाम नहीं ले रही थी.उसका लम्बूतरा  चेहरा हंसने के कारण ऊपर-नीचे हिल रहा था.लगा था,वह कोई घोड़ा है जो हिनहिना रहा है...
   थोड़े समय के बाद जब वह शांत हुआ तो बोला, “आओ मेरे कमरे में.”हम उठकर उसके पीछे-पीछे चले आए.
   यह उसका अपना कमरा था. स्टडी रूम.कमरा अगर कबाड़खाना नहीं था तो भी एक वैसी ही अस्त-व्यस्तता वहां थी. सब कुछ बिखरा-बिखरा.कहीं किताबें ढेर पड़ी हैं तो कहीं अख़बार फैला है.और पूरे कमरे में कागज के कटे गए पुर्जों का ढेर. 
   यहाँ आकर हमें उसकी मानसिक स्थिति का वास्तविक अहसास हुआ था,जो बेहद डरावना था.
  वहां रखे एक स्टूल पर विजय बैठ गया और मैं उस बिस्तर पर जो कि कमरे की ही तरह गन्दा और अस्त-व्यस्त था. 
   इधर वह बहुत तेजी से अपनी किसी चीज को ढूंढ रहा था. इस फेर में कमरा नए सिरे से बिखर रहा था,चीजें उलट-पलट रही थीं.
  “क्या खोज रहा है अरविन्द?”
  “कैंची.”
  “कैंची? उसका भला अभी क्या काम?”
  “मुझको है.पता नही कहाँ-कहाँ रख देते हैं!” वह ढूंढते हुए बौखलाकर गालियाँ बकने लगा,अपने घर वालों को, खासकर अपने पिता को. वैसी गन्दी गलियाँ जो उसने घर में कभी नहीं बकी होंगी.
  “लेकिन काम क्या है?”
  “मैं उससे डिज़ाइन बनता हूँ. एक से बढ़कर एक !देखोगे ?”
   पलंग के पायताने से कागजों के ढेर में से कुछ कागज उठाकर वह हमें दिखाने-समझाने लगा—“ये देखो,एक बिल्डिंग की डिज़ाइन ! इसकी लागत दो करोड़ से कम की नहीं होगी. और ये आठ मंजिला अपार्टमेन्ट. सब मैंने अपने दिमाग से बनाया है. कैसा है ?”
  हम जो भय से पथरा गए थे,बेकार पुर्जों को देखकर अब भीतर से एकदम पसीज गये. बेचारा अरविन्द ! क्या हाल हो गया है इसका !
   किसी प्रकार खुद पर काबू पाकर हमने कहा,”ठीक है. बहुत बढ़िया! कितना अच्छा डिज़ाइन किया है तुमने. लेकिन इतना बहुत है.अब और बनाने की जरूरत नहीं.”
  “तुम देखते जाना,कैसा नाम होगा मेरी कंस्ट्रक्शन कम्पनी का.यह तो कुछ भी नहीं.”
  हमें विश्वास करना पड़ा—यह अरविन्द ही है. अपनी जिद का पक्का!
   अपने गजब के आत्मविश्वास के साथ वह कहता गया,”तुम देखना,मेरे पास दो कारें होंगी. और दोनों अपने ढंग की अलग गाड़ी होगी...जो शहर में किसी के पास नहीं होगी ! एक से मैं ऑफिस जाया करूँगा,और दूसरी से सैर-सपाटा,मार्केटिंग वगैरह. बड़े-बड़े दुकानदार मुझे देखते ही घिघियाएंगे—अरे आइये साब,आइये...इस बार बड़े दिनों बाद दर्शन हुए... हें-हें-हें...कहीं बाहर चले गए थे क्या? और मैं इनसे बात करूँगा भला ?इन चवन्नी छाप लोगों से मेरा कोई वास्ता नहीं होगा...”
  मेरे सर के पिछले हिस्से में अब सचमुच दर्द होने लगा था. और कितनी देर तक इसे झेलना पड़ेगा ! महसूस होने लगा,अब थोड़ी देर और साथ बैठ लिए तो हम भी पगला जाएंगे. इसी क्षण मुझे ध्यान आया,थोड़े समय में ही जब हमारी ये हालत है,राम जाने इसके घर वाले इसे कैसे बरदाश्त करते होंगे ! 
   अचानक उसने कहा,”तुम दोनों को मैं अपनी एक खास चीज दिखाता हूँ.बिलकुल पर्सनल!” आवाज में खूब उत्साह और आँखों में एक अजीब सी चमक.
   क्या है? वह हमें अपना राजदार बनाने जा रहा था,सो हम उत्सुक थे,किसी भी स्थिति के लिए तैयार.
    पलंग के तकिये के नीचे से उसने एक किताब निकाली. यह बीज गणित की किताब थी.किताब के पृष्ठों के बीच कहीं एक चित्र था,जिसे उसने बहुत आहिस्ते से बाहर निकाला. और हमारे सामने रख दिया,”ये देखो...इसे मैंने बनाया है !”
   “ये किसका चित्र है? हमने ऐसे ही पूछा,इस पर जरा भी ध्यान न देते हुए. 
   “देखो...जरा गौर से देखो और पहचानो.” वह जैसे हमारी परीक्षा ले रहा था. चित्र किसी लड़की का था. हम उसे ध्यान से देखने लगे. और पहचानते ही चौंक पड़े—अरे! लेकिन आवाज को दबाकर पूछा, “ये वीना है ना....?”
   “येस,यू आर राइट ! वह मुस्कुराया.
   हमें पता था,अरविन्द कोई चित्रकार नहीं है.इसके बावजूद यह चित्र उससे बहुत अच्छा बन पड़ा था. कि अपने अनगढ़पन के बावजूद तस्वीर से उभरकर वीना ही आ रही थी. वही कंधे तक कटे हुए बाल—जो उन दिनों आजकल के फैशन की तरह आम नहीं था -–कम से कम हमारे शहर में. आँखों पर लेंस वाला चश्मा,और ठोड़ी पर छोटा-सा तिल.सब कुछ वही.
  “तुमने तो कमाल कर दिया यार !”
   हम विस्मय मिश्रित मुग्धावस्था में थे. तारीफ़ में बस यही निकल रहा था—कमाल कर  दिया! और सचमुच यह कमाल था,क्योंकि हमें मालूम था कि इसे उसने वीना का फोटो देखकर नही बनाया है.क्योंकि यह बात कल्पना से परे थी कि वीना ने अरविन्द को अपना फोटो दिया होगा. यह अरविन्द की कल्पना शक्ति का कमाल था.
   इस चित्र को देखते ही हमारी शिथिल पड़ती उत्सुकता जाग गयी... थकते दिलो-दिमाग में एक नये उमंग और शक्ति का संचार हो गया. हम जोश से भर गए, “अबे, इसको कब बनाया?” हम भूल चले कि यह मेन्टली डिस्टर्ब है. 
  “कुछ महीने पहले.बता,है कि नहीं वही?”
  “है तो .मगर तुम इसे...”हम हिचक रहे थे कहने में,क्योंकि वास्तविकता कुछ और ही थी.
  “मैं शादी करूँगा तो इसी से. वरना करूँगा ही नहीं, यह मेरी प्रतिज्ञा है!”
   उसकी यह भीष्म पितामही प्रतिज्ञा सुनकर हम एकबारगी सकपका गए.तिस पर उसका इतना आत्मविश्वास! हमें उससे इतने बोल्ड और डाइरेक्ट प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी. वह कह रहा था,”तुम देख लेना !” यह अरविन्द के बात करने का एक ख़ास लहजा था.एक अजीब जिद से भरी ठोस आवाज,जिसे चुनौती देना बहुत मुश्किल होता.
   मैं वीना का चित्र देखते हुए सोचने लगा,पट्ठे ने इसे कितनी लगन और मेहनत से बनाया होगा. और शायद बहुत चाहत से. इस क्षण वह मुझे तमाम लोकप्रिय प्रेम-कहानियों के नायक के समान लगा जिन पर कई फ़िल्में बनी हैं.तो यह इस मजनूँ की लैला का चित्र है. इसका मतलब यह उससे प्रेम करता है. मुझे अच्छा लगा.प्रेम हमेशा अच्छा ही लगता है. 
  विजय ने उससे पूछा,”तो तू उसे लाइक करता है?”
  “डोंट से लाइक !” वह एकदम बमक पड़ा और लगभग दांत पीसते हुए बोला, “आई लव हर ! ऐंड यू नो, आई विल मैरी विद हर ! तुम देखते जाना.तुम दोनों को मेरी बारात में जाना पड़ेगा. बोलो.चलोगे कि नहीं?”
  वह हम पर हावी था. हमने कहा, यह भी कोई पूछने की बात है ! फिर पूछा,’मगर वीना चाहती है ऐसा ?’
 “वो? उसके चाहने न चाहने से क्या होता है? मुख्य बात यह है कि मैं उसे चाहता हूँ.यह ज्यादा इम्पोर्टेंट बात है.फिर अपने समाज में शादी के बाद हर पत्नी अपने पति को चाहने लगती है.”
  उसने अनजाने ही जैसे पूरे भारतीय समाज में विवाह का यथार्थ प्रस्तुत कर दिया था. हमारी स्थिति तरस खाने लायक थी. हम न हँस पा रहे थे न रो. फिर भी मैंने उसे अपनी जानकारी-जो सच थी—बताने का प्रयास किया, “लेकिन यार,...मैं तो सुनता हूँ,वह सत्येन्द्र अरोड़ा को पसंद करती है...सत्येन्द्र जो अभी भोपाल इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा है...वह उसी के साथ घूमती-फिरती दिखती है...”
  “मैं जान से मार डालूँगा उस अरोड़ा को ! जो भी मेरे रस्ते में आएगा,मार डालूँगा!” उसकी आँखों में हिंसक चमक उभर आयी. वह गालियाँ बकने लगा.
   हम इस बात से बहुत ज्यादा डर गए कि मामला कहीं और बिगड़ न जाए. हम उसे समझाने लगे.शांत कराने लगे. एक कभी न हो सकने वाली बात को उसकी खातिर मान गए कि वीना की शादी तुम्हीं से होगी.जरूर होगी...
   वीना सभरवाल !
 हमारे स्कूल में न पढ़ने के बावजूद हमारी क्लास ग्यारहवीं ए की सबसे ज्यादा चर्चित लड़की. वह हमें दुनिया की सबसे सुंदर और शानदार लड़की मालूम होती. पंजाबी लड़कियों की ख़ास गुलाबी आंच लिए हुए गोरा रंग, कि दूध में बस जरा सा महावर घोल दिए जाने पर आने वाला रंग! उसकी ठोड़ी पर तिल-किसी शायर की उपमा लेकर कहें तो दौलत-ए-हुस्न पर तैनात दरबान.वह इतनी खूबसूरत थी कि हम हमेशा उसकी खूबसूरती से डरे हुए रहते. और यह सच था कि हम सारे उसकी भव्य सुन्दरता के आगे बहुत दीन-हीन और लुटे-पिटे लगते.अपने रंग-रूप में ही वह बहुत दूर की चीज लगती. इस पर तुर्रा यह कि अत्यंत मेधावी ! करेला वह भी नीम चढ़ा!
   वह आदर्श कन्या विद्यालय में ग्यारहवीं की छात्रा थी. इसके बावजूद हमारी कक्षा के बहुतेरे लड़के उसका नाम-पता जानते थे. उसके पिता का नाम और काम जानते थे.—डॉ. पी.एस. सभरवाल. विभागाध्यक्ष भौतिकी विभाग,शासकीय विज्ञानं महाविद्यालय.
  कुछ लड़के उसकी डेट ऑफ़ बर्थ बता सकते थे.
  कक्षा में लडकों के बीच प्रायः उसकी चर्चा छिड़ जाती.उसकी अदृश्य उपस्थिति हमें,हमारी कक्षा को गतिशील और उर्जावान बनाए रखती.
   वीना सभरवाल हमारे साथ ट्यूशन पढ़ती थी. सिद्धार्थ नगर में चौधरी सर अपने घर में ट्यूशन पढ़ाया करते थे. ट्यूशन क्या,पूरा इंस्टीट्युट था. वे गणित, भौतिक और रसायन पढ़ाते. हमने कभी उनको खाते-पीते या आराम करते नहीं देखा. सिर्फ पढाते देखा. सुबह पाँच बजे से ग्यारह बजे तक.शाम छह बजे से रात दस बजे तक. दिन में वे अपने स्कूल में पढ़ते थे. वे भूत थे जो कभी नहीं थकते थे.
  हमारी कक्षा के पंद्रह-बीस लड़के उनके पास पढने जाते थे.हम तीनों भी. हम सुबह आठ वाली बैच में थे. यह हमारी खुशनसीबी थी कि वीना सभरवाल हमारे बैच में थी. हमारे दस छात्रों के बीच की अकेली लड़की. अकेली और हिम्मतवर.और प्रतिभाशाली. किसी दिन हमसे बात कर लेती,यों ऐसा कम ही होता,तो हम समझते आज का दिन महान हो गया. उसके द्वारा कहे गए दो-चार वाक्यों की गूँज दिन भर कानों में बनी रहती. हमारे बाहर-भीतर एक तरंग बना रहता.
   कभी-कभी हम लड़के इस बात पर चर्चा करते कि वह रूपसी बाला हमारे बारे में क्या सोचती है. तो कहते, अबे, हवा में इतना न उछलो. पक्की बात जान लो कि वह लौंडिया हमें अपने बाप के चपरासी से ज्यादा कुछ नहीं समझती. और इस निष्कर्ष पर पहुँचते कि हमें दिन में सपने देखना छोड़ देना चाहिए. कि कोई अतिशय भावुकता वाली मूर्खतापूर्ण चालू सिनेमाई घटना ही हमें मिला सकती है. और यह किसी दैवीय चमत्कार से ही संभव है.
  उसकी मेधा को चुनौती देनेवाला अगर कोई हमारे बीच था तो वह अरविन्द ही था.पढ़ाई-लिखाई में सदा अव्वल.अरविन्द वीना से बीस ही था.इतना तेज था कि चौधरी सर उससे घबराते रहते—इस लड़के का कोई भरोसा नहीं.जाने कहाँ से, किस किताब से सवाल लेकर आ जाए और कहे कि सर हल करा दीजिए.
  यहाँ एक अघोषित मुकाबला था वीना और अरविन्द के बीच. कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था.वीना का गणित कुछ कमजोर था लेकिन वह केमिस्ट्री में अरविन्द से आगे थी. जबकि अरविन्द के गणित और भौतिक काफी मजबूत थे.
  चौधरी सर हर हफ्ते हमारा टेस्ट लेते. इसमें उनके बीच वही हाल—तू डाल-डाल मैं पात-पात. हमें मजा तब आता जब वीना पिछड़ जाती. एक खास किस्म का सुख होता जो प्रतिद्वंद्वी के हारने पर मिलता है. हम कामना इसी की किया करते कि वह पराजित हो.और स्वीकारे कि वही दुनिया में सर्वश्रेष्ठ नहीं है. और यह भी स्वीकारे कि लड़कियाँ अंततः लडकों की बराबरी कभी नहीं कर सकतीं. वह हमसे दूर थी, शायद इसीलिए हमारे भीतर यह बैर भाव पलता था.
  चौधरी सर को भी इस मुकाबले में गहरी दिलचस्पी थी. जीत किसी कि भी हो,इससे उन्हें मतलब नहीं था. मतलब उनका सिर्फ इतना था कि इनमें से कोई पी.ई.टी. में टॉप रैंक लाता है तो उनके वारे-न्यारे हो जाएंगे. भीड़ और बढ़ जाएगी.
    वीना की पढ़ाई के बारे में हम नहीं जानते, लेकिन अरविन्द के बारे में यकीन से कह सकते हैं कि वह पढाई में डूब रहा था. निरंतर. घनघोर रूप से. अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए वह रात-दिन एक किए हुए था.यों भी उसके सम्बन्ध दूसरे लोगों से नहीं के बराबर थे.उसकी दुनिया कोर्स की किताबों तक सिमटकर रह गयी थी. लक्ष्य था—पी.ई.टी. में सफलता.  
  उसका घर पूरी तरह उसके साथ था.आखिर एक सुखद भविष्य की पूर्व लड़ाई थी यह.
  दूसरी तरफ हम  थे,ऐसे लड़के,जो विलक्षण प्रतिभा के धनी न थे.बस ठीक-ठाक थे. बुद्धि के साथ आर्थिक हालत भी पिछड़ी थी.किसी नई किताब के लिए दस बार घर में झगड़ना पड़ता था, फिर भी मिल जाएगी इसका भरोसा नहीं रहता था.फिर भी हम डटे थे और मैदान मारने की इच्छा रखते थे.  
  हम सबका लक्ष्य एक था.
  उन दिनों हम पूरी क्षमता के साथ कोर्स की किताबों में ख़ट रहे थे. हमें सदैव इस बात का तीक्ष्ण अहसास बना रहता कि यही समय है कुछ करने का.कुछ बनने का.सफल होने का. मत चूको चौहान. इस परिश्रम का तुम्हें दूरगामी किन्तु सुखद और समृद्ध परिणाम मिलेगा. तब पढ़ाई के साथ-साथ कई चीजें हमारी कल्पना में उड़ती रहतीं—पद,रुतबा, शोहरत,बंगला,मोटर-गाड़ी और किसी हिरोइन के माफिक खूबसूरत बीवी जो हमेशा मुस्कुराती रहेगी.हमें इन्हें मूर्त करना था. और यही आकर्षण था जो पृथ्वी के गुरुत्व-बल की मानिंद हमें कोर्स की नीरस और उबाऊ दुनिया में खींच रहा था. 
   जमकर पढाई.माने सुख समृद्धि की बरसा. माने जनम सफल.
  इन सबका हमारे जीवन पर चौतरफा असर पड़ने लगा.पढाई की बदौलत मोहल्ले में हमारी धाक कुशाग्र विद्यार्थी के रूप में जम रही थी. हमारा स्तर इतना ऊँचा हो चला था.कि अब सिन्धी दुकान से तेल-साबुन लाने वाले लड़के नहीं रह गए थे.स्कूल का माहौल भी इस मामले में हमारी मदद कर रहा था. वहां गणित लेकर पढने वाले विद्यार्थियों की शान अलग थी.हमारी कक्षा का विद्यार्थी होने का मतलब यही था—इंटेलिजेंट ब्वॉय. भावी इंजीनियर.
   इस बहाव में हमें इस बात का तनिक भी अहसास नहीं था कि कैसे हम विशिष्ट बनने के फेर में धीरे-धीरे अपने समय और समाज से कटते जा रहे हैं.एक सुखद भविष्य की कामना में अपने वर्तमान और जीवन से कटते जा रहे हैं.हम भूल चले थे कि शहर से होकर बहने वाली नदी उत्तर में है अथवा दक्षिण में.या यह कि पास ही गाँव में अमरुद का बगीचा है जहां अक्सर हमारी उम्र के लड़के धावा बोलते हैं.हमें पता नहीं चलता था कि उत्तरी भारत में भूकंप से हजारों मारे गए और इससे भी ज्यादा बेघर हो गए. या यह कि कल पंजाब में आतंकवादियों ने बस में चौहत्तर निर्दोष मुसाफिरों को भून डाला...
   हाँ,हमें यह जरूर पता रहता कि पिछले साल मध्यप्रदेश में किसने टॉप किया था. या यह कि पिछली परीक्षा में हरदत्त सिंह की निर्देशांक ज्यामिति से ज्यादा सवाल पूछे गए थे.
   कक्षा के लड़कों के बीच अजब प्रतिद्वंद्विता का आलम था. हम अपने सहपाठी के प्रति हमेशा एक शंका और चालाकी से भरे होते.एक-दूसरे के प्रति अविश्वास करते.हम अपनी पढ़ाई और तैयारी दूसरों से छुपाते ताकि वह आगे न बढ़ पाए.ऐसे में स्वाभाविक था कि हम झूठ बोलने लगें. हमारी दोस्ती इतनी कमीनी थी जो हमें एक-दूसरे के पास आने से रोकती थी.हमें लगता,यह दुराव की नीति हमारे आगे बढ़ने की जरूरी शर्त है.
  हम इतने घाघ हो चले थे कि सहपाठी के बार-बार पूछने पर भी प्रश्नों के उत्तर या हल नहीं बताते थे—यद्यपि हमें मालूम होता. और सोचकर खुश होते,चलो एक दुश्मन साफ़ हुआ.
    इस मामले में अरविन्द विकट निर्मम था. वह बगैर किसी नरमी या उदारता के कह देता—इसका हल मुझे आता है.लेकिन बताउँगा नहीं. और सहपाठी की असहायता पर हंस देता.
  इस प्रकार हम पढ़ रहे थे...  
   अरविन्द के पास उस शाम हम लगभग दो घंटे बिताकर लौट आए. वह अभी पागलपन के दौर में है,यह हमने जान लिया था.हमें अंदाजा नहीं था उसे ठीक होने में कटना समय लगेगा—दो-चार महीना,या इससे भी ज्यादा.
  बाद में उसकी हालत सुधरती गयी.उसका इलाज चलता रहा. कुछ महीने बाद वह बिल्कुल स्वस्थ हो गया.और सामान्य.वह फिर पी.ई.टी. कि तयारी में जुट गया.अगले साल उसका चयन हो गया.उसके इंजीनियरिंग में जाने के बाद हमारा मिलना-जुलना बहुत कम हो गया. हमारे रास्ते अलग हो गये. 
  पढाई के बाद उसकी सरकारी नौकरी लग गयी. आजकल वह यहाँ नगर निगम के टाउन प्लानिंग में सहायक कार्यपालक यंत्री है. अधिकारी. अब वह इंजीनियर ‘जायसवाल साहब’ है.  विजय जबलपुर में एक निजी कम्पनी में टेक्निशियन है और मैं अपने शहर में शिक्षा विभाग में क्लर्क.
   
 
     मैं कई महीनों या साल के बाद उससे मिल रहा था.उससे एक काम के सिलसिले में मिलना हो रहा था. हमारे स्कूल के चपरासी हैं गोविन्द देशमुख. उसे नगर-निगम से अपने निर्माणाधीन घर का नक्शा पास कराना था. अरविन्द के अनुमोदन और दस्तखत की जरूरत थी.
    हम शाम उसके सरकारी आवास पर पहुंचे.
   वह घर पर था. चेहरे-मोहरे से कुछ अधिक नहीं बदला था.हाँ वह मुटा रहा था अच्छा-ख़ासा.उसने हँसते हुए मुझसे हाथ मिलाया. और हाथ मिलाते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि हम इतना समय गुजर जाने के बाद फिर उन पुराने दिनों में लौट रहे हैं.
  हम सोफे पर अभी आराम से बैठे भी नहीं थे कि उसने पूछा,कैसे आना हुआ?
  इस जरा से सवाल ने मेरे भीतर भूचाल पैदा कर दिया. मैं वह सारी बातें भूल गया जो अपनी मूर्खतावश सोचता आया था...कि हम कुछ देर अपने पुराने दिनों में लौट जाएँगे उन साथियों को बीच...और...
  वह हमें सीधे मतलब पर आने को कह रहा था.
  मैंने गोविन्द देशमुख की समस्या बताई.
  “नक्शा वगैरह सब सबमिट है ?”
  “जी हाँ, सर...जी हाँ..,” गोविन्द बोला.
  “ठीक है. देखिए मेरा रेट दो हजार है. अगर देंगे तो आपका काम हो जाएगा.” निपट शुष्कता से बिना किसी संकोच के वह कह गया.
   मैंने पाया,गोविन्द से बात करते हुए वह मुझे जैसे भूल गया है. मैं एकदम हैरान था! हैरान नहीं शायद कुछ और...दिमाग सुन्न हो रहा था.फिर भी मैंने जैसे-तैसे खुद को समेटकर उससे कहा, “अरे देखो यार...ये एक प्यून है...और अपने आदमी हैं...” 
  इतना कहते-कहते मानो मेरी पूरी उम्र बीत गयी. मेरी आवाज मेरी नहीं थी...वह एक खोखली,पिलपिली और बेजान आवाज थी.और हल्की, जो कभी भी एक झटके में उड़ाई जा सकती है.
  अरविन्द ने इस पर कहा,”ठीक है,आप मेरे दोस्त के साथ आये हैं इसलिए डेढ़ हजार में हो जाएगा.”
  गोविन्द ने एक पल मेरी ओर देखा.उसकी आँखें ठण्डी थीं.इसके बावजूद उसकी आंच में मैं मोम-सा पिघल गया था.
   गोविन्द ने पर्स से रुपये निकालकर दे दिए उसे.
   “थैंक्यू !” मुस्कुराया वह.
   फिर उठते हुए उसने मुझसे कहा,”सब करना पड़ता है यार आज के जमाने में.इसे माइण्ड मत करना.अब घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? क्यों?” और वह जोरों से हंस पड़ा.हँसते हुए उसकी गर्दन फिर घोड़े के समान हिल रही थी.
  और मजा देखिये,उसके साथ मैं भी हंस पड़ा था. गोविन्द भी.
  हम ठठाकर हंस रहे थे.
  आपको क्या लगता है,हम--गोविन्द और मैं—क्या सचमुच हंस रहे थे?
   लेकिन मैं वास्तव में हंस रहा था.एक भरे-पूरे आकारवाली आदमकद हँसी. क्योंकि मेरी हत्या हो चुकी थी. पहले मुझे शक था कि वह मुझे पूरी तरह नहीं मारेगा...लेकिन...
  अरविन्द मुझसे कुछ ‘प्राइवेट’कहने एक कोने में ले गया,और फुसफुसाया, “ऐसे ही मुर्गे लाया करो यार और...तुम्हारा भी कमीशन हो जाएगा...तुम उसकी चिंता मत करना...”
  मुझे लगा,अरविन्द हमारे समय और सामाजिक संरचना का एक बिलकुल सही उत्पाद है.जैसा कि रसायन शास्त्र में होता है: निश्चित ताप और दाब की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद एक नया किन्तु निर्धारित पदार्थ ही बनता है,कुछ दूसरा नहीं बनता.
  हम बाहर निकल आए.

कैलाश बनवासी द्वारा लिखित

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शिक्षा - बी० एस० सी०, एम० ए० बी० एड० 

कृतियाँ  - विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित | पांच  कहानी संग्रह - 'लक्ष्य तथा अन्य कहानियां' , 'बाजार में रामधन' , 'पीले रंग की उजली इबारत' , 'प्रकोप व अन्य कहानियां' और                 'जादू टूटता हैं' |

उपन्यास - 'लौटना नहीं है'

सम्प्रति - अध्यापन 

संपर्क - 41, मुखर्जी नगर, सिकोला भाठा, दुर्ग, (छत्तीसगढ़ ) fon - 9827993920

 

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