कविता आजकल- 3 : आलेख (अनुपम त्रिपाठी )

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अनुपम त्रिपाठी 702 2020-07-16

एक शिक्षक जो कि कवि भी है, खुद को यदि बच्चों के लिए जल का स्रोत बनना चाहा है, तो सोच के इस खूबसूरत अंश की तारीफ़ होनी ही चाहिए।

कविता आजकल- 3

अँधेरा इस कदर है कि जुगनुओं को देखना अच्छा लगता है। अब से नहीं बचपन से ही। शहर में बिजली के जाने पर दूर सुदूर टॉवर पर जलती लाल बत्ती को देखना भी अच्छा लगता है। घुप अँधेरे के खिलाफ डटे हुए भुक्-भांय करते रोशनी के ये नन्हें स्रोत बहुत प्रेरित करते हैं। इन जुगनुओं ने बहुत सिखाया है हमें। शायद कवि होना अँधेरे के खिलाफ जुगनूँ होना है। यह जो अपने वर्तमान में घना अँधेरा देखता हूँ, इस अँधेरे में कुछ जुगनुओं को भी देखता हूँ... ये कवि रोशनी के स्रोत हैं... हमारे घुप अँधेरे समय में इन्हें पढ़कर अच्छा लगता है।

  आलोक मिश्रा उम्मीद बंधाते हैं।  दिल्ली में शिक्षक हैं। उनके काव्य संग्रह का नाम है 'मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा'। लिखते हैं -

'कक्षा में

जब मैं हो जाता हूँ पानी
बच्चे बन जाते हैं मछली
और तैर जाते हैं मुझमें
इस छोर से उस छोर तक'

- अब देखिए इसकी खूबसूरती। मछली और पानी का एक सन्दर्भ हमारे बचपन से ही जुड़ा हुआ है। हमें याद नहीं करना पड़ता है कि मछली जल की रानी है। शायद सबसे पहले साहित्य-संस्कार की शुरुआत  हमारी इसी कविता से होती है। अब इसी मछली और पानी का एक प्रयोग इस कवि ने किया है। यह जो मछलियों का पानी में तैरने के मनोयोग का प्रयोग कवि ने अध्यापक और विद्यार्थियों के सन्दर्भ में किया है...एक वयस्क शिक्षा शास्त्री की तरफ से किया गया प्रयोग दिखाई पड़ता है। आप सोच रहे हैं कि कविता के इतने साधारण से टुकड़े में मुझे ऐसा क्या दिखा कि मैं इस पर लिखने लगा, तो उसका उत्तर आगे है।

    मछली का पानी में रहना ठीक वैसे ही है जैसे हम अपने घरों में रहते हैं। और अपने घर में हम निडर रहते हैं। बच्चों और अध्यापकों का यह मछली और पानी वाले सम्बन्ध का अपने भारतीय समाज के शिक्षण संस्थानों में गहरा अभाव महसूस करता हूँ। स्कूल में बच्चे डरते हैं। यह कहने का जोखिम उठा रहा हूँ कि डरने की सबसे पहली ट्रेनिंग हमारे शिक्षण संस्थानों में ही दी जाती है। जहाँ से हम बेख़ौफ़ हो प्रश्न करने के तमाम तरीके सीख सकते थे वहां से हमने डरना सीखा। याद करिए प्रेमचंद का उपन्यास 'कर्मभूमि'। पहला पेज़ खोलते ही आपको शिक्षालय और जुर्मानालय का भेद मिल जायेगा। वह भेद भी आज तक मिट नहीं पाया। ऐसे में एक शिक्षक जो कि कवि भी है, खुद को यदि बच्चों के लिए जल का स्रोत बनना चाहा है, तो सोच के इस खूबसूरत अंश की तारीफ़ होनी ही चाहिए।

      इन्हीं की एक अन्य कविता है 'आम का पेड़'। उसका शुरुआती हिस्सा कुछ यूँ है-

'काटा जा रहा है आम का पेड़
क्योंकि वो आ रहा है बन रही दीवार के रास्ते में
ओह! आ नहीं रहा
पेड़ भी भला कहीं चलते हैं
दीवार आ रही है उससे होते हुए
पर दीवार भी कहाँ चलती है
ये तो हमारे रहन का विस्तार आ रहा है
आम के पेड़ तक'

    - जब मैंने यह कविता पढ़ी तो मुझे अपने गाँव वाले घर की दुआर पर खड़े बेल के पेड़ की याद आई। अब वो पेड़ काट दिया गया है। वह इतना विशाल और समृद्ध पेड़ था कि गांव के सभी उसके फल का आनंद लेते थे। मुझे याद है गर्मियों में अक्सर दोपहर के वक्त बाबा बाल्टी भरकर बेल का शर्बत बनाया करते थे और सारा घर लोटा भर भर कर उसका पान किया करता था। फिर जब हमारे उस पुस्तैनी घर को और बड़ा किया जाना तय हुआ तो उसके साथ ही उस विशाल समृद्ध पेड़ को भी काटा जाना तय किया गया। बल्कि उसे काट ही दिया गया। यही होता है। हम मनुष्यों ने अपने लक्ष्य में आने वाली हर उस चीज़ को नष्ट करने का प्रयास किया है जिसकी वजह से हमारा जीवन संतुलित हुआ करता है।

   आलोक जी बहुत संभावनाशील हैं। मुझे उम्मीद है कि कविता के क्षेत्र में इनकी यात्रा बहुत लंबी होगी। यदि आप कविता के पाठक हैं तो इनकी कविताओं से आपकी मुलाकात विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से होती ही होगी। इनका संग्रह (मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा) अभी हाल ही में वर्ष 2019 में 'बोधि' प्रकाशन से आया है।

     यदि आप यह मानते हैं कि कविता अपने समय में हो रही हलचलों का सबूत है तो अनुपम सिंह की कविताएं आपको पुख्ता सबूत देंगी। हमारी समकालीन कविता में यह जो प्रतिरोध का बहुत व्यापक स्वर दिखलाई पड़ रहा है, उसमें एक बुलंद आवाज़ इनकी भी है। न केवल बुलंद बल्कि गंभीर। इस 'गम्भीरता' पर  वज़न दे रहा हूँ। इनकी एक कविता 'राष्ट्रीय सूतक' का एक अंश कुछ यूँ है-


'खपरैलों पर रोती बिल्लियाँ
मुँह में दबाए अपने बच्चों को
किसी और दिशा को जा रही हैं
खलिहानों में कुत्ते और
खेतों में स्यारिनों का मातम है
फिर भी टूटता नहीं इस रात का सन्नाटा'

  - है न हृदय विदारक दृश्य! यह बिल्लियों और कुत्तों का रोना! खेतों से आती स्यारिनों की रोने की आवाज़... उफ़...जरा सोचें, जिस बिल्ली ने अभी-अभी बच्चों को जन्म दिया है वही बिल्ली अपनी आँखों के सामने किसी बिलौटे को देख रही हो। उसे पता है कि वह उन बच्चों को मार डालेगा। और बिल्ली असहाय है। कुछ नहीं कर सकती। रो सकती है और रोती है।

कविता अध्ययन की मेरी सीमा है लेकिन उसी सीमा की ऊंचाई से झाँककर दूर दूर तक देखने की कोशिश करता हूँ कि खपरैल पर रोती हुई बिल्ली का दुःख कहाँ है? कहाँ है खेतों में सियारिनों का मातम? औ' यह जो इतना दारुण इतना खौफनाक माहौल कविता में बन पड़ा है कि इस भयंकर मातमी शोर के बावजूद इस रात का सन्नाटा नहीं टूटता है। कुछ देर के लिए मुझे लगा कि मैं जगदम्बा प्रसाद दीक्षित का 'मुर्दाघर' पढ़ रहा हूँ। इतना 'पेनिक' कर देने वाली कविता।

दरअसल चुप्पी में और भी चुप्पी एक अलग तरह का शोर पैदा कर देती है। जैसे सबकुछ शांत हो और महज़ घड़ी की टिक टिक हमारा ध्यान भटका दे। मैंने महसूस किया है, शायद आपने भी किया ही होगा कि सन्नाटे में अक्सर एक अजीब शून्य की स्थिति पैदा हो जाती है। और वह शून्य ध्वनि विहीन नहीं होता। अगर हम उस शून्य पर  ध्यान देंने लगें तो वह ध्वनि हमें बेचैन कर देती है। अनुपम की कविताएं हमें उसी तरह बेचैन कर सकती हैं। यह बहुत ताकतवर कविता है। इस कविता की जितनी तारीफ की जाय... कम है।


        अच्छा कवि जितना सटीक शब्द संयोजन करता है उतना ही सटीक दृश्य संयोजन। जिसे 'इमेज़री इन पोएट्री' कहते हैं... वह भाषा में फिल्म प्रस्तुत करने की कला जैसी है। अनुपम सिंह इसमें बेहद सिद्ध हैं। कविता में चित्र बनाते वक्त वह बहुत बारीकी से ध्यान रखती हैं। और उस चित्र संयोजन से कुछ ऐसा निकल कर आता है जो बहुत सहज होते हुए भी कठिन काम है। एक कविता जो मुझे बेहद पसंद आई, अधूरा पुल, उसका शुरुआती अंश देखें-

'जब दुपहरिया कुम्हार के आँवे-सी
तपने लगती है।
धूल, आग की तरह गर्म
जब कुत्ते मिट्टी को गहरे खोद
गर्मी से बचने की कोशिश करते हैं
और गौरैया नल के मुँह से लटक कर
हाँफती है पानी के लिए
तब कुछ तांबई रंग की औरतें
खेत काट रही होती हैं
कुछ इंसान-नुमा लोग
ईंट के भट्ठे पर पक रहे होते हैं
ईंटों से भी गहरा है उनके देह का रंग
कुछ झाँवे जैसा।'

       -  अब देखिए भीषण गर्मी है। इतनी गर्मी है कि कुत्ते गड्ढों में छुप रहे हैं। गौरैया नल के मुंह से लटक कर पानी पी रही है और ऐसी भीषण स्थिति में कुछ औरतें खेत काट रही हैं। कुछ मज़दूर-जिन्हें लेखिका ने 'इंसान नुमा' कहा- ईंट के भट्टे में लगे हुए हैं।

यह सिर्फ कविता भर नहीं बल्कि एक सवाल की तरह अड़ गयी है कि ऐसी गर्मी में जब अन्य पशु पक्षी तक व्याकुल हो होकर अपने लिए आसरा ढूंढ रहे हैं, आराम ढूंढ रहे हैं तब हमारा मज़दूर वर्ग काम पर डटा हुआ है। क्या वो इतने अन्य हैं कि जीव जंतुओं की जिंदगी भी उनसे बेहतर है?

 अनुपम सिंह और आलोक मिश्रा की कविताओं पर और भी लिखने का मन है। अभी तो हमने केवल इनके काव्य संसार में खिड़कियों से झाँकने का प्रयास किया,

कुछ दीवारों को देखा है, थोड़े से साज- सामानों पर भी नज़र घुमाई है लेकिन पूरा घर देखना अभी बाकी है।

मैं जानता हूँ कि दोनों ही की कविताओं के बहुत बड़े पक्ष को मैंने छोड़ दिया है जिसपर लिखा जाना चाहिए था लेकिन वह काम पाठकों की पीठ पर रख रहा हूँ। वे जाएँ खोजें और हिंदी के इन युवा रचनाकारों को पढ़ें।

अनुपम त्रिपाठी द्वारा लिखित

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