'अपने भीतर की यात्रा' : कहनी "शैलेंद्र शर्मा"

कथा-कहानी कहानी

शैलेंद्र शर्मा 193 2020-12-27

“हमरंग बारह क़िस्से टन्न” लाइव क़िस्सा कहन के लम्बे चले आयोजन के हासिल के रूप में बहुत से साहित्यिक मित्रों से परिचय हुआ और उनमें से कुछ अच्छे दोस्त भी बने हैं। उन्हीं में से एक नाम है कथाकार “शैलेंद्र शर्मा” का । मथुरा से बहुत क़रीब आगरा रहते हुए भी अपरचित रहने का कारण भी उनकी कहानियों से गुजरते हुए समझ में आता है कि आप अपने समय और समाज को इंसानी जज़्बातों के साथ पढ़ते तो हैं किंतु पढ़ाने की  क़थित उग्रता में आपका यक़ीन नहीं है । आपकी कहानी पाठक के भीतर ठीक वैसे ही जगह बनाकर आ बैठती है जैसे वे खुद अपने व्यवहार और बात-चीत की सहजता से किसी के भी दिल में जगह बना लेते हैं । आपकी कहानी के पात्र मिलकर जो समाज गढ़ते हैं उसका ताना-बाना इतनी महीन और सघन बुनाबट के साथ इतनी सहज और सरलता से उतरता है जहां किसी अकल्पनीय बितान का धागा मात्र भी खोज पाना भी मुश्किल होता है । यही कारण है कि आपकी कहानियों में लेखकीय कल्पनाशीलता का ऐसा यथार्थपरक सामंजस्य का सामर्थ्य महज़ किताबी ज्ञान नहीं जान पड़ता बल्कि सामज के गहन विश्लेषण का नतीज़ा है । आज यहाँ प्रस्तुत कहानी ‘अपने भीतर की यात्रा’ आपकी कथा यात्रा से निकली एक ऐसी ही कहानी है जो न महज़ खुद को पढ़वा लेती है बल्कि पाठक को गहरे आत्म चेतन में उतार ले जाकर संवेदना के इंसानी संवेग के साथ जैविक ऊर्जा की ज़मीन के रूप में उपस्थित होती है जो इस कहानी और कहानीकार को ख़ास बनाती है ॰॰॰॰॰॰॰। - संपादक

अपने भीतर की यात्रा

पहला दिन 

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 एयरपोर्ट के बड़े दरवाज़े से निकलते ही ठंडा वातावरण छूट गयाऔर उमस और गर्मी का एक भभका आयामगर सामने ही प्रणय मुझको दिख गया… शीतल पवन के झोंके जैसा! वही गोरा रंगवही स्निग्ध हंसीवही शरारती आँखें… इस इंसान को तो मैं अँधेरे में भी पहचान लूं! साथ में खड़ी थी अनुभा… उसकी गोरीगुलथुल पत्नी… हाथों में गुलाब का एक छोटा सा गुलदस्ता लिए!लगभग दौड़ती हुई-सीअपने सामान की ट्रॉली छोड़कर मैं उन दोनों से जा लिपटी

 दोस्त….!” 

 हम दोनों एक साथ ही चिल्लाते हुए खिलखिलाने लगेI ’दोस्तही तो वह संबोधन था जिससे हमारे चार यारसमूह  के लोग एक दूसरे को बुलाते थे Iजब कुछ क्षणों में हम तीनों के आलिंगन की पकड़ थोड़ी ढीली पड़ी तो मैंने प्रणय से कहा,

 कैसा है तू प्रणय ?”

 मरा नहीं हूँ तेरी याद में.. देख ले अभी तक”,उसने कहकहा लगायाI

 अनुभा ने मुझे गुलाब का गुलदस्ता देते हुए स्वागत कियागुलाब मेरी कमजोरी थेसारे दोस्तों को पता थामैंने गुलदस्ता नाक पर लगा कर जोर से सांस खींचीतन-मन सुवासित हो उठा… थकान एक मिनट में जाने कहाँ काफूर हो गयी!

 तू गुलाब अभी तक नहीं भूला मजनू ?”अनुभा को धन्यवाद देकर मैंने प्रणय से कहा!

 तेरे दिए गुलाब तो मैंने किताबों में छुपा कर रखे हैं”,प्रणय ने कहा,फिर वाक्य को गाने की-सी स्वरलहरी देते हुए बोला,“वो जो ख़त... तूने मुहब्बत में लिखे थे मुझको…!”

 प्रणय के बच्चे….उन्हीं खतों को लेकर हर की पैड़ी से कूद जा गंगा में”, और प्रणय फिर खिलखिलाया! उसे हंसने के सिवा दूसरा काम कब आता था!

 सामान गाड़ी में पीछे रख कर हम लोग प्रणय के घर की तरफ चल दिएवे दोनों आगे बैठे थेमैं पीछे वाली सीट पर गुलाबों को सीने से लगाये बैठी थीबाहर मेरे पुराने शहर बैंगलूरू की सडकें तेज़ी से उल्टी  दिशा में जागी जा रहीं थींमेरा शहर… मेरा अन्तरंग परिवेश! कितने वर्ष बीते थे यहाँ… मोजाम्बिक  का वह मशीनीनीरसअपरिचित,और अकेलेपन से भरा माहौल याद हो आयाI

 कहाँ खो गयीं दोस्त?”प्रणय ने सामने सड़क पर नज़रें गड़ाए हुए पूछा I

 यार बहुत याद आती है इस शहर कीयहाँ के वीक-एंड...यहाँ की मस्ती...शोर-शराबा… हल्ला-गुल्लाकितने किस्मत वाले हो तुम लोग!

 अरे हम सबसे ज्यादा किस्मतवाली हो सकती है तू! वहाँ अफ्रीका में बियाबान में पड़ी हुई है। अभी भी रिजाइन करके वापस भारत आ जाI”

 हाँ यार,ये वाला प्रोजेक्ट पूरा हो जाएतो अब कोई नया काम नहीं लूंगी। कंपनी से कहूँगीमुझे वापस भेज देबंगलूरू!

 दोस्ततब तो तू यहीं आ जायेगी… इसी शहर मेंमेरे पास!”,प्रणय चहकते हुए बोला। मैं तुरंत उसका मज़ाक समझ गयी।

 आ जाऊँगी… तो भी तेरा कोई स्कोप नहीं है लाइन मारने का!

 अरे जब तक तू सिंगल हैतब तक तो हम तेरे दरवाज़े पर खड़े हैं। उम्मीद पे दुनिया कायम है”,उसने जोर से कहकहा लगाया। ऐसे ही हँसता था वह... पागलों की तरह!

 शर्म करतेरे बगल में तेरे बच्चे की मां बैठी हुई है। कुछ तो लिहाज़ कर”, मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

 अपना तो बस वही सिद्धांत है… वन सेवेन टू टू”, यह उसका प्रिय डायलॉग था।

 और उसके इस हँसते-मुस्कुराते व्यक्तित्व पर अचानक बहुत प्यार उमड़ने लगा। मन किया,अभी गले लगा लूं उसे। तभी उसके खिलंदड़ेपन के ठीक विपरीत एक धीर-गंभीर व्यक्तित्व और याद हो आया। चश्मे के पीछे से झांकती पारिजात की आश्वस्त करती आँखेंमानो कह रहीं हों… मेरी बलिष्ठ भुजाओं पर माथा टिका कर तुम सारी दुश्वारियां भूल सकती हो। पारिजात को इतनी जोर से ठहाका लगाते हुए कभी देखा होयाद नहीं। जिन चुटकुलों पर बाकी लोग हँस-हँस कर दोहरे हो रहे होंउन पर भी वह चमकती आँखों से केवल मुस्कुराता  रहता था।

 एक अजब सी सुगंध आती थी पारिजात से… चित्त को अन्दर तक सुवासित करने वाली। अभी भी आँखें बंद करके उसे अनुभव कर सकती हूँ मैं। अपनत्व से लबरेज़ उसकी आवाज़… उसका बात करने का लहजा याद हो आया। फिर उसकी बातें मुझ पर नशे की तरह छाने लगीं तो निर्ममता से उसके ख्यालों को हथेली से बुहार कर मैंने मन-मस्तिष्क से हटा दिया। नहींमुझे तुम्हारे विषय में नहीं सोचना है पारिजातमैंने जो पगडंडी अपने लिए चुनी है,उसमें तुम कहीं भीकभी भी नहीं होI

 गाड़ी के रुकने पर जैसे मैं नींद से जगीदरवाज़ा खोले प्रणय खड़ा था,

 आओमेरी मल्लिका!

 वाह रे मेरे शोफ़र!”,मैं मुस्कुरायी

 अंदर खाने की मेज़ पर मेरा मनपसंद नाश्ता था…. खांडवीरवा इडली और फ़िल्टर कॉफ़ी! मन प्रसन्न हो गया। प्रणय  से कहा, “तुझे अभी तक याद है प्रणय ?”

 और कुछ चाहिए मलिका-ए-आलियातो बताइएबंदा हाज़िर है!”,उसने झुकने का नाटक-सा किया।

 अरे छोटू से तो मिलवाओ।”,मैंने अनुभा से आग्रह किया। वह उसे अपने कमरे से गोदी में उठा कर ले आई। मैंने लपक कर उसे गोदी में लिया और चेहरे से सटा लिया… बेबी-पाउडर और बेबी-सोप की मिली-जुली गंध और शिशु की देह से उठती एक नैसर्गिक सुगंध का मिश्रण अन्दर तक उतर गया।

 शिशु की दुनिया से निकलने में शायद मुझे एक-दो मिनट लगे होंगे। तभी मेरी नज़रें प्रणय पर पड़ीं। वह कुटिल शरारत से मुस्कुरा रहा था। बोला,“तेरी गोद में बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं दोस्त!  न जाने कितने मासूम तरस रहे होंगे तेरी गोद में आने के लिए… लेकिन नहीं.... तुझे तो वह बंजर धरती बने रहना हैजहाँ घास का एक कतरा भी नहीं उगता!

 फिर अपनी बांह फुलाता हुआ बोला, “शाबाश प्रणय खत्री! अब तो तुम सॉफ्टवेयर डेवलपर के साथ कवि भी होते जा रहे हो!

 मगर तेरी कविता बहुत ही फूहड़ है। कूड़ेदान में फेंकने लायक”, मैंने मुंह बिचका दिया 

 यात्रा में मैंने कुछ भी नहीं खाया थाशायद इसीलिए कॉफ़ी का पहला घूँट पीते ही लगा कि मुझे बहुत भूख लग आई है। प्रणय और अनुभा ने जबरदस्ती मुझे बहुत कुछ खिला दिया। यात्रा की थकान और मनपसंद भोजन ने शरीर में एक अजीब सी खुमारी भर दी थी और निद्रा देवी मस्तिष्क के दरवाज़ों पर दस्तक देने लगीं थीं।

 अनुभा बोली-आप बहुत थक गयीं होंगी। अब सो जाइये। सुबह बात करेंगे”, 

 और उसने मुझे मेरा कमरा दिखा दिया। कपडे बदल आकर क्लांत देह से मैं बिस्टर पर लेट गयी। प्रणय और अनुभा की दुनिया कितनी सम्मोहक और आकर्षक है-- ख़याल आया।  फिर सोचा--क्या मैं ख़ुश नहीं हूँआखिर अपने चुने हुए रास्ते पर चल रही हूँ...अकेली और मस्त रहती हूँकिसी का आदेश नहीं सुनना पड़ता। ऑफिस में लगभग हम सब एक ही स्तर के थेबावजूद इसके कि टीम लीडर मैं ही थी।

 मैं खुशकिस्मत थी  कि जो काम मेरे दिल के करीब रहा थावही मेरी जीविका का साधन था।  शोध मेरा प्रिय विषय थातपेदिक जैसी जानलेवा बीमारी पर फील्ड वर्क करना और फिर आंकड़ों पर विषद अनुसंधान करना मेरा पसंदीदा शगल था। पा [मेरे पिता] हमेशा कहते थे अभी बहुत कुछ करने को हैख़ास तौर से टी.बी. के क्षेत्र में। बहुत से रोगियों में दवाओं का निष्प्रभावी हो जाना एक महती समस्या थीजिस पर काम किया जा रहा था।

 मुझे ख़ुशी थी कि मेरे पा ने मुझे एक ऐसा विषय दिया जो मेरे लिए बहुत रुचिकर था। वह स्वयं माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हुए थे। पसंद होने की वजह से ही जब बायोटेक्नोलॉजी की इस बहुराष्ट्रीय  कंपनी ने मुझे अफ्रीका के मोजाम्बिक देश में रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए भेजने का प्रस्ताव दिया था,तो मैंने तुरंत हामी भर दी थी।

 केवल एक ही दुःख था--मेरा देश मुझसे छूट जायेगा… और बैंगलोर भीजहां पिछले आठ सालों से थी मैं। यह भी दुःख था कि मेरे चार यार’ मुझसे छूट जायेंगे… हालाँकि सब की राहें अलग-अलग हो गयीं थीं।

 मैगी शादी करके लखनऊ चली गयी थी और फिरोज गुडगाँव। प्रणय तो बैंगलोर में था ही मगर अब भी हम चारों दोस्त भावनात्मक रूप से एक दूसरे से बहुत जुड़े हुए थे। फ़ोन पर हम एक दूसरे से बहुत बतियाते और तस्वीरें भेजते। मोजाम्बिक में मेरा एक ही काम था… दिन भर प्रोजेक्ट में हाड़-मांस गला कर काम करना और रात को प्रणयफ़िरोज़ या मैगी से फ़ोन पर बात करना या संगीत सुनना I

 ऐसे में एक बड़ी दुर्घटना घटी थी। पा का असमय चले जाना। पागलों की तरह रोती-बिलखती मैं भारत पंहुची थी,अपने शहर! मेरे तीनों दोस्त वहां मौजूद थे--मेरा दुःख कम करने के लिए। मैगी तो पूरे तेरह दिन रुकी थी।

 पा मेरी दुनिया थे--दोस्तदार्शनिकमार्गदर्शक,सब एक में समाहित! शुरू से माँ की कमी को वे दूर करते आये थे। वे अक्सर कहते थे--मृत्यु तो ऐसी होनी चाहिए कि पल भर में हैं,और पल भर में नहींप्रकृति ने तथास्तु कह कर उन्हें पल भर में ग़ायब कर दिया था,मगर अभी तो उनकी कोई उम्र भी नहीं थी जाने की विवाह तो मुझे खैर,करना नहीं था …..मगर मेरे पा,मेरा संबलमेरा आत्मविश्वासमेरी ज़मीन से जुड़ी हुई जड़ थे।

 विवाह का ख़याल आते ही पारिजात की वह बात याद आ गयी-- जितना मैं समझ पाया हूँ

दरअसल तुम हर पुरुष में अपने पिता को देखती होउनसे उसकी तुलना करती होऔर उसे कमतर पाते ही फ्यूज हो जाती हो।

 फिर मुस्कुराकर बोला था,“तुम्हारे बापूजी ने तो सारे छोकरों के स्कोप पे बुलडोज़र ही चला दिया।

 बकवास मत कर”, मैं वाकई गुस्सा हो जाती। और सचमुझे कभी नहीं लगा कि मेरे संभावित जीवन साथियों की खोज में मेरे पा बीच में आ जाते हों। मगर एक दूसरा सत्य यह भी था कि उनके जैसा कोई था भी नहीं।

 अक्सर मेरे सामने यह प्रश्न एक दैत्य बन कर खड़ा हो जाता कि मुझे कोई लड़का पसंद क्यों नहीं आताघूमने-फिरनेलफंगई करनेदेर रात तक कानफोडू संगीत पर पागलों की तरह नाचने के लिए सही हैलेकिन जहां उस लड़के को जीवन साथी बनाने का प्रश्न आता है तो मुझे क्यों सांप सूंघ जाता हैएकदम से ज़िन्दगी साथ बिताने की कल्पना में वह व्यक्ति एक अझेलज़बरदस्ती का सौदाया बोझ लगने लगता है।

 पारिजात,एक साल की फ़ेलोशिप पर अफ्रीका आया था और उसने मेरे मन की चूलों को काफी हद तक दुरुस्त कर दिया था। लेकिन क्या करतीमेरी विवाह रेखा के अनुसंधान में वह क्याकोई भी खरा नहीं उतरता था।

 मोजाम्बिक में उसकी शामें अक्सर मेरे घर पर गुज़रतीं थीं। हम लोग साथ मिलकर कुछ खाने को बना लेतेफिर बतकही करतेया संगीत सुनतेया टी.वी. पर कुछ देखते। मुझे अक्सर यह ताज्जुब होता कि वह मेरे बारे में मुझसे भी अधिक कैसे जान गया है। कई बार मेरे स्वभाव कीया काम करने के बकवास कम,काम ज्यादा’ वाले तरीकेया मेरी त्वचामेरी आँखेंमेरी वेणी या जूड़े की ऐसी विशद व्याख्या करता कि मैं हैरत में पड़ जाती। इस आदमी को और कोई काम नहीं है क्या ,मैं सोचती रहतीएक बार तो मैं बहुत हतप्रभ हो आई थी जब उसने मेरे होंठों के रंग के बारे में कुछ कहामैंने महसूस किया कि उसके अन्दर की स्त्रीमेरे अन्दर के पुरुष पर हावी होना चाह रही थीI

 जब उसके जाने में कुछ महीने शेष थे,एक अव्यक्त सी बेचैनी आ गयी थी उसके स्वभाव मेंबातें ज्यादा बढ़ गयी थीं-- जैसे समय कम हो और कहना बहुत सारा बचा होवह तरह-तरह के दृश्य मेरे सामने पेश करताजो लौट-फिर कर एक ही सन्देश देते कि हालाँकि वह जोर नहीं डाल रहा हैलेकिन हम दोनों ज़िन्दगी भर एक दूसरे के साथ बहुत अच्छे लगेंगेबार-बार मुझे यह भी दिलासा देता कि वह प्रतीक्षारत है… किसी हड़बड़ी में नहीं हैऔर यह भी कि वह अन्यथा ज़िन्दगी भर अकेला ही रहेगाI

मैं दृढप्रतिज्ञ थी मगर वह हर बार इस बात को एक नए और नामालूम से  तरीके से प्रस्तुत 

करतामगर पत्थर की शिला पर रेशम की रस्सी से भला क्या निशान पड़ता?

 उसका कार्यकाल अफ्रीका में ख़त्म होने पर पूरी यूनिट उसे अलविदा कहने एयरपोर्ट गयी थीअपनी उसी चिरपरिचित मुस्कराहट और आँखों में नमी लिए सबको विदा कहता हुआ वह मुख्य द्वार के अन्दर गया थासब उसके व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हुए लौटे थेएक पल को मुझे भी लगा कि मेरे अन्दर से कुछ हिस्सा टूट कर कहीं खो गया हैI

 कुछ शामों तक उसकी कमी खलती रहीफिर धीरे-धीरे मैंने खुद को मज़बूत कियाउसके सारे ख्यालों को झाड़-बुहार कर घर से बाहर फ़ेंक दियाजब भी उसका फ़ोन आताया सन्देश आता,मैं उत्तर नहीं देतीउसके फ़ोनसन्देशफोटोग्राफ्स आते रहते मगर मेरा दरवाज़ा बंद रहताउसकी दस्तकें जारी रहतींमगर मैं सांकल और अधिक मजबूती से बंद कर लेती,और करती रहती… डर था कि दरवाज़ा थोड़ा सा खुला और मेरी कमजोरियां मुझ पर हावी हो जायेंगीशायदI

 कमाल की प्रतिबद्धता का नमूना था वह भी! आपके सन्देश,फ़ोन कॉल्स ,चित्र और इन सब के आवरण में लिपटे एक मूक निवेदन को कोई पत्थर मार-मार कर वापस कर दे ,और फिर भी आप रोज़ 

होने वाली दिनचर्या का हिस्सा जैसा बना कर अपनी गुहारें लगातार भेजते रहेंकिसी और की तरफ से प्रतिक्रिया आये न आये,आपको कोई फर्क न पड़े--ऐसा कहीं होता है भला?

 पारिजात और पा के ख्यालों में डूबते उतराते कब नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लियापता ही नहीं चलाI

 

दूसरा दिन 

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दूसरा दिन बहुत व्यस्त गुज़राभारत के ऑफिस के सारे कार्य निपटाएफिर भी कल के लिए बहुत सा काम बाकी रह गया थाI

 रात को सब लोगों ने घर पर ही खाना खायाप्रणय भी बहुत थका हुआ था,कंपनी वाले दिन भर तेल निकाल  लेते हैंइसीलिए तो बहुत से लोग कहते हैं कि हम जैसे कार्य वाले लोग जल्दी ही बर्न-आउट’ हो जाते हैंफिर भी,देर रात तक मैं,और प्रणय लैपटॉप पर फिल्म देखते रहेअनुभाछोटू के साथ अपने कमरे में सो गयी थी 

 सोने से पहले  तय हुआ कि कल-परसों सारा काम  निबटा कर  परसों शाम से पूरी मस्ती की जायेगी I

 

तीसरा दिन[क़यामत की रात]

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मेज़-कुर्सी पर काम करते करते काफी रात हो गयी थीडिनर के लिए अनुभा और आया को मना कर दिया थामगर अब अन्दर से सन्देश आ रहा था कि गरम पेय  जैसा कुछ चाहिएतभी पीछे से किसी हाथ ने मेज़ पर एक बड़ा सा मग रखाI

 हॉट चॉकलेट !”,प्रणय की आवाज़ थीIमेरा रोम-रोम आलोकित हो उठा 

 तुझे अभी तक याद है?”,मैं बुदबुदाईI

 क्यूँ नहीं भलाकंप्यूटर जैसा चलता है दिमाग मेरा! एक बार जो डाटा पंहुच जाता हैहमेशा के लिए स्टोर हो जाता है”,वह इतराते हुए बोलाI

 सबके लिए रात को चाय-कॉफ़ी बनती थी लेकिन तुझे तो हॉट चॉकलेट चाहिए होती थीसपने में तभी तो मेरे जैसे हॉट लड़के आते थे तेरे”,और उसने पूरे बत्तीस दांत दिखा दिएI

 अपने को हॉट समझता थातभी मुझसे और मैगी से ट्रेनिंग लेता था कि लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए”,मैंने बोलाI

 दोस्त... सच्ची यार कितने हाथ पाँव मारे लेकिन कहीं बात नहीं बनीवो तो अगर मम्मी -पापा ने अरेंज्ड मैरिज नहीं कर दी होती तो आज भी सड़कों पर सिगरेट फूँक रहे होते I”

 अनुभा बहुत अच्छी लड़की हैऔर छोटू तो बहुत ही प्यारा खिलौना है”,मेरी आवाज़ में जैसे चिड़ियों का सा संगीत घुल रहा था और मैं जैसे सपनों में छोटू को बेतहाशा चूमे जा रही थीI

 अब दोस्त,अगर तू एक मुफ्त की सलाह माने तो… वह गंभीर हो आया थाI”

 मैं समझ गयी कि बात किस और मुड़ रही हैमैंने कृत्रिम क्रोध जताते हुए कहा, “तूने अगर अब फिर से ये बात छेड़ी तो मैं अभी मोजाम्बिक  भाग जाऊंगी I”

 उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहेतभी मुझे अपना काम याद आ गया और मैंने कहा 

दोस्त.ज़रा देखनामेरी कैलकुलेशंस में कुछ गड़बड़ हो रही हैतीन बार फार्मूला लगायामगर हर बार उत्तर अलग आ रहा हैI”

 उठ,ला मैं देखता हूँसमझ में कैसे आएगा तेरेऊपरी मंजिल तो खाली हैपता नहीं तुझे विदेश कैसे भेज दिया कंपनी वालों ने”, वह मुस्कुराते हुए बोलाI

 अच्छा ,ज्यादा नौटंकी मत कर”,मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा,“पता है कितनी बड़ी यूनिट चलाती हूँ मैंकितने पेपर छप चुके हैं मेरे,और वह भी अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स मेंतेरे बाप को गिनती भी नहीं आती होगी”,मैं आत्माभिमान के अतिरेक से फूली जा रही थीI

 अच्छा चुप कर मेरी अम्मादेखने दे अपनी कैल्कुलेशंस कोI”

 मैं जैसे ही पलंग पर बैठने को मुड़ीलगा कि दरवाज़े पर पर्दा कुछ हिला,जैसे कोई खड़ा हो वहाँमैं चेहरे पर प्रश्नवाचक भाव लेकर दरवाज़े तक पंहुचीतो देखाअनुभा जैसे खिड़की की संध में से कुछ झाँकने का प्रयत्न कर रही थीअचानक मुझसे नज़रें मिलीं,और वह सकपका सी गयी Iफिर एक झेंपी सी मुस्कान लिए,तेज़ क़दमों से वापस चली गयीI

 मैं आकाश की ऊंचाइयों से… धड़ाम से पाताल में गिरीक्या मुझ पर और प्रणय पर निगाह रखी जा रही थीक्या अनुभा को लग रहा था कि इतनी रात को अकेले कमरे में मैं और प्रणयकुछ ऐसा कर रहे थेजो वर्जित हैअपमानक्षोभ और कुंठा से मेरा चेहरा तमतमा आयाप्रणयमेरा दोस्तमेरा साथीमेरा बच्चा… क्या हम सब एक दूसरे को जितना समझते थेकोई और नहीं समझ सकता था?  कितनी बार हम चारों एक साथएक कमरे में रातों को सोये हैंएक दूसरे को उतनी ही इज्ज़तउतनी ही स्पेस देते हुएजितना परिवार के सदस्य एक दूसरे को देते हैंI

  हमारा चार यार’‘ समूह लोगों की ईर्ष्या का केंद्र थाएक बार जब बंगलुरु की सड़कों पर प्रदर्शन और तोड़-फोड़ चल रही थी,और सारे ऑफिस बंद हो गए थेतो हम चारोंइन लड़कों के फ्लैट में,चार दिन बंद रहे थे… कर्फ्यू की-सी स्थिति मेंहम चारों ने उस विषम परिस्थिति में भी कितने मज़े किये थे!  खाना खुद बनातेखातेदिन भर लैपटॉप पर फिल्में देखते और रात को बड़े वाले कमरे में सो जातेउन दिनों में डूबते-उतराते! परआज अनुभा का थप्पड़-सा खाकर मेरे चेहरे पर मानो पाँचों उंगलियाँ उभर आयी थींआँखों में एक जोर का झंझावात घिर-घिर आने लगाअशक्त सी मैंजाने कितने लम्हे  पलंग पर पड़ी रहीनिस्तेजनिष्प्राण!

 अरे भाई,यह तो समझ में नहीं आ रहा हैतेरे डाटा इनपुट में कुछ कुछ गड़बड़ है”, प्रणय जमुहाई लेते हुए बोला,“चल,कल सुबह देखते हैं”,और वह उठ खड़ा हुआI

 तभी उसकी नज़रें मेरे उस चेहरे  पर पड़ींजिस पर हज़ार अमावस की रातें दहाड़ मार रही थींI

 अबे,तुझे क्या हुआ दोस्त?”,वह बोलाबमुश्किल मेरे चेहरे पर एक उदासफीकी सी हंसी आईI

 बिरादर,तू रो रहा है?”,उसका लहज़ा तरल हो आयागंभीर मौकों पर वह कई बार मुझसे पुल्लिंग में बात करता था I

 अरे,जमुहाई आती हैतो आँखों में पानी नहीं आ जाता क्याजा,भाग जा”, मैंने कहा उसने मेरे सिर पर एक हलकी सी चपत लगायीऔर कमरे के बाहर चला गयाI

 दरवाज़ा बंद करके मैं निर्जीव सी पलंग पर जा गिरीजाने कितने बांधों को तोड़ कर पानी कमरे में भर गया था और मेरी हिचकियाँ थीं कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थींकोई मुझ पर प्रणय को लेकर शक कर सकता थाऔर वह भी प्रणय की अनुभा… यह बात मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही थीI

 और यह प्रणयआकाश की कितनी ऊँचाइयों तक उठा हुआ हैयह अभी भी अनुभा नहीं समझ पायी थीमुझे अचानक कुलकर्णी याद आ गया,जिसकी नज़रों में छिपकलियाँ-सी रेंगती थीं 

 कई साल पहले की बात थीकई लड़के-लडकियां अपने अपने गृह प्रदेशों को चले गये थे,और कौन किसे अपने फ्लैट का पार्टनर बनाएगायह समीकरण बैठाये जा रहे थेमैं और मैगी तो साथ रह ही रहे थेफ़िरोज़ अपने लोकल गार्जियन के साथ रह रहा थाबस प्रणय को ही कोई साथ रहने को नहीं मिला थाऔर बैंगलोर में अकेले कमरा लेकर रहना बहुत महंगा थाउन दिनों भीतभी कुलकर्णी की बात चलीपढ़ा तो चार साल हम सबके साथ ही थालेकिन हम लड़कियों को बड़े गंदे तरीके से घूरता थाएक आध बार कुछ लड़कियों ने उसकी लाइन भी लगा दी थीमगर उसका केंचुए जैसा लिजलिजापन ख़त्म नहीं हुआ थाउसके बारे में मेरी और मैगी की धारणा एक-सी थीउसी कुलकर्णी को प्रणय को मजबूरी में अपना रूम पार्टनर बनाना पड़ा थाIहमने प्रणय को कुलकर्णी  के विषय में बताया था कि हम उसके साथ सहज नहीं हैंप्रणय ने घोषणा कर दी थी,

 मेरी तो मजबूरी हैमगर तुम लोग मेरे घर नहीं आओगेजब कुलकर्णी वहां होगाफ़िरोज़ के घर मिल लेंगे,तुम्हारे घर आ जायेंगेलेकिन कोई लड़की मेरे फ्लैट पर नहीं आएगीI”

 और हुआ भी यहीजब तक कुलकर्णी उसके साथ रहाहम कभी उसके फ्लैट पर नहीं गयेमैगी तो कभी-कभी प्रणय से चुहल भी करती,

 तूने हमारे प्रोटेक्शन का ठेका ले रखा है?” 

 मगर प्रणय इस विषय पर दृढप्रतिज्ञ थाकभी कुलकर्णी के साथ बाज़ार में होता तो हम दोनों के लिए रुकता भी नहींI

 और ऐसे प्रणय को और मुझे लेकर अनुभा का यह व्यवहार मुझे बहुत अन्दर तक आहत कर गया थापूरी रात नींद और जगार के बीच की स्थिति में डूबती-इतराती रही मैंकभी देखा… कुर्ग के शांतरम्य वातावरण में हम चारों सप्ताहांत मनाने गए हुए हैंरात को तीन पत्ती खेलते-खेलते हम चारों उसी कमरे में सो गए हैं-- मैं और मैगी पलंग परफ़िरोज़ सोफे पर,और प्रणय फर्श परइतने में अनुभा कमरे में आती है,तूफ़ान सा लिए-- तुम्हें शर्म नहीं आती लड़कियों !लड़कों के साथ सो रही हो !उनको तुरंत बोलो अपने कमरे में जाने के लिए!

 कभी देखा-- बंगलुरु में सुनसान हाईवे पर फ़िरोज़ और हम दोनों लड़कियां बाइक पर जा रहे हैंI  हम दोनों लड़कियां उससे चिपक कर बैठी हैंपागलों की तरह हँसते हुए चीख रहीं हैं हम दोनोंउससे गाड़ी धीरे करवाने के लिए उसे गुदगुदी मचा रहीं हैंकभी देखा-- दरवाज़े का पर्दा हटा कर अनुभा कमरे में आती है और प्रणय से कहती है--आज मैंने तुम दोनों को रंगे हाथों पकड़ लियाI’

 आसमान के सितारों और नरक की नालियों में धक्के खाती मैं कब सो गयीहोश नहीं! सुबह आँख खुली तो ग्यारह बज रहे थेसिर भन्ना रहा थामेरे जाने में चार दिन शेष थेलेकिन मैंने पहला काम यह किया कि फ़ोन उठा कर वापसी की उसी  रात की फ्लाइट बुक कर लीकल रात के अनुभव के बाद मैं प्रणय के घर से जल्दी से जल्दी भाग जाना चाहती थीशावर के नीचे बहुत देर खड़े रहने पर भी सिर का दर्द  कम नहीं हुआ थातैयार होने के बाद कमरे से बाहर निकली तो देखा अनुभा नाश्ता लगा रही है

 मुझे देख कर औपचारिकता की ठंडी मुस्कान लाकर बोली,“प्रणय तो आठ बजे ही निकल गया थाआपका दरवाज़ा भी खटखटायालेकिन आप गहरी नींद में थींनाश्ता लगा रही हूँबैठियेI”

 नहीं अनुभा… सिर्फ चाय पियूंगी मैं! और सुनोरात को मोजाम्बिक  से  कंपनी से अर्जेंट कॉल आई थीमुझे शाम को ही निकलना होगामैंने फ्लाइट बुक करा ली हैअभी कंपनी के ऑफिस जा रही हूँवहीँ से प्रणय से बात कर लूंगीदिन भर तो ऑफिस में ही हो जायेगाशाम को सामान उठाने आऊँगीI

 अरे आप तो चार दिन बाद जा रही थींरुकतीं आप"प्रत्यक्ष रूप से उसने कहा,  मगर मैंने वह नहीं सुना जो उसने कहा थाबल्कि वह सुनाजो उसने नहीं कहा था-- चलो अच्छा हुआअब फूटो यहाँ सेI“

                    यंत्रचालित सी मैं ऑफिस पहुँच गयी थीIबहाना बनाया था,कोई काम तो था नहींऑफिस की बड़ी सी लॉबी में पूरा दिन काटना था मुझेप्रणयफ़िरोज़मैगीपापारिजात…..कितनी यादें थीं जो मुझे सागर की लहरों की तरह कभी ऊपरकभी नीचे ले जा रही थीं

 पारिजात की एक बात बहुत याद आ रही थी, ‘देखो सिंगल लोगों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उनके शादीशुदा दोस्तऔर दोस्तों के परिवार कभी उन्हें सामान्य मान कर स्वीकार नहीं करतेहमेशा एक दूरी बनाकर और शक के दायरे में रखते हैं उन्हेंतुम लड़कियों की तो मैं नहीं जानतालेकिन हम जैसे कुंवारे लड़कों को भूखा भेड़िया या प्रीडेटर समझा जाता है,जो जाने कब नोच ले!

 

आज पता चला कि शायद पारिजात सही कह रहा थाउसकी एक बात और याद आ गयी--

देखो ज़्यादातर लोगों के तईं आदमी और औरत का रिश्ता आदम और हव्वा वाला होता हैइसके आगे उनकी सोच नहीं जातीI’

 क्या पारिजात का विश्लेषण सही थामेरे पा ने जिन तंतुओं से मुझे गढ़ा था और चार यार ने उसे जिस खाद-पानी से सींचा थावे सब उसके इस विश्लेषण पर नकारात्मक मोहर लगा रहे थेमगर कल रात मेरे दोस्तमेरे प्रणय को कोई मुझे थप्पड़ मारकर मुझसे छीन ले गया थाऔर मैं रह गयी थी सन्नहताश,हतप्रभ और निःशब्द! और गली गली फैली किरचों को समेत कर तस्वीर बनाने की जुगत करती रही मैंप्रणय के कई बार कॉल आये लेकिन मैंने उठाये नहींबिलकुल मन नहीं हो रहा था उससे बात करने का! जैसे मैंने पिछले दो सालों से पारिजात का एक भी फ़ोन नहीं उठाया हैन उसके मेसेज का उत्तर दिया हैठीक उसी तरह!

 पारिजात का कभी न चुकने वाला धैर्य मुझे चकित कर देता थावह नियमित अंतराल पर मेरे फ़ोन की घंटी बजातानियमित मैसेज करके मुझे अपने बारे में सूचनाएं देता रहतासबकी आवाजें पहाड़ पर चिल्लाने जैसी प्रतिध्वनित होकर वापस आतीलेकिन मैं ऐसा पहाड़ बनी थी जिससे टकराकर उसकी आवाजें वापस नहीं आती थींमगर जैसे मंदिर में रोज़ ढोक लगाने जाता होऐसे मुझे बताता रहता-- कौन सी किताब पढ़ी हैकंपनी उसे क्या नया काम दे रही हैकौन सा शोधपत्र छप रहा है… और यह भी कि वह प्रतीक्षा कर रहा है कि ग्लेशियर कभी तो पिघलेगा!

 कभी-कभी मुझे सपना आता कि पारिजात जैसे छोटा-सा बच्चा होऔर मेरे पा उसे गोदी में उठा कर मेरी तरफ ला रहे हों… और मैं निर्ममता से इस सपने को परे झटक देतीआज जागती आँखों से वही दृश्य दिख रहा था,और मैं जितना बेरहम बनती,व ह सपना उतना ही ढीठउतना ही उद्दंड बनकर चोट खाकर फिर से खड़ा हो रहा था

 समय देखाप्रणय के घर से सामान उठा कर एयरपोर्ट तक पहुँचने के बाद लगभग तीन ही घंटे बचेंगेमैं उठ खड़ी हुईटैक्सी को मैंने प्रणय के घर पर ही खड़ा रखाछोटू को प्यार कियारास्ते से ख़रीदा हुआ एक खिलौना उसके नन्हे-नन्हे हाथों पर रखाऔर अनुभा से विदा लीशायद मैंने गलत देखा होलेकिन उसके चेहरे पर निर्विकार-सा भाव थाI

 एयरपोर्ट पर जैसे ही मैं  गेट के बाहर पंक्ति में खड़ी हुईदूर से किसी ने आवाज़ दीदेखाप्रणय लगभग दौड़ता हुआ चला आ रहा हैहांफता हुआउसके हाथ में गुलाब का एक फूल था

 यार सुबह से दिमाग का दही हुआ जा रहा हैतुझे फ़ोन कर कर केऔर तू तो मरी पड़ी है! अनुभा ने फ़ोन करके बताया नहीं होता तो तू तो निकल ही लेती!

 दोस्तमैं बहुत व्यस्त थी दिन भरफ़ोन साइलेंट पर पड़ा थाअभी-अभी देखासोच रही थी सिक्योरिटी चेक के बाद तुझे मिलाऊँगीI”

  “और यह अचानक भागी क्यों जा रही है तूतेरी फर्म की छत नहीं गिर पड़ेगी अगर तू हाथ नहीं लगाएगीइतने सालों बाद तो भारत आई है!

  “नहीं दोस्त,बहुत ही ज़रूरी काम हैउन लोगों ने सारा रायता फैला दिया हैऔर सिर्फ मैं ही जाकर समेट सकती हूँI” 

 मैंने महसूस किया कि अभिनय में मुझे पुरस्कार मिल सकता है!

 अनुभा ने भी कहा कि मुझे भी ले लोलेकिन मैं घर जाता तो तू मिलती नहीं",

 मैंने प्रणय की आँखों में देखा... शायद वह सच बोल रहा थाअचानक उसने खींच कर मुझे गले लगा लिया

 टेक केयर!”,वह फुसफुसायाI

 तुझे कभी भुला नहीं पाऊँगी दोस्त!” मैंने कुछ अस्फुट स्वर में उसके कान में कहाI

 तो मैं लाश बनकर तेरे साथ चिपका जो रहूँगाI”,उसकी आवाज़ में इतनी चहक थी कि मुझे उस मनःस्थिति में भी हंसी आ गयीI

 गुलाब का फूल पकड़े अन्दर जाते हुए मैंने दो-तीन बार पलट कर देखाइस कान से उस कान तक की मुस्की खींचे वह हाथ हिला रहा थासारी औपचारिकताएं पूरी करके मैंने देखाप्रवेश खुलने में अभी समय शेष था और मुझे ज़ोरों की भूख लग आई थीअपने पीने की लिए कुछ खरीद  कर मैं खाली कुर्सियों में से एक पर जा बैठी 

 ठन्डे पेय के साथ जैसे मेरा कुहासा कुछ छंटने लगा थानेपथ्य का शोर,संगीत में बदलता जा रहा था और मेरी निर्मम पकड़ ढीली पड़ती जा रही थीमैंने फ़ोन पर कॉन्टेक्ट्स खोलेगति कुछ ज्यादा हो गयी,तो प्रणय के नंबर पर जा कर रुकीजैसे एक प्यारे बच्चे के सर पर धौल जमा दी होऐसे मैंने उसे हटा दियाI

 फिर वापस लौटते हुए मैंने पारिजात पर उंगली दबा दी हाँ पारिजातहम तुम एक दूसरे के साथ शायद  बहुत अच्छे लगेंगेघंटी जा रही थीअजीब सा लग रहा थाआखिर दो साल तक मैंने उसके किसी फ़ोन का या मैसेज का उत्तर नहीं दिया थाऔर मैं वृत्त की पूरी परिधि में घूम कर लौटीउसे स्वयं फ़ोन मिला रही थी

 एक मिनट  के बाद उसकी आवाज़ आई,आश्चर्य और भावातिरेक से लबालब, “कनुक्या यह तुम हो?”,

 उसकी आवाज़ से मैंने महसूस किया कि उसकी आँखों में धुंध सी छा गयी है,

 "हाँपारिजात मैं ही हूँ”,

 कहते हुए,मैंने उसके कंधे पर अपना सिर टिका लिया था I     

शैलेंद्र शर्मा द्वारा लिखित

शैलेंद्र शर्मा बायोग्राफी !

नाम : शैलेंद्र शर्मा
निक नाम : शैलेंद्र शर्मा
ईमेल आईडी : drshail123@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

चिकित्सक-साहित्यकार

शिक्षा-एम.बी .बी.एस, एम.डी.(मेडिसिन)

17 वर्ष की आयु में हिंदी साहित्य की प्रमुख पत्रिका'सारिका' में प्रथम कहानी प्रकाशित।उसके उपरांत 'धर्मयुग' में एक लंबी कहानी। उसके उपरांत कुछ अन्य पत्रिकाओं में कहानियां।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन व उसकी विभिन्न शाखाओं में निरंतर सांस्कृतिक व मंचीय गतिविधियों का वर्षों से संचालन।

स्थानीय टी वी पर 5 वर्षों तक सफलतापूर्वक चिकित्सा विषयक  कार्यक्रम का संचालन ।

इधर कहानियां, लमही,कथाबिम्ब,कथाक्रम,दैनिक जागरण,जानकीपुल ब्लॉग आदि में प्रकाशित। एक कहानी का सिंधी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।

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'अपने भीतर की यात्रा' : कहनी

'अपने भीतर की यात्रा' : कहनी "शैलेंद्र शर्मा"

शैलेंद्र शर्मा 194 2020-12-27

“हमरंग बारह क़िस्से टन्न” लाइव क़िस्सा कहन के लम्बे चले आयोजन के हासिल के रूप में बहुत से साहित्यिक मित्रों से परिचय हुआ और उनमें से कुछ अच्छे दोस्त भी बने हैं। उन्हीं में से एक नाम है कथाकार “शैलेंद्र शर्मा” का । मथुरा से बहुत क़रीब आगरा रहते हुए भी अपरचित रहने का कारण भी उनकी कहानियों से गुजरते हुए समझ में आता है कि आप अपने समय और समाज को इंसानी जज़्बातों के साथ पढ़ते तो हैं किंतु पढ़ाने की  क़थित उग्रता में आपका यक़ीन नहीं है । आपकी कहानी पाठक के भीतर ठीक वैसे ही जगह बनाकर आ बैठती है जैसे वे खुद अपने व्यवहार और बात-चीत की सहजता से किसी के भी दिल में जगह बना लेते हैं । आपकी कहानी के पात्र मिलकर जो समाज गढ़ते हैं उसका ताना-बाना इतनी महीन और सघन बुनाबट के साथ इतनी सहज और सरलता से उतरता है जहां किसी अकल्पनीय बितान का धागा मात्र भी खोज पाना भी मुश्किल होता है । यही कारण है कि आपकी कहानियों में लेखकीय कल्पनाशीलता का ऐसा यथार्थपरक सामंजस्य का सामर्थ्य महज़ किताबी ज्ञान नहीं जान पड़ता बल्कि सामज के गहन विश्लेषण का नतीज़ा है । आज यहाँ प्रस्तुत कहानी ‘अपने भीतर की यात्रा’ आपकी कथा यात्रा से निकली एक ऐसी ही कहानी है जो न महज़ खुद को पढ़वा लेती है बल्कि पाठक को गहरे आत्म चेतन में उतार ले जाकर संवेदना के इंसानी संवेग के साथ जैविक ऊर्जा की ज़मीन के रूप में उपस्थित होती है जो इस कहानी और कहानीकार को ख़ास बनाती है ॰॰॰॰॰॰॰। - संपादक

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