सूने समंदर और किनारे : कहानी (हुश्न तवस्सुम निहाँ)

कथा-कहानी कहानी

हुश्न तवस्सुम निहाँ 741 3/6/2021 11:00:00 AM

"विश्व महिला दिवस" को समर्पित हमरंग की प्रस्तुति "एक कहानी रोज़" 'महिला लेखिकाओं की चुनिंदा कहानी' में आज छटवें दिन प्रस्तुत है "हुश्न तवस्सुम निहाँ" की कहानी ।   'हरियश राय जी'  की टिप्पणी के साथ  ॰॰॰॰॰ । कहानी पर आप भी अपनी टिप्पणियाँ नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर करें।

सूने समंदर और किनारे

सवा सांझ से ही उनके भीतर गर्म खुशबुएं उठने लगती हैं। कमोवेश वैसे जैसे झुटपुटे में रातरानी रह-रह के महकती जाए या जैसे पावस की रात में भींगे-भींगे नम स्पर्श। आठ साल की उम्र से ही वह गर्म सुगंधों के मोहतात हो गए थे। कैसे न होते... जंगली हवाओं के झंझावत से झूला झूलते हुए ही तो वह वयस्क होते हुए प्रौढ़ अमराइयों तक पहुंचे थे। होश संभाला तो खुद को अम्मा से लिपटा हुआ पाया। अम्मा खालिस पेटीकोट-ब्लाउज में ही उन्हें चिपका कर सोतीं। अम्मा सो जातीं, मगर उनकी नन्हीं-नन्हीं उंगलियां अम्मा के कलछऊं-मुलायम जिस्म से छुआ-छू खेला करतीं। तब तक जब तक नींद सिरहाने आकर बैठ न जाती। कभी-कभार अरवट-करवट बदलियां उनकी आंखों में भर जातीं और वह गहरे  ख्वाब में खो रहते...।

पिता उनके जन्म के साल भर बाद ही गुजर गए थे। किसी कॉलेज में पानी पिलाने के ओहदे पर थे। उनके गुजरने के बाद अम्मा को जगह मिल गई। पति के खोने का दर्द बेटे को कलेजे से लगाकर पी लिया। नाम दिया केशव। रात को खा-पका कर जब वह केशव को सीने से चिपका के सोती तो दिन भर की थकन छू हो जाती। लगता कांटों पे चलते-चलते फूलों से पांव छू गए हों या तपती रेत से गुलमोहर ने खींच लिया हो। हालांकि एक दिन उसने केशव को डपटा था-

‘‘अब अलग पलंग बिछाया कर, बड़ा हो गया है। पूरे दस साल का’’ वह

सन्नाटे में-

‘‘क्या कहती हो अम्मा...नहीं, तेरे बिना नींद नहीं आवेगी...कसम ले...’’

अम्मा का जी उमड़ पड़ा

‘‘ठीक है पगले...’’ दुलारन टिपिया दिया।

रात, अम्मा सो गईं मगर वह उनकी नाभि पर उंगलियां फेरते सोचते रहे ‘‘अलग सोने में कहां ये रस...कहां ये सुख...? और पुनः ब्लाउज में हाथ डाल सो रहे। किंतु ये स्पष्ट था कि उस रात मां की देह से जुड़ाव और गहरा गया। सपने में देखा कि मां की देह से महुआ टपक रहा है, संदल बरस रहा है। और वह लोट रहे हैं कदमों में। कभी उनका जिस्म गर्म लोहा हो जाता, कभी ठंडी झुरझुरी दौड़ जाती। ऐसी ही रानाइयों में गोतम-गोता लगाते सुबहें आती रहीं, रातें जाती रहीं। तेरहवें साल का पाला छूते-छूते देह किसी गर्जन से भर गई, जैसे अजीब मटमैले बादल भीतर घुड़मुड़ाया करते। शरीर भर में छोटी-छोटी कोपलें फूटने लगीं। मन हरियाली से भर गया। मगर क्या, सुहाने दिन हमेशा अपने पीछे चक्रवात लेकर आते हैं। उसी साल शहर में प्लेग फैला। अम्मा खर्च हो गईं। वह टूट गए। बिखर गए। चकनाचूर हो गए। यूं तो दिन बुरे थे मगर रात का सन्नाटा बेतरह गले पड़ जाता। अम्मा द्वारा सूनी कर दी गई जगह उन्हें कचोट डालती। खाली पलंग पे हाथ रेंगते रहते। शरीर में कभी गर्म धारा दौड़ जाती, कभी ठंडी लहर। कॉलेज में तिबारा उन्हें अम्मा की जगह बैठा दिया गया। अलबत्ता, जो अम्मा के पी.एफ. आदि से धन निकलता था, उसे कॉलेज के अधिकारियों ने ही आपस में बांट-चोंट लिया। हां, इतना था कि अनाथ होने के कारण उन्हें सारे कॉलेज स्टाफ का लाड़-प्यार मिल रहा था। पूरा सहयोग मिल रहा था। वयस्क होने तक का उनके खाने-पीने, पढ़ाई-लिखाई का खर्च प्रिंसपल साहब ने अपने जिम्मे ले लिया। शायद इस तरह वह अपने पापों का प्रायश्चित करना चाह रहे थे जो उन्होंने उनके हिस्से की राशि गटक कर किया था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था सिवाय इसके कि उनका अंतर्मन किसी विमोहक-अंक के लिए छटपटाता रहता। आंख लगी नहीं कि जिस्म पर सांप लोटने लगते। कभी-कभी करवटों में ही पलंग के नीचे गिर जाते। अजब कैफियत, अजब नशा...अजब उन्माद...वो जो सिंदूरी-स्पर्श अम्मा दे गई थीं, उसे हवा में तलाशते रहते। अभी तो तमाम रहस्य जानने शेष थे और अम्मा थीं कि चल ही दीं।

 हालांकि, कॉलेज की किशोरियों में वह इन रहस्यों को ढंूढ़ लेने का खूब प्रयत्न करते। अम्मा वाला जादू वह लड़कियों में टकटकी लगाए महसूसते रहते। उंगलियां डोलने लगतीं। मन के हाथ कुर्ते के भीतर अनायास रेंग जाते। क्षण भर को वह सब भूल जाते। खुद को भी। देह तपने लगती, कंपन शुरू हो जाता, चेहरा फड़कने लगता। फिर ज्योंहि कोई चेताता-वह बर्फ का टुकड़ा बन जाते। आयु के साथ-साथ वह कक्षाएं पार करते गए। प्रिंसिपल साहब ने भी वयस्क होते ही उन्हें उनकी जगह बैठा दिया। किंतु हां, चपरासी होते हुए भी उनसे चपरासी का काम नहीं लिया जाता। अलबत्ता स्नातक होते-होते वरिष्ठ बाबुओं ने भी उन्हें अपनी फाइलें पकड़ा दीं और बेफिक्र हो गए। केशव बाबू ने इन्हें सगर्व अपना लिया। उनके लिए इसमें सौभाग्य का पुट ये था कि वह चपरासी होते हुए भी चपरासी नहीं थे। उनकी योग्यता का सही मूल्यांकन करते हुए लोगों ने उनकी तरफ कुर्सी सरका दी थी। बाबू लोग ये सोचकर खुश थे कि अब उनके पास उनका दायां हाथ था, जिसपे वे आंख मूंदकर भरोसा करते हुए गप्पें मार सकते थे। कुर्सी पर पकड़ बनी रहे इस प्रयास में वह भी जीतोड़ मेहनत करते, पूरी ईमानदारी से। और वह उन खसूट क्लर्कों की जरूरत और कमजोरी बनते चले गए। बाबुओं की तरफ से प्रायः उन्हें चाय-नाश्ता भी आॅफर होता, पान तो दस-दस बार तक हो जाते। केशव बाबू इतने में ही खुश थे, संतुष्ट थे। यही नहीं यदा-कदा किसी अध्यापक की अनुपस्थिति में उन्हें कक्षाओं में भेज दिया जाता जिसके एवज में उन्हें छात्रा-छात्राओं की तरफ से ‘सर’ की उपाधि मिल गई। अपनी व्यवहार-कुशलता और तत्परता के चलते उन्होंने अपने लिए एक पुराना झज्झड़ बंद पड़ा कमरा खुलवा लिया। साफ-सफाई करवा के दो कुर्सियां और एक मेज डालकर अपना आॅफिस मुकम्मल कर लिया था। इंसान अपनी सूझ-बूझ और लगन से क्या नहीं पा लेता? जिंदगी एक मस्त खेमे सी चल पड़ी। उदासियों, विरक्तियों और अवसाद का दूर-दूर तक पता न था। मगर क्या था, एक रहस्यमयी गंध बादामी बादल बनके उनके भीतर खुल जाती। तब क्षण काटे नहीं कटते। रात तो कतई नहीं। स्पप्न मेंदोष ही...दोष...दोष ही दोष...दोष...ही...दोष...।

विवाह का कोई नाम लेता तो तलवे के नीचे की जमीन सरकते-सरकते रह जाती। इसी टाल-मटोल में उनके हिस्से के गुलाबी मौसम श्वेत घोड़ों पे सवार दूर शिखर चोटियांे में जा बैठने को बचैन थे। पशोपेश में जिंदगी जाने किधर रेंगती निकल गई। उम्र के इस मोड़ पे वह एक मातबर व्यक्ति में तब्दील हो गए। और वह केशव से केशव बाबू हो गए। बालों में हल्की चांदनी गिरने लगी थी। व्यक्तित्व में निखार आता गया। पूरे वजूद पर एक गौर-गम्भीर्य आकर्षण पैदा होता गया था। यहां तक कि कालेज की किशोरियां भी नहीं बख्शतीं। गाहे-बगाहे मीठे तंज भी उछाल देतीं, जिसका जवाब वह हल्की मुस्कान से देते। बी.ए. द्वितीय वर्ष (कला वर्ग) की कक्षा के सामने से गुजरते हुए उन्हें खास रोमांच सा हो आता। इस क्लास में कुछेक लड़कियां ऐसी भी थीं जो उनका नैकट्य लांघ आने को हमेशा आतुर रहतीं। जाने कितने अनोखे संकेतों से उन्हें खींच लेने का असफल प्रयास करती रहतीं।

एक रोज कॉलेज छूटा तो वह घर के लिए निकले।

रास्ते में बचपन के साथी विवेक बाबू भेंटा गए। इस समय केंद्रीय डाकघर में बाबू हैं। सलाम-दुआ के बाद दोनों साथ-साथ निकल लिए। विवेक बाबू ने फौरी पूछा-

‘‘कहां जाएगा...?’’

‘‘घर...’’

‘‘व्हाट....घर....तू उसे घर कहता है, जिसका ताला खुद खोलना पड़े, जिसकी चिराग-बत्ती खुद करनी पड़े....तू उसे घर कहता है?’’

‘‘ऊं...ह..., हो गया लेक्चर,...अब बोल क्या चाहता है...?’’

‘‘यार, तू मेरे साथ चल, मैजिक दिखाऊं...दुनिया का सबसे खूबसूरत और नैसर्गिक टेस्ट।’’

‘‘रहने दे...घटिया बातें हैं...’’ केशव बाबू ने हिकारत से मुंह एक ओर फिरा लिया। विवेक बाबू को ये अपनी भावनाओं पर ओछा प्रहार सा लगा। हार मानने से पहले एक रद्दा और रखा-

‘‘यार...केशव, तू अपनी इस संतगिरी से क्या साबित करना चाहता है? क्या मैं नीच हूं, घटिया हूं...चरित्रहीन हूं...छैं...ह...ह तुझे कुछ भी नहीं आता। अरे यार ये हमारी जरूरतें हैं...जीवन का हिस्सा हैं...’’

‘‘तू समझता नहीं विवेक, ऐसे ठिकानों पे जाने से कितनी बदनामी होती है, देखने वाले भी क्या...’’

‘‘उल्लू हो यार...’’, विवेक बाबू ने बीच में झपट लिया।

‘‘क्या ...?’’ केशव बाबू चौंके ।

‘‘और नहीं तो क्या, अभी भी चालीस साल पीछे चल रहे हो, मुझे तुम मूर्ख समझते हो?’’

‘‘मैं समझा नहीं...’’

‘‘तो समझो, वे ऐसी-वैसी नहीं, स्कूल गोइंग लड़कियां हैं।...शरीफ घरानों से संबंध रखती हैं।’’

‘‘क्या कह रहे हो...?’’

‘‘सही कर रहा हूं। जिनकी मैं बात कर रहा हूं वे कॉलेज -गर्ल्स है। तू तो जानता है इस बाजारवादी परिवेश में शरीर से आत्मा तक सब बाजार में उतर आए हैं। ना बेचना मुश्किल, ना खरीदना मुश्किल। ये प्रतिस्पर्धा का दौर है यार! हममें अगले से ज्यादा पा लेने की होड़ सी लगी है। पाने का रास्ता कैसा भी हो, जायज...नाजायज...। इस भोग-पिपासा से ग्रस्त है खासकर मध्यम वर्ग। कुंठाओं और आत्महीनता से वो इस कदर त्रस्त है कि कितना भी गिर जाने पर तुला है। आत्मग्लानि और वितृष्णा का शिकार है विशेषकर छात्रा-वर्ग। कॉलेज कैंपस में वे अपने सहपाठी से कमतर रहकर नहीं जी सकते। उन्हें अकाडमिक परफारमेंस की इतनी चिंता नहीं होती जितनी कि इस बात की कि अगर उनके सहपाठी के पास सेल फोन है, लैप्टॉप है या बाइक है तो हमारे पास क्यूं नहीं है? और इस ‘क्यूं नहीं हैं’ का ‘वे आउट’ वे हर तरह तलाश लेने का प्रयास करते हैं। भले ही उन्हें इसके लिए अवांछित रास्ते अपनाने पड़ें। लड़के चोरी, राहजनी और सुपारी लेने तक पे उतर आते हैं। पकड़े भी जाते हैं। बर्बाद भी होते हैं। हां, लड़कियां यहां भी भाग्यशाली साबित होती हैं। बगैर चोरी, राहजनी और कत्ल के वे अच्छा कमाती हैं। पैसे कमाने का उनके पास खूबसूरत जरिया है। वे मनमानी रकम वसूलती हैं। देह उनकी मिल्कियत है, जिसका वे भरपूर लाभ उठाती हैं। और बिना कोई रिस्कउठाए, सुविधा-संपन्न होती रहती हैं।

केशव बाबू के जेहन में गोले दगने लगे। दिमाग में अंग्रेजी लेक्चरार मलिक साहब की बात कौंध गई। एक रोज वह बी.ए. द्वितीय वर्ष की मालती व सुनैना को झाड़ रहे थे-

‘‘बड़ी एडवांस बनती हैं, मोबाइल लेकर चलती हैं...घर में नहीं खाने को, अम्मा चली भुनाने को...’’ और वह खा जाने वाली नजरों से मलिक साहब को देखे जा रही थीं। सहसा विवेक बाबू का लेक्चर थमा तो उन्हें ख्याल आया कि उनके घर की तरफ जाने वाली गली काफी पीछे छूट गई है। और वे बातों के बहाव में विवेक बाबू के साथ जाने कितनी दूर निकल आए हैं। अब, जब उनका घर पीछे छूट ही गया था तो उन्हें विवेक बाबू के साथ बढ़ना ही बढ़ना था। विवेक बाबू चैराहे पर पहुंचकर दायीं तरफ एक ढाबे पर रुके। दो सिगरेट लीं। सुलगाईं। एक केशव बाबू को थमाई और दायीं तरफ जाती रोड पर मुड़ गए। दस हाथ और आगेबढ़ने पर फुटपाथ के किनारे दायीं तरफ खड़े गुलमोहर के तरु के नीचे जींस-टी शर्टमें एक 18-19 साल के लगभग लड़की बाइक पर बैठी दिखाई दी। बाॅब कट  बाल और सिर पर बड़ी सी कैप। कैप का अगला हिस्सा खासा झुका हुआ, जिससे चेहरा बमुश्किल नजर आ रहा था। आधा-अधूरा। विवेक बाबू को देख अजीब से लहजे में उसने हाथ हल्के से उठाकर ‘हाय’ किया। जवाब में विवेक बाबू ने मुट्ठी में दबे सौ-सौ के पांच नोट उसे थमा दिये जिन्हें उन्होंने ढाबे पर ही तह कर मुट्ठी में दबा लिया था। लड़की जैसे बड़बड़ाई-

‘‘चन्दन बाड़ा, लेन नं टू, रूम नं. फाइव...’’

‘‘थैंक्यू...एक मिनट ये मेरे मित्र हैं, ये भी...’’

‘‘एक सेकेंड...’’ खट...खट...खट..मोबाइल पर कोई नंबर डायल किया।

‘‘हां यार...कहां है?’’

‘‘....’’

‘‘इस एक घंटे में फ्री है?’’

‘‘...’’

‘‘यार..., इंग्लिश के टेस्ट में अभी तीन दिन बाकी हैं, हो जायेगा। एक ही घंटे की तो बात है....’’

‘‘...’’

‘‘मम्मी को मुझ पे छोड़, मैं कहे देती हूं कि तू मेरे यहां आ रही है...यार स्टेटस का सवाल है...’’

‘‘...’’

‘‘माई डियर...’’

‘‘सर, ठिकाना नोट कीजिए अहमद हसन स्ट्रीट, डाॅली अपार्टमेंट, रूम न पंद्रह,सात बजकर दस मिनट पर...’’

विवेक बाबू ने केशव बाबू से लड़की को पांच सौ देने को कहा। वह कुछ झिझके, फिर जेब से निकाल कर पांच सौ गिन दिए। लड़की ने बगैर गिने ही पिछली जेब में रुपए खौंस लिए और एक झटके में बाइक स्टार्ट कर सड़क की भीड़ में बिला गई। केशव बाबू विस्फारित नेत्रों से उस रास्ते को देखते रह गए जिधर से होकर लड़की गई थी। विवेक बाबू ने चुटकी ली-

‘‘चल यार...आज तो तेरा भी ब्रह्मचर्य टूटेगा, बहुत हो गया ‘सन्यास’।’’

‘‘हां, मगर मैं इस लड़की का सोचता हूं कैसी फर्राटा हो रही है।’’

‘‘तूने दुनिया देखी ही कहां है यार..., ये गुलाबी आंधियां ही तो दुनिया खूबसूरत बनाती रही हैं...’’ विवेक बाबू ने समझाया।

×××

घर से फ्रेश होकर केशव बाबू पौने सात बजे निकले। बीस मिनट का रास्ता था। सोच कुछ देर पहले ही पहुंचू। भीतर खुशी की लहरें तरंगित हो रही थीं। आटो पकड़ा। भीड़-भड़कम वाली सड़क पर भी उन्हें घोर सन्नाटा और सन्नाटे में मात्रा चंद बनती-बिगड़ती आकृतियां नजर आ रही थी। अहमद हसन स्ट्रीट होते हुए वह डॉली अपार्टमेंट पहुंचे। डॉली अपार्टमेंट गोलाकार कॉलोनी थी। दूर से देखने में लगता कि विशाल पानी की टंकी खड़ी है। छोटी जगह में बड़ी इमारत। कई मंजिलों तक गई हुई। आसमान छूती सी। बीच-बीच में नन्हीं-नन्हीं गैलरियां ,जिसमें से ऊपर जाने के लिए जीने दिए गए थे। कमरों की प्लेटों पर वह उंगली रख-रखकर नंबर पढ़ने लगे। अंततः गोल-गोल घूमते हुए वह पहुंच ही गए। इसे तलाशने में उन्हें पांच मिनट लगे। दरवाजा अंदर से भिड़ा हुआ था। कॉलवैल पर उंगली रखी ही थी कि हटा ली। कुछ सोचने लगे। क्यूं ना वापस लौट चलूं...। फिर किसी ने धकेला। उंगली फिर से कॉलवैल पर। पुश होते ही भीतर से कहा गया-

‘‘कम इन प्लीज....’’ वह डरते-डरते भीतर दाखिल हुए। घुप्प अंधेरा।

‘‘उफ्, बड़ा अंधेरा है...लाइट का बंदोबस्त नहीं है?’’ फिर सहसा विवेक बाबू की बात याद आई

‘‘....बस, हमारे स्पर्श ही हमारा परिचय होते हैं। एक दूसरे के नाम व पता ठिकाने से हमें कोई सरोकार नहीं रखना होता। यहां तक कि अगर हम दिन के उजाले में आमने-सामने भी हुए हों तो कह नहीं सकते कि हमने किसी काली रात के अंधेरे में समागम किया था। वही घुप्प अंधेरा हुआ करता है...यानी कि हर तरफ से ऽ ऽ ऽफ...’’

‘‘ऊं...हूं..., यहां लाइट का क्या काम...’’ वह हठात् चौंक पड़े।

तभी पैर एक शरीर से टकराया। वह गिरते-गिरते बचे। नीचे मोटा सा गद्दा बिछा था। वह जूते उतार कर उस पर बैठ गए। शरीर उनसे और सट गया। उनके भीतर एक ही मंथन चल रहा था कि ये आवाज पहले कहां सुनी... कहां सुनी... ? अजीब घबराहट होने लगी। उन्होंने चौंक के पीठ पर हाथ मारा तो हाथ में हाथ आ गया। पीछे हाथ किए ही उन्होंने उसका हाथ सख्ती से दबा दिया तो उसकी चीख निकल गई।

‘‘ओह...गाॅ...ऽ ऽ ड...’’

और वह उछल पड़े।

‘‘म्....मा...ल...ती?’’

वह तुरन्त संभल गई

‘‘ओह सर जी, मालती-वालती छोड़ो, यहां हम सिर्फ स्त्री और पुरुष हैं...कमऑन ...।’’

कहते हुए उसने अपना सिर केशव बाबू की गोद में रख दिया। केशव बाबू के हाथ उसके सिर पे टहलने लगे। बड़ा लाड़ आ रहा था उन्हें मालती पर। जाने कब उनकी शर्ट के बटन खुल गए और शर्ट दो हिस्सों में बंट गई। सीने पर लहरें दौड़ रही थीं। वह एक हाथ उसके बालों में फेरने लगे, दूसरा हाथ चुपके से कुर्ते के नीचे रेंग गया। लगा, समय-देवता ने तीस वर्ष पीछे उन्हें उठाकर फेंक दिया हो। जिस्म तपती रेत हो गया। बोटी-बोटी सिहरने लगी, मचलने लगी। सांसें कभी तेज होतीं, कभी थम जातीं। एक ना मालूम सा भय उन पर छाने लगा। उस भय से कतराते हुए उन्होंने झट हाथ समेट लिए और उसका दुपट्टा टटोलकर ठीक करतेहुए लंबी सांस खींचते बोले-  

‘‘जानती हो मालती, मैं तो एक अर्से से तुम्हारे प्यार में पगलाया था मगर कभी कह नहीं पाया। तुम्हारी महक हमेशा मेरे सीने में भरी रही। तभी तो मैं किसी न किसी बहाने तुम्हारी कक्षा की गश्त करता रहता था। तुम देखती भी थीं, मुस्काती भी थीं मगर...चलो आज भाग्य ने हमें मिला ही दिया, भले ही इस गुमनाम जगह पर...मगर तुम्हें क्या चाहिए? हमसे कहा होता, ख्वाहम ख्वाह...यहां...तुमको बहुत प्यार करता हूं मालती, बोलो, तुम्हें क्या चाहिए...?’’

संवेदनाओं की भावुक बेलों पर रेंगते हुए वह बड़ी चालाकी से किसी और तरफ निकलना चाह रहे थे कि मालती की उकताहट फूट पड़ी-

‘‘ओह सर जी... अब थ्योरी ही पढ़ाओगे या कुछ प्रेक्टिकल भी करोंगे।’’

केशव बाबू को काटो तो खून नहीं। छक्के छूट गए। ऐसा तुषारापात हुआ कि बस्स... कू ऽ ऽ ल हो गए। ये पिद्दी सी लड़की का साहस तो देखो। मानो खुला चैलेंज कर रही हो। किंतु यदि चैलेंज था भी, तो उनके लिए पहाड़ था। वह इसमें पछाड़ खाने वाले थे। तत्क्षण रोमछिद्रों से बर्फीली धाराएं फूट पड़ीं। एकदम निढाल। मानो लकवा ग्रस गया हो। अब वे कुछ नहीं कह पायेंगे। कुछ नहीं कर पाएँगे ...जिस्म में जैसे कुछ रह ही नहीं गया। उसे एक तरफ धकेल बमुश्किल खड़े हुए। टटोल कर जूते चढ़ाए और शर्ट के बटन बंद करते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े तो मालती की आवाज ने चकरा दिया-

‘‘सर जी, पैसे लेते जाइए, मुझे भीख नहीं चाहिए...’’

‘‘न ...नहीं..., रख लो, मैं ही अयोग्य निकाला कि...’’ कहते-कहते स्वर रुंआसा हो गया। झोंके से बाहर निकले। सामने दुनिया भर का शोर था। उजाले थे। भीड़ थी। किन्तु उनके भीतर का शोर कहीं ज्यादा जीवंत हो उठा था। वह हैरान थे। क्या दुनिया खरीद-फरोख्त पर ही अब चलेगी? भावनाओं के उजालों का क्या कोई महत्व नहीं? लगा सूने-समंदर के किनारे तन्हा बैठे हों। अंधेरे से अटा पड़ा था उनका मन। तन मोम की तरह पिघलता जा रहा था। अपने आपसे ही नजरें चुराते एक संकरी गली में निकल गए। बायीं तरफ बड़े से नाले के किनारे बैठ फारिग होने लगे। जहां कई और पहले से ही उसी कतार में बैठे हुए थे। नाले से लगी पपड़ाई दीवार जाने कितने भित्ति-चित्रों से गुदी पड़ी थी। केशव बाबू अनमने से दीवार पर निंगाह फेरने लगे मगर झेंप गए। मरकरी की मटमैली रोशनी में उन्होंने सामने लाल ईंटों पे लिखा साफ पढ़ा था-

‘‘ जो साला यहां मूते वह कुत्ता...नामर्द...’’

लगा दीवार पे मालती का चेहरा सयास उभर आया हो और वह बके जारही हो-

‘‘कुत्ता...नामर्द...’’

उन्होंने झट जिप बंद की और खड़े हो गए।

 

कहानी पर 'हरियश राय जी' की टिप्पणी -

निहाँ के लेखन को लेकर दुनिया इन दिनों में श्री यषराज जी अपने संपादकीय में कहते हैं कि. हुस्न तबस्सुम निहाँ की कहानी सूने समंदर और किनारे मंटो और इस्मत चुग़ताई की परंपरा की कहानी है। जहाँ निर्भीक होकर स्त्री देह के प्रति आकर्षण बेसाख्ता फैलता बाजारवाद और एकतरफा प्रेम की मानसिकता को व्यक्त किया गया है। कहानी में हुस्न तबस्सुम निहाँ केवल दृष्यों और प्रसंगों तक ही अपने आपको सीमित न कर कहानी की संवेदनाओं को व्यापक स्तर पर पहुँचाती हैं। वह लिखती हैं कि क्या दुनिया खरीद फरोख़्त पर ही अब चलेगी भावनाओं के उजालों का अब क्या कोई महत्व नहीं है 

(प्रयुक्त प्रतीकात्मक चित्र google से साभार) 

हुश्न तवस्सुम निहाँ द्वारा लिखित

हुश्न तवस्सुम निहाँ बायोग्राफी !

नाम : हुश्न तवस्सुम निहाँ
निक नाम :
ईमेल आईडी : nihan073@gmail.com
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ऑथर के बारे में :

जन्म -08 जनवरी, रानी बाग, नानपारा जिला बहराईच, उत्तर प्रदेश।

पिता- श्री अनीस अहमद खां

माँ- श्रीमती हुस्न बानो

शिक्षा-

 अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर । स्त्री अध्ययन और गांधीयन थॅाट में पी0जी0 डिप्लोमा, एम0फिल0, पी-एच.डी.महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र से

सम्मान-

समाज रत्न, सरस्वती साहित्य सम्मान, महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान, स्व0 हरि ठाकुर स्मृति सम्मान। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा मानद उपाधि विद्यावाचस्पति (2011) से सम्मानित।

भारत एवं हिंदी प्रचारिणी सभा मोरशस द्वारा अंतरराष्ट्रीय सम्मान (2016) से सम्मानित।

अंतरराष्ट्रीय अवधी महोत्सव (नेपाल) में अंतरराष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित (2018)

कविता संग्रह-चाँद ब चाँद, शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान (2014) द्वारा पुरस्कृत।

कहानी संग्रह-नीले पंखों वाली लड़कियाँ, स्पेनिन साहित्य गौरव पुरस्कार-(2014) से पुरस्कृत।

कहानी संग्रह- नर्गिस फिर नही आएगी , डाॅ विजय मोहन सिंह स्मृति (प्रथम पुरस्कार) पुरस्कार--(2017)

प्रकाशन-

कविता संग्रह-     मौसम भर याद,

              चाँद-ब-चाँद

कहानी संग्रह-     नीले पँखों वाली लड़कियाँ,

             नर्गिस फिर नहीं आएगी,

             सुनैना! सुनो ना....

             गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता

 

उपन्यास-    फिरोजी आँधियाँ

          कामनाओं के नशेमन

शोध पुस्तक-  धार्मिक सह-अस्तित्व और सुफीवाद

सपादित पुस्तक-

                कविताओं में राष्ट्रपिता

                आदिवासी विमर्श के विभिन्न आयाम

‘‘साहित्य में मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे (विशेष संदर्भ: हुस्न तबस्सुम निंहाँ )‘‘लघु शोध प्रबंध सुश्री मंजू आर्या द्वारा प्रस्तुत।(स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र द्वारा)

सम्पर्क-महात्मा  गांधी अंतरराष्ट्री य हिंदी विश्वा विद्यालय गांधी हिल्स वर्धा महाराष्ट्र

      मो0-09415778595

                    09455448844,

      ई-मेल-nihan073@gmail.com

 

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पोस्ट की गई टिप्पणी -

Rashid parvez khan

13/Mar/2021
वाह बहुत ही बेहतरीन कहानी लाजवाब अंदाज़ में... क़्या बात है.. हुस्ना तबस्सुम निहाँ जी उर्फ़ लेडीज़ मुंशी प्रेमचंद जी मान गए आपको

नमिता सिंह अली गढ़

07/Mar/2021
हुस्न तब्बसुम निहां मेरी पसंदीदा कथाकार हैं ।वर्तमान साहित्य में भी खूब छपी हैं।वर्तमान परिदृश्य को दिखाती अच्छीकहानी है ।थोड़ी एडिटिंग की जरूरत थी ।

हाल ही में प्रकाशित

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