भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है,

भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है, "'मदारीपुर जंक्शन" : बालेन्दु द्विवेदी (साक्षात्कार)

बालेन्दु द्विवेदी 169 2018-11-24

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक गाँव ब्रह्मपुर में पैदा हुए लेखक बालेंदु द्विवेदी ने एक सीधी सरल रचना मदारीपुर जंक्शन के जरिए साहित्यकारों के बीच अपनी पहचान बनाई है। उनके लिखे उपन्यास मदारीपुर जंक्शन में गांव की सौंधी मिट्टी की महक के साथ ही जीवन की कटु सच्चाई भी सामने आती है। प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक अशोक चक्रधर ने इस उपन्यास की प्रशंसा में यह लिखा है कि 'मदारीपुर गांव उत्तर प्रदेश के नक्शे में ढूंढें तो शायद ही कहीं आपको नजर आ जाए, लेकिन निश्चित रूप से यह गोरखपुर जिले के ब्रह्मपुर गांव के आस-पास के हजारों-लाखों गांवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना एक बड़ा गांव है। जो अब भूगोल से गायब होकर उपपन्यास में समा गया है। हाल ही में अपने कलम कार्यक्रम के लंदन सीरीज़ में,फाउंडेशन ने 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास से प्रसिद्ध हुए कथाकार बालेन्दु द्विवेदी को आमंत्रित किया। दिनांक 11 नवम्बर,2018 को लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में कलम कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा सहित हिंदी के अनेकों विद्वान उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन युवा साहित्यकार शिखा वाष्र्णेय ने किया। प्रस्तुत है 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास के लेखक और युवा साहित्यकार बालेंदु द्विवेदी से विशेष बात-चीत एक साक्षात्कार के रूप में -

हिंदी-उर्दू द्वंद्व और टोपी शुक्ला: आलेख (मोहम्मद हुसैन डायर)

हिंदी-उर्दू द्वंद्व और टोपी शुक्ला: आलेख (मोहम्मद हुसैन डायर)

मोहम्मद हुसैन डायर 2 2018-11-17

राही मासूम रज़ा की कृतियों के पात्र भाषायी द्वंद्व से जूझते देखे जा सकते हैं। आधा गांव जहां उर्दू और आंचलिक भाषा में उलझा हुआ है, वहीं टोपी शुक्ला हिंदी उर्दू विवाद पर लंबी बहस कर पाठकों को झकझोर देने वाले संवाद प्रस्तुत करता है। वैसे यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि इस उपन्यास (टोपी शुक्ला ) का केंद्रीय विषय सांप्रदायिक समस्या से जूझते सेकुलरिज्म की आत्महत्या है। इस उपन्यास की भाषा बहुत ही साफ सुथरी है, पर इसके हर संवाद किसी गाली से कम नहीं है। इसकी भूमिका में राही लिखते हैं, “आधा गांव में बेशुमार गालियां थी। मौलाना टोपी शुक्ला में एक भी गाली नहीं है। परंतु शायद यह पूरा उपन्यास एक गंदी गाली है। और मैं यह गाली डंके की चोट पर बक रहा हूं। यह उपन्यास अश्लील है, जीवन की तरह।

मासूम से राही मासूम रज़ा तक…: साक्षात्कार (हनीफ मदार)

मासूम से राही मासूम रज़ा तक…: साक्षात्कार (हनीफ मदार)

हनीफ मदार 4 2018-11-17

राही मासूम रजा का नाम वर्तमान युवा वर्ग के बीच से उसी तरह गुमनाम होता जा रहा है जिस तरह प्रेमचन्द, त्रिलोचन शास्त्री, यशपाल, रांगेय राघव, नागार्जुन, मुक्तिबोध जैसे अनेक नामों से वर्तमान बाजार में भटकी युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है जबकि इन लेखकों को कमोबेश कोर्सों में भी पढ़ाया जाता रहा है फिर भी लोग इनसे या इनके रचनाकर्म से अंजान हैं, वहीं राही मासूम रजा के साथ तो यह सकारात्मक पहलू भी नहीं रहा है तब तो वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए यह नाम और भी अजनबी हो जाता है। कहना न होगा कि राही मासूम रजा हिन्दी साहित्य का एक ऐसा नाम है जो केवल साहित्य लेखन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उनके लेखकीय रचना कर्म को किसी गद्य या काव्य के विशेष खाँचे में या फिर हिन्दी या उर्दू किसी एक भाषा के साथ जोड़कर समायोजित करना आसान नहीं है। जहाँ उन्होंने आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, असंतोष के दिन, कटरा बी आर्जू, नीम का पेड़ और सीन-७५ उपन्यास हिन्दी में लिखे। वहीं मुहब्बत के सिवा उर्दू में लिखा गया उपन्यास है। मैं एक फेरीवाला’कविता-संग्रह हिन्दी में रचा जबकि ‘नया साल मौजे गुल, मैजे सबा, रक्सेमय, अजनबी शहर अजनबी रास्ते’ जैसे कविता संग्रहों की रचना उर्दू में की इतना ही नहीं उनका बहुचर्चित महाकाव्य १८५७’ समान रूप से हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं में रचा गया। मुम्बई जाकर फ़िल्मी लेखन की शुरुआत के साथ ‘नीम का पेड़’ एवं लोक प्रचलित महाकाव्य “महाभारत” का संवाद लेखन कर इतिहास बना डालने वाले राही मासूम रजा के व्यक्तित्व के विषय में जानने एवं ‘आधा गाँव’ का वह दब्बू-सा मासूम अपनी कलम की धार पर चलकर कैसे राही मासूम रजा बन गया इन्हीं तमाम उत्सुकताओं पर ‘राही मासूम रजा’ की सबसे लाडली और प्यारी बहन ‘सुरैया बेगम’ से इलाहाबाद में उनके आबास पर हुई मेरी बात-चीत का संक्षिप्त रूप आप सब के सामने, “राही मासूम रज़ा” के 90 वें जन्मदिवस पर ।

मेरा रुझान विजुअल आर्ट और लेखन दोनों के प्रति रहा है: “असग़र वजाहत” साक्षात्कार

मेरा रुझान विजुअल आर्ट और लेखन दोनों के प्रति रहा है: “असग़र वजाहत” साक्षात्कार

अनीता 2 2018-11-17

अपनी किताब ‘असग़र वजाहत –चुनी हुई कहानियां’ के पर एक चर्चा के लिए कानपुर आये लेखक डाक्टर असग़र वजाहत | वैसे कानपुर शहर उनके लिए अजनबी नहीं है । ननिहाल होने के नाते उनके ताल्लुक के तार यहाँ के एक मोहल्ले राम नारायण बाज़ार से जुड़े रहे हैं। इसलिए उन्हें कानपुर की उस गली के खस्ते ,समोसे, जलेबी ….सब याद रहते हैं | शायद कानपुर यात्रा के दौरान वे यह सब खाना पसंद भी करते हैं। उनका औरा इतना वाइब्रेंट है कि सारा माहौल गर्मजोशी से भर जाता है । जितने लोग भी मौजूद हों सब श्रोता होते हैं और वो वक्ता ..सबको लगता है कि उन्हें वजाहत साहेब ने बहुत तवज्जो दी क्योंकि वो सबसे बराबर मुखातिब होते रहते हैं । ये उनकी सहजता है कि अगर सामने वाले ने बहुत पढ़ा लिखा ना भी हो तो बात करने के दौरान किस्से, चुटकुले सुनाते हुए वो किसी को अपने बड़े लेखक होने से आतंकित नहीं करते हैं । यहीं उनसे साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक विभिन्न पहलुओं पर लम्बी बातचीत की ‘अनीता मिश्रा’ ने……

स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात, एक दिन की नहीं होती: (डॉ० नमिता सिंह)

स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात, एक दिन की नहीं होती: (डॉ० नमिता सिंह)

अनीता 2 2018-11-17

‘आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है | आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है| इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा समाज कर रहा है | अगर स्त्री आन्दोलन ऐसा ही चलता है तो वह जस्टिफाइड है क्योंकि समाज, स्त्रियों की एक सम्मानजनक स्थिति के लिए तैयार नहीं हो पा रहा है | इसके लिए बहुत बातचीत भी हो रही है | जब कभी कोई रेप की घटना प्रकाश में आ जाती है तो मोलीस्ट्रेशन की बात होती है, बड़ा हल्ला-गुल्ला भी होता है | कैंडिल मार्च भी निकाले जाते है | लेकिन जब हम स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात करते तो वह एक दिन की बात नहीं होती | एक सुनियोजित रूप में वातावरण तैयार करने की बात होती है इसके लिए लम्बे प्रयास करने होते है |

कैसा है इंतिज़ार हुसैन का भारत: साक्षात्कार (मिर्ज़ा ए. बी. बेग)

कैसा है इंतिज़ार हुसैन का भारत: साक्षात्कार (मिर्ज़ा ए. बी. बेग)

हनीफ मदार 8 2018-11-16

७ दिसंबर १९२३ को डिवाई बुलंदशहर, भारत में जन्मे इंतज़ार हुसैन पाकिस्तान के अग्रणी कथाकारों में से थे | वे भारत पाकिस्तान के सम्मिलित उर्दू कथा साहित्य में मंटो, कृश्नचंदर और बेदी की पीढ़ी के बाद वाली पीढ़ी के प्रमुख कथाकारों में से एक थे । उनकी स्कूली शिक्षा हापुड़ में हुई और १९४६ में मेरठ से उर्दू में एम.ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद विभाजन के कारण वे सपरिवार पाकिस्तान में बस गए। वैसे तो इंतजार हुसैन १९४४ से उर्दू में कहानियाँ लेखते रहे हैं किंतु विभाजन के बाद १९५० के आसपास इनका रचना संसार एकदम बदल गया और पाकिस्तान के उर्दू कथा साहित्य में एक चमकते सितारे की तरह इनका प्रवेश हुआ। इंतजार हुसैन ने अनेक अहम कहानियों के अलावा तीन उपन्यास भी लिखे हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास बस्ती है। इसे पाकिस्तान के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार आदमजी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। बाद में इंतजार हुसैन ने यह पुरस्कार वापस कर दिया था । उनके निधन पर श्रृद्धांजलि स्वरूप, 2008 में ‘बी बी सी‘ हिंदी के लिए ‘मिर्ज़ा ए. बी. बेग‘ द्वारा किया गया उनका साक्षात्कार (‘बी बी सी हिंदी‘ से साभार) ….

हाल ही में प्रकाशित

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 12 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

विजय शर्मा 26 2018-12-04

‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।

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