विभिन्न सुर-ताल से सजी कविताएं: रिपोर्ट (सुमन कुमारी)

विभिन्न सुर-ताल से सजी कविताएं: रिपोर्ट (सुमन कुमारी)

सुमन कुमारी 95 2018-11-18

‘ताजमहल’ कविता में मजदूरों के दर्द, पीड़ा और उनकी दुर्दशा पर मुख्य रूप से बात की गई है। लोक प्रचलित धारणा से हटकर कवयित्राी यहां अपने दृष्टिकोण को विस्तार देती है। काव्य-गोष्ठी के तीसरे कवि रमेश प्रजापति रहे। जिनकी पहचान देशज कविता के लिए है। इन्होंने ‘पानी का राम’, ‘अरी लकड़ी’, ‘तपो-तपो हे सूर्य’ और ‘महानगर में मजदूर’ कविताओं का पाठ किया। इनके सभी विषय गांव और गांव से जुड़ी समस्याओं से संब( हैं। ‘पानी’ की महत्ता पर अपनी बात कहते हुए रमेश प्रजापति कहते हैं कि, ‘‘बेहिसाब बर्बाद हो रहा पूंजीपतियों की ऐय्यासी में कालाहांडी ही नहीं बल्कि बुंदेलखंड के साथ-साथ अब सूखने लगा है लातूर और भीलवाड़ा का कंठ।’’……

हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

अंतरिक्ष शर्मा 118 2018-11-16

हर वर्ष की भांति एक जनवरी २०१६ को कोवैलैंट ग्रुप ने अपना स्थापना दिवस अनूठे तथा रचनात्मक ढंग से उन युवा और किशोर प्रतिभाओं के साथ मनाया |जिनकी सामाजिक, साहित्यिक और कलात्मक प्रतिभाएं किसी मंच के अभाव में मुखर नहीं हो रहीं हैं | साथ ही ऐसे युवा और किशोर भी जो देश-दुनिया, समाज, साहित्य, कला और सामाजिक सरोकारों और जिम्मेदारियों से दूर महज़ किताबी शिक्षा को ही मनोरंजन और जिन्दगी मान कर जी रहे हैं | ‘रमाशंकर विद्रोही‘ और ‘सफदर हाशमी‘ को समर्पित कार्यक्रम ‘हमारे समय में कविता‘ की एक रिपोर्ट ‘अन्तरिक्ष शर्मा‘ की कलम से …|

एक शाम अदब के नाम – ‘बज़्म-ए-शायरी’

एक शाम अदब के नाम – ‘बज़्म-ए-शायरी’

सीमा आरिफ 103 2018-11-18

आज के युग में जहाँ सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है, बहुत कुछ पीछे छुट रहा है। डिजिटल के दौर में हमें चीज़ों को भूलने की आदत पड़ती जा रही है।हम बहुत कुछ वो खो रहे हैं जिसको सेहजना,सवंरना हमारी ज़िम्मदारी है। इसी में एक है उर्दू ग़ज़ल शेरों शायरी। सुख़नवर-ए-शायरी का जन्म शेरों शायरी की मक़बुलियत, रिवायत को ज़िंदा, तरोताज़ा रखने, उसे एक नई शक्ल, स्फूर्ति दिलाने की नियत से हुआ था। सुख़नवर-ए-शायरी का मक़सद नई नस्ल के दिमाग़ों से यह ग़लतफ़हमी भी निकालना है कि शायरी ,ग़ज़ल बहुत ‘बोरिंग’ होती है। सुख़नवर-ए-शायरी का उद्देश्य नए शायरों, शायराओं के हाथों में एक ऐसा डाइस थमाना है जिस डाइस पर आकर वो किसी रिवायत,किसी बंदिश में बधें नहीं, बल्कि उर्दू ज़ुबाँ की रूह में खोकर शायरी पढ़े। ग़ज़ल की खुबसूरती में मदहोश होकर दूसरों के कलाम को सुने और नज़्मों की तिरछी चाल से क़दम से क़दम मिलाकर शायरी की महफ़िलों का लुत्फ उठाएं। वो एहसास जो ज़िन्दगी के हर पहलू को किसी ने किसे तरह से शायरी से जोड़ते हैं,ऐसे ही एक एहसास का नाम है सुख़नवर-ए-शायरी।

मुक्तिबोध, संघर्ष और रचनाशीलता : अनीश अंकुर

मुक्तिबोध, संघर्ष और रचनाशीलता : अनीश अंकुर

अनीश अंकुर 67 2018-11-17

प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा ” एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा ‘मुक्तिबोध’। मुक्तिबोध एक लाइट हाउस जी तरह से थे। ” आलोकधन्वा ने आगे कहा ” मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे। यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता। जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता। मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया वो उन्हें विजातीय बनाता है।जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता। मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे।”……

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 169 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 126 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 197 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 202 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 314 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.