अंतिम युद्ध : नाटक (राजेश कुमार)

अंतिम युद्ध : नाटक (राजेश कुमार)

राजेश कुमार 470 2018-11-18

कइयों बार इन सवालों के व्यूह से गुजरा हूं कि आज जब देश आजाद है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र यहां स्थापित है, विश्व की राजनीति में लगातार किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, कला-सौंदर्य-अंतरिक्ष के क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रहा है, वहां फिर से भगतसिंह और मुठ़ी भर क्रांतिकारियों को याद करने का क्या मतलब हो सकता है? भगत सिंह पर तो वैसे भी फिल्म बन चुकी है, आजादी की स्वर्ण जयंती पर धड़ा-धड़ सीरियल बन रहे हैं, नाटक लिखे जा चुके हैं, इतिहास की किताबों में ढेरों कहानियां छप चुकी हैं फिर एक नाटक लिखने की जरूरत? कौन नहीं जानता है, सब जानते हैं भगत सिंह की कहानी। सबको पता है, भगतसिंह एक बहादुर इंसान थे, पक्के देशभक्त थे। उन्होंने सांडर्स को मारकर लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लिया। पुलिस की आंखों में धूल झोंककर दुर्गा भाभी व उनके पुत्र शची के साथ लाहौर से कलकत्ता गये। सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका और गिरफ्तारी देकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गये। फिर इस कथा को पुनः दोहराने की क्या आवश्यकता? लोगों को स्मरण दिलाने के लिए एक बार अगर इतिहास दिखला भी दे तो उसकी प्रासंगिकता क्या है? निःसंदेह वे स्मरणीय है, पूजनीय है। उन पर गीत-कवितायें लिखे जा सकते हैं, आजादी के पर्वों पर उनकी कुरबानियों को याद किया जा सकता है पर आज के समाज में जो घट रहा है उथल-पुथल बरकरार हैं उसमें कहां फिट बैठते हैं? इन्हीं सवालों से जूझने व इसकी तह में जाने की प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है यह नाटक ‘अन्तिम युद्ध’ ।

झोपड़पट्टी: नाटक (राजेश कुमार)

झोपड़पट्टी: नाटक (राजेश कुमार)

राजेश कुमार 303 2018-11-18

‘राजेश कुमार’ ऐसे इकलौते हिंदी नाटककार हैं जो निरंतरता में ऐसे नाट्यालेखों को लिख रहे हैं जो यथा स्थिति ही बयान नहीं करते बल्कि वे एक चेतना भी पैदा करते हैं और प्रतिरोध भी | उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर से उपजी राजनैतिक उथल पुथल जिसके कारण विभिन्न सामाजिक तबकों की विविधता भरी जिंदगियों में तरह – तरह के बदलाव आये हैं जो सामान्यतः सकारात्मक से कहीं ज्यादा नकारात्मक हैं | राजनैतिक लालसा के प्रभाव में सामाजिक व्यक्तित्व भी, व्यक्तिवादी अंधी सोच में तब्दील हो रहा है | सामाजिक रूप से हमें इसका अंदाजा भी नहीं होता | चारों तरफ से राजनैतिक चालों से घिरे आम-जन के, इन्हीं बेरहम सवालों से जूझते हुए उनके जबाव खोजने का रचनात्मक प्रयास है नाटक ‘झोपडपट्टी”

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 241 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 159 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 244 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 245 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

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