मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

हरिशंकर परसाई 93 2018-11-17

प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया था। हम लोगों ने सलाह की कि इसे रमेश के नाम से बैंक में जमा कर देना चाहिये। मुक्तिबोध पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया हुई इसकी। बिल्कुल बच्चे की तरह वे खीझ उठे। बोले,” क्यों? मेरे नाम से खाता क्यों नहीं खुलेगा? मेरे ही नाम से जमा होना चाहिये। मुझे क्या आप गैर जिम्मेदार समझते हैं?” वे अड़ गये। खाता मेरे नाम से खुलेगा। थोड़ी देर बाद कहने लगे,”बात यह है पार्टनर कि मेरी इच्छा है ऐसी। ‘आई विश इट‘। मैं नहीं जानता कि बैंक में खाता होना कैसा होता है। एक नया अनुभव होगा मेरे लिये। तर्कहीन लालसा है-पर है जरूर ,कि एक बार अपना भी एकाउन्ट हो जाये! जरा इस सन्तोष को भी देख लूँ।” मुक्तिबोध हमेशा ही घोर आर्थिक संकट में रहते थे। अभावों का ओर-छोर नहीं था। कर्ज से लदे रहते थे। पैसा चाहते थे ,पर पैसे को ठुकराते भी थे। पैसे के लिये कभी कोई काम विश्वास के प्रतिकूल नहीं किया। अचरज होता है कि जिसे पैसे-पैसे की तंगी है, वह रुपयों का मोह बिना खटके कैसे छोड़ देता है। बैंक में खाता खुलेगा-यह कल्पना उनके लिये बड़ी उत्तेजक थी। गजानन माधव मुक्तिबोध का बैंक में खाता है-यह अहसास वे करना चाहते थे। वे शायद अधिक सुरक्षित अनुभव करते।……..

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई)

हरिशंकर परसाई 159 2018-11-17

प्रमोद मैं और शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गये।इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नये प्रकाशनों पर बात करने लगे। तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिये। मित्रों ने कुछ पैसा जहाँ-तहाँ से भेज दिया था। हम लोगों ने सलाह की कि इसे रमेश के नाम से बैंक में जमा कर देना चाहिये। मुक्तिबोध पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया हुई इसकी। बिल्कुल बच्चे की तरह वे खीझ उठे। बोले,” क्यों? मेरे नाम से खाता क्यों नहीं खुलेगा? मेरे ही नाम से जमा होना चाहिये। मुझे क्या आप गैर जिम्मेदार समझते हैं?” वे अड़ गये। खाता मेरे नाम से खुलेगा। थोड़ी देर बाद कहने लगे,”बात यह है पार्टनर कि मेरी इच्छा है ऐसी। ‘आई विश इट‘। मैं नहीं जानता कि बैंक में खाता होना कैसा होता है। एक नया अनुभव होगा मेरे लिये। तर्कहीन लालसा है-पर है जरूर ,कि एक बार अपना भी एकाउन्ट हो जाये! जरा इस सन्तोष को भी देख लूँ।” मुक्तिबोध हमेशा ही घोर आर्थिक संकट में रहते थे। अभावों का ओर-छोर नहीं था। कर्ज से लदे रहते थे। पैसा चाहते थे ,पर पैसे को ठुकराते भी थे। पैसे के लिये कभी कोई काम विश्वास के प्रतिकूल नहीं किया। अचरज होता है कि जिसे पैसे-पैसे की तंगी है, वह रुपयों का मोह बिना खटके कैसे छोड़ देता है। बैंक में खाता खुलेगा-यह कल्पना उनके लिये बड़ी उत्तेजक थी। गजानन माधव मुक्तिबोध का बैंक में खाता है-यह अहसास वे करना चाहते थे। वे शायद अधिक सुरक्षित अनुभव करते।……..

एक गौभक्त से भेंट: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

एक गौभक्त से भेंट: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

हरिशंकर परसाई 182 2018-11-17

हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य जगत का एक ऐसा नाम जिसकी वज़ह से व्यंग्य को साहित्य विधा की पहचान मिली | परसाई ने सामाजिक रूप से हलके फुल्के मनोरंजन की सांस्कृतिक धारा को मानवीय सरोकारों के साथ व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का काम किया | उनकी हर रचना सामाजिक चेतना की महत्वपूर्ण विरासत के रूप में नज़र आती है | यही कारण है कि आज भी लेखक व्यंग्यकार परसाई को अपना आदर्श मानते हैं बावजूद इसके उनके समूल राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक दृष्टिकोण को लेकर एक अजीव विभ्रम की स्थिति नज़र आती है | जब अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से उनको व्याख्यायित कर लिया जाता है | तब जरूरत लगती है परसाई जी को एक सामूहिक दृष्टिकोण से समझने के प्रयास की | आइये इस कोशिश की शुरूआत खुद ‘हरिशंकर परसाई‘ के एक व्यंग्य से करते हैं | परसाई के व्यंग्य महज़ गुद-गुदाते भर नहीं हैं बल्कि समय, समाज और राजनीति के विकृत और भीव्त्स स्वरूप को सहज, स्वाभाविक भाषा और संवादों से, बेहद मनोरंजक अंदाज़ में उद्घाटित करने के साहित्यिक कौशल के साथ नज़र आते हैं |

महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

हरिशंकर परसाई 173 2018-11-17

महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे harishankar-parsai1 यह चिट्ठी महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधी को पहुंचे. महात्माजी, मैं न संसद-सदस्य हूँ, न विधायक, न मंत्री, न नेता. इनमें से कोई कलंक मेरे ऊपर नहीं है. मुझमें कोई ऐसा राजनीतिक ऐब नहीं है कि आपकी जय बोलूं. मुझे कोई भी पद नहीं चाहिये कि राजघाट जाऊँ. मैंने आपकी समाधि पर शपथ भी नहीं ली. आपका भी अब भरोसा नहीं रहा. पिछले मार्च में आपकी समाधि मोरारजी भाई ने भी शपथ ली थी और जगजीवन राम ने भी. मगर बाबू जी रह गए और मोरारजी प्रधानमंत्री हो गए. आख़िर गुजराती ने गुजराती का साथ दिया. जिन्होंने आपकी समाधि पर शपथ ली थी उनका दस महीने में ही ‘जिंदाबाद’ से ‘मुर्दाबाद’ हो गया. वे जनता से बचने के लिए बाथरूम में ही बिस्तर डलवाने लगे हैं. मुझे अपनी दुर्गति नहीं करानी. मैं कभी आपकी समाधि पर शपथ नहीं लूँगा. उसमें भी आप टाँग खींच सकते हैं.

आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

आवारा भीड़ के खतरे: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

हरिशंकर परसाई 276 2018-11-17

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान, बाहर अवहेलना। वह आत्म ग्लानि से क्षुब्ध। घुटन और गुस्सा एक नकारात्क भावना। सबसे शिकायत। ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है। खिले फूल बुरे लगते हैं। किसी के अच्छे घर से घृणा होती है। सुंदर कार पर थूकने का मन होता है। मीठा गाना सुनकर तकलीफ होती है। अच्छे कपड़े पहिने खुशहाल साथियों से विरक्ति होती है। जिस भी चीज से, खुशी, सुंदरता, संपन्नता, सफलता, प्रतिष्ठा का बोध होता है, उस पर गुस्सा आता है।

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

दो नाक वाले लोग: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

हरिशंकर परसाई 207 2018-11-17

“कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढ़िया लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं हैं। जब खुशबू कम होने लगती है, ये फिर कलम करा लेते हैं, जैसे किसी औरत को छेड़ दिया और जूते खा गए। ‘जूते खा गए‘ अजब मुहावरा है। जूते तो मारे जाते हैं। वे खाए कैसे जाते हैं? मगर भारतवासी इतना भुखमरा है कि जूते भी खा जाता है। नाक और तरह से भी बढ़ती है। एक दिन एक सज्जन आए। बड़े दुखी थे। कहने लगे – हमारी तो नाक कट गई। लड़की ने भागकर एक विजातीय से शादी कर ली। हम ब्राह्मण और लड़का कलाल! नाक कट गई।”

हाल ही में प्रकाशित

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

ज्योति कुमारी 274 2019-12-11

हैदराबाद, उन्नाव, बक्सर, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में बेटियों को जिंदा जलाने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि पश्चिम चंपारण के शिकारपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में ऐसा ही मामला सामने आया है । निश्चित ही यह भारतीय न्याय व्यवस्था, सामाजिकता और लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। किंतु इसके बरअक्स त्वरित न्याय प्रक्रिया में हैदराबाद का पुलिसिया कृत्य भी ऐसी घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई आदर्श नहीं माना जा सकता। बल्कि बिना किसी अपराध के साबित होने से पूर्व ही महज़ आरोपित व्यक्ति या व्यक्तियों की भीड़ द्वारा हत्या कर देना या हैदराबाद में पुलिस का ख़ुद मुंसिफ़ बन जाना यक़ीनी तौर पर माननीय भारतीय न्यायालयों और न्याय प्रक्रिया को मुँह चिढ़ाने जैसा है, जो अपराधी और आपराधिक घटना की जाँच, विश्लेषण और अन्वेषण के रास्ते भी एक झटके से बंद कर देता है, फलस्वरूप न्याय व्यवस्था के प्रति सामाजिक भरोसे की जगह सहमा सा संदेह खड़ा होने लगता है । इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को सामाजिक और क़ानूनी रोशनी में देखने का प्रयास है, कथाकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता ‘ज्योति कुमारी शर्मा’ का यह आलेख॰॰॰॰॰

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

हुश्न तवस्सुम निहाँ 234 2019-12-06

शैफाली का ओहदा क्या बढ़ा उसके कद में खुद ब खुद इजाफा हो गया। प्रेस की ओर से उसे एक स्कूटर भी मिल गई। वेतन भी बढ़ां संपादक संजय वर्मा की नजरें उस पर कुछ ज्यादा मेहरबान रहने लगीं। उसके खाने पीने और प्रेस के कामों का भी काफी ध्याान रखते। जितनी बार काॅफी चाय खुद के लिए मंगवाते उसे भी भिजवाते। खाली समय में उसके केबिन में जा कर गप्पें लड़ाया करते। और ऐसे ही वह नजदीकियों की पराकाष्ठा पार करने का प्रयत्न करने लगे। इस दरम्यान उसका बादल से मिलना जारी रहा। किन्तु बादल, बादल जेसा ही ठण्डा और बेगाना बंजारा सा बना रहा। एक दिन शैफाली संपादक की कुटिल हरकतों से उक्ता कर बड़े आवेश में बादल के पास गई और.................

बंद कमरे की रोशनी  : कहानी (हनीफ़ मदार)

बंद कमरे की रोशनी : कहानी (हनीफ़ मदार)

हनीफ मदार 588 2019-11-21

फ़िरोज़ खान के संस्कृत पढ़ाने को लेकर उठे विवाद के वक़्त में लगभग डेढ़ दशक पहले लिखी इस कहानी को पढ़ते हुए एक ख़ास बात जो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि बीते इन वर्षों में भले ही हम आधुनिकता और तकनीकी दृष्टि से बहुत तरक़्क़ी कर गए हैं किंतु यह बिडंबना ही है कि सामाजिक रूप से हमारी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं  आ पाया । जहाँ इधर फ़िरोज़ खान का संस्कृत पढ़ाना राजनैतिक हित-लाभ का अस्त्र बनता जा रहा है वहीं डेढ़ दशक पहले लिखी कहानी का पात्र मास्टर अल्लादीन का संस्कृत पढ़ाना भी वोट की राजनीति को इस्तेमाल होता है॰॰॰॰॰॰एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वाले वर्ग की नंगी दास्ताँ है "हनीफ़ मदार" की यह कहानी - अनिता चौधरी

नोट-

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