'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 550 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

उफ़ परसाई हाय परसाई: संस्मरण (यूनुस खान)

उफ़ परसाई हाय परसाई: संस्मरण (यूनुस खान)

युनुश खान 374 2018-11-18

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है …….” के आठवें दिन ……. यूनुस खान का आलेख ‘) हिम्‍मत नहीं थी कि आकाशवाणी की कैजुएली वाले उन दिनों में अपनी बेहद प्रिय ‘स्‍ट्रीट-कैट’ साइकिल को परसाई जी के घर की ओर मोड़ दिया जाए । लेकिन ये शौर्य हमने दिखा ही दिया एक दिन । और नेपियर टाउन में परसाई जी के घर पहुंच गए । परसाई जी बिस्‍तर पर थे । हमें पता था कि एक दुर्घटना के बाद उनकी यही हालत है । उनसे बातें हुईं । उन्‍हें पता नहीं किस धुन में हमने अपनी ‘कविताएं’ तक सुना डालीं । ये बात याद करके आज भी गर्दन के पीछे वाले हिस्‍से में झुरझुरी दौड़ जाती है । उन बचकानी कविताओं पर परसाई ने अपनी राय दी । रास्‍ता दिखाया । फिर तीन चार बार की मुलाकात रही परसाई जी के साथ । एक बार तो गणतंत्र दिवस पर आकाशवाणी जबलपुर के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार करते हुए हम उन्‍हें रिकॉर्ड करने भी गए । वो रिकॉर्डिंग पता नहीं जबलपुर केंद्र में अब है या नहीं । फिर विविध भारती वाले दिन आ गये जीवन में । मुझे याद है कि बंबई से ऑडीशन देकर लौटा ही था कि उसी दिन जबलपुर आकाशवाणी के केंद्र निदेशक क़मर अहमद का फोन आया । परसाई जी नहीं रहे, उनकी ‘अंतिम-यात्रा’ को कवर करना है । फौरन आओ । जाने क्‍या धुन थी । आनन-फानन पहुंचे । और हमने परसाई को पंच-तत्‍त्व में विलीन होते देखा ।

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 896 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है,

भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है, "'मदारीपुर जंक्शन" : बालेन्दु द्विवेदी (साक्षात्कार)

बालेन्दु द्विवेदी 738 2018-11-24

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक गाँव ब्रह्मपुर में पैदा हुए लेखक बालेंदु द्विवेदी ने एक सीधी सरल रचना मदारीपुर जंक्शन के जरिए साहित्यकारों के बीच अपनी पहचान बनाई है। उनके लिखे उपन्यास मदारीपुर जंक्शन में गांव की सौंधी मिट्टी की महक के साथ ही जीवन की कटु सच्चाई भी सामने आती है। प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक अशोक चक्रधर ने इस उपन्यास की प्रशंसा में यह लिखा है कि 'मदारीपुर गांव उत्तर प्रदेश के नक्शे में ढूंढें तो शायद ही कहीं आपको नजर आ जाए, लेकिन निश्चित रूप से यह गोरखपुर जिले के ब्रह्मपुर गांव के आस-पास के हजारों-लाखों गांवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना एक बड़ा गांव है। जो अब भूगोल से गायब होकर उपपन्यास में समा गया है। हाल ही में अपने कलम कार्यक्रम के लंदन सीरीज़ में,फाउंडेशन ने 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास से प्रसिद्ध हुए कथाकार बालेन्दु द्विवेदी को आमंत्रित किया। दिनांक 11 नवम्बर,2018 को लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में कलम कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा सहित हिंदी के अनेकों विद्वान उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन युवा साहित्यकार शिखा वाष्र्णेय ने किया। प्रस्तुत है 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास के लेखक और युवा साहित्यकार बालेंदु द्विवेदी से विशेष बात-चीत एक साक्षात्कार के रूप में -

मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर: स्मरण शेष, 'कादर खान'

मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर: स्मरण शेष, 'कादर खान'

मनीष पाण्डेय " आशिक़ " 1172 2019-01-02

'हमारी तारीफ़ ज़रा लम्बी है । बचपन से सर पर अल्लाह का हाथ और अल्लाहरक्ख़ा है अपने साथ । बाज़ू पर ७८६ का है बिल्ला, बीस नम्बर की बीड़ी पीता हूँ, काम करता हूँ क़ुली का और नाम है इक़बाल' - फ़िल्म क़ुली का एक संवाद ।

हिन्दुस्तानी फ़िल्म जगत के मशहूर चरित्र अभिनेता और लेखक कादर खान का आज कनाडा के अस्पताल में निधन हो गया. वह 81 साल के थे. कादर खान को हिन्दी फ़िल्मों के महान संवाद लेखक और हास्य अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है. नब्बे के दशक में, कादर खान और अभिनेता गोविंदा की जोड़ी ने अपनी शानदार कॉमेडी के ज़रिये भारतीय दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ दी थी. आज जब कादर खान साहब हमारे बीच नहीं हैं तो इस लेख के ज़रिये, हम उनकी ज़िंदगी के तमाम संघर्षों और उपलब्धियों को आपसे साथ साझा करेंगे. यही हम सबकी तरफ़ से कादर खान साहब को सच्ची श्रद्धांजली होगी.॰॰॰॰ मनीष पाण्डेय " आशिक़ " का आलेख 

हाल ही में प्रकाशित

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

ज्योति कुमारी 209 2019-12-11

हैदराबाद, उन्नाव, बक्सर, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में बेटियों को जिंदा जलाने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि पश्चिम चंपारण के शिकारपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में ऐसा ही मामला सामने आया है । निश्चित ही यह भारतीय न्याय व्यवस्था, सामाजिकता और लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। किंतु इसके बरअक्स त्वरित न्याय प्रक्रिया में हैदराबाद का पुलिसिया कृत्य भी ऐसी घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई आदर्श नहीं माना जा सकता। बल्कि बिना किसी अपराध के साबित होने से पूर्व ही महज़ आरोपित व्यक्ति या व्यक्तियों की भीड़ द्वारा हत्या कर देना या हैदराबाद में पुलिस का ख़ुद मुंसिफ़ बन जाना यक़ीनी तौर पर माननीय भारतीय न्यायालयों और न्याय प्रक्रिया को मुँह चिढ़ाने जैसा है, जो अपराधी और आपराधिक घटना की जाँच, विश्लेषण और अन्वेषण के रास्ते भी एक झटके से बंद कर देता है, फलस्वरूप न्याय व्यवस्था के प्रति सामाजिक भरोसे की जगह सहमा सा संदेह खड़ा होने लगता है । इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को सामाजिक और क़ानूनी रोशनी में देखने का प्रयास है, कथाकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता ‘ज्योति कुमारी शर्मा’ का यह आलेख॰॰॰॰॰

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

हुश्न तवस्सुम निहाँ 144 2019-12-06

शैफाली का ओहदा क्या बढ़ा उसके कद में खुद ब खुद इजाफा हो गया। प्रेस की ओर से उसे एक स्कूटर भी मिल गई। वेतन भी बढ़ां संपादक संजय वर्मा की नजरें उस पर कुछ ज्यादा मेहरबान रहने लगीं। उसके खाने पीने और प्रेस के कामों का भी काफी ध्याान रखते। जितनी बार काॅफी चाय खुद के लिए मंगवाते उसे भी भिजवाते। खाली समय में उसके केबिन में जा कर गप्पें लड़ाया करते। और ऐसे ही वह नजदीकियों की पराकाष्ठा पार करने का प्रयत्न करने लगे। इस दरम्यान उसका बादल से मिलना जारी रहा। किन्तु बादल, बादल जेसा ही ठण्डा और बेगाना बंजारा सा बना रहा। एक दिन शैफाली संपादक की कुटिल हरकतों से उक्ता कर बड़े आवेश में बादल के पास गई और.................

बंद कमरे की रोशनी  : कहानी (हनीफ़ मदार)

बंद कमरे की रोशनी : कहानी (हनीफ़ मदार)

हनीफ मदार 465 2019-11-21

फ़िरोज़ खान के संस्कृत पढ़ाने को लेकर उठे विवाद के वक़्त में लगभग डेढ़ दशक पहले लिखी इस कहानी को पढ़ते हुए एक ख़ास बात जो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि बीते इन वर्षों में भले ही हम आधुनिकता और तकनीकी दृष्टि से बहुत तरक़्क़ी कर गए हैं किंतु यह बिडंबना ही है कि सामाजिक रूप से हमारी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं  आ पाया । जहाँ इधर फ़िरोज़ खान का संस्कृत पढ़ाना राजनैतिक हित-लाभ का अस्त्र बनता जा रहा है वहीं डेढ़ दशक पहले लिखी कहानी का पात्र मास्टर अल्लादीन का संस्कृत पढ़ाना भी वोट की राजनीति को इस्तेमाल होता है॰॰॰॰॰॰एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वाले वर्ग की नंगी दास्ताँ है "हनीफ़ मदार" की यह कहानी - अनिता चौधरी

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.