अभिषेक के सभी लेख

महापंचायत…: कहानी (अभिषेक प्रकाश) http://humrang.com/

अभिषेक की कलम खासकर साहित्यिक विधा के तौर पर पूर्व नियोजित होकर लिखने की आदी नहीं है | हाँ बस वे मानव जीवन की घटना परिघटनाओं पर वौद्धिक क्रिया-या प्रतिक्रिया पर अपनी कलम न घसीटकर, अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को उन्मुक्त छोड़ते हैं…. बस कहानी लेख आलेख के दायरे से आज़ाद….. ‘महापंचायत’ उसी लेखकीय उन्मुक्तता से निकली रचना है जो मुझे कहानी लगी…. बाकी आप भी पढ़ें और तय करें …..

मेरे समय में नेहरू: आलेख (अभिषेक प्रकाश) http://humrang.com/

नेहरू को हमने किताबों के माध्यम से जाना जरूर पर सबसे शिद्दत से मोदी युग में ही महसूस किया। एक घटना याद आ रही है मुझे जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं आपका प्रधानसेवक हूं। तभी मुझे त्रिमूर्ति की याद आई जिसके पास ही एक स्मारक में मैंने नेहरू द्वारा कहे गए इसी शब्द ‘प्रधानसेवक’ को लिखा पाया था। खैर सेवक तो सभी है कॉपीराइट केवल नेहरू का ही थोड़ी ही है। ….. अपने समय में नेहरु को समझने का प्रयास कर रहे हैं ‘अभिषेक प्रकाश’

रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स, सवालों में ! आलेख (अभिषेक प्रकाश) http://humrang.com/

तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों के खोखलेपन से उत्पन्न रिक्तता में पाँव पसारते वर्तमान में शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहतें है कि– ‘अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसकी यादाश्त को मिटा देना होगा, उसके भूत को नष्ट कर देना होगा, उसकी कहानियों को समाप्त कर देना होगा”। ऐसे में नेल्सन मंडेला की अभिव्यक्ति “स्वशासन की नींव में महत्वपूर्ण है कि सभी लोग अपने मतों को रख सके और नागरिक के रूप में उनकी वैल्यू समान हो।” को समझना ही होगा और एक बेहतर समाज, राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए सवालों और तर्कों की इंसानी परम्परा को बचाए रखना ही होगा इसके लिए जरूरत है तो बस चुप्पी तोड़ने की …..| वर्तमान में सवाल और सवालों की लोकतांत्रिक महत्ता पर प्रकाश डालता “अभिषेक प्रकाश’ का आलेख ….

‘विभीषण’ केवल ‘घर का भेदिया’…? आलेख (अभिषेक प्रकाश) http://humrang.com/

आज हम देख सकते हैं कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ किस तरह चाटुकारिता, स्वार्थलोलुपता व परिवारवाद के शिकार है।बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सच बोलने का साहस रखते है।हर युग मे ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने हितों से ऊपर उठकर सत्य का साथ दिया। सुकरात को जहर दिया गया, ब्रूनो को जिन्दा जलाया गया ।न जाने ऐसे ही कितने इंसान हुए है जिन्होंने सत्य के लिए अपनी आहुति दी।और जिस परंपरा को पीढी दर पीढी इंसानों ने आगे बढ़ाया।परन्तु इतिहास मे सभी के साथ न्याय हुआ हो जरूरी नही! विभीषण के साथ भी हमारे समाज ने कुछ ऐसा ही किया। ….. ‘अभिषेक प्रकाश’ का आलेख

क्या कला को सीमाओं में बाँधना आदर्श स्थिति होगी ?: आलेख (अभिषेक प्रकाश) http://humrang.com/

“सभी माध्यमों के इतर दिलों को जोड़ने वाला माध्यम गिने-चुने हैं। कला ,उसमें सबसे सशक्त माध्यम है जो दिलों को छू जाती है। अभी जनमाष्टमी पर अबू मोहम्मद औऱ फरीद अय्याज की आवाज मे ‘कन्हैया, याद है कुछ भी हमारी’ कव्वाली सुना। कृष्ण के प्रति इतना अनुराग देखकर कैसे ये मन नही चाहेगा कि कला को सीमाओं मे न बाधा जाए! नफरत का आकाश भी इतना घना है कि लोग इसे सैनिकों के बलिदान से जोड़ेगे औऱ अमन की बात करने वालों से उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांगा जाएगा। पर बिना डरे निर्भीकता से उनको चलना होगा, क्योंकि युद्ध कोई हल नही है बल्कि स्वयं मे ही एक समस्या है।” ‘अभिषेक प्रकाश’ का आलेख ……

‘द वीमेन ऑफ़ क्वेश्चनेबल कैरेक्टर’ “पिंक”: लेख संवाद (अभिषेक प्रकाश) http://humrang.com/

“हमारे यहां तो लडकियों को जोर से हंसने व छींकने पर भी सोचना पड़ता है। शालीनता का अपना एक सामाजिक पैमाना है। लेकिन अच्छी बात है कि स्त्री विमर्श हमारे घरों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। पहले सुना करता था जब बजुर्ग अपने अगल-बगल की स्त्रियों को ‘सती-सावित्री’ होने का तमगा बांटा करते थे, लेकिन अब ऐसी कम ही स्त्रियां होंगी जो सती-सावित्री होना चाहेंगी। शायद स्त्रियों को यह बात समझ में आने लगी कि ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है। ‘अभिषेक प्रकाश’ की कलम से “पिंक” के बहाने एक लेख संवाद ……..|

हाल ही में प्रकाशित

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 176 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 345 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.