अनीश के सभी लेख

हिंदी रंगमंच से विश्वासघात: आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

“शौकिया रंगमंच का आंदोलन इस देश के हर क्षेत्र में और हरेक गॉंव में फैलाना है और यही रंगमंच के टिके रहने का आधार है। शौकिया रंगमंच ही पेशेवर रंगमंच का भरण-पोषण करता है।’’ हमरंग पर ‘नटरंग’ पत्रिका के ब.व.कारंत विशेषांक के सन्दर्भ में हिंदुस्तानी रंगमंच के किंवदंती पुरूष समझे जाने वाले बाबा कारंत की रंगशख्सीयत को समझने का एक वस्तुपरक प्रयास करता “अनीश अंकुर” का अगला आलेख ….| – संपादक

हावर्ड फास्ट एवं ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी रचनाओं में हमेशा समाजवादी दृष्किोण को आगे बढ़ाया: रिपोर्ट (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

हावर्डफ़ास्ट और ख्वाजा अहमद अब्बास जन्म्शाताव्दी वर्ष के अवसर पर “साहित्य- सिनेमा – प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन” विषय पर पटना में आयोजित एक परिचर्चा की संक्षिप्त रिपोर्ट, “अनीश अंकुर” की कलम से ….| – संपादक

तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा: http://humrang.com/

३१ जुलाई २०१६ को सुर-सम्राट मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि पर पटना में आयोजित कार्यक्रम से ‘अनीश अंकुर‘ ……

मुक्तिबोध, संघर्ष और रचनाशीलता : अनीश अंकुर http://humrang.com/

प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा ” एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा ‘मुक्तिबोध’। मुक्तिबोध एक लाइट हाउस जी तरह से थे। ” आलोकधन्वा ने आगे कहा ” मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे। यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता। जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता। मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया वो उन्हें विजातीय बनाता है।जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता। मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे।”……

एक्टीविस्ट वैज्ञानिक थे प्रो0 यशपाल : अनीश अंकुर http://humrang.com/

एक्टीविस्ट वैज्ञानिक थे प्रो0 यशपाल : अनीश अंकुर

शम्भू मित्र ने रंगमंच में आधुनिक युग का प्रारंभ किया, अनीश अंकुर http://humrang.com/

शम्भू मित्र ने रंगमंच में आधुनिक युग का प्रारंभ किया, अनीश अंकुर

भिखारी ठाकुर, उत्सुकता की अगली सीढ़ी: आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

बिहार के सांस्कृतिक निर्माताओं में गौरवस्तंभ माने जाने वाले ‘भिखारी ठाकुर‘ पर पिछले कुछ वर्षों कई पुस्तकें निकलीं, शोध हुए एवं कई अभी भी जारी है। इसी कड़ी में ‘विकल्प प्रकाशन’, नई दिल्ली से अश्विनी कुमार पंकज के संपादन में ‘रंग बिदेसिया’ छप कर आयी है। भिखारी ठाकुर व बिदेसिया रंगशैली पर केंद्रित यह पुस्तक लेखों का संकलन है। विभिन्न लोगों द्वारा अलग-अलग नजरिए से लिखे गए लेखों में भिखारी ठाकुर के सामाजिक व सृजनात्मक महत्व को समय और समाज की बदलती जीवन-स्थितियों के संदर्भों में देखने का प्रयास है। 10 जुलाई को भिखारी ठाकुर की पुण्य तिथि पर “रंग बिदेसिया” पर अनीश अंकुर का समीक्षात्मक आलेख | – संपादक

सांस्कृतिक मसलों पर राजनीतिक पक्षधरता: आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

विश्वविख्यात सांस्कृतिक चिंतक अर्डाेनो कहते हैं ‘‘ संस्कृति के सवाल अंततः प्रशासनिक प्रश्न होते हैं ।’’ खास सियासी पक्षधरता वाले संस्कृतिकर्मी अपनी राजनीति छुपाने के लिए संस्कृति को एक राजनीतिनिरपेक्ष श्रेणी बताते हैं। ऐसे लोगों का मशहूर जुमला होता है ‘‘ हमारा लोग तो किसी भी पक्ष के नहीं है अतः हम किसी भी पक्ष वाले सरकार के साथ काम करते हैं’’। इस वक्तव्य में छिपी सत्तापरस्त अवसरवादिता सहज ही लक्षित की जा सकती है।” सांस्कृतिक परिक्षेत्र में छुपे कुछ इन्हीं सवालों को खोज रहे हैं ‘अनीश अंकुर‘…| – संपादक

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’ : आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ….या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्रामक है बल्कि सच तो यह है कि उनकी परम्परा के प्रतिबद्ध संवाहक हमेशा रहे हैं और रहेंगे भी …… ‘विकास‘ उसी रास्ते का राही और वैचारिक संवाहक था जो महज़ २१ वर्ष की अल्पायु में एक रेल हादसे में शहीद हुआ को याद करते हुए ……. “अनीश अंकुर” | – संपादक

रंगमंच में अनुदान का ऑडिट कराया जाए : आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

‘‘थियेटर में ग्रांट देने का काम एन.एस.डी को सौंप दिया गया है। बहुत सारे लोग परेशान हैं कि अब तो सारा अनुदान एन.एस.डी के लोगों को ही मिलने वाला है,…. उनकी चिंता जायज है। पीछे के आंकड़ों और रंगमहोत्सव इसका जीता-जागता प्रमाण है।”(आलेख से) रंग संस्थाओं को मिलने वाले अनुदान कि खुली व्याख्या करती ‘समकालीन रंगमंच‘ कि विशेषांक पत्रिका ‘रंगमंच और अनुदान‘ पर ‘अनीश अंकुर‘ का समीक्षार्थ आलेख …| – संपादक

राष्ट्रगान की लय से टकराती बिदेसिया की धुन: आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

राजनीतिक सत्ता समाज के हाशिए पर रहने वाले बहिष्कृत तबकों केा भले ही पहचान अब मिली हो लेकिन भिखारी ठाकुर ने हमेशा अपने नाटकों के नायक इन तबकों से आने वाले चरित्रों को ही बनाया। उनके नाटकों के पात्रों केा देखने से ही इसका अंदाजा हो जाता है। बिदेसी, चेथरू, उपद्दर, गलीज, भलेहू, उदवास, चपाटराम ये सभी भिखारी ठाकुर के पात्र थे। समाजिक न्याय के सांस्कृतिक पुरोधा ‘भिखारी ठाकुर‘ की १२८ वीं जयंती पर ‘अनीश अंकुर‘ का विशेष आलेख … | – संपादक

रंगमंच का बदलता स्वरूप: आलेख (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

नाटक, रंगमंच समाज में जनता की आवाज़ बनकर किसी भी प्रतिरोध के रचनात्मक हस्तक्षेप की दिशा में जरूरी और ताकतवर प्रतीक के रूप में मौजूद रहा है | न केवल आज बल्कि उन्नीसवीं शताब्दी में 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम जब असफल हो गया। लोगों को कंपनी सरकार के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस न था उस समय नाटकों के माध्यम से प्रतिरोध की शुरूआत हुई, लोगों में साहस भरने का काम किया जाने लगा। बंगाल में ‘नीलदर्पण’ ऐसा ही नाटक रहा । हालांकि व्यवस्थाओं ने जनता की इन सांस्कृतिक आवाजों को दवाने की दिशा में भी कभी कमी नहीं छोड़ी | अॅंग्रेजों ने नाटकों की ताकत को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार पर अंकुष लगाने के लिए काला कानून ‘ड्रामेटिक परफोर्मेंस एक्ट, 1876 बनाया था । बावजूद इसके मनुष्य का दूसरे मनुष्य से रागात्मक संबंध कायम करने के रचनात्मक माध्यम के रूप में रंगमंच हमेशा जीवित रहा है और रहेगा ।… प्राचीन से आज तक के रंगमंचीय बदलाव को रेखांकित करता ‘अनीश अंकुर‘ का आलेख ….| – संपादक

जो है, उससे बेहतर चाहिए का नाम है ‘विकास’: संस्मरण (अनीश अंकुर) http://humrang.com/

भगत सिंह या सफ़दर हाशमी के जाने के बाद सांस्कृतिक या वैचारिक परिक्षेत्र या आन्दोलन रिक्त या विलुप्त हो गया ….या हो जाएगा यह मान लेना निश्चित ही भ्रामक है बल्कि सच तो यह है कि उनकी परम्परा के प्रतिबद्ध संवाहक हमेशा रहे हैं और रहेंगे भी …… ‘विकास’ उसी रास्ते का राही और वैचारिक संवाहक था जो महज़ २१ वर्ष की अल्पायु में एक रेल हादसे में शहीद हुआ को याद करते हुए ……. “अनीश अंकुर” | – संपादक

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 44 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 58 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

नोट-

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संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
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