शार्लिट ब्रॉन्टी: आज की स्त्री : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

शार्लिट ब्रॉन्टी: आज की स्त्री : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

विजय शर्मा 3 2018-11-18

खासकर साहित्य के संदर्भ में, अभिव्यक्ति में स्त्री स्वर तब से शामिल हो रहे थे जब स्त्रियों का लिखना तो दूर शिक्षा प्राप्त करना भी सामाजिक अपराध था | दरअसल गोल-मोल तरीके से समाज स्वीकृत स्थितियों को लिखना या चित्रण करना तो हमेशा आसान था | किन्तु पुरूष सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में मानवाधिकारों की समानता की मांग के साथ सामाजिक भेदभाव के नंगे सच को उद्घाटित करना निश्चित ही न केवल साहस का काम था बल्कि उन्ही स्वरों कि प्रेरणा पाकर अब तक १४ स्त्री लेखिकाएं साहित्य के नोबोल पुरूस्कार तक पहुंची हैं | सामाजिक रूप से बेहद संकीर्ण और खतरनाक वक़्त में भी स्त्री स्वर को मुखर करने वाली लेखिका “शार्लिट ब्रॉन्टी” को उनके दूसरी शताब्दी वर्ष में चर्चा कर रहीं है ‘विजय शर्मा‘ ….| – संपादक

टू वीमेन: युद्ध काल में स्त्री: आलेख (प्रो0 विजय शर्मा)

टू वीमेन: युद्ध काल में स्त्री: आलेख (प्रो0 विजय शर्मा)

विजय शर्मा 2 2018-11-18

”युद्ध का स्त्री पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाने वाली अच्छी फ़िल्मों की संख्या और भी कम है। ‘टू वीमेन’ उन्हीं कुछ बहुत अच्छी फ़िल्मों से एक है। ‘टू वीमेन‘ उपन्यास युद्ध काल में स्त्री जीवन की विभीषिका का सचित्र, उत्कृष्ट एवं भयावह चित्रण करता है। स्त्री जीवन की इसी भयावहता, कठोरता और क्रूरता का फ़िल्मांकन इस फ़िल्म का कथानक है। यह एक बेबाक फ़िल्म है जो सोचने पर मजबूर करती है। युद्ध पुरुषों का शगल है, पर मारी जाती है स्त्री। मर जाती तो भी भला था। युद्ध काल में वह मृत्यु से भयंकर हालात में जीने को मजबूर होती है। स्त्री शांति काल में सुरक्षित नहीं है, वह युद्ध काल में सुरक्षित नहीं है। वह विदेश में असुरक्षित है, अपने देश में भी सुरक्षित नहीं है। और तो और वह देवालय-गिरजाघर में भी सुरक्षित नहीं है।” ‘टू वीमेन‘ के संदर्भ में ‘विश्व महिला दिवस‘ पर ‘डा० विजय शर्मा‘ का विस्तृत और समीक्षात्मक आलेख …….| – संपादक

छोड़छाड़ के अपने सलीम की गली… : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

छोड़छाड़ के अपने सलीम की गली… : आलेख (प्रो० विजय शर्मा)

विजय शर्मा 2 2018-11-18

“प्रेम क्या है? प्रेम में पड़ना क्या होता है? इसे लिख कर व्यक्त नहीं किया जा सकता है फ़िर भी युगों-युगों से प्रेम पर लिखा जाता रहा है, आगे भी लिखा जाता रहेगा। इसे जानने-समझने का एक ही तरीका है आपादमस्तक इसमें डूबना। यह प्रेरक है, इसीलिए न मालूम कितने चित्र, मूर्तियाँ और साहित्य इसकी उपज हैं।” (गैब्रियल गार्सिया मार्केस की किताब ‘लव इन टाइम ऑफ़ कॉलरा’) के संदर्भ में आधुनिकता, प्रेम और सेक्स के आंतरिक और सूक्षतम सम्बन्धों और मानवीय रिश्तों के बीच प्रेम के लिए स्पेस खोजने एवं समझने का प्रयास करता ‘प्रो० विजय शर्मा‘ का आलेख …| – संपादक

हलाला निकाह: एक वैध वेश्या-वृत्ति: आलेख (हुश्न तवस्सुम निहाँ)

हलाला निकाह: एक वैध वेश्या-वृत्ति: आलेख (हुश्न तवस्सुम निहाँ)

हुश्न तवस्सुम निहाँ 2 2018-11-18

“कहा जाता है कि शरीयतन स्त्री को इस्लाम में तमाम अधिकार दिए गए हैं। ऐसा वास्तव में है भी किंतु ये अधिकार कभी अमल में लाते हुए दिखाई दिए नहीं। अर्थात ये सारे महिला अधिकार सिर्फ धर्म ग्रंथों तक ही सीमित हो कर रह गए हैं । इन अधिकारों को व्यवहार में लाया ही नहीं गया। बल्कि मुस्लिम महिला को बताया तक नहीं कि उसे कुछ अधिकार भी मुहैया कराए गए है। क्यँू ? क्योंकि अगर वह अपने अधिकारों की बाबत जान लेगी तो कल अधिकार मांगने को खड़ी भी हो जाएगी। शायद यही कारण है कि आज के समय में यदि महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सबसे बत्तर स्थिति मुस्लिम महिला की है। हलाला निकाह मुस्लिम महिला के शेाषण की ही एक अगली कड़ी है। हलाला निकाह के बारे में ठीक-ठीक स्पष्ट नहीं कि इसका इतिहास क्या है, क्यूं ये रिवायत शुरू करनी पड़ी। इसके पीछे का लॉजिक क्या था। तलाक और फिर निकाह और फिर तलाक की थ्योरी क्या है? या फिर किसी पैगम्बर या खलीफा की पत्नी का भी कभी हलाला निकाह हुआ था या नहीं ? बहरहाल स्थिति है तो बेहद गम्भीर और शर्मनाक।हलाला इस्लाम धर्म की एक ऐसी प्रथा है जो काफी निंदनीय कही जा सकती है। इसमें एक तलाकशुदा पत्नी को अपने पति से दोबारा निकाह करने के लिए, उससे पहले किसी दूसरे मर्द से निकाह करना पड़ता है। यही नहीं उसके साथ हमबिस्तरी भी जरूरी है। यानि निर्दोष होते हुए भी काल का ग्रास महिला को ही बनना है। पति के कुसूर की सजा पत्नी को, क्योंकि वह महिला है। यह तो एक तरह का यौन उत्पीड़न ही है। अर्थात महिला के यौन उत्पीड़न की खुली छूट।” ‘हुश्न तवस्सुम निहाँ‘ का आलेख ……

खुदा-ए-सुखन, ‘मीर-तकी-मीर: आलेख (एस तौहीद शहबाज़)

खुदा-ए-सुखन, ‘मीर-तकी-मीर: आलेख (एस तौहीद शहबाज़)

एस. तौहीद शहबाज़ 1 2018-11-18

यह बात याद रखने योग्य है कि हिन्दी और उर्दू भाषा के निर्माण के इतिहास में अठाहरवीं शताब्दी, जो मीर की शताब्दी है, सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। उस समय तक भाषा का नाम केवल हिन्दी था । कभी-कभी उसे जबान-ए-देहलवी भी कहा जाता था। इसका सबसे अधिक विश्वस्त रूप उर्दू लिपि में और उर्दू शायरी के रूप में निखर रहा था । इस शताब्दी में यह जुबान स्थानीय बोलियों की हदबंदी से आजाद होकर हिन्दुस्तान व्यापी जबान बन गयी। हिन्दी के संत कवियों और उर्दू के सूफी शायरों ने जनता की बोलियों को अपनाया और कबीर, मीरा, जायसी, सूरदास, तुलसीदास, वली दकनी, सौदा और मीर ने उच्चश्रेणी के शाहकार पेश किए जो दुनिया की दूसरी भाषाओं की उच्चश्रेणी शायरी से आंखें मिला सकते हैं। ……. बीते 21 सितम्बर को ‘मीर-तकी-मीर’ की पुण्यतिथि पर ‘एस तौहीद शहबाज़’ का आलेख …..

मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी: आलेख (सुशील कुमार भारद्वाज)

मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी: आलेख (सुशील कुमार भारद्वाज)

सुशील कुमार भारद्वाज 3 2018-11-18

एक इंसान की खुशी दूसरे की भी खुशी हो, कोई जरूरी तो नहीं. जैसे इस दुनियां में सुंदरता और संतुष्टि का कोई निश्चित पैमाना नहीं है ठीक उसी प्रकार खुशी का कोई निश्चित स्वरूप या पारामीटर नहीं है. खुशी हमें हर उस क्षण से मिल सकती है जिस पल हम स्वयं को आनंदित करते है. परिवार, दोस्त, सहकर्मी या फिर जीवन में मिलने वाले हर प्राणी से निष्पक्ष एवं निष्कलुष भाव से मिलते हैं. जहां हम कुछ वापस पाने की आस लगाने की बजाय परोपकार या सहयोग की भावना से कार्य करते हैं. जब हम अपनी स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रकृति के हर जीव –जंतु के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से गुरेज करते हैं. स्वर्ग की परिकल्पना खुशी की ही भूमि पर तैयार की जाती है जहां मनुष्य सारी चिंताओं और विध्न-बाधाओं से दूर हो सिर्फ भोग-विलास में खोया रहना चाहता है. जबकि सभी जानते हैं कि किसी चीज में हमारी आसक्ति ही हमारे खुशी के विनाश का कारण बनती है. कुछ लोग कहते हैं कि मनुष्य के पास होने से खुशी मिलती है तो कोई कहता है दूर रहने से. जबकि खुशी का सम्बन्ध नजदीकी और दूरी से नहीं है….

मानवीय करुणा का उच्च शिखर है परसाई का व्यंग्य: आलेख (सुरेश क़ांत)

मानवीय करुणा का उच्च शिखर है परसाई का व्यंग्य: आलेख (सुरेश क़ांत)

सुरेश कान्त 2 2018-11-18

जीवन की व्याख्या के लिए एक विचारधारा की अनिवार्यता बताते हुए परसाई लिखते हैं, “एक ही बात की व्याख्या भिन्न–भिन्न लोगों के लिए भिन्न–भिन्न होती है. इसलिए एक विचारधारा जरूरी है, जिससे जीवन का ठीक विश्लेषण हो सके और ठीक निष्कर्षों पर पहुंचा जा सके. इसके बिना लेखक गलत निष्कर्षों का शिकार हो जाता है. मेरा विश्वास मार्क्सवाद में है. यहीं से प्रतिबद्ध लेखन का विवादास्पद प्रश्न खड़ा हो जाता है. प्रतिबद्ध लेखन को जो पार्टी–लेखन मानते हैं, वे अनजाने या जान–बूझकर भूल करते हैं. प्रतिबद्धता एक गहरी चीज है, जो इस बात से तय होती है कि समाज में जो द्वंद्व है, उसमें लेखक किस तरफ खड़ा है—पीड़ितों के साथ या पीड़कों के साथ. कोई यह स्वीकार नहीं करेगा कि वह पीड़कों के साथ है. पर यदि वह अपने को किनारे की या बीच की स्थिति में रख लेता है, तो निश्चित रूप से पीड़कों का साथ देता है. अपने पक्ष के निर्वाचन से कोई बचाव नहीं, सिवा छल के. …जो जीवन से तटस्थ है, वह व्यंग्य–लेखक नहीं, जोकर है.”

आदर्श समाज की परिकल्पना-संत रैदास: आलेख (शिवप्रकाश त्रिपाठी)

आदर्श समाज की परिकल्पना-संत रैदास: आलेख (शिवप्रकाश त्रिपाठी)

शिव प्रकश तिरपाठी 3 2018-11-18

रविदास ने ऐसे समाज की परिकल्पना की जिसमें कोई ऊंच-नीच, भेदभाव, राग-द्वेष न हो। सभी बराबर हो सामाजिक कुरीतियों न हो, जिसे कालान्तर में महात्मा गांधी द्वारा रामराज्य की अवधारणा के रुप में महत्व मिला। संत रैदास के काव्य में आदर्श राज्य के लिए चिंतित दिखते है। उन्होंने राज्य के आवश्यक तत्वों पर विचार किया तथा उनकी नई व्यवस्था करके बेगमपुर शहर की परिकल्पना की। हम इनके इस परिकल्पना को इनके काव्य में देख सकते है। आपने आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक तीनों क्षेत्रों में अपने विचार व्यक्त किये है।…. संत रविदास की जयंती पर शिव प्रकाश त्रिपाठी का विस्तृत आलेख ..|

एक ‘मलाल’ यह भी: आलेख (सौरभ शेखर)

एक ‘मलाल’ यह भी: आलेख (सौरभ शेखर)

सौरभ शेखर 6 2018-11-18

“आखिर आत्म-कथाओं में ऐसा क्या होता है कि वे साहित्य ही नहीं साहित्येतर पाठकों को भी आकर्षित करती हैं. क्या दूसरों की ज़ाती ज़िन्दगी में ताक-झाँक और उससे उत्पन्न ‘विकेरिअस प्लेज़र’ इस आकर्षण के मूल में होता है? या प्रसिद्ध और कामयाब शख्शियतों की ज़िन्दगी से जुड़े संघर्षों, उनकी दुविधाओं, उनकी नाकामियों, उनके मान-अपमान में कहीं हम अपनी साधारण सी ज़िन्दगी का कोई अक्स तो नहीं ढूंढ रहे होते; अपने सच और झूठ के प्रिज्म से दूसरों के सच-झूठ तो नहीं तलाश रहे होते ?” मन्नू भंडारी की आत्म-कथा ‘एक कहानी यह भी’ का आलोचनात्मक दृष्टि से गहन, गंभीर विश्लेष्ण कर रहे हैं ‘सौरभ शेखर‘ …..| – संपादक

महिला लेखन की वर्तमान पीढ़ी: स्त्री लेखन, एक पुनर्पाठ: समीक्षालेख (संजीव चंदन)

महिला लेखन की वर्तमान पीढ़ी: स्त्री लेखन, एक पुनर्पाठ: समीक्षालेख (संजीव चंदन)

संजीव चन्दन 2 2018-11-18

हिंदी की पांच महिला रचनाकारों की कहानियों को पढ़ना और उनके आधार पर युवा पीढ़ी के लेखन के केंद्रीय स्वर और सरोकार को समझना एक तुलनात्मक आधारभूमि पर सम्भव हो सका है और सुकूनदाई भी है कि हिंदी की रचनाकार ‘स्त्रीवाद के नारों ‘ से प्रभावित हुए बिना ‘पितृसत्तात्मक समाज ‘ की जटिल संरचना को समझती हैं, अपनी पूर्वाजाओं की तुलना में इन रचनाकारों के समय का यथार्थ जटिल हुआ है, गाँव अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं, मध्यकालीन प्रवृतियाँ अपने को पुनर्जीवित भी कर रही हैं, ‘पितृसत्ता ‘ पर यदि कुठाराघात हुए हैं, तो उसके वर्चस्व की स्थितियां और भी सूक्ष्म हुई हैं। मध्यम वर्ग फैला है, तो गरीबी उसी तुलना में और विकराल हुई है।‘ हमारे समय की पांच महिला लेखिकाओं के साहित्यिक पुनर्पाठ पर ‘संजीव चन्दन‘ का समयानुकूल तुलनात्मक आलेख ….

नाक के नीचे : आलेख (रूपाली सिन्हा )

नाक के नीचे : आलेख (रूपाली सिन्हा )

रुपाली सिन्हा 3 2018-11-18

समय बीतने के साथ मेरी नाक के नीचे इतनी चीज़ें इकट्ठी हो गयी थीं कि अब देखने में मुश्किल होने लगी थी। आहिस्ता आहिस्ता मानो नज़र धुंधली पड़ने लगी थी और ज़बान? जब नज़र ही साफ़ न हो तो बोलने का क्या अर्थ रहता है? वैसे भी लम्बे समय से सिर्फ जवाब देते-देते सवाल करना मैं लगभग भूल चुकी थी, या शायद करना ही नहीं चाहती थी। असफल कहलाते- कहलाते अब सफलता से पहचान भी मिट ही गयी थी। वैसे यह मेरी अपनी सोची-समझी रणनीति थी। एकबार ‘असफल’ बन जाने के बाद आपसे सारी अपेक्षायें समाप्त हो जाती हैं। धीरे-धीरे आप खुद से भी कोई अपेक्षा रखना भूल जाते हैं। कितनी बेफिक्री का एहसास होता है। आप चैन की बंसी बजाते हैं क्योकि आपको खुद को साबित नहीं करना…..

वर्तमान सांस्कृतिक परिदृष्य में रंगकर्म की चुनौतियाँ: आलेख (राजेश कुमार)

वर्तमान सांस्कृतिक परिदृष्य में रंगकर्म की चुनौतियाँ: आलेख (राजेश कुमार)

राजेश कुमार 4 2018-11-18

लेखक और कलाकार आम जनता से अलग-थलग होने लगे। एकांकी जीवन व्यतीत करने लगे। सामूहिकता व्यक्तिवाद में तब्दील होने लगा। मुगालते में रहने लगे कि जनता के बीच जाने की जरूरत क्या है? अगर जनता के विचार की जरूरत भी होगी तो यहां के बदले कहीं और से भी आयतित किया जा सकता है। साम्प्रदायिकता, जनतंत्र का अस्तित्व, विज्ञान की समसामयिकता पर अगर बल देना भी हो तो उन्हे मिथक या किसी और वाह्य प्रतीकों द्वारा कलात्मक ढंग से लाकर प्रगतिशीलता बरकरार रखी जा सकती है। आज जमीनी सच्चाई के यथार्थ से बचकर कहीं और की सच्चाई दिखाने का साहित्य-कला में खूब प्रचलन है। और ऐसी कला की खूबी ये है कि प्रगतिशील और प्रतिगामी दोना पक्ष एक साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। जनता पहचान ही नहीं पाती है कि कौन कलाकार हमारे पक्ष का है, कौन सी कलाकृति हमारी बात कर रही है? इस तरह का जो संशय आज है, इसको तोड़ना भी आज के सांस्कृतिक आंदोलन की जबरदस्त चुनौती है………..|

हाल ही में प्रकाशित

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 12 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

विजय शर्मा 26 2018-12-04

‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।

नोट-

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