अशोक तिवारी की लंबी कविताएँ स्त्री जीवन के क्षणिक और स्थायी अनुभवों, कुंठा, अवसाद और प्रेम के भावात्मक आरोह-अवरोह का सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक संदर्भों में संवेदनशील विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं।
1- वो औरत
विस्मृत नहीं हो पाती
घूंघट काढे़ वो औरत
जो पशुओं की लीद
अपने सिर पर ढोकर
गांव बाहर घूरे तक जाती है
जिसके क़दम फिर
घर की दहलीज के अंदर नहीं आते
मुड़ जाती है
रेलगाड़ी की आवाज़ की तरफ़
खिंचकर चली आती है
मेरी स्मृतियों में वो औरत
जिसकी चिंदी-चिंदी
पटरियों के इर्द-गिर्द बिखरी हैं
खुद को खत्म करने की
उसकी जिद
उस दिन पूरी हुई
पूरा हुआ उसका
अपना वायदा
जो किया था उसने अपने मन में
खत्म करने का सब कुछ
क्षणिक आवेग में
हावी हुई थी कमज़ोरी उसके ऊपर
हो सकता है यह
बहस का मुद्दा कि
पहले उसके सपनों की गठरी को
कुचला था रेलगाड़ी के पहियों ने
या उसे खुद!
क्या था जो
खींच ले गया था उसे
पटरियों पर
चुंबक के आकर्षण की तरह
क्या था कि दुर्गा के हाथों से
गिर गई कटार
शादी से पहले
नाजों में पली वो लड़की
जो लाड़ली थी सबकी
संभालती थी पूरा घर
मां की मौत के बाद
पढ़ा था उसने हरफ़े-मानवता
क्यों बन गई कामचोर
कमज़ोर
आलसी और बेहया,
कुछ न करने की तोहमत
क्यों लगाई गई उस पर
सब काम करने और
एक के बाद एक कई
बच्चे जनने के बाद भी
निरीह और अबला
कैसे हो गई वो
भरपूर ताक़त और
विश्वास के बावजूद
वो औरत जो
करती थी पूरे घर का काम
नहीं करती थी आराम
सुबह जगने से
रात सोने तक बनी रहती थी
उसकी घिरनी
काम का
पुरातन बोझ
मूल्यों का
पुरातन भार
रूढ़ियों की
पुरातन साजिश में
वो शरीक थी
जो चाहती थी करना सब कुछ
वो अपनी ज़मीन में
ज़ुल्म के ख़िलाफ़
विद्रोह का एक बीज
अंकुरित करना चाहती थी
समेट लेना चाहती थी अपने
आंचल में दुनिया की
तमाम हसरतें
छूना चाहती थी
उच्चतम शिखर की चोटी
वो खपना चाहती थी दिन रात
कुछ न कुछ करते हुए
अपने गंजेड़ी पति की मार
और घर की दुत्कार के बाद भी
स्मृति की खोह में
मुझे अक्सर
एक दरकी हुई ज़मीन
नज़र आती है
जहां से गुज़री थी वो
अपनी अंतिम
बड़बड़ाहट और ग़ुस्से के साथ
और दिखाई देते हैं
उसी ज़मीन से
उपजते हुए अनगिनत हाथ
न्याय की मांग करते हुए !!
2. बुरक़ा
लाखों-करोड़ों निगाहों से बचती
बुरक़े में लिपटी वो औरत
मोटर साइकिल पर पीछे बैठकर
रोज़ काम पर जाती है
सीधे जाती है
सीधे आती है
उसकी पहचान उसके नाम से नहीं
बुरक़े से है
उसका धर्म-उसकी जाति
उसके काम
से नहीं
बुरक़े से है
वो औरत
जो लिपटी है बुरक़े में
बंद कर दी गई हैं उसके लिए
सभी खिड़कियां
पहुंच नहीं पाती
रोशनी की कोई किरण उस तक
पीलिया से ग्रस्त है वो
चाहिए उसे विटामिन-डी
खुद को बनाए रखने के लिए
बुरक़े में लिपटी वो औरत
नहीं जानती
बुरक़े में लिपटने का
असली मंतव्य
नहीं जानती
किन-किन हाथों ने स्पर्श किया है
बुरक़े को बुनते वक़्त
वो जानना भी नहीं चाहती
रेशम के तागों का इतिहास
स्वीकार कर लिया है उसने
उन तागों से बंधना,
लिपटना
स्वीकार ही स्वीकार है
उसका धर्म
सहमति ही सहमति है
उसका कर्त्तव्य
‘ना’ शब्द उसकी शब्दावली का
हिस्सा नहीं है
बुरक़े का परदा और
परदे की अपारदर्शिता के चलते
वंचिता ठहराए जाने की
कोशिश के ख़िलाफ़
वो चुप है
और चुप रहकर करती है
समर्थन समर्पण का
परंपरा के नाम पर
अर्पण का
वो मां है
बहन है
बीवी है किसी की
जुड़ा है उसके साथ जो भी
उसे पहचान देने के लिए ही
उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है
कोई मान नहीं है
पुरुष के हाथों वह
कंप्यूटर के स्क्रीन की आइकॉन है
समूची की समूची वह
पुरुष के लिए है
पुरुष है तो उसका मान है
सम्मान है
पुरुष है तो उसकी परिभाषा है
नहीं अगर पुरुष
उसकी पहचान भर के लिए
नहीं है हक़ उसे ज़िंदा रहने का भी
पुरुष है तो वो हँस सकती है
इतरा सकती है
कुलांचें भर सकती है
पुरुष के इशारे पर
पुरुष ही है जिसका दंभ
तोड़ता है स्वामित्व के अभिमान की
असीमित हदें
बुनता है बुरक़े की अपारदर्शिता
पुरुष ही है जो
डाल देता है उसकी नाक मेें नकेल
अपनी नाक ऊंची रखने के लिए
डाल देता है बढ़ते क़दमों में
बजती हुई पायजेब
गोद देता है तमाम निशानियां
औरत की कोमल त्वचा में
ख़ूबसूरती के नाम पर
औरत के लिए ये
तमाम बंधन पुरुष के
स्वयं न बढ़ पाने की
विवशता का प्रतीक हैं
ऐसा नहीं है कि
ख़ूबसूरत चीज़ों को देखकर
वाह! न करता हो उसका मन
सही बात के समर्थन के लिए
न छटपटाता हो
न करता हो चीख़-चीख़कर
तकाजा संघर्ष का उसका ज़मीर
पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के ख़िलाफ़
यक़ीन है मुझे
मांगेंगी दुनिया की औरतें
अपने काम का हिसाब
जब एक दिन
ये धरती एक तरफ झुक जाएगी
और कहेंगी तनी मुट्ठी के साथ
वे औरतें
हमें बुरक़ा नहीं-रोशनी चाहिए।
3. मज़दूर औरत
एक औरत
जिसने नहीं पढ़ी है कोई कविता
नहीं जाना है कविता का महत्त्व
नहीं समझा है कविता का
अनुपम संसार
उसका समूचा जीवन
खुद एक कविता है मगर
उस औरत के घूंघट के अंदर का चेहरा
यक़ीनन बहुत कुछ कहता है
जो बहुमंजिली इमारत को बनाने के लिए
अपने सास ससुर और जेठ के साथ
काम पर आई है
सुबह-मुंह-धुंधलके में
रोटी बनाई है
खाई है-खिलाई है
दो रोटी मैले कपड़े में
बांधकर लाई है
बच्चे को संभाला है
पति को एक और काम पर निकाला है
निकल आई काम पर –
वह खुदाई करती है
मिट्टी ढोती है
गारा बनाती है
ईंटें उठाती है
मगर उसकी निगाह
रहती है बच्चे पर बराबर
वह लेटा है बालू के ढेर पर
रेत में कुलेलें करता
बालक ईंट-उठा-उठाकर
घर बनाता है
कभी रोता है तो
कभी खिलखिलाता है
राल बह रही है उसकी
वह दूर से देख-देखकर खुश होती है
मगर ठेकेदार के डर से
अपने हाथों की तेज़ी को बरकरार रखती है
उसका अंतर्मन कहीं
गहरे में उसके दिमाग़ पर चोट करता है
जो कहता है कि इस बालक को
मालूम नहीं है
ईंटें जमाने का मतलब
घर खड़ा करने का अर्थ
बरसात में चूती झोंपड़ी का घर
मन में कौंध जाता है उसके
वह सर झटक देती है झट से
मालिक आ गया है
वह ठेकेदार पर बरस रहा है
ठेकेदार-मिस्त्री पर
मिस्त्री-मज़दूरों पर
वह तसले में और ज़्यादा बोझ लादती है
अपनी ईमानदारी का
कोई सबूत दे पाए शायद
तेज़ चाल से चलकर
भरा तसला पकड़ाती है अपने जेठ को
मगर खाली तसला लेते हुए
सोचती है वो इस बार
लड़का होगा या लड़की
लड़का हो-उसका अंतर्मन कहता है
मगर लड़की वो वाकई चाहती है
उसका सातवां महीना है यह
काम से लौटते हुए
कल शाम भूख में
बालक ने दीवारों को खरोंचा था
उसने महसूस किया था
कोई भी हो
मगर उसका मन करता है
ऐसे बालक को जन्म देने का
जो उसका अपना साथ दे
उसका मन
घूंघट से निकलकर
बाहर ठेकेदार से टक्कर लेने को करता है
कि क्यों पिस-पिसकर
घिस-घिसकर काम करने के बावजूद
मज़दूरी नहीं मिल पाती
भरपेट रोटी के लिए
बराबर और ज़्यादा काम करने के बाद भी
उसे कम मज़दूरी क्यों मिलती है आदमियों से।
उसका मन चाहता है
इन सवालों के जवाब
कि क्यों करते हैं
उसके जेठ और ससुर
उसकी मज़दूरी का सौदा
उसे पसंद नहीं है –
उसके काम का मोल कोई और करे-
अपनी इस असमर्थता पर
वह लज्जित नहीं, कुंठित है
ईंटों को ऊपर की मंज़िल पर
उछालते हुए
वह अपनी सीमा को
आंकना चाहती है कई बार
वह आसमान में
कितना ऊपर फैंक सकती है पत्थर
उसकी ललक है
आसमान के अंतिम छोर को
अपने पत्थर से छूने की
उसे वाजिब मज़दूरी की तलाश है
वह थकान से चूर-चूर होकर रखती है
अपने घर की देहरी पर जब क़दम
उसके शरीर की थकान
मन की थकान पर भारी होती है
वो थककर चूर-चूर हो जाना चाहती है
मन से भी
मगर कोई नहीं
जिसे उसके काम की तलाश हो
वो खोना नहीं चाहती भीड़ में
मगर खो जाती है।
रात की गरमाहट में
पति के साथ बतियाते हुए
कई बार लगता है उसे
बेकार हो रही ऊर्जा पर
बात करना
बेमानी है
बेमतलब है
वो पसरी आंखों से निहारती है
झौंपड़पट्टी के फूंस को
सहलाती है एक हाथ से
पास सो रहे बच्चे को
और दूसरे से
अपने भविष्य के सपने को
जिस पर छोड़ दिया उसने सब कुछ!
4. स्त्री के बारे में
मुझे लिखनी है एक कविता
स्त्री के काम करते हाथों के बारे में
दया नहीं, दान नहीं
अहसान नहीं
मुझे करनी है एक टिप्पणी
उसकी ऊर्जा के बारे में
जिसे उसने अपने अंदर समेटा है
जिस तरह उसकी ताक़त (ऊर्जा)
संचित होकर बन जाती है संघर्ष
जिस तरह ठंडी बूंदों का अहसास
भर देता है
व्याकुल मन में गरमाहट
जिस तरह उसके रात-दिन
बुनते है
जीवन की मुश्किल मगर खूबसूरत चटाई
मुझे उसका अहसास भरना है
अपने अंदर-उसी तरह
और लिखनी है एक कविता
जो स्त्री के घूंघट के अंदर
उसकी मुस्कान दर्ज कर सके
दर्ज कर सके उसकी सोच की मुद्रा
समझ सके उसके आह्वान को
पनीली आंखों के सपनों को समेट सके
ग़ुस्सा और आग उगलती आंखों की भंगिमा को पढ़ सके
और व्यक्त कर सके
उसकी उधेड़बुन और उसकी सोच को
जो मेहनताना पाने की ख़्वाहिश में
बैठी है- भूखी,प्यासी
व्यवसायी के पायताने,
बहुमंज़िली इमारत के नीचे
गारा बनाते वक़्त,
एक अदद ‘छत’ और एक अदद ‘रोटी’ का सपना पाले
जुटे हैं उसके हाथ
मुझे लिखनी है एक कविता उस स्त्री के बारे में
जो अपने बच्चों को
झुग्गी में या सड़क की पटरी पर
लावारिस छोड़कर काम पर आई है।
उस सपने की तासीर
महसूस करनी है मुझे अपने अंदर और
लिखनी है एक कविता
उस स्त्री के बारे में
जो वहां नहीं है
जहां उसे होना चाहिए।
5. विज्ञापन की औरत
दुनिया के सारे साबुन
औरतों के लिए हैं
सारी की सारी जींसें और पतलून
सारे के सारे क़लम
और सारे के सारे जूते
वैसे ही जैसे-
सभी सिगरेट
सारे टूथपेस्ट
सारे ब्लेड
और दुनिया की सारी की सारी घड़ियां
उनके लिए बनी हों जैसे
सिर्फ़ उनके लिए-
अजीब है ये कितना
खिलते हुए फूल के
असली रंग और महक तक
कितने हैं जो पहुंच पाते हैं
नहीं देखना चाहता है कोई असली चेहरा
विज्ञापन में दिखती हुई औरत का
उसके चेहरे पर ओढ़ी गई
मुस्कान के पीछे के असली मक़सद से
किसी को कोई मतलब नहीं
उसके हर झूठ को
उसके चहरे की मुस्कान से नाप लिए जाने का भ्रम
पाल लेता है हर कोई
उसी को मान लिया जाता है सच
पर सच …?
सच दूर दूर तक कहीं नहीं होता
न तो उस प्रोडक्ट में
जिसके लिए वो हो जाती है
ज़रूरत से ज़्यादा परोसी हुई
और नहीं उस ख़ूबसूरत दिखती
औरत की मुस्कान में
सच उसके तन में नहीं
मन की खोह में बसा होता है कहीं
जिसे उसने ख़ुद कर दिया है दफ़न
अपनी ज़रूरतों के चलते
पैसे के बल पर
उसे लगता है
बंद सींखचों से हो रही है वो बाहर
ये उतना ही बड़ा झूठ है
जितना बड़ा ये सच कि
घटाटोप मौसम उसे भा गया है
विज्ञापन में दिखती औरत को
अब झूठ को
पैसे में तब्दील करना आ गया है!
अशोक तिवारी
जन्म : 05/09/1963
लेखन विधाएं : कविता, कहानी, रेखाचित्र एवं लेख
कृतियां • सुभाषचंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (दो भागों में) • सुनो अदीब (कविता संग्रह)
• धार काफ़ी है (संपादन-जनकवि शील पर केंद्रित) • मुमकिन है (कविता संग्रह)
• दस्तख़त (कविता संग्रह) • सरकश अफ़सानेः जनम के चुनींदा नुक्कड़ नाटक (संपादन)
• समकालीन हिंदी कविता और सांप्रदायिकता (शीघ्र प्रकाश्य)
संपर्क : 17-डी, डी.डी.ए.फ़्लैट्स, मानसरोवर पार्क, शाहदरा
दिल्ली - 110032
फ़ोन - (011)22128079